भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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३२० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [द्वितीय परिच्छेद

चक्षुःसन्निकर्षमात्रस्य कारणत्वविलोपप्रसङ्गाच्च । दर्पणे मिथ्यामुखाध्यास- वादिनाऽपि कारणत्रयान्तर्गतसंस्कारसिद्ध्यर्थं नयनरश्मीनां कदाचित्- परावृत्य स्वमुखग्राहकत्वकल्पनयैव पूर्वानुभवस्य समर्थनीयत्वांच्च । न च नासादिप्रदेशावच्छिन्नपूर्वानुभवादेव संस्कारोपपत्तिः । तावता नयनगोल- कादिप्रतिबिम्बाध्यासानुपपत्तेः तटाकसलिला तटविटपिसमारूढादृष्टचर- पुरुषप्रतिबिम्बाध्यासस्थले कथमपि पूर्वानुभवस्य दुर्वचत्वाच्च । एवं चोपाधिप्रतिहतनयनरश्मीनां बिम्बं प्राप्य तद्ग्राहकत्वेऽवश्यं वक्तव्ये फलबलाद्दर्पणाद्यभिहतानामेव बिम्बं प्राप्य तद्ग्राहकत्वम्, न शिलादि-


फिर चक्षुःसन्निकर्षमात्रमें प्रत्यक्षकारणत्वका विलोप प्रसक्त हो जायगा । और यह भी बात है कि जो दर्पणमें मिथ्याभूत मुखप्रतिबिम्ब मानता है, उसको भी दोष, सम्प्रयोग और संस्कार इन तीन कारणोंके अन्तर्गत संस्कारकी सिद्धिके लिए किसी समयमें नयनरश्मियाँ परावृत्त होकर ही स्वमुखकी ग्राहक होती हैं, इस प्रकारकी कल्पना करके पूर्वानुभवका समर्थन करना पड़ेगा । यदि शङ्का हो कि नासिका आदि प्रदेशसे युक्त पूर्वके अनुभवसे ही उक्त स्थलमें संस्कारकी उपपत्ति हो सकती है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि नासिका आदि प्रदेशसे युक्त पूर्वानुभवसे नयनगोलक आदि प्रतिबिम्बाध्यासकी उपपत्ति नहीं हो सकती है और तालाबके जलमें किसी समयमें नहीं देखे गये और किनारेके वृक्षके ऊपर चढ़े हुए पुरुषके प्रतिबिम्बस्थलमें किसी रीतिसे भी पूर्वानुभवका समर्थन भी नहीं कर सकते हैं । इस अवस्थामें उक्त प्रकारसे उपाधिसे आहत होकर चक्षुकी रश्मियाँ लौटकर बिम्बको ग्रहण करती हैं, इस प्रकार अवश्य कहना होगा, परन्तु अनुभवके आधारपर यह भी कहना होगा कि दर्पण आदि स्वच्छ उपाधिके प्रतिघातसे लौटी हुई रश्मियाँ ही बिम्बका ग्रहण करती हैं, शिला आदिसे आहत हुई रश्मियाँ नहीं ग्रहण करती हैं, अतः शिला आदिमें प्रतिबिम्ब नहीं होता है। जो उपाधियाँ अत्यन्त स्वच्छ नहीं हैं, ऐसी ताम्र आदि उपाधियोंसे आहत नयन- रश्मियाँ मलिन उपाधिके सम्बन्धसे मुख आदि बिम्बभूत पदार्थोंके नयन- गोलक आदि संस्थानोंका ग्रहण नहीं कर सकती हैं, [ अतः शिलादिसे वैलक्षण्य होनेपर भी उनमें कार्त्स्न्येन प्रतिबिम्बग्राहकत्व नहीं है, यह भाव है।] और