सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
| २८० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
|---|
यागसाधनत्वं च बोधनीयमिति व्यापारभेदेन वाक्यभेदापत्तेः । सामाना- धिकरण्येनाऽन्वये वक्तव्ये प्रत्यक्षाविरोधाय 'सोमवता यागेन' इति मत्वर्थ- लक्षणा न कल्पनीया । उभयत्राऽपि सत्यपि प्रत्यक्षविरोधे तदनादृत्याऽऽ- गमेन बलीयसा प्रस्तरे यजमानाभेदस्य, यागे सोमाभेदस्य च सिद्धि- सम्भवादिति चेत्,
अत्राऽऽहुर्भामतीकृतः ॥ ८ ॥
मानान्तराद्बलवती श्रुतिस्तात्पर्यगोचरे ।
अन्यत्र त्वविरुद्धार्थे देवताविग्रहादिके ॥ ९ ॥
इस आक्षेपके समाधानमें भामतीकार कहते हैं कि तात्पर्यविषयपदार्थमें अन्य प्रमाणोंसे श्रुति बलवती है और अन्यत्र देवताशरीर आदि अविरुद्ध अर्थमें श्रुतिप्रमाण है ॥ ८ ॥ ९ ॥
अत्रोक्तं भामतीनिबन्धे—तात्पर्यवती श्रुतिः प्रत्यक्षात् बलवती
साधनत्वकी कल्पना करनी होगी, अतः व्यापारके भेदसे वाक्यभेद प्रसक्त होगा, यदि सामानाधिकरण्यसे अन्वय किया जायगा, तो प्रत्यक्षसे विरोध होगा, अतः मत्वर्थमें लक्षणा करनी होगी, परन्तु अब प्रत्यक्षके साथ अविरोधके लिए मत्वर्थमें लक्षणा करनेकी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि दोनों स्थलोंमें प्रत्यक्ष विरोध होनेपर भी उसकी परवा न कर बलवान् आगमप्रमाणसे प्रस्तरमें यज- मानका अभेद और यागमें सोमका अभेद सिद्ध हो सकता है ।
परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि इस विषयमें भामतीकारने कहा है कि तात्पर्यसे युक्त श्रुति ही प्रत्यक्षसे बलवती होती है, श्रुतिमात्र ( सब श्रुति ) बलवती * नहीं होती है । मन्त्रोंका और अर्थवादवाक्योंका स्तुतिके
* जब तात्पर्यवाली श्रुति ही प्रमाण है, तो 'सोमेन यजेत' इत्यादि श्रुतियोंका सोम और याग आदिके सम्बन्धमें तात्पर्य न होनेसे श्रुतिकी अपेक्षा प्रत्यक्ष ही बलवान् होगा, इसलिए प्रत्यक्षके साथ विरोधके परिहारके लिए सोमशब्दकी मत्वर्थमें लक्षणा करनी चाहिए, वैसे ही 'यजमानः प्रस्तरः' यह श्रुति भी, स्वार्थमें तात्पर्य न होनेसे, गौणार्थक ही माननी चाहिए, प्रपञ्चमें मिथ्यात्वप्रतिपादक श्रुतियोंका स्वार्थके प्रतिपादनमें ही तात्पर्य होनेसे प्रत्यक्षकी अपेक्षा श्रुति ही बलवती होती है, अतः उन श्रुतियोंसे प्रत्यक्षका बाध होना अनिष्टकारक है, यह समाधानका भाव है ।
प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २८१
न श्रुतिमात्रम् । मन्त्रार्थवादानां तु स्तुतिद्वारभूतेऽर्थे वाक्यार्थद्वारभूते पदार्थे इव न तात्पर्यम् । तात्पर्याभावे मानान्तराविरुद्धदेवताविग्रहादिकं न तेभ्यः सिध्येत् । तात्पर्यवत्येव शब्दस्य प्रामाण्यनियमादिति चेत्, न;
द्वारभूत अर्थमें अर्थात् विधान करनेके लिए अभीष्ट अर्थोंकी स्तुति आदिके द्वारभूत † अर्थमें वाक्यार्थके द्वारभूत पदार्थके समान तात्पर्य नहीं होता है । यदि ‡ शङ्का हो कि मन्त्र और अर्थवादोंका स्वार्थके प्रतिपादनमें अगर तात्पर्य नहीं है, तो मानान्तरसे (प्रत्यक्ष आदि अन्य प्रमाणोंसे) अविरुद्ध देवताओंके शरीर आदिकी उन वाक्योंसे सिद्धि नहीं होगी ? क्योंकि तात्पर्यविषय अर्थमें ही शब्दका (श्रुतिका) प्रामाण्य है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि
† मन्त्रादिका स्वार्थमें, फल न होनेसे और गौरव होनेसे, तात्पर्य नहीं है, इसलिए 'देवस्य त्वा' इत्यादि मन्त्रोंकी और 'यजमानः प्रस्तरः' इत्यादि अर्थवादोंकी विधेयगत स्तुतिमें ही लक्षणावृत्तिका आश्रयण करना चाहिए । इस अवस्थामें द्रव्यदेवतादिरूप मन्त्र आदि वाक्यार्थोका लक्षणायोग्य स्तुतिके साथ सम्बन्ध करना चाहिए, इसलिए स्तुतिमें लक्षणाका मन्त्र आदिका अर्थ द्वारभूत है, जैसे कि गङ्गापदकी तीररूप अर्थमें जो लक्षणा है उसमें प्रवाहरूप अर्थ द्वारभूत है अथवा वाक्यार्थके तात्पर्यसे प्रयुक्त पदोंका वाक्यार्थके ज्ञानमें द्वारभूत स्मारित पदोंका अर्थ द्वार है, परन्तु गङ्गाशब्दका तात्पर्य प्रवाहमें नहीं है और वाक्योंका तात्पर्य स्मारित पदार्थोंमें नहीं है, वैसे ही मन्त्र आदिका भी स्तुतिके द्वारभूत स्वार्थोंमें तात्पर्य नहीं है, इससे तात्पर्यरहित मन्त्रवाक्योंका प्रत्यक्षप्रमाणके अनुकूल ही अर्थ करना चाहिए, यह भाव है ।
‡ शङ्काका तात्पर्य यह है कि यदि मन्त्र, अर्थवाद आदिका स्वार्थमें तात्पर्य न माना जाय, तो देवताओंके शरीरोंको बतलानेवाले 'वज्रहस्तः पुरन्दरः' (वज्र है हाथमें जिसके, ऐसे पुरन्दर) इत्यादि अर्थवादोंका देवताके विग्रह आदि स्वार्थमें तात्पर्य न होनेके कारण देवताओंके शरीरका ज्ञान उन वाक्योंसे नहीं होता, क्योंकि वेदतात्पर्यविषयत्व वेदजन्य-यथार्थज्ञानविषयत्वके प्रति व्यापक है अर्थात् जहां जहां वेदजन्य यथार्थ ज्ञानकी विषयता रहेगी, वहां वहां वेदकी तात्पर्यविषयता अवश्य रहेगी, प्रकृतमें वेदके तात्पर्यकी विषयता नहीं है, अतः देवताके शरीरमें भी वेदजन्य यथार्थ ज्ञानकी विषयता नहीं रहेगी, क्योंकि व्यापकके अभावसे व्याप्यके अभावका ज्ञान होता है, इस अवस्थामें तात्पर्यवती ही श्रुति प्रमाण है, इस नियमके होनेसे 'वज्रहस्तः' इत्यादि वाक्यसे बोधित इन्द्रका शरीर सिद्ध नहीं होगा ।
३६
२८२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद
'एतस्यैव रेवतीषु वारवन्तीयमग्निष्टोम साम कृत्वा पशुकामो ह्येतेन यजेत' इति विशिष्टविधेस्तात्पर्यागोचरेऽपि विशेषणस्वरूपे प्रामाण्यदर्शनेन उक्तनियमासिद्धेः। अत्र हि रेवतीऋगाधारं वारवन्तीयं साम विशेषणम्। न चैतत् सोमादिविशेषणवल्लोकसिद्धम्। येन तद्विशिष्टयागविधिमात्रे प्रामाण्यं वाक्यस्य स्यात्। नाऽपि विशिष्टविधिना विशेषणाक्षेपः। आक्षेपाद्विशेषणप्रतिपत्तौ विशिष्टगोचरो विधिः। तस्मिंश्च सति तेन विशेषणाक्षेपः इति परस्पराश्रयापत्तेः। अतो विशिष्टविधिपरस्यैव वाक्यस्य विशेषणस्वरूपेऽपि
'एतस्यैव०' ❋ इत्यादि विशिष्टविधिके—तात्पर्यका विषय न होनेपर भी विशेषण-स्वरूपमें—प्रामाण्यके देखनेसे पूर्वोक्त नियम नहीं हो सकता है। प्रकृतमें रेवती नामकी ऋचाओंमें वारवन्तीयनामक साम विशेषण है, परन्तु यह † वारवन्तीय साम सोम आदि विशेषणके समान लोकसिद्ध नहीं है, जिससे कि उक्त साम-विशिष्ट यागकी विधिमात्रमें वाक्यका प्रामाण्य हो। और विशिष्टविधिसे विशेषणका आक्षेप भी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि आक्षेपसे विशेषणके ज्ञात होनेपर विशिष्टविधि होगी और विशिष्टविषयकविधिके ज्ञात होनेपर उससे विशेषणका आक्षेप होगा, इस प्रकार ‡ अन्योन्याश्रय प्रसक्त होगा। इससे विशिष्टविधिके
