भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 324

२९४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद

यज्ञमिष्ट्वा तेन पुनर्यजेत' इति श्रुतिनिरीक्षणेन जाता उद्गात्रपच्छेदनिमित्तकप्रायश्चित्तकर्त्तव्यताबुद्धिः पश्चात् प्रतिहर्त्रपच्छेदे सति 'यदि प्रतिहर्त्ताऽपच्छिद्येत सर्ववेदसं दद्याद्' इति श्रुतिनिरीक्षणेन जातया तद्विरुद्धप्रतिहर्त्रपच्छेदनिमित्तप्रायश्चित्तकर्त्तव्यताबुद्ध्या बाध्यते ।

एवं पूर्वं घटादिसत्यत्वप्रत्यक्षं परया तन्मिथ्यात्वश्रुतिजन्यबुद्ध्या बाध्यते । न चोदाहृतस्थले पूर्वनैमित्तिककर्त्तव्यताबुद्धेः परनैमित्तिककर्त्तव्यताबुद्ध्या बाधेऽपि पूर्वनैमित्तिककर्त्तव्यताजनकं शास्त्रं यत्रोद्गातृमात्रापच्छेदः, उभयोरपि युगपदपच्छेदौ वा, उद्गात्रपच्छेदस्य परत्वं वा, तत्र सावकाशम्, प्रत्यक्षं तु अद्वैतश्रुत्या बाधे विषयान्तराभावान्निरालम्बनं स्यादिति वैषम्यं शङ्कनीयम् । यत्र घटादौ श्रुत्या बाध्यं प्रत्यक्षं प्रवर्तते, तत्रैव व्यावहारिकं विषयं लब्ध्वा कृतार्थस्य तस्य परापच्छेदस्थले सर्वथा बाधितस्य पूर्वापच्छेदशास्त्रस्येव विषयान्तरान्वेषणाभावात् । इहाऽपि सर्व-


ज्ञान होता है, उसके बाद 'यदि प्रतिहर्ता०' (यदि प्रतिहर्ताका विच्छेद हो, तो सर्वस्व दान दे दे) इस प्रकारकी श्रुतिके देखनेसे उत्पन्न हुई उद्गाताके विच्छेदनिमित्तकर्तव्यतासे विरुद्ध प्रतिहर्ताके विच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्तकर्तव्यबुद्धिसे प्राक्तन बुद्धिका बाध होता है ।

इसी प्रकार पूर्वमें घट आदिमें होनेवाला सत्यत्वविषयक प्रत्यक्ष अनन्तरमें होनेवाले श्रुतिजन्य मिथ्यात्वविषयक बुद्धिसे बाधित होता है, यदि शङ्का हो कि पूर्वके उदाहृतस्थलमें अर्थात् जहाँ प्रथम उद्गाताका अपच्छेद हुआ है, उस स्थलमें प्राथमिक नैमित्तिकप्रायश्चित्तकर्तव्यत्व ज्ञानसे पश्चात् हुई नैमित्तिक कर्तव्यताका बोधक शास्त्र—जहाँ केवल उद्गाताका विभाग हुआ है, वहाँ अथवा एक कालमें दोनोंका जहाँ विच्छेद हुआ है, वहाँ अथवा जहाँ उद्गाताका विच्छेद पीछे हुआ है, वहाँ—सावकाश है और प्रत्यक्ष, तो अद्वैतश्रुतिसे बाध होनेपर अन्य किसी विषयके न होनेसे, निरालम्बन है, अतः वैषम्य है ? तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है; कारण कि जिस घट आदिमें श्रुतिसे बाध्य प्रत्यक्ष प्रवृत्त होता है, उसी घट आदिमें व्यावहारिक—व्यवहार करनेमें उपयुक्त—सत्तारूप विषयकी प्राप्ति करके कृतार्थ प्रत्यक्षको, जैसे पर अपच्छेदस्थलमें सर्वथा बाधित पूर्व अपच्छेद शास्त्रको अन्य विषयकी अन्वेषणा करनी पड़ती है, वैसे


ankurnagpal108@gmail.com