सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 346, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३१६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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नन्वेवं प्रतिबिम्बभ्रमस्थलेऽपि ग्रीवास्थमुखातिरेकेण दर्पणे मुखाभासोत्पत्तिरुपेया स्यात् । स्वकीये ग्रीवास्थमुखे नासाद्यवच्छिन्नप्रदेशापरोक्ष्यसम्भवेऽपि नयनगोलकललाटादिप्रदेशापरोक्ष्यायोगात् । प्रतिबिम्बभ्रमे नयनगोलकादिप्रदेशापरोक्ष्यदर्शनाच्च । न च बिम्बातिरिक्तप्रतिबिम्बाभ्युपगमे इष्टापत्तिः । ब्रह्मप्रतिबिम्बजीवस्यापि ततो भेदेन मिथ्यात्वापत्तेः ।
रजतकी अपरोक्षताके लिए यदि शुक्तिमें अनिर्वचनीय रजतकी उत्पत्ति मानी जायगी, तो जहाँपर प्रतिबिम्बका भ्रम होता है, वहाँ भी ग्रीवास्थ मुखसे अतिरिक्त दर्पणमें अनिर्वचनीय मुखाभास की उत्पत्ति माननी ही होगी, क्योंकि प्रतिबिम्बत्वरूपसे स्वीकृत अपने ग्रीवास्थ मुखमें नासिका आदिसे युक्त प्रदेशका अपरोक्षत्व होनेपर भी नेत्रके गोलक और ललाट आदि प्रदेशका आपरोक्ष्य नहीं होगा, [ क्योंकि उस अंशके साथ इन्द्रियसन्निकर्ष नहीं है, यह भाव है ] । और प्रतिबिम्बविभ्रममें नयनके गोलक आदि प्रदेशोंका आपरोक्ष्य देखा भी जाता है । यदि शङ्का हो कि बिम्बसे अतिरिक्त प्रतिबिम्ब माननेमें इष्टापत्ति ही है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीवभूत ब्रह्मप्रतिबिम्बके ब्रह्मभिन्न होनेपर जीवमें मिथ्यात्वकी प्रसक्ति होगी । [तात्पर्यार्थ यह है कि बिम्ब और प्रतिबिम्बको यदि एक माना जायगा, तो प्रतिबिम्बका आपरोक्ष्य ( प्रत्यक्षात्मक ज्ञान ) नहीं होगा, क्योंकि बिम्बभूत मुखमें रहनेवाले आँखके गोलक तथा ललाट आदिके साथ इन्द्रिय आदिका सन्निकर्ष न होनेके कारण तदभिन्न प्रतिबिम्बका प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा, और यदि प्रत्यक्षकी उपपत्तिका लिए बिम्बसे अतिरिक्त प्रतिबिम्ब मानोगे, तो उसको मिथ्या ही मानना होगा, अन्यथा अद्वैतकी हानि होगी । इस अवस्थामें ब्रह्मप्रतिबिम्बरूपसे माने गये जीवका भी ब्रह्मसे भेद और उसको मिथ्या मानना होगा, क्योंकि जीव ब्रह्मसे स्वरूपतः भिन्न है, ब्रह्मप्रतिबिम्ब होनेसे, मुखप्रतिबिम्बवत् , इस अनुमानसे जीवमें ब्रह्मका भेद सिद्ध करनेपर—जीव मिथ्या है, ब्रह्मभिन्न होनेके कारण, घट आदिके समान, इस अनुमानसे जीवमें मिथ्यात्वप्रसक्ति होगी, इसे इष्टापत्ति नहीं मान सकते हैं, अतः मुखाभासादिकी उत्पत्ति नहीं मान सकते हैं, यह शङ्ककका कहना है ] ।