भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 341, कुल 590 में से

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पृष्ठ 341

उपजीव्य प्रत्यक्षसे श्रुतिका अबाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित ३११

पर्यन्तानुवृत्तिकासद्विलक्षणप्रतियोगिस्वरूपसहिष्णुत्वाभ्युपगमात् । एतेन प्रपञ्चस्य स्वरूपेण निषेधे शशशृङ्गवदसत्त्वमेव स्यादिति निरस्तम्, ब्रह्मज्ञाननिवर्त्यस्वरूपाङ्गीकारेण वैषम्यात् । न चाऽस्याध्यस्तस्याऽधिष्ठाने स्वरूपेण निषेधे अन्यत्र तस्य स्वरूपेण निषेधः स्वतः सिद्ध इति तस्य सर्वदेशकालसम्बन्धिनिषेधप्रतियोगित्वापश्या असत्त्वं दुर्वारम् । ‘सर्वदेशकालसम्बन्धिनिषेधप्रतियोगित्वमसत्त्वम्’


वाले असद्विलक्षण प्रतियोगीस्वरूपका—सहिष्णु है, ऐसा माना जाता है* ।

इससे अर्थात् वक्ष्यमाणब्रह्मज्ञाननिवर्त्यरूप प्रपञ्चस्वरूपका अङ्गीकार करनेसे यह भी निरस्त हुआ समझना चाहिए कि ‘नेह नानास्ति’ इत्यादि श्रुतिसे प्रपञ्चका स्वरूपतः निषेध करनेपर शशशृङ्गके समान प्रपञ्च असत् ही होगा, क्योंकि ब्रह्मज्ञानसे निवृत्त होनेवाले स्वरूपसे युक्त उस प्रपञ्चका स्वीकार किया गया है । अतः शशशृङ्गसे वैषम्य है ।

यदि शङ्का हो कि अध्यस्तका अधिष्ठानमें स्वरूपतः निषेध किया जाय, तो अन्यत्र अर्थात् अधिष्ठानसे अतिरिक्त देश, कालमें अध्यस्तका निषेध स्वतः सिद्ध है ही; इसलिए वह असत् हो जायगा, क्योंकि सब देश और कालके साथ सम्बन्ध रखनेवाले अभावका वह प्रतियोगी है । असत्त्वका निर्वचन भी यही है


† शङ्कासमाधानका तात्पर्य यह है कि अधिष्ठानभूत ब्रह्ममें प्रपञ्चस्वरूप और प्रपञ्चका निषेध दोनों एक कालमें नहीं मान सकते हैं, यदि निषेध श्रुतिके अनुसार प्रपञ्च-निषेध ब्रह्ममें माना जाय, तो प्रपञ्चकी अवस्थिति नहीं होगी, क्योंकि अभाव प्रतियोगीकी स्थितिका विरोधी होता है, यदि कथञ्चित् जबर्दस्ती मान लिया जाय कि प्रतियोगी और अभाव एकत्र रहते हैं, तो निषेधत्वका व्याघात होगा, क्योंकि निषेधत्व (अभावत्व) प्रतियोग्यवस्थितिविरोधित्वरूप है; अतः स्वरूपतः प्रपञ्चका निषेध करनेपर प्रपञ्चस्वरूप सिद्ध नहीं हो सकता है, अतः प्रपञ्चको सत्य मानना चाहिए, यह पूर्वपक्षका तात्पर्य है, इसपर सिद्धान्त कहते हैं कि कल्पितपदार्थप्रतियोगिक अभाव अधिष्ठानसे अन्यत्र प्रतियोगीके साथ भले ही विरोधी हो, परन्तु अधिष्ठानमें कुछ काल तक अविरोधी रहता है अर्थात् अधिष्ठानमें रहनेवाला कल्पितप्रतियोगिक अभाव प्रतियोगीकी अवस्थितिको सहन करता है, ऐसी कल्पनामें द्वैतग्राही प्रत्यक्ष और निषेधश्रुति प्रमाणरूपसे हमको मिल रहे हैं, जैसे न्यायमें घटत्वाद्यभावको प्रतियोगीके साथ घटाद्यधिकरणमें विरोधी मानते हैं, तथापि संयोगादिके अभावको प्रतियोगीके साथ विरोधी नहीं मानते हैं अर्थात् संयोगाधिकरणमें भी संयोगाभाव माना जाता है, वैसे ही हम लोग भी मान, तो क्यों हानि है अर्थात् कुछ हानि नहीं है ।

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