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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 590 में से

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पृष्ठ 323

प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २९३


तस्मादपच्छेदन्यायादिसिद्धस्य श्रुतिबलीयस्त्वस्य न कश्चिद् बाध इति ।

अथ कथमत्रापच्छेदन्यायप्रवृत्तिः ? उच्यते—यथा ज्योतिष्टोमे बहिष्पवमानार्थं प्रसर्पतामुद्गातुरपच्छेदे सति 'यद्युद्गातापच्छिद्येतादक्षिणम्


अनुष्ठानाशक्ति दो अलग-अलग पदार्थ हैं। इसलिए 'सोमेन यजेत' इत्यादिमें अनुष्ठानकी अशक्ति ही लक्षणाके स्वीकारमें बीज है। इससे अपच्छेदन्यायसे सिद्ध श्रुतिके प्राबल्यके साथ कोई विरोध या बाध नहीं है †

अब शङ्का होती है कि प्रकृतमें अपच्छेद न्यायकी प्रवृत्ति कैसे होती है ? कहते हैं—ज्योतिष्टोम यागमें बहिष्पवमानके * लिए जाते हुए ऋत्विजोंमें से यदि उद्गाताका अपच्छेद (विच्छेद) हो जाय, तो 'यद्युद्गातापच्छिद्येता०' † (यदि उद्गाताका विच्छेद हो, तो दक्षिणाके बिना उस यागको करके फिर उस यागको करे) इस श्रुतिके देखनेसे उद्गाताके विच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्त करनेका


† अनुष्ठानकी अशक्तिसे ही लक्षणाके आश्रयण करनेसे और प्रत्यक्षविरोधसे लक्षणा न माननेसे श्रुतिसे प्रत्यक्षका प्राबल्य सिद्ध नहीं होता है, आगमसे बाधित गगन-नैल्य आदिके प्रत्यक्ष बतलाये गये हैं, अतः आगम ही प्रबल है, यह औत्सर्गिक है, अर्थात् बाधित होनेपर उसका त्याग किया जायगा, अतः यदि प्रत्यक्षसे आगम बलवान् होगा, तो 'यजमान और प्रस्तरका' परस्पर अभेद हो जायगा, इत्यादि बाधोंका प्रसङ्ग, जो पहले आशंकित था, अब नहीं है, यह भाव है।

* बहिष्पवमाननामक स्तोत्र है और वह स्तोत्र 'उपास्मै गायत नरः' 'दविद्युतत्या रुचा' 'पवमानस्य ते कवे' इत्यादि तीन सूक्तोंके गानसे साध्य है।

† बहिष्पवमान स्तोत्रके लिए एक दूसरेका कच्छ पकड़ करके जाते हुए ऋत्विजोंमें से यदि उद्गाताका विच्छेद हो जाय, तो जिस यागका आरम्भ किया है, उसको दक्षिणाके बिना समाप्त करके यजमानको पुनः उस यागका आरम्भ करना चाहिए। यदि प्रतिहर्त्ताका विच्छेद हो जाय, तो यजमानको सर्वस्व दक्षिणा दे देनी चाहिए। ये दो विरुद्ध प्रायश्चित्त सुननेमें आते हैं, एक तो अदक्षिणापूर्वक यागकी समाप्ति और (पुनः याग) और दूसरा सर्वस्वदानपूर्वक यागकी समाप्ति। इस अवस्थामें यदि क्रमसे दोनोंका विच्छेद हो जाय, तो कौन प्रायश्चित्त करना चाहिए, क्योंकि विरुद्ध प्रायश्चित्तोंका एक कालमें तो अनुष्ठान नहीं हो सकता है, इसलिए क्या पूर्वनिमित्तक प्रायश्चित्त करना चाहिए या परनिमित्तक ? इस प्रकारका संशय होनेपर निर्णय किया गया है कि पूर्वसे पर बलवान् है, अर्थात् अनन्तर होनेवाला ज्ञान पूर्वमें अप्रामाण्यका निश्चय करके होता है, जैसे शुक्तिमें रजतज्ञानके उत्तरमें जायमान 'नेदं रजतम्' इस प्रकारका बाधज्ञान पूर्वज्ञानमें अप्रामाण्यका निश्चय करके ही प्रवृत्त होता है, वैसे ही पूर्वनिमित्तक प्रायश्चित्तसे उत्तरनिमित्तक प्रायश्चित्त बलवान् होगा और उत्तर प्रायश्चित्तसे पूर्वका बाध होता है, यह भाव है।