❋ 'एतस्यैव०' (रेवत्यधिकरणवाले वारवन्तीयनामक सामसाध्य अग्निष्टोमस्तोत्रविशिष्ट प्रकृत अग्निष्टुद् धर्मवाले यागसे पशुकी अभिलाषा करनेवाला इष्ट सम्पादन करे) रेवती ऋचा—जिसमें 'रे' शब्द आता है, ऐसी 'रेवतीनः' इत्यादि ऋचा। वारवन्तीयम्—'अश्वं न त्वा वारवन्तम्' इस ऋचामें गेय साम। अग्निष्टोम साम—'यज्ञा यज्ञा वो अग्नय' इसमें गेय साम। प्रकृतमें इस रेवत्याधारऋचारवन्तीयसामादिविशेषणविशिष्ट क्रतुभावनाविधिका तात्पर्यविषय विशेषणस्वरूप नहीं है, परन्तु विशेषणस्वरूपमें प्रामाण्य होनेसे उक्त नियम अर्थात् शब्दतात्पर्यविषयत्व शाब्दप्रमितिविषयताके प्रति व्यापक है, यह नियम सिद्ध नहीं हो सकता है, इसी ग्रन्थका 'अत्र हि' इत्यादि ग्रन्थसे विवरण किया गया है।
† रेवती ऋचाधारक वारवन्तीयनामक साम विशेषण है, और यह किसी लौकिक प्रमाणसे प्राप्त नहीं है, यदि वह किसी लौकिक प्रमाणसे प्राप्त होता, तो वारवन्तीय सामरूप विशेषणकी दधि आदिके समान लोकतः प्राप्ति होनेसे 'एतस्यैव' इत्यादि वाक्यका उससे अतिरिक्त अर्थमें प्रमितिजनकत्वरूप प्रामाण्य होता, परन्तु ऐसा नहीं है, क्योंकि वारवन्तीय साम अन्य ऋचाओंमें अध्ययनसिद्ध है, अतः उक्त वाक्यसे ही रेवतीऋचाधारकवारवन्तीयसामरूप विशेषणकी प्रमिति कहनी चाहिए, यह भाव है।
‡ तात्पर्य यह है कि विशेषणगुणविषयक विधिकी कल्पनाके पूर्वमें विशिष्टविधिसे विशेषणका स्वरूप प्रमित है या नहीं? प्रथम पक्ष मानें, तो विशेषगोचरविधिकी कल्पना व्यर्थ है द्वितीय
प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २८३
प्रामाण्यं वक्तव्यम् । अथ च न तत्र तात्पर्यम् । उभयत्र तात्पर्ये वाक्यभेदापत्तेः ।
एवमर्थवादानामपि विधेयस्तुतिपराणां स्तुतिद्वारभूतेऽर्थे न तात्पर्यमिति तेभ्यः प्रत्यक्षस्यैव बलवत्त्वात् तद्विरोधाय तेषु वृत्त्यन्तरकल्पनम् । 'सोमेन यजेत' इत्यत्र विशिष्टविधिपरे वाक्ये सोमद्रव्याभिन्नयागरूपं
बोधक वाक्यमें ही विशेषणके स्वरूपमें भी प्रामाण्य कहना चाहिए, यदि कहोगे कि वहां तात्पर्य नहीं है, तो दोनों जगहोंमें तात्पर्यको माननेसे वाक्यभेदकी आपत्ति * प्रसक्त होगी ।
विशिष्टविधिके विशेषणस्वरूपके समान अर्थात् जैसे विशिष्टविधि-बोधकवाक्यका विशिष्टद्वारा विशेषणांशमें प्रामाण्य है, स्वतः नहीं है, वैसे अर्थ-वाद वाक्योंका भी, जो विधेयभूत अर्थके स्तावक हैं, स्तुतिद्वारभूत अर्थमें, तात्पर्य नहीं है [तथापि देवताओंके शरीर आदिके ज्ञानके प्रति कारण हो सकते हैं] †, इसलिए तात्पर्यरहित उन मन्त्र और अर्थवादोंकी अपेक्षा प्रत्यक्षप्रमाण ही बलवान् है, अतः उनके ( प्रत्यक्ष आदिके ) साथ अविरोधके लिए मन्त्र और अर्थवाद आदिकी अन्यवृत्ति माननी चाहिए । 'सोमेन यजेत' इत्यादि विशिष्टविधिके बोधकवाक्यमें यदि 'सोमलतारूप द्रव्यसे अभिन्न यागरूप
पक्ष मानें, तो विधिका आक्षेप हो ही नहीं सकता है, क्योंकि जो प्रमित है अर्थात् जिसका यथार्थ ज्ञान हुआ है, ऐसा द्रव्यदेवतासम्बन्धयागविधिका आक्षेपक होता है, इस अवस्था में विशिष्टविधिसे विशेषणविधिका आक्षेप है, इस प्रकार जो कहनेवाला है उसको आक्षेपसे पूर्वमें विशेषणको जानना चाहिए, उसका प्रमापक कौन है ? इस शङ्कामें आप कल्पित विधिको ही प्रमापक मानेंगे, इससे आक्षिप्तविधिसे विशेषणस्वरूपके ज्ञात होनेपर प्रकृत विधि विशिष्ट विषयक होगी और उस विधिके विशिष्टविषयक होनेपर उस विशिष्टविधिसे विशेषणविधिका आक्षेप होगा, इसलिए परस्पराश्रय दोषकी प्रसक्ति होनेसे विशेषणविधिका आक्षेप ही असिद्ध होगा ।
* यदि प्रकृतमें कोई शङ्का करे कि 'यत्परः शब्द स वाक्यार्थः' (वही शब्दका अर्थ होता है जो शब्द तात्पर्यसे गम्य होता है ) इस नियमके अनुसार उक्त वाक्योंका तथाकथित अर्थोंमें (विशेषण आदि अर्थोंमें) तात्पर्य न होनेसे उनका बोध नहीं होना चाहिए, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'यत्परः' इत्यादि नियम औत्सर्गिक है, और गौरवसे बाध भी होता है, यह भाव है ।
† इसलिए जैसे तात्पर्यके अविषय रेवती वारवन्तीय विशेषणस्वरूप अर्थमें भी श्रुति प्रमा उत्पन्न करती है, वैसे अन्यपरक मन्त्र भी देवताके शरीर आदिका बोध करते हैं, अतः देवताधिकरणके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है ।
| २८४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
|---|
विशिष्टं विधेयमित्युपगमे तस्य विधेयस्य ‘दध्ना जुहोति’ इत्यादौ विधेयस्य दध्यादेरिव लोकसिद्धत्वाभावेन विधिपराद्वाक्यादेव रेवत्याधारवारवन्तीयविशेषणस्येव विना तात्पर्यं सिद्धिरेष्टव्या । नहि तात्पर्यविरहितादागमाद्यागसोमलताभेदग्राहिप्रत्यक्षविरुद्धार्थः सिध्यतीति तत्राऽपि तद्विरोधाय मत्वर्थलक्षणाश्रयणम् ।
अद्वैतश्रुतिस्तु उपक्रमोपसंहारैकरूप्यादिषड्विधलिङ्गावगमिताद्वैततात्पर्या प्रत्यक्षाद् बलवतीति ततः प्रत्यक्षस्यैव बाधः, न तद्विरोधाय श्रुतेरन्यथानयनमिति ।
कथंचिद्विषयप्राप्त्या मानान्तरसमर्थने ॥
श्रुतिर्बलीयसी नो चेद्विपरीतं वलावलम् ॥१०॥
यदि प्रत्यक्ष आदिकी व्यावहारिक विषयोंसे उपपत्ति हो सकती है, अतः प्रत्यक्ष आदिकी अपेक्षा श्रुति ही बलवती है । व्यावहारिक विषयोंसे प्रत्यक्ष आदिकी उपपत्ति न हो, तो बल और अबल विपरीत होंगे याने निरवकाश होनेसे श्रुतिकी अपेक्षा प्रत्यक्ष आदि ही बलवान् होंगे ॥१०॥
विवरणवार्तिके तु प्रतिपादितम्—न तात्पर्यवत्त्वेन श्रुतेः प्रत्यक्षात् प्राबल्यम् । ‘कृष्णलं श्रपयेद्’ इति विधेः श्रपणस्य कृष्णलार्थत्वप्रतिपादने विशिष्टका विधान मानेंगे, तो उस विधेयकी अर्थात् सोमसे अभिन्न यागरूप विशिष्टकी—‘दध्ना जुहोति’ (दधिसे होम करे) इत्यादिमें विधेय दधिके समान लोकसे—सिद्धि न होनेके कारण, रेवती ऋचा है आधार जिसका, ऐसे वारवन्तीय सामरूप विशेषणके समान तात्पर्यके विना ही विशिष्टविधायकवाक्यसे उसकी सिद्धि माननी होगी, परन्तु तात्पर्यरहित आगमसे—सोमलतासे भेदको ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्षसे विरुद्ध अर्थ—सिद्ध नहीं हो सकता है, अतः ‘सोमेन यजेत’ इत्यादि स्थलमें भी प्रत्यक्षके साथ विरोध न आवे, इसलिए मत्वर्थमें लक्षणाका आश्रयण होता है ।
अद्वैतब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका तो उपक्रम और उपसंहारके ऐक्य आदि छः लिङ्गोंसे अद्वैतमें ही तात्पर्य जाना जाता है, अतः प्रत्यक्षसे श्रुति बलवती है, इसलिए अद्वैतश्रुतिसे प्रत्यक्षका ही बाध होता है, अतः प्रत्यक्षके साथ अविरोधके लिए अद्वैतश्रुतिका गौण अर्थ नहीं कर सकते हैं ।
विवरणवार्तिकमें, तो प्रतिपादन किया गया है कि तात्पर्यवती श्रुतिका भी प्रत्यक्षसे प्राबल्य नहीं है, क्योंकि ‘कृष्णलं श्रपयेत्’ (सोनेके बने हुए छोटे-
प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्रावल्य-विचार] भाषानुवादसहित २८५
तात्पर्य्येऽपि कृष्णले रूपरसपरावृत्तिप्रादुर्भावपर्य्यन्तमुख्यश्रपणसम्बन्धः प्रत्यक्ष-विरुद्ध इति तदविरोधाय श्रपणशब्दस्य उष्णीकरणमात्रे लक्षणाभ्युपगमात् ।
'तत्त्वमसि' इति वाक्यस्य जीवब्रह्माभेदप्रतिपादने तात्पर्य्येऽपि त्वम्पदवाच्यस्य तत्पदवाच्याभेदः प्रत्यक्षविरुद्ध इति तदविरोधाय निष्कृष्टचैतन्ये लक्षणाभ्युपगमाच्च ।
