सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 345, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३१५
मिति सत्तात्रैविध्यं नोपेयते, अधिष्ठानब्रह्मगतपारमार्थिकसत्ताऽनुवेधादेव घटादौ शुक्तिरजतादौ च सत्त्वाभिमानोपपत्त्या सत्यत्वाभासकल्पनस्य निष्प्रमाणकत्वात् । एवं च प्रपञ्चे सत्यत्वप्रतीत्यभावात्, तत्तादात्म्यापन्ने ब्रह्मणि तत्प्रतीतेरेवाविवेकेन प्रपञ्चे तत्प्रसक्त्युपपत्तेश्च सत्यत्वेन प्रपञ्च-निषेधे नोपजीव्यविरोधः, न वा अप्रसक्तनिषेधनम् ।
न च ब्रह्मगतपारमार्थिकसत्ताऽतिरेकेण प्रपञ्चे सत्त्वाभासानुपगमे व्यवहितसत्यरजतातिरेकेण शुक्तौ रजताभासोत्पत्तिः किमर्थमुपेयत इति वाच्यम्, व्यवहितस्याऽसन्निकृष्टस्याऽऽपरोक्ष्यासम्भवात् तन्निर्वाहाय तदुपगमात् ॥ ३ ॥
नन्वेवं स्वमुखं स्वस्यासन्निकृष्टमितीतरत् ।
दर्पणेऽध्यस्तताऽऽपन्नं प्रतिबिम्बं मृषेति चेद् ॥ १८ ॥
रजताभासकी उत्पत्ति माननेपर दर्पणमें अध्यस्त अपना मुख भी असन्निकृष्ट होनेसे अन्य अनिर्वचनीय उत्पन्न होगा, अतः वह मिथ्या होगा, यदि इस प्रकार शङ्का हो तो युक्त नहीं है ॥ १८ ॥
अधिष्ठानमें रहनेवाले पारमार्थिक सत्यत्वके सम्बन्धसे ही घट आदिमें और शुक्तिरजत आदिमें सत्ताका भान हो सकता है, फिर सत्यत्वाभासरूप सत्तान्तरकी कल्पना प्रमाणशून्य है। इस परिस्थितिमें* प्रपञ्चमें सत्यत्वकी प्रतीति न होनेसे प्रपञ्चतादात्म्यापन्न ब्रह्ममें सत्यत्वकी प्रतीतिसे ही अविवेकसे प्रपञ्चमें सत्यत्वकी प्रसक्ति है, अतः सत्यत्वरूपधर्मसे यदि ब्रह्ममें प्रपञ्चका निषेध किया जाय, तो उपजीव्य विरोध नहीं है और अप्रसक्तका निषेध भी नहीं है।
यदि शङ्का हो कि ब्रह्ममें रहनेवाली पारमार्थिक सत्तासे अतिरिक्त प्रपञ्चमें सत्त्वाभासरूप सत्ताके न माननेपर शुक्तिमें भी व्यवहित (दूरस्थ) रजतसे अतिरिक्त प्रातिभासिक रजतकी उत्पत्ति माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि व्यवहित रजतके साथ इन्द्रियका सम्बन्ध न होनेके कारण उसकी अपरोक्षता नहीं हो सकती है, इसलिए अपरोक्षत्वका निर्वाह करनेके लिए प्रातिभासिक रजतकी उत्पत्ति मानी जाती है ॥३॥
* इस परिस्थितिमें अर्थात् 'सन्' रूपसे प्रतीयमान घटादितादात्म्यापन्न सद्वस्त्वंशरूप ब्रह्ममें ही 'सन् घटः' इत्याकारक प्रतीतिकी विषयता है, जैसे 'मृद्धटः' इत्यादि प्रतीतिकी मृदंशमें मृद्विषयता है और ब्रह्ममें सत्ताप्रतीति होनेसे ही घटादिमें सत्ताव्यवहार होता है, यह भाव है।