सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 349, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३१९
पपत्तेः । कुड्यादिव्यवधानस्य प्रतिहतनयनरश्मिसम्बन्धविघटनं विनैवेह प्रतिबन्धकत्वे तथैव घटप्रत्यक्षादिस्थलेऽपि तस्य प्रतिबन्धकत्वसम्भवेन
शङ्का हो कि उसी द्रव्यका चाक्षुषप्रतिबिम्ब होता भ्रम है, जो कि व्यवधान रहित, उद्भूतरूपवान् और स्थूल हो, दूसरेका चाक्षुष प्रतिबिम्ब भ्रम नहीं होता है, ऐसा नियम है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि बिम्बगत* स्थूलत्व और उद्भूतरूपका कॢप्त चक्षुरिन्द्रियजन्य ज्ञान द्वारा उपयोग हो सकता है, फिर उनका उपयोग प्रकारान्तरसे मानना अर्थात् स्थूलता और उद्भूतरूपका उनके आश्रय बिम्ब द्वारा प्रतिबिम्बभ्रमकी उत्पत्तिमें उपयोग मानना अनुचित है। और इस अवस्थामैं यह भी आपत्ति हो सकती है—व्यवधानभूत दिवाल आदि पदार्थोंमें प्रतिहत नेत्ररश्मि आदिके सम्बन्धके विघटनके बिना ही प्रतिबिम्बविभ्रम-स्थलमें प्रतिबन्धकत्व होनेपर घट आदिके प्रत्यक्षस्थलमें भी सन्निकर्षविघटनके बिना भित्ति आदि व्यवधानोंमें प्रतिबन्धकत्वकी उपपत्ति हो सकती है, तो
* समाधानका तात्पर्य यह है कि द्रव्यके चाक्षुषप्रत्यक्षमें द्रव्यगत महत्त्व और उद्भूतरूप कारण है, यह मानी हुई बात है । इसी प्रकार बाह्य वस्तुके प्रत्यक्षके प्रति दिवाल आदि पदार्थ सन्निकर्षके निरसन द्वारा ही प्रतिबन्धक हैं, यह कॢप्त है। इस अवस्थामें प्रतिबिम्ब और बिम्बके अभेदपक्षमें बिम्बका चाक्षुष प्रत्यक्ष ही प्रतिबिम्बका चाक्षुष प्रत्यक्ष है, अतः बिम्बभूत मुख आदिमें रहनेवाले स्थूलत्व और उद्भूतरूपको कॢप्त चाक्षुष प्रत्यक्षसे अन्यत्र कारण नहीं मानना पड़ता है, अतः लाघव है, और शुक्तिरजतके समान साक्षीसे भास्य अनिर्वचनीय प्रतिबिम्बाध्यासकी उत्पत्तिपक्षमें, तो प्रतिबिम्बाध्यासमें प्रतिबिम्बसन्निकर्षको कारण माननेसे, वायु और परमाणु आदिके चाक्षुष प्रसङ्गके निवारणके लिए बिम्बगत महत्त्व और उद्भूतरूपको—महत्त्व और स्थौल्यका आश्रयीभूत द्रव्यरूप बिम्बसे उत्पन्न होनेवाले प्रतिबिम्बके अध्यासकी उत्पत्तिमें भी—कारण मानना होगा, यह गौरव है । इसी प्रकार बिम्ब और प्रतिबिम्बके अभेदपक्षमें यह माना जाता है कि नयनरश्मियाँ परावृत्त होकर बिम्बके साथ सम्बद्ध होती हैं; इससे प्रतिबिम्बविभ्रममें भी बिम्बसन्निकर्षके हेतु होनेसे घट आदिके चक्षुर्जन्य ज्ञानके समान प्रतिबिम्बके चाक्षुषमें भी दिवाल आदि सन्निकर्षके विघटनद्वारा ही प्रतिबन्धक होंगे, अकॢप्त साक्षात् प्रतिबन्धक नहीं होंगे, अतः लाघव है, प्रतिबिम्बके अध्यासपक्षमें तो बिम्बसन्निकर्षके हेतुत्वका अभ्युपगम न होनेसे कुड्यादिमें (दिवाल आदिमें) कॢप्त सन्निकर्षविघटकत्व कह नहीं सकते हैं, अतः कुड्यादिमें प्रतिबिम्ब अध्यासके प्रति साक्षात् ही प्रतिबन्धकताकी ही कल्पना करनी होगी, अन्यथा व्यवहितका भी प्रतिबिम्ब प्रसक्त होगा, इसलिए गौरव है, अतः 'अव्यवहित' इत्यादि ग्रन्थोक्त नियमसे भी उपपत्ति नहीं हो सकती है ।