छोटे माषोंका पाक करे ) * इस विधिका तात्पर्य यद्यपि कृष्णलोंके अङ्गभूत श्रपणमें ही है, तथापि कृष्णलोंमें मुख्यपाकका सम्बन्ध—जो कि रूप और रसकी परावृत्तिके प्रादुर्भावपर्य्यन्त है, प्रत्यक्षविरुद्ध होनेसे—नहीं हो सकता है, इसलिए उसके अविरोधके लिए श्रपणशब्दकी उष्णीकरणमात्रमें लक्षणाका स्वीकार है ।
† और 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्योंका जीव और ब्रह्मके अभेद प्रतिपादनमें तात्पर्य होनेपर भी, 'त्वम्पद' वाच्य जीवका 'तत्पद' वाच्य ब्रह्मके साथ अभेद प्रत्यक्षविरुद्ध है, अतः उसके अविरोधके लिए विशिष्टरूप वाच्यसे अर्थसे—अलग किये हुए केवल विशेष्यरूप चैतन्यमें लक्षणा ‡ मानी जाती है ।
* प्रकृतमें कृष्णलशब्दका अर्थ सुवर्णके विकारभूत माप किया गया है, और 'कृष्णलं श्रपयेत्' इत्यादिसे कृष्णलके अङ्गभूत श्रपण (पाक) का विधान किया जाता है। परन्तु कृष्णलका मुख्य पाक नहीं हो सकता है, क्योंकि रूपरसपरावृत्तिपर्य्यन्त अधिश्रयणादि व्यापार अर्थात् पूर्वके रूप और रस आदिके विनाशपूर्वक अन्यरूप और अन्य रस आदिकी उत्पत्ति तक अधिश्रयण आदि व्यापार ही मुख्य श्रपणशब्दका अर्थ है, और इस पाकके साथ कृष्णलका वस्तुतः सम्बन्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि कृष्णलोंमें अधिश्रयण (पाकानुकूल व्यापार) आदिके करनेपर भी रूपरसादिकी परावृत्ति या प्रादुर्भाव नहीं देखा जाता है।
† 'कृष्णलं श्रपयेत्' इस श्रुतिसे श्रपणका ही विधान होता है, और वह प्रत्यक्षसे बाधित भी नहीं है, क्योंकि ज्वालाधिश्रयण आदि क्रियारूप पाककी ही श्रपणशब्दसे विवक्षा है, इसलिए कृष्णलमें यह पाक हो सकता है, पूर्वरूपपरावृत्ति या प्रादुर्भाव धात्वर्थके अन्तर्गत नहीं होनेसे उसके न रहनेपर भी कोई हानि नहीं है, किन्तु कर्मत्वरूप पाकका फल वह द्वितीयार्थ ही है, और जो फल होता है, वह विधिके योग्य नहीं होता है, इसलिए वह विधेयभूत श्रपणात्मक भी नहीं है, इस अवस्थामें विधेयभूत श्रपणका कोई दृष्टफल न होनेसे अदृष्टार्थक ही पर्यवसन्न होता है, अतः श्रुतिके तात्पर्यके विषयीभूत श्रपणमें कोई प्रत्यक्ष विरोध न होनेसे उसमें श्रपणशब्दकी लक्षणा करना व्यर्थ है, इस प्रकार यदि किसीको शङ्का हो, तो उसके लिए 'तत्त्वमसि' इत्यादिसे अन्य दृष्टान्त कहते हैं।
‡ तात्पर्य यह है कि 'तत्त्वमसि' आदि जितने महावाक्य हैं, उन सबका तात्पर्य अखण्ड,
| २८६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
|---|
अर्थवादानामपि प्रयाजाद्यङ्गविधिवाक्यानामिव स्वार्थप्रमितावन्न्यार्थ- तया प्रमितानामेवार्थानां प्रयोजनवशादन्यार्थतेति प्रयाजादिवाक्यवत्तेषा- मप्यवान्तरसंसर्गे तात्पर्यमस्त्येव, वाक्यैकवाक्यत्वात् । पदैकवाक्यतायामेव
अर्थवादवाक्योंके भी—प्रयाज आदि अङ्गोंके विधायक वाक्योंके समान— स्वार्थका अवबोध होनेपर अन्य प्रयोजन न होनेसे प्रमित अर्थोंका ही किसी प्रयोजनवशसे उन अर्थवादोंमें अन्यार्थपरता है, अतः प्रयाज आदि वाक्योंके समान अर्थवादोंका भी अवान्तरपदार्थसंसर्गके बोधमें तात्पर्य है ही, अर्थात् अर्थवाद वाक्योंका भी विधिके अन्वयके पूर्वकालमें स्वरसतः प्रतीयमान देवताके विग्रह ( शरीर ) आदिके संसर्गमें भी अवान्तर ‡ तात्पर्य माननेमें कोई विरोध नहीं है, क्योंकि वाक्यैकवाक्यता है अर्थात् विधिवाक्योंके साथ अर्थवादवाक्योंकी
एकरस चैतन्यरूप वस्तुके प्रतिपादनमें ही है, क्योंकि 'तमेवैकं जानथ आत्मानम्' ( हे मुमुक्षु लोगो उसी आत्माको जानो, जिसमें यह समस्त जगत् अध्यस्त है ) 'तमेव विदित्वाऽति- मृत्युमेति' (उसी प्रकृत पर आत्माको जानकर संसाररूप मृत्युको तैर जाता है) 'एकधैवानुद्रष्टव्यम्' ( शास्त्र और आचार्यके उपदेशके बाद एकरूपसे आत्माको जानना चाहिए ) इत्यादि अनेक श्रुतियोंसे मुक्तिके प्रति साधनभूत महावाक्यार्थके ज्ञानके प्रति केवल उक्त चैतन्यात्मक वस्तुका ही नियमन होता है, इस प्रकारकी वस्तुके बोधनमें तात्पर्य रखनेवाले महावाक्योंकी जब तक लक्षणा न मानी जाय, तब तक उक्त तात्पर्यका निर्वाह नहीं हो सकता है, अतः उन महा- वाक्योंमें तात्पर्यके अनुसार लक्षणाका अभ्युपगम किया गया है, प्रत्यक्षके साथ विरोधके परिहार- के लिए लक्षणाका अभ्युपगम नहीं किया गया है । और जो 'प्रत्यक्षविरोधके परिहारके लिए महावाक्योंमें लक्षणाका स्वीकार किया गया है, इस प्रकार निबन्धोंमें व्यवहार होता है, वह केवल इसीलिए होता है कि 'तत्' और 'त्वम्' शब्दकी केवल चैतन्यमें लक्षणा स्वीकार करके वाक्यार्थबोध माननेसे प्रत्यक्षके साथ विरोधका भी परिहार हो जाता है ।
‡ तात्पर्यार्थ यह है कि 'समिधो यजति' इत्यादिसे अवगत समिध्, प्रयाज आदिका दर्श- पूर्णमासके साथ अन्वय अवश्य होता है, क्योंकि उनका परस्पर उपजीव्योपजीवकभाव है, परन्तु 'समिधो यजति' इत्यादि जितने अङ्गविधिवाक्य हैं, वे पहले स्वार्थकी प्रमितिमें अन्यार्थ- रूपसे अवश्य प्रमित होंगे, पीछे उनका देश आदिके साथ सम्बन्ध होगा, वैसे ही अर्थवाद- वाक्य भी स्वार्थांशमें पूर्वमें प्रमित होते हैं अनन्तर उनका स्वार्थज्ञानमात्रसे कोई फल न होनेके कारण विधेयके स्तावकरूपसे विधिके साथ एकवाक्यताकी कल्पना करते हैं, इसलिए अर्थवादवाक्योंका भी विधिके साथ अन्वयके पूर्वमें स्वरसतः प्रतीयमान देवताके शरीर आदिके संसर्गमें अवान्तर तात्पर्य है ।
प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २८७
परमवान्तरतात्पर्यानभ्युपगमादिति विवरणाचार्यैर्न्यायनिर्णये व्यवस्थापनेनं 'यजमानः प्रस्तरः' इत्यादीनामपि मुख्यार्थतात्पर्यप्रसक्तौ प्रत्यक्षाविरो-धायैव लक्षणाऽभ्युपगमाच्च ।
कथं तर्हि श्रुतेः प्राबल्यम् ? उच्यते-निर्दोषत्वात् परत्वाच्च श्रुति-मात्रस्य प्रत्यक्षात् प्राबल्यमित्युत्सर्गः किन्तु श्रुतिबाधितमपि प्रत्यक्षं कथं-
एकवाक्यता है, पदैकवाक्यतामें * ही अवान्तरतात्पर्यका अभ्युपगम नहीं माना जाता है, ऐसी विवरणाचार्यने न्यायनिर्णयमें व्यवस्था की है, अतः 'यजमानः प्रस्तरः' इत्यादि वाक्योंका मुख्य अर्थमें तात्पर्यकी प्रसक्ति होनेपर प्रत्यक्षके साथ विरोध होगा, अतः उसकी निवृत्ति करनेके लिए ही लक्षणा मानी गई है।
तब श्रुति प्रबल कैसे होती है ? निर्दोष होनेसे और प्रत्यक्षकी अपेक्षासे पर होनेसे, ऐसा कहते हैं। सम्पूर्ण श्रुति प्रत्यक्षकी अपेक्षासे प्रबल है, यह नियम उत्सर्ग—सामान्य है, [ तात्पर्य यह है कि श्रुति और उससे भिन्न प्रमाणोंकी जहाँ परस्पर विप्रतिपत्ति ( विरोध ) होती है, वहींपर श्रुति बलवती है और जहाँ, श्रुतिबाधित प्रत्यक्ष प्रमाण अवकाशरहित होता है, वहाँ निरवकाश प्रमाणसे श्रुतिका बाध होता है, क्योंकि यह एक नियम है कि सावकाश और निरवकाशमें निरवकाश प्रमाण ही बलवान् होता है, ] किन्तु श्रुतिसे यद्यपि प्रत्यक्षका बाध किया गया हो, तथापि उसकी उचित विषयके
