भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 340
३१०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

अन्ये त्वाहुः—शाब्दप्रमितौ वर्णपदादिस्वरूपसिद्ध्यनपेक्षायामप्ययोग्यशब्दात् प्रमित्यनुदयाद्योग्यतास्वरूपसिद्ध्यपेक्षाऽस्ति । तदपेक्षायामपि नोपजीव्यविरोधः । 'नेह नानास्ति' इति श्रुत्या निषेधेऽपि यावद्ब्रह्मज्ञानमनुवर्तमानस्याऽर्थक्रियासंवादिनोऽसद्विलक्षणप्रपञ्चस्वरूपस्याऽङ्गीकारात् । अन्यथा प्रत्यक्षादीनां व्यावहारिकप्रमाणानां निर्विषयत्वप्रसङ्गात् ।

न च स्वरूपेण निषेधेऽपि कथं प्रपञ्चस्वरूपस्यात्मलाभः । निषेधस्य प्रतियोग्यप्रतिक्षेपरूपत्वे व्याघातादिति वाच्यम् , शुक्तौ 'इदं रजतम्' 'नेदं रजतम्' इति प्रतीतिद्वयानुरोधेनाधिष्ठानगताध्यस्ताभावस्य बाध-


कुछ लोग* उक्त उपजीव्यविरोधका अन्य प्रकारसे समाधान करते हैं—यद्यपि शाब्दबोधमें वर्ण, पद आदिके स्वरूपकी सिद्धि अपेक्षित नहीं है, तथापि अयोग्य शब्दसे शाब्दज्ञानकी उत्पत्ति न होनेके कारण योग्यता-स्वरूपकी सिद्धि अपेक्षित है । उस योग्यताकी अपेक्षा होनेपर भी उपजीव्यके साथ विरोध नहीं है, क्योंकि 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि श्रुतिसे ब्रह्मातिरिक्त समस्त प्रपञ्चका निषेध होनेपर भी ब्रह्मज्ञानपर्यन्त अनुवर्तमान तथा अर्थक्रियामें समर्थ असत् पदार्थोंसे विलक्षण प्रपञ्चके स्वरूपका अङ्गीकार किया जाता है । यदि असत् ( शशशृङ्ग ) पदार्थसे विलक्षण प्रपञ्चस्वरूप न माना जाय, तो जितने व्यावहारिक प्रमाण हैं, वे सब निर्विषयक हो जायेंगे ।

शङ्का होती है कि स्वरूपतः प्रपञ्चके निषिद्ध होनेपर प्रपञ्चस्वरूपके अस्तित्वका लाभ कैसे होगा ? क्योंकि यदि निषेधको प्रतियोगीका अभावरूप न माना जाय, तो व्याघात होगा । परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि शुक्तिमें 'इदं रजतम्' 'नेदं रजतम्' ( यह रजत है और यह रजत नहीं है ) इस प्रकार दो प्रतीतियोंके अनुरोधसे अधिष्ठानमें अध्यस्तका अभाव—बाधपर्यन्त अनुवृत्त होने-


* इस मतका अवलम्बन करनेवालोंका कहना है कि पूर्व मतमें केवल शब्दका प्रत्यक्षज्ञान शाब्दबोधमें प्रयोजक है, वह चाहे प्रमात्मक हो चाहे भ्रमात्मक हो, परन्तु वर्ण, पद आदिका स्वरूप कारण नहीं है, लेकिन यह उनका कहना युक्त नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष निर्विषयक नहीं होता है; अतः वर्णादिस्वरूपका अवश्य शाब्दबोधके कारणरूपसे अङ्गीकार करना चाहिए । इस परिस्थितिमें पूर्वमतमें भी उपजीव्य विरोध अवश्य है, अतः पूर्वोक्त समाधान युक्त नहीं है, अतः मतान्तर कहते हैं, यह भाव है ।

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