सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 347, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रतिबिम्ब की सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३१७
दर्पणादिपरावृत्तैर्निजैर्नयनरश्मिभिः ।
सन्निकृष्टं मुखं तत्रोपाध्यन्तःस्थितिविभ्रमः ॥ १९ ॥
न दर्पणे मुखाध्यासः संस्कारादेरसम्भवात् ।
ममेदमिति भानाच्चेत्याहुर्विवरणानुगाः ॥ २० ॥
क्योंकि दर्पण आदिसे परावृत्त अपनी नयनकी रश्मियाँ ही सन्निकृष्ट मुखका ग्रहण करती हैं और उसमें केवल उपाध्यन्तःस्थत्व आदि का अध्यास होता है। दर्पणमें मुखका अध्यास उत्पन्न नहीं होता है, क्योंकि संस्कार नहीं है और 'मेरा यह मुख है' इस प्रकार अभेदानुभव भी होता है, ऐसा विवरणानुसारी लोग कहते हैं ॥ १९ ॥ २० ॥
अत्र विवरणानुसारिणः प्राहुः—ग्रीवास्थ एव मुखे दर्पणोपाधिसन्निधानदोषाद् दर्पणस्थत्वप्रत्यङ्मुखत्वविम्बभेदानामध्याससम्भवेन न दर्पणे मुखस्याध्यासः कल्पनीयः, गौरवात् । 'दर्पणे मुखं नास्ति' इति संसर्गमात्रबाधात् । मिथ्यावस्त्वन्तरत्वे 'नेदं मुखम्' इति स्वरूपबाधापत्तेः । 'दर्पणे मम मुखं भाति' इति स्वमुखाभेदप्रत्यभिज्ञानाच्च ।
❊ इस आक्षेपके समाधानमें विवरणानुसारी कहते हैं—ग्रीवास्थ मुखमें ही दर्पणरूप उपाधिके सान्निध्यरूप दोषसे दर्पणस्थत्व, प्रत्यङ्मुखत्व, बिम्बभिन्नत्व आदिका अध्यास हो सकता है, इसलिए दर्पणमें मुखाध्यासकी कल्पना करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि धर्माध्यासकी अपेक्षा धर्मीका अध्यास माननेमें गौरव है। और 'दर्पणमें मुख नहीं है' इस प्रकार जो बाध होता है, वह दर्पणस्थत्वादि संसर्गका ही बाध है, प्रतिबिम्बस्वरूपका बाध नहीं है, [ अतः दर्पणस्थत्व आदि संसर्ग मिथ्या हैं और प्रतिबिम्ब सत्य हैं, यह भाव है ] । यदि यह मान लिया जाय कि प्रतिबिम्ब [ शुक्तिरजतके समान बिम्बभूत वस्तुसे मिथ्याभूत अन्य वस्तु है ] तो 'नेदं मुखम्' ( यह मुख नहीं है ) इस प्रकार स्वरूपबाध ही होता, परन्तु ऐसा तो होता नहीं है, अतः प्रतिबिम्बको मिथ्या वस्तु नहीं मान सकते हैं। और प्रतिबिम्बको सत्यस्वरूप मानने में और भी कारण है कि 'दर्पणमें मेरा मुख है' इस प्रकार अपने बिम्बभूत मुखके साथ अभेदकी प्रत्यभिज्ञा होती है । [ इसलिए प्रतिबिम्ब मिथ्या नहीं है, उसके विषयमें अनुमानसे यह फलित होगा—बिम्बके समान प्रतिबिम्ब सत्य है, बिम्बाभिन्न होनेसे और बाधाभाव होनेसे । इससे प्रतिबिम्बभूत जीवका भी सत्यत्व ही सिद्ध होगा,
* इस विवरणके मतमें बिम्ब और प्रतिबिम्बका ऐक्य होनेसे बिम्बभिन्नत्व हेतुसे मिथ्यात्वका अनुमान नहीं कर सकते हैं, यह भाव है।