- वाक्योंके होनेपर ही वाक्योंकी विधिवाक्यके साथ एकवाक्यता मानी गई है, कारण कि वाक्योंका वाक्यार्थमें ही स्वभावतः तात्पर्य है। पदोंके होनेपर ही एक वाक्यार्थके बोधनसे एकवाक्यता होती है, अतः पदैकवाक्यता कहलाती है। इस पदैकवाक्यतामें जो पदार्थ हैं, वे वाक्यार्थके समान अपूर्व नहीं हैं, अतः उनका अवान्तर तात्पर्य भी नहीं है, इसीसे रेवत्याधारकवारवन्तीयसामरूप विशेषणमें भी तात्पर्य है, यह समझना चाहिए, क्योंकि स्वभावतः वाक्यार्थमें ही वाक्यका तात्पर्य है, विशिष्टविधिका तात्पर्य विशिष्टभावनामें है, अतः उसका विशेषणमें भी तात्पर्य अर्थतः सिद्ध होता है। यदि विशिष्ट विधिका तात्पर्य केवल विशेषणमें माना जाय, तो उसके विशिष्टविषयकत्वकी सिद्धि नहीं होगी, मीमांसकोंके यहाँ 'विशिष्टविधिका विशेषणमें तात्पर्य नहीं है' इस प्रकारका व्यवहार प्रत्येकमें विशिष्टविधिकी विषयता नहीं है, इसी तात्पर्यसे होता है, 'तात्पर्यविषयमें ही वेद प्रमाणज्ञानका जनक है' इस प्रकारके नियम न्यायनिर्णयमें विवरणाचार्यने भी माना है, अतः 'यजमानः प्रस्तरः' इसका प्रस्तराभेदमें यदि तात्पर्य माना जाय, तो प्रत्यक्षसे बाधित होगा, अतः उसके साथ विरोध न हो, इसलिए उसकी लक्षणा मानी जाती है, यह भाव है।
| २८८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
|---|
चित् स्वोचितविषयोपहारेण सम्भावनीयम् , निर्विषयज्ञानायोगात् । अत एवाऽद्वैतश्रुतिविरोधेन तत्त्वावेदनात् प्रच्यावितं सत्यत्वम् अर्थक्रियासमर्थव्यावहारिकविषयसमर्पणेनोपपाद्यते । किं बहुना 'नेदं रजतम्' इति सर्वसिद्धप्रत्यक्षबाधितमपि शुक्तिरजतप्रत्यक्षमनुभवानुरोधात् पुरोदेशे शुक्तिसंभिन्नरजतोपगमेन समर्थ्यते, न तु तद्विरोधेन व्यवहितमान्तरमसदेव वा रजतं
उपहारसे ( समर्पणसे ) उपपत्ति करनी चाहिए, क्योंकि जितने ज्ञान होते हैं, वे सब सविषयक होते हैं अर्थात् प्रत्यक्षजन्य ज्ञानका कोई विषय नहीं होता, तो उसके ज्ञानत्वकी व्याहृति होगी, इससे ज्ञानकी उपपत्ति के लिए उस ज्ञानमें योग्य विषयकी कल्पना करनी चाहिए, यह भाव है ] । इसीलिए अर्थात् प्रत्यक्ष आदि ज्ञान अविषयक नहीं हो सकते हैं, इससे [ भाष्य आदि निबन्धोंमें ] अद्वैतब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंके साथ विरोध होनेसे [ द्वैतप्रपञ्चमें तात्त्विकत्व न होनेके कारण द्वैतबोधक प्रत्यक्षमें ] तत्त्वावेदकरूप प्रामाण्यसे रहित सत्यत्वकी अर्थक्रियामें समर्थ व्यावहारिक विषयके समर्पणसे उपपत्ति करते हैं ।
अधिक क्या कहा जाय, * 'नेदं रजतम्' ( यह रजत नहीं है ) इस प्रकार बाधक प्रत्यक्षसे, जो सभीको सम्मत है, शुक्तिमें रजतका यद्यपि प्रत्यक्ष बाधित है, तथापि अनुभवके अनुसार पुरोवर्ती प्रदेशमें शुक्तिके साथ तादात्म्यापन्न रजतकी उत्पत्ति मानकर उस प्रत्यक्षकी उपपत्ति की जाती है, परन्तु रजतमें इदमर्थके साथ अभिन्नत्वानुभवके विरोधसे अन्यदेशस्थ या ज्ञानाकार रजत विषय नहीं माना जाता है, [ तात्पर्य यह है कि देशान्तरस्थ रजतको 'इदं रजतम्' ( यह रजत है ) इत्याकारक भ्रमज्ञानमें विषय मानेंगे अथवा ज्ञानाकार रजतको विषय मानेंगे, तो 'इदं रजतम्' इस प्रकार पुरोवर्ती प्रत्यय नहीं होगा अर्थात् इदमर्थके साथ अभेदको वह प्रत्यक्ष अवगाहन नहीं करेगा, क्योंकि देशान्तरमें रहनेवाला
* अद्वैतश्रुतिबाधित घट आदिका प्रत्यक्ष निर्विषयक माना जाय, तो जैसा सम्पूर्ण व्यवहारका लोपप्रसङ्ग बाधक है, वैसा शुक्तिरजत आदि प्रत्यक्ष निर्विषयक माने जानेपर बाधक नहीं है, क्योंकि कहींपर असत् रजत आदिका भी भान माना गया है, तथापि सिद्धान्तमें शुक्तिरजतस्थलमें तात्कालिक रजतकी उत्पत्ति मान कर उसी रजतको शुक्तिरजत प्रत्यक्षका विषय मानते हैं, क्योंकि निर्विषयक प्रत्यक्ष नहीं होता है, इससे श्रुतिबाधित प्रत्यक्ष जहाँ निरवकाश होता है, वहाँ उस प्रत्यक्षसे श्रुतिका बाध युक्त और सिद्धान्तसम्मत है, अतः श्रुतिका प्राबल्य औत्सर्गिक है !
प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार ] भाषानुवादसहित २८९
विषय इति परिकल्प्यते । एवं च प्रस्तरे यजमानभेदग्राहिणो यावद्ब्रह्मज्ञानमर्थक्रियासंवादेनाऽनुवर्तमानस्य प्रत्यक्षस्य प्रातिभासिकविषयत्वाभ्युपगमेनोपपादनायोगाद् 'यजमानः प्रस्तरः' इति श्रुतिबाध्यत्वे सर्वथा निर्विषयत्वं स्यादिति तत्परिहाराय उत्सर्गमपोद्य श्रुतिरेव तत्सिद्ध्यधिकरणादिप्रतिपादितप्रकारेणाऽन्यथानीयते ।
न चाऽद्वैतश्रुतिप्रत्यक्षयोरिव इह श्रुतिप्रत्यक्षयोस्तात्त्विकव्यावहारिक-
रजत और ज्ञानाकार रजत पुरोवर्ती ( सामने ) नहीं हो सकते हैं, इससे इदमर्थसङ्गभिन्नत्वका विरोध होगा यह भाव है, ] विरोधके रहते अन्य प्रमाणोंसे श्रुतिका बाध होना न्याय्य है, इसलिए ब्रह्मज्ञान जब तक न हो तब तक अर्थक्रियामें समर्थ भेदविषयकत्वरूपसे अनुवर्तमान यजमान और प्रस्तरके परस्पर भेदको ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्षकी, प्रातिभासिकविषयक मानकर, उपपत्ति नहीं कर सकते हैं, अतः परस्पर अर्थात् कुशमुष्टिमें यजमानका भेद ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्षका 'यजमानः प्रस्तरः' इत्यादि श्रुतिसे बाध किया जायगा, तो सर्वथा ⁜ उक्त प्रत्यक्ष निरवकाश हो जायगा, अतः उक्त प्रत्यक्षमें निरवकाशत्वके परिहारके लिए उक्त सामान्य नियमका बाध करके श्रुतिको ही † 'तत्सिद्धि' अधिकरणमें प्रतिपादित प्रकारसे गौण मानना चाहिए ।
यदि शङ्का हो कि अद्वैतश्रुति और प्रत्यक्षके परस्पर विरोध होनेपर जैसे श्रुतिका विषय अद्वैत पारमार्थिक माना जाता है और प्रत्यक्षका विषय व्यावहारिक द्वैत माना जाता है, वैसे ही प्रकृतस्थलमें भी 'यजमानः प्रस्तरः' इस श्रुतिका और प्रत्यक्षका—यजमान और प्रस्तरका पारमार्थिक अभेद और व्यावहारिक
• प्रस्तरमें ( कुशमुष्टिमें ) यजमानभेदविषयक प्रत्यक्ष प्रातिभासिक भेदविषयक नहीं हो सकता है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानके बिना उसका बाध नहीं होता है, व्यावहारिक भेद भी उसका विषय नहीं हो सकता, क्योंकि उसका खण्डन आगेके ग्रन्थमें ही होनेवाला है। यदि पारमार्थिक भेद माना जाय, तो अद्वैतश्रुतिके साथ विरोध होगा, इसलिए वह निरवकाश होगा, अतः 'यजमानः प्रस्तरः' उसको गौण मानना पड़ता है, यह भाव है।
† तत्सिद्धि अधिकरणका सूत्र है—'तत्सिद्धिजातिसारूप्यप्रशंसाभूमलिङ्गसमवाया इति गुणाश्रयः' [ पू० मी० १।४।२३ ] यद्यपि इतना बड़ा सूत्र एक ही है, परन्तु 'तत्सिद्धिः, जातिः' इत्यादि विभागशः उपलब्धि केवल व्याख्यासौकर्यार्थ ही है, 'परिधिपरिधान' आदि यजमानके कार्यकी कुशमुष्टिसे ( प्रस्तरसे ) सिद्धि होती है, अतः 'यजमान' शब्द गौणीवृत्तिसे प्रस्तरका स्तावक है, यह भाव है।
३७
| २९० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
|---|
विषयत्वोपगमेन प्रत्यक्षोपपादनं कर्तुं शक्यम्। ब्रह्मातिरिक्तसकलमिथ्यात्व-प्रतिपादकषड्विधतात्पर्यलिङ्गोपपन्नानेकश्रुतिविरुद्धेन एकेनाऽर्थवादेन प्रस्तरे यजमानतादात्म्यस्य तात्त्विकस्य प्रतिपादनासम्भवात्। एवं ‘तत्त्वमसि’ वाक्येन त्वंपदवाच्यस्य सर्वज्ञत्वाभोक्तृत्वकर्तृत्वादिविशिष्टब्रह्मस्वरूपत्वबोधने तत्राऽसर्वज्ञत्वभोक्तृत्वादिप्रत्यक्षमत्यन्तं निरालम्बनं स्यादिति तत्परिहाराय अहङ्कारशवलितस्य भोक्तृत्वादि, ततो निष्कृष्टस्य शुद्धस्य उदासीनब्रह्मस्वरूपत्वम्’ इति व्यवस्थामाश्रित्य भागत्यागलक्षणाऽऽश्रीयते। एवं
भेद क्रमशः—विषय हैं, इस प्रकार मानकर भी प्रत्यक्षका उपपादन कर सकते हैं? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि छः प्रकारके उपक्रम आदि तात्पर्यके बोधक प्रमाणोंसे युक्त, ब्रह्मसे अतिरिक्त समस्त संसारके मिथ्यात्वका प्रतिपादन करनेवाली अनेक श्रुतियोंके साथ अत्यन्त विरुद्ध एक ✽ अर्थवादवाक्यसे यजमान और प्रस्तरके तात्त्विक अभेदका प्रतिपादन नहीं हो सकता है। इसी प्रकार ‘तत्त्वमसि’ † इत्यादि वाक्यसे ‘त्वंशब्द’ के वाच्य जीवमें सर्वज्ञत्व, अभोक्तृत्व, अकर्तृत्व आदिसे युक्त ब्रह्मरूपताका बोधन करनेमें उस जीवमें असर्वज्ञत्व, भोक्तृत्व आदिका जो प्रत्यक्ष है, वह अत्यन्त निरालम्ब होगा, इसलिए उसके परिहारके लिए अहङ्कारसे उपहित अर्थात् अन्तःकरणसे विशिष्ट चैतन्यमें भोक्तृत्वादि और उससे रहित शुद्धमें उदासीन ब्रह्मस्वरूपता है, इस प्रकारकी
* यदि इस स्थलमें कोई शङ्का करे कि यजमान और प्रस्तरका व्यावहारिक अभेद ही श्रुतिसे बोधित होता है, इससे व्यावहारिक अभेदप्रतिपादक श्रुतिसे बाधित भेदप्रत्यक्ष भी व्यावहारिक भेदविषयक ही होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि समानसत्ताकभेद और अभेद एक जगह नहीं रहते हैं, और श्रुतिसे प्रस्तर और यजमानका प्रातिभासिक अभेद भी बोधित नहीं होता है, क्योंकि शुक्तिमें रजतके अभेदके समान प्रस्तरमें यजमानके अभेदका किसीसे ग्रहण नहीं होता है।
† ‘तत्त्वमसि’ इस वाक्यसे किञ्चिज्ज्ञत्व आदि धर्मोंसे युक्त चैतन्यात्मक जीवमें उससे विरुद्ध सर्वज्ञत्वादिसे युक्त चैतन्यात्मक ब्रह्मके साथ सदातन अभेदका प्रतिपादन होता है, इसके अनुरोधस यदि जीवमें सर्वज्ञत्वादि धर्मोंका अङ्गीकार किया जाय, तो असर्वज्ञत्वादिरूप संसारका अवगाही प्रत्यक्ष विरुद्ध होगा, अतः सांसारिक निरवकाश प्रत्यक्षसे श्रुतिका बाध करना चाहिए, और वह बाध विशेष्य चैतन्यांशमात्रका सङ्कोचरूप ही है, ‘यजमानः प्रस्तरः’ इत्यादिके समान सर्वथा मुख्यार्थका त्याग करके गौण अर्थकी कल्पनारूप नहीं है, यह भाव है।
प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २९१
'कृष्णलं श्रपयेद्' इत्यादावपि प्रत्यक्षस्याऽत्यन्तनिर्विषयत्वप्रसक्तौ तत्परि- हाराय श्रुतौ लक्षणा उष्णीकरणे। 'नेह नानाऽस्ति किञ्चन' इत्यत्र प्रत्यक्षस्य कथञ्चिद्विषयोपपादनसम्भवे तु न प्रबलायाः श्रुतेरन्यथानयन- मिति न कश्चिदप्यव्यवस्थाप्रसङ्गः।
अथवा कृष्णलेऽशक्तेर्लक्षणा श्रपयोर्दिह । व्यवस्थेत्थं विवरणवार्तिके समुदीरिता ॥ ११ ॥
अथवा कृष्णलके पाकमें किसीकी सामर्थ्य न होनेसे 'श्रपयेत्' की उष्णीकरणमें लक्षणा मानी जाती है, इस प्रकार विवरणवार्तिकमें व्यवस्था कही गई है।
व्यवस्थाका आश्रयण करके भाग-त्याग लक्षणाका * आश्रयण किया जाता है। इसी प्रकार 'कृष्णलं श्रपयेत्' इत्यादि † स्थलोंमें भी प्रत्यक्षकी निर्विषयता प्रसक्त होनेसे उसका परिहार करनेके लिए श्रुतिमें 'श्रपयेत्'की केवल गर्म करनेमें लक्षणा की जाती है। 'नेह नानाऽस्ति किञ्चन' (ब्रह्ममें कोई द्वैत है ही नहीं) इत्यादिमें यदि किसी प्रकारसे भी प्रत्यक्षके सविषयकत्वका उपपादन कर सकते हैं, तो प्रबलश्रुतिकी लक्षणा नहीं माननी चाहिए, इस प्रकारसे कोई अव्यवस्था प्रसक्त नहीं है।
* 'तत्त्वमसि' इस महावाक्यमें 'त्वम्' शब्दका अर्थ है—'अन्तःकरणविशिष्ट चेतन' इसमें दो भाग हैं—एक विशेषण और दूसरा विशेष्य, उनमेंसे विशेषणभागका—अन्तःकरणां-शका—त्याग करके चैतन्यमात्र विशेष्य दलका परिग्रहण करना चाहिए। वैसे ही 'तत्' शब्दके—मायाविशिष्ट चैतन्यरूप अर्थमें भी दो भाग करके विशेष्यमात्रमें ही लक्षणा करनी चाहिए, यह भाव है।
† 'कृष्णलं श्रपेत्' इस श्रुतिके जोरसे कृष्णलोंमें रूपरसादिकी परावृत्तिके प्रादुर्भाव पर्यन्त पाक माना जाय, तो उनमें श्रपणाभावका जो प्रत्यक्ष होता है, उसका कोई विषय ही नहीं होगा। और कृष्णलोंमें अनुभूयमान जो श्रपणका अभाव है, वह पारमार्थिक नहीं है, क्योंकि अद्वैत श्रुतिके साथ विरोध होगा, अतः व्यावहारिक ही मानना होगा, इससे श्रुतिद्वारा उक्त श्रपण भी व्यावहारिक मानना होगा, इस परिस्थितिमें कृष्णलोंमें व्यावहारिक श्रपणका अभाव कैसे रहेगा और उसे प्रातिभासिक भी नहीं मान सकते हैं, क्योंकि उसका व्यवहारकालमें बाध नहीं होता है, अतः श्रपणाभावका प्रत्यक्ष अवश्य निर्विषयक होगा, अतः श्रपणकी उष्णीकरणमें (अर्थात् कृष्णलोंको केवल अग्निसे गर्म करनेमें) ही लक्षणा करनी चाहिए। इसी प्रकार 'सोमेन यजेत' इत्यादि स्थलमें भी सोम और यागका अभेद प्रत्यक्षसे बाधित है, अतः मत्वर्थमें लक्षणा करनी चाहिए, यह भाव है।
‡ द्वैतमें मिथ्यात्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंके और द्वैतमें सत्यत्वग्राही प्रत्यक्षके
२९२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
अथवा 'कृष्णलं श्रपयेत्' 'सोमेन यजेत' इत्यादौ न प्रत्यक्षा- नुरोधेन लक्षणाश्रयणम्, किन्तु अनुष्ठानाशक्त्या । नहि कृष्णले उष्णी- करणमात्रमिव मुख्यः पाकोऽनुष्ठातुं शक्यते । न वा सोमद्रव्यकरणको याग इव तदभिन्नो यागः केनचिदनुष्ठातुं शक्यते । न चाऽनुष्ठेयत्वाभिम- तस्य प्रत्यक्षविरोध एवाऽनुष्ठानाशक्तिरिति शब्दान्तरेण व्यवह्रियते इति वाच्यम् । 'शशिमण्डलं कान्तिमत् कुर्याद्' इति विधौ अनुष्ठेयत्वाभि- मतस्य शशिमण्डले कान्तिमत्त्वस्य प्रत्यक्षाविरोधेऽप्यनुष्ठानाशक्तिदर्शनेन तस्यास्ततो भिन्नत्वात् । तथा च तत्र तत एव लक्षणाऽऽश्रयणम् ।
* अथवा 'कृष्णलं श्रपयेत्' और 'सोमेन यजेत' इत्यादि स्थलमें प्रत्यक्षके अनुरोधसे लक्षणाका आश्रयण नहीं करते हैं, किन्तु [ मुख्यार्थक माननेसे ] अनुष्ठान ही नहीं हो सकता है, अतः लक्षणाका आश्रयण करते हैं, कारण कि कृष्णलमें ( सुवर्णमाषोंमें ) उष्णीकरणके सिवा मुख्य पाक नहीं कर सकते हैं, [ इसी प्रकार 'सोमेन' इत्यादिमें भी सोम और यागका अभेद नहीं हो सकता है ] तथा सोमद्रव्य है उपकरण जिसमें, ऐसे यागके समान सोमद्रव्यसे अभिन्न यागका कोई पुरुष अनुष्ठान नहीं कर सकता है। यदि शङ्का हो कि अनुष्ठेयत्वेन जो अभिमत है, उसके साथ प्रत्यक्ष-विरोध ही शब्दान्तरसे 'अनुष्ठानकी अशक्ति' कहलाता है ? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'शशिमण्डलं कान्तिमत् कुर्यात्' ( चन्द्रमण्डलको कान्तियुक्त बनावे ) इस विधिमें अनुष्ठेयत्वरूपसे अभिमत जो चन्द्रमण्डलमें कान्तिमत्व ( कान्ति ) है, उसमें प्रत्यक्षविरोध न होनेपर भी अनुष्ठानकी अशक्ति दिखती है, अतः यह स्वीकार करना होगा कि प्रत्यक्ष-विरोध और
विरोधस्थलमें श्रुतिसे प्रत्यक्षके बाधित होने पर भी उसमें निरवकाशत्व नहीं है, क्योंकि कल्पितद्वैत और तद्गतसत्ता आदिसे उपपत्ति हो सकती है, यह तात्पर्य है ।
* पूर्वके ग्रन्थसे प्रत्यक्षसे श्रुतिके बाधमें अनेक उदाहरण दिखलाये गये, परन्तु श्रुतिसे प्रत्यक्षका बाध होता है, इसमें अधिक दृष्टान्त नहीं बतलाये गये, अर्थात् एक ही बतलाया है । इस अवस्थामें 'श्रुतिकी अपेक्षा प्रत्यक्ष बलवान् है' इसी उत्सर्गकी सिद्धि हो सकती है, प्रत्यक्षस श्रुति बलवती है, इसकी सिद्धि नहीं हो सकती है—इस अस्वरससे 'अथवा' इस पक्षको कहते हैं, यह भाव है ।
प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २९३
तस्मादपच्छेदन्यायादिसिद्धस्य श्रुतिबलीयस्त्वस्य न कश्चिद् बाध इति ।
अथ कथमत्रापच्छेदन्यायप्रवृत्तिः ? उच्यते—यथा ज्योतिष्टोमे बहिष्पवमानार्थं प्रसर्पतामुद्गातुरपच्छेदे सति 'यद्युद्गातापच्छिद्येतादक्षिणम्
अनुष्ठानाशक्ति दो अलग-अलग पदार्थ हैं। इसलिए 'सोमेन यजेत' इत्यादिमें अनुष्ठानकी अशक्ति ही लक्षणाके स्वीकारमें बीज है। इससे अपच्छेदन्यायसे सिद्ध श्रुतिके प्राबल्यके साथ कोई विरोध या बाध नहीं है †
अब शङ्का होती है कि प्रकृतमें अपच्छेद न्यायकी प्रवृत्ति कैसे होती है ? कहते हैं—ज्योतिष्टोम यागमें बहिष्पवमानके * लिए जाते हुए ऋत्विजोंमें से यदि उद्गाताका अपच्छेद (विच्छेद) हो जाय, तो 'यद्युद्गातापच्छिद्येता०' † (यदि उद्गाताका विच्छेद हो, तो दक्षिणाके बिना उस यागको करके फिर उस यागको करे) इस श्रुतिके देखनेसे उद्गाताके विच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्त करनेका
† अनुष्ठानकी अशक्तिसे ही लक्षणाके आश्रयण करनेसे और प्रत्यक्षविरोधसे लक्षणा न माननेसे श्रुतिसे प्रत्यक्षका प्राबल्य सिद्ध नहीं होता है, आगमसे बाधित गगन-नैल्य आदिके प्रत्यक्ष बतलाये गये हैं, अतः आगम ही प्रबल है, यह औत्सर्गिक है, अर्थात् बाधित होनेपर उसका त्याग किया जायगा, अतः यदि प्रत्यक्षसे आगम बलवान् होगा, तो 'यजमान और प्रस्तरका' परस्पर अभेद हो जायगा, इत्यादि बाधोंका प्रसङ्ग, जो पहले आशंकित था, अब नहीं है, यह भाव है।
* बहिष्पवमाननामक स्तोत्र है और वह स्तोत्र 'उपास्मै गायत नरः' 'दविद्युतत्या रुचा' 'पवमानस्य ते कवे' इत्यादि तीन सूक्तोंके गानसे साध्य है।
† बहिष्पवमान स्तोत्रके लिए एक दूसरेका कच्छ पकड़ करके जाते हुए ऋत्विजोंमें से यदि उद्गाताका विच्छेद हो जाय, तो जिस यागका आरम्भ किया है, उसको दक्षिणाके बिना समाप्त करके यजमानको पुनः उस यागका आरम्भ करना चाहिए। यदि प्रतिहर्त्ताका विच्छेद हो जाय, तो यजमानको सर्वस्व दक्षिणा दे देनी चाहिए। ये दो विरुद्ध प्रायश्चित्त सुननेमें आते हैं, एक तो अदक्षिणापूर्वक यागकी समाप्ति और (पुनः याग) और दूसरा सर्वस्वदानपूर्वक यागकी समाप्ति। इस अवस्थामें यदि क्रमसे दोनोंका विच्छेद हो जाय, तो कौन प्रायश्चित्त करना चाहिए, क्योंकि विरुद्ध प्रायश्चित्तोंका एक कालमें तो अनुष्ठान नहीं हो सकता है, इसलिए क्या पूर्वनिमित्तक प्रायश्चित्त करना चाहिए या परनिमित्तक ? इस प्रकारका संशय होनेपर निर्णय किया गया है कि पूर्वसे पर बलवान् है, अर्थात् अनन्तर होनेवाला ज्ञान पूर्वमें अप्रामाण्यका निश्चय करके होता है, जैसे शुक्तिमें रजतज्ञानके उत्तरमें जायमान 'नेदं रजतम्' इस प्रकारका बाधज्ञान पूर्वज्ञानमें अप्रामाण्यका निश्चय करके ही प्रवृत्त होता है, वैसे ही पूर्वनिमित्तक प्रायश्चित्तसे उत्तरनिमित्तक प्रायश्चित्त बलवान् होगा और उत्तर प्रायश्चित्तसे पूर्वका बाध होता है, यह भाव है।
२९४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
यज्ञमिष्ट्वा तेन पुनर्यजेत' इति श्रुतिनिरीक्षणेन जाता उद्गात्रपच्छेदनिमित्तकप्रायश्चित्तकर्त्तव्यताबुद्धिः पश्चात् प्रतिहर्त्रपच्छेदे सति 'यदि प्रतिहर्त्ताऽपच्छिद्येत सर्ववेदसं दद्याद्' इति श्रुतिनिरीक्षणेन जातया तद्विरुद्धप्रतिहर्त्रपच्छेदनिमित्तप्रायश्चित्तकर्त्तव्यताबुद्ध्या बाध्यते ।
एवं पूर्वं घटादिसत्यत्वप्रत्यक्षं परया तन्मिथ्यात्वश्रुतिजन्यबुद्ध्या बाध्यते । न चोदाहृतस्थले पूर्वनैमित्तिककर्त्तव्यताबुद्धेः परनैमित्तिककर्त्तव्यताबुद्ध्या बाधेऽपि पूर्वनैमित्तिककर्त्तव्यताजनकं शास्त्रं यत्रोद्गातृमात्रापच्छेदः, उभयोरपि युगपदपच्छेदौ वा, उद्गात्रपच्छेदस्य परत्वं वा, तत्र सावकाशम्, प्रत्यक्षं तु अद्वैतश्रुत्या बाधे विषयान्तराभावान्निरालम्बनं स्यादिति वैषम्यं शङ्कनीयम् । यत्र घटादौ श्रुत्या बाध्यं प्रत्यक्षं प्रवर्तते, तत्रैव व्यावहारिकं विषयं लब्ध्वा कृतार्थस्य तस्य परापच्छेदस्थले सर्वथा बाधितस्य पूर्वापच्छेदशास्त्रस्येव विषयान्तरान्वेषणाभावात् । इहाऽपि सर्व-
ज्ञान होता है, उसके बाद 'यदि प्रतिहर्ता०' (यदि प्रतिहर्ताका विच्छेद हो, तो सर्वस्व दान दे दे) इस प्रकारकी श्रुतिके देखनेसे उत्पन्न हुई उद्गाताके विच्छेदनिमित्तकर्तव्यतासे विरुद्ध प्रतिहर्ताके विच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्तकर्तव्यबुद्धिसे प्राक्तन बुद्धिका बाध होता है ।
इसी प्रकार पूर्वमें घट आदिमें होनेवाला सत्यत्वविषयक प्रत्यक्ष अनन्तरमें होनेवाले श्रुतिजन्य मिथ्यात्वविषयक बुद्धिसे बाधित होता है, यदि शङ्का हो कि पूर्वके उदाहृतस्थलमें अर्थात् जहाँ प्रथम उद्गाताका अपच्छेद हुआ है, उस स्थलमें प्राथमिक नैमित्तिकप्रायश्चित्तकर्तव्यत्व ज्ञानसे पश्चात् हुई नैमित्तिक कर्तव्यताका बोधक शास्त्र—जहाँ केवल उद्गाताका विभाग हुआ है, वहाँ अथवा एक कालमें दोनोंका जहाँ विच्छेद हुआ है, वहाँ अथवा जहाँ उद्गाताका विच्छेद पीछे हुआ है, वहाँ—सावकाश है और प्रत्यक्ष, तो अद्वैतश्रुतिसे बाध होनेपर अन्य किसी विषयके न होनेसे, निरालम्बन है, अतः वैषम्य है ? तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है; कारण कि जिस घट आदिमें श्रुतिसे बाध्य प्रत्यक्ष प्रवृत्त होता है, उसी घट आदिमें व्यावहारिक—व्यवहार करनेमें उपयुक्त—सत्तारूप विषयकी प्राप्ति करके कृतार्थ प्रत्यक्षको, जैसे पर अपच्छेदस्थलमें सर्वथा बाधित पूर्व अपच्छेद शास्त्रको अन्य विषयकी अन्वेषणा करनी पड़ती है, वैसे
प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार ] भाषानुवादसहित २९५
प्रत्ययवेद्यब्रह्मसत्तायां सावकाशं प्रत्यक्षमिति वक्तुं शक्यत्वाच्च ।
यच्चैकस्मिन्नपि प्रयोगे क्रमिकाभ्यां निमित्ताभ्यां क्रतौ तत्तन्नैमित्तिककर्तव्यतयोर्बदरफले श्यामरक्तरूपयोरिव क्रमेणोत्पादाद् रूपज्ञानद्वयवत् कर्तव्यताज्ञानद्वयमपि प्रमाणमेवेति न परेण पूर्वज्ञानबाधे अपच्छेदन्याय उदाहरणम् ।
अत एवापच्छेदाधिकरणे ( पू० मी० अ० ६ पा० ५ अधि० १९ )
प्रकृतमें अन्य विषयकी अन्वेषणा नहीं करनी पड़ती है। और इस स्थलमें भी * सम्पूर्ण प्रतीतिमें वेद्य ब्रह्मसत्तारूप विषयको लेकर प्रत्यक्ष सावकाश है।
कोई लोग कहते हैं कि जैसे एक बदर (बेर) के फलमें क्रमशः पहले हरारूप उत्पन्न होता है, अनन्तर पाकवशात् पूर्वरूपके नाशके बाद पीला या रक्तरूप उत्पन्न होता है, और दोनों रूप कालभेदसे प्रामाणिक हैं, वैसे ही एक ही क्रतु (याग) के प्रयोगमें क्रमशः उत्पन्न हुए निमित्तोंसे (अर्थात् उद्गाताका अपच्छेद और प्रतिहर्ताका अपच्छेदरूप निमित्तोंसे) तत् तत् प्रायश्चित्त कर्तव्यताओंमें दो ज्ञान भी प्रमाण ही हैं, अतः परज्ञानसे पूर्वज्ञानके बाधमें अपच्छेदन्याय उदाहरण नहीं हो सकता है।
इसीसे अपच्छेदाधिकरणमें 'नैमित्तिकशास्त्रका (किसी निमित्तको लेकर
* ब्रह्ममें पारमार्थिक सत्ता है, घट आदिमें व्यावहारिक सत्ता है और शुक्तिरजतमें प्रातिभासिक सत्ता है, इस प्रकारकी तीन सत्ताओंके स्वीकारपक्षमें घटादिसत्ताके प्रत्यक्षके लिए कोई विषयान्तरकी अन्वेषणा करनी नहीं पड़ती है, क्योंकि घट आदिमें विद्यमान व्यावहारिक सत्ता ही उस प्रत्यक्षकी विषय हो सकती है, और 'एक ही सर्वत्र सत्ता है' इस पक्षमें व्यावहारिक और प्रातिभासिक सत्ताके न रहनेसे घटादिसत्त्वप्रत्यक्षका अन्य विषय खोजना होगा। जैसे कि उत्तर कालमें उत्पन्न विरुद्ध अपच्छेदसे बाधित पूर्वापच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्त अपने विषयकी अन्वेषणा करता है। परन्तु एकसत्तावादियोंके मतसे भी कोई विरोध नहीं है, कारण कि घटादिद्वैतप्रत्यक्ष घटादिमें सत्ताके न रहनेपर भी निरवकाश नहीं है, क्योंकि अधिष्ठान सत्ताको लेकर उस प्रत्यक्षकी सावकाशता हो सकती है। इसलिए कहते हैं 'इहापि' अर्थात् 'एकसत्तापक्षमें भी संसारमें जितने प्रत्यय मनमें स्फुरित होते हैं, उन सबमें सत् वस्तु स्फूर्ति है, अतः सभी जगत्की सत्ता सर्वप्रत्ययवेद्य है और वह सभीके अधिष्ठानभूत ब्रह्मकी ही सत्ता है, उससे अतिरिक्त नहीं है, क्योंकि अतिरिक्त सत्ता माननेमें गौरव है, यह भाव है।
२९६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
'नैमित्तिकशास्त्रस्य ह्ययमर्थः—निमित्तोपजननात् प्रागन्यथाकर्तव्योऽपि क्रतुर्निमित्ते सत्यन्यथाकर्तव्यः' इति शास्त्रदीपिकावचनमिति, तन्न; अङ्गस्य सतः कर्तव्यत्वम् । न च पश्चाद्भाविप्रतिहर्त्रपच्छेदवति क्रतौ पूर्ववृत्तोद्गात्रापच्छेदनिमित्तकस्य प्रायश्चित्तस्याऽङ्गत्वमस्ति। आहवनीयशास्त्रस्य पदहोमातिरिक्तहोमविषयत्ववद् 'यद्युद्गाताऽपच्छिद्येत' इति शास्त्रस्य पश्चाद्भाविप्रतिहर्त्रपच्छेदरहितक्रतुविषयत्वात् ।
उक्तं हि न्यायरत्नमालायाम्—
'साधारणस्य शास्त्रस्य विशेषविषयादिना ।
संकोचः कॢप्तरूपस्य प्राप्तबाधोऽभिधीयते ॥'
प्रवृत्त हुए शास्त्रको नैमित्तिक शास्त्र कहा जाता है ) यह अर्थ है—निमित्तके उत्पन्न होनेके पूर्वमें अन्यरूपसे अर्थात् उत्तरकालमें उत्पन्न होनेवाले प्रतिहर्ताके अपच्छेदके पूर्वमें अदक्षिणारूपसे किया जानेवाला भी यज्ञ निमित्तके आ जानेपर अन्य रीतिसे अर्थात् अनन्तर प्रतिहर्ताके विच्छेद होनेपर सर्वस्वदक्षिणारूपसे किया जाता है' इस प्रकारका शास्त्रदीपिकाकारका वचन भी उपपन्न होता है । परन्तु यह सब कल्पना असङ्गत है, क्योंकि [ विरुद्ध प्रकारसे जहाँ अपच्छेद हुए हैं, वहाँ यदि ] पूर्व नैमित्तिककर्तव्यता क्रतुके प्रति अङ्ग हो, तो उसमें कर्तव्यत्व आ सकता है, परन्तु क्रतुके प्रति उसके अङ्गत्त्वमें प्रमाण नहीं है, अतः पूर्वकी प्रसक्ति हो ही नहीं सकती है । और पश्चात् कालमें उत्पन्न होनेवाले प्रतिहर्ताके अपच्छेदवाले क्रतुमें पूर्वकालमें उत्पन्न उद्गाताके अपच्छेदसे हुए प्रायश्चित्त अङ्ग नहीं है ] । ꕤ 'आवहनीये जुहोति' इस आवहनीयशास्त्रकी पदहोमातिरिक्त होममें ही जैसे विषयता है, वैसे ही 'यदि उद्गाता विच्छेद करे' इत्यादि शास्त्रकी भी पीछे कालमें होनेवाले प्रतिहर्ताके अपच्छेदसे शून्य क्रतुमें विषयता है ।
न्यायरत्नमालामें कहा भी है—
'साधारणस्य शास्त्रस्य ०' प्रत्यक्षसिद्ध और होममात्रमें प्रवृत्त साधारणशास्त्र आहवहनीये जुहोति ( आवहनीय अग्निमें होम करे ) इत्यादिका 'पदे जुहोति' ( गौके सप्तम पादविक्षेपमें [सप्तम खुर जहाँ पड़ा हो, उसमें] होम करे ) इस
ꕤ 'आवहनीये जुहोति' इस शास्त्रका 'पदे जुहोति' इस वाक्यसे संकोच होता है, इसीको प्राप्तबाध कहा जाता है, इसका आगेके न्यायरत्नमालाके श्लोकमें विचार किया जायगा ।
प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २९७
इति उक्तलक्षणप्राप्तबाधविवेचने, ‘तत्रैवं सति शास्त्रार्थो भवति, पश्चाद्भाव्युद्गात्रपच्छेदविधुरप्रतिहर्त्रपच्छेदवतः क्रतोस्सर्ववेदसदानमङ्गम्, एवमुद्गात्रपच्छेदेऽपि द्रष्टव्यम्’ इति ।
यत्तु शास्त्रदीपिकावचनमुदाहृतम्, तदपि—‘तेनोत्पन्नमपि पूर्वप्रायश्चित्तज्ञानं मिथ्या भवति, बाधितत्वाद्, उत्तरस्य तु न किञ्चिद्बाधकमस्ति’ इति पूर्वकर्तव्यताबाध्यत्वप्रतिपादकग्रन्थोपसंहारपठितत्वाद् निमित्तोपजननात् प्राङ्निमित्तोपजननं विनानिमित्तोपजननाभावे सति अन्यथा कर्तव्यो-
विशेषविषयक शास्त्रसे संकोच होता है अर्थात् पदहोमातिरिक्त स्थलमें आहवनीय होम करे, इस प्रकार जो संकोच होता है; उसे प्राप्तबाध कहते हैं। तात्पर्यार्थ यह हुआ कि इस स्थानमें जैसे सामान्यशास्त्रका विशेष शास्त्र बाधक है, वैसे ही सामान्यशास्त्रोंमें भी किसी विषयमें विरोध होनेपर पूर्वकालमें प्राप्त नैमित्तिकशास्त्रका उत्तरकालमें प्राप्त नैमित्तिकशास्त्रसे बाध होता है, जैसे कि विरुद्ध अपच्छेदनिमित्तकशास्त्रोंमें । इससे श्लोकस्थ विशेष विषयादिमें पठित आदि शब्दसे ‘परशास्त्र’ आदिका संग्रह होता है यह बात श्लोकमें उक्तलक्षण प्राप्तबाधके विवेचनके अवसरमें कही गई है । अपच्छेद स्थलमें उत्तरज्ञानसे पूर्वज्ञानका बाध होनेपर उक्त नैमित्तिक शास्त्रका यह अभिप्राय होता है कि उत्तरकालमें होनेवाले उद्गाताके अपच्छेदसे रहित प्रतिहर्ताके विच्छेदसे युक्त क्रतुका सर्वस्वदान अङ्ग है और पश्चात्कालमें होनेवाले प्रतिहर्ताके अपच्छेदसे रहित उद्गाताके विच्छेदसे युक्त क्रतुकी दक्षिणाके विना समाप्ति करना अङ्ग है—यह ध्यान रखना चाहिए ।
जो कि पूर्वमें शास्त्रदीपिकाकार (पार्थसारथिमिश्र) का ‘नैमित्तिकशास्त्रस्य’ इत्यादि वाक्य उदाहरणरूपसे दिया गया है, वह भी -पूर्वकालमें प्रवृत्त नैमित्तिकशास्त्रसे उत्पन्न होनेपर भी प्राक्तनप्रायश्चित्तज्ञान उत्तर नैमित्तिक शास्त्रसे बाधित होनेसे मिथ्या ही होता है, और उत्तरकालमें उत्पन्न हुए प्रायश्चित्त ज्ञानका कोई बाधक नहीं है, इस प्रकार पूर्वकर्तव्यतामें बाध्यत्वका प्रतिपादन करनेवाले ग्रन्थके उपसंहारमें पढ़ा गया है, अतः निमित्तकी उत्पत्तिके बिना अर्थात् निमित्तके उत्पन्न न होनेपर अन्यरूपसे भी कर्तव्य हैं इस प्रकार—
३८
२९८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
ऽपीति—कृत्वाचिन्तामात्रपरम्। न तूत्तरनिमित्तोपजननात्प्राक्पूर्वनैमित्तिक- कर्तव्यता वस्तुत आसीदित्येवंपरम्, पूर्वग्रन्थसन्दर्भविरोधापत्तेः ।
कृत्वाचिन्तापरक है, उत्तरनिमित्तके उत्पन्न होनेसे पूर्व उसमें वस्तुतः कर्तव्यता थी, इस अर्थका प्रतिपादक वह ग्रन्थ नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे पूर्व ग्रन्थके साथ विरोध होगा * ।
* शास्त्रदीपिकाकारका वचन 'नैमित्तिकशास्त्रस्य०' (निर्णयसागरमुद्रित पुस्तकमें शास्त्रदीपिकामें 'नैमित्तिकशास्त्राणां ह्ययमर्थः' ऐसा पाठ उपलब्ध होता है, और इस ग्रन्थमें 'नैमित्तिकशास्त्रस्य' इत्यादिरूपसे पाठ उपलब्ध होता है, अतः अन्य पुस्तकोंमें कदाचित् एकवचनान्त पाठ भी होगा यह ज्ञात होता है) इत्यादिका उपन्यास इसलिए किया गया है कि दो रूपज्ञानके समान अर्थात् एक ही घटमें क्रमिक रूपद्वयज्ञान जैसे प्रामाणिक हैं, वैसे एक ही क्रतुमें क्रमिक नैमित्तिकप्रायश्चित्तद्वयज्ञान भी प्रामाणिक हो सकते हैं, अतः पूर्वसे परका बाध या परसे पूर्वका बाध करनेकी चिन्ता ही नहीं हो सकती है। इसपर सिद्धान्ती कहते हैं कि नहीं उक्त ग्रन्थका आपके मतानुसार अर्थ नहीं है, परन्तु उसका अभिप्राय कुछ दूसरा ही है। 'नैमित्तिकशास्त्रस्य' इत्यादि वाक्य उपसंहारभागमें पठित है, इसलिए उसका अभिप्राय उपक्रम ग्रन्थके अनुसार ही होगा और उपक्रमस्थ वाक्य है—'तेनोत्पन्नमपि' इत्यादि। इसका तात्पर्यार्थ यह है कि पहले शङ्का की गई कि जिस स्थलमें क्रमिक उद्गाता और प्रतिहर्ताका विभाग हुआ हो, वहाँपर पूर्वनिमित्तक ही प्रायश्चित्त करना चाहिए, क्योंकि उसका कोई विरोधी नहीं है, अतः अनायास उसका परिज्ञान हो जाता है। और उत्तरनिमित्तक प्रायश्चित्तका पूर्व- निमित्तक प्रायश्चित्तसे विरुद्ध होनेके कारण ज्ञान नहीं हो सकता है, इसलिए पूर्व ही बलवान् है। इस परिस्थितिमें 'तेनोत्पन्नम्' इत्यादिसे कहा कि यद्यपि पूर्वनैमित्तिकशास्त्रसे उस पूर्व प्रायश्चित्तकी अवगति होती है, तथापि वह बाधित होनेसे मिथ्या है। भाव यह है कि यद्युद्गातापच्छिन्द्यात्' इत्यादि प्रत्यक्षशास्त्रसे पूर्वनिमित्तक प्रायश्चित्तका ज्ञान होता है, परन्तु जो उत्तरनिमित्तक प्रायश्चित्तका ज्ञान है, वह अपनेसे विरुद्ध पूर्वज्ञानका बाध करके ही प्रवृत्त होता है, लोकमें भी 'शुक्तिरजतम्' और 'नेदं रजतम्' इत्यादिस्थलमें, ऐसा देखा गया है; अतः पूर्वज्ञान मिथ्या है, इसलिए वह बलवान् नहीं है। इस अवस्थामें 'तेनोत्पन्नमपि' इत्यादि उपक्रम ग्रन्थके अनुसार 'निमित्तोपजननं विना' इत्यादिका यही अर्थ होगा कि जिस क्रतुमें दो प्रकारके क्रमिक विरुद्ध अपच्छेद न हों, उस स्थलमें यदि द्वितीय निमित्तकी उत्पत्ति न हो, तो पूर्वनिमित्तके बलसे इस क्रतुका प्रयोग अन्य रीतिसे हो सकता है, परन्तु प्रकृतमें तो ऐसा है नहीं अर्थात् द्वितीय निमित्तकी उत्पत्ति हो गई है, अतः उत्तरनिमित्तक प्रायश्चित्तज्ञान पूर्वका बाध करेगा ही, इस प्रकार पूर्वनिमित्तसे अन्यथाकर्तव्यत्वकी क्रतुमें केवल संभावना होती है, वस्तुतः उसकी सत्ता निश्चित नहीं होती है कि अन्यथाकर्तव्य याग था, इसलिए शास्त्रदीपिकावचन भी दो ज्ञानोंमें प्रामाण्यका प्रतिपादक नहीं है, यह भाव है।
ज्योतिष्टोम यज्ञ सोमयागका ही प्रकार है 'ज्योतींषि स्तोमा यस्य सः=ज्योतिष्टोमः' इस
प्रत्यक्षसे 'श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २९९
[ टिप्पणी ]
प्रकार ज्योतिरूप स्तोम जिसमें हों उसे ज्योतिष्टोम कहना चाहिए, यह अर्थ लब्ध होता है। त्रिवृत्, पञ्चदश, सप्तदश एकविंश इस प्रकार चार स्तोम होते हैं इसमें 'त्रिवृत्पञ्चदशः सप्तदश एकविंश एतानि वाव ज्योतींषि य एतस्य स्तोमाः' ( तै० ब्रा० १।५।११ ) यह वाक्य प्रमाण है । इस ज्योतिष्टोम यागमें हविर्धानसे वहिष्पवमान देशके प्रति जाते हुए ऋत्विजोंका अन्वारम्भ सुना जाता है अर्थात् अध्वर्यु प्रस्तोताके कच्छको पकड़े और उद्गाता प्रस्तोताके कच्छको, प्रतिहर्ता उद्गाताके कच्छको, ब्रह्मा प्रतिहर्ताके कच्छको, यजमान ब्रह्माके कच्छको और प्रशास्ता यजमानके कच्छको पकड़े । इस प्रकार एक दूसरेका कच्छ पकड़ कर जाते हुए ऋत्विजोंमेंसे एकका विच्छेद होनेपर प्रायश्चित्त करना पड़ता है—वह इस प्रकार है—प्रस्तोता अपच्छेद करे तो प्रम्राधो वर दे । यदि प्रतिहर्ता अपच्छेद करे तो सर्वस्व दे । यदि उद्गाता अपच्छेद करे, तो उस यज्ञको दक्षिणा बिना समाप्त कर पुनः याग करे। उसमें वही दक्षिणा दे जो पूर्वमें दी जानेवाली थी ।
इस प्रायश्चित्तोंके विषयमें एक यह भी विचार प्रस्तुत होता है कि यदि एक कालमें उद्गाता और प्रतिहर्ताका अपच्छेद हो जाय तो क्या प्रायश्चित्त करना चाहिए या नहीं ? इस सन्देहमें पूर्वपक्षी यह कहता है कि ऐसी स्थितिमें प्रायश्चित्त नहीं करना चाहिए, क्योंकि एककालमें प्रतिहर्ता और उद्गाताका जहाँपर विच्छेद हुआ हो, वहाँपर सापेक्ष होनेसे यह निश्चित नहीं होता है कि विच्छेदका कौन प्रायश्चित्त किया जाय । इसलिए युगपत् अपच्छेदकालमें प्रायश्चित्त करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, इस पूर्वपक्षके परिहारमें सिद्धान्तीका कहना है—युगपत् अपच्छेदमें भी प्रायश्चित्त होता ही है, क्योंकि विभजन ( अपच्छेद ) क्रियाके प्रति जो कर्ता है वह सापेक्ष नहीं है, किन्तु निरपेक्ष ही है, अतः विच्छेदक्रियाके प्रति एक एकमें भी कर्तृता है, विशेष इतना ही है कि युगपत् अपच्छेदमें काल एक है। तात्पर्यार्थ यह है कि अपच्छेदशब्दका अर्थ है—विभाग । और यद्यपि विभाग उभयमें समवायसम्बन्धसे रहता है, तथापि जिसकी क्रियासे उत्पन्न होगा तत्कर्तृक ही कहा जाता है। प्रकृतमें यद्यपि दोनों पुरुषोंकी ( प्रतिहर्ता और उद्गाताकी ) क्रियासे विभागकी उत्पत्ति हुई है, अतः प्रत्येकमें निरपेक्ष कर्तृता न होनेके कारण इस अपच्छेदमें एककर्तृकत्वका व्यवहार नहीं होगा यह शङ्का हो सकती है; तथापि अन्य स्थलमें अर्थात् एककी क्रियासे जन्य विभागमें एक पुरुषकी ही कर्तृता भासती है, इससे दैवात् एक कालमें दोनों कर्ताओंका समावेश होनेपर भी प्रत्येकमें ही कर्तृत्व निरपेक्ष है, अतः अवश्य प्रायश्चित्त करना होगा ।
अथ यहां युगपत् विच्छेदमें शङ्का होती है कि क्या दोनों ही प्रायश्चित्त करने चाहिएँ या विकल्पसे एक; इस संशयमें पूर्वपक्ष होता है कि दोनों प्रायश्चित्त करने चाहिएँ, क्योंकि युगपत् अपच्छेदमें समुच्चय करना ही न्याय्य है, कारण कि प्रयोग एक है। अथवा अदक्षि-णत्व और सर्वस्वदक्षिणात्वका विरोध है, तो प्रयोगभेदसे व्यवस्था अर्थात् विकल्प करना चाहिए—अपच्छेदयुक्त प्रथम प्रयोगमें दक्षिणा न देनी चाहिए और उत्तर प्रयोगमें सर्वस्व-दक्षिणा देनी चाहिए, इसपर सिद्धान्त यह होता है कि उत्तर प्रयोगमें अपच्छेद नहीं है, इसलिए निमित्तके बिना नैमित्तिक प्रायश्चित्त हो नहीं सकता, इससे पूर्वके प्रयोगमें दोनों निमित्तोंके होनेसे प्रायश्चित्त होते, परन्तु वे अन्योऽन्य विरुद्ध हैं, अतः विकल्प मानना उचित है, इसलिए