सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३१९
पपत्तेः । कुड्यादिव्यवधानस्य प्रतिहतनयनरश्मिसम्बन्धविघटनं विनैवेह प्रतिबन्धकत्वे तथैव घटप्रत्यक्षादिस्थलेऽपि तस्य प्रतिबन्धकत्वसम्भवेन
शङ्का हो कि उसी द्रव्यका चाक्षुषप्रतिबिम्ब होता भ्रम है, जो कि व्यवधान रहित, उद्भूतरूपवान् और स्थूल हो, दूसरेका चाक्षुष प्रतिबिम्ब भ्रम नहीं होता है, ऐसा नियम है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि बिम्बगत* स्थूलत्व और उद्भूतरूपका कॢप्त चक्षुरिन्द्रियजन्य ज्ञान द्वारा उपयोग हो सकता है, फिर उनका उपयोग प्रकारान्तरसे मानना अर्थात् स्थूलता और उद्भूतरूपका उनके आश्रय बिम्ब द्वारा प्रतिबिम्बभ्रमकी उत्पत्तिमें उपयोग मानना अनुचित है। और इस अवस्थामैं यह भी आपत्ति हो सकती है—व्यवधानभूत दिवाल आदि पदार्थोंमें प्रतिहत नेत्ररश्मि आदिके सम्बन्धके विघटनके बिना ही प्रतिबिम्बविभ्रम-स्थलमें प्रतिबन्धकत्व होनेपर घट आदिके प्रत्यक्षस्थलमें भी सन्निकर्षविघटनके बिना भित्ति आदि व्यवधानोंमें प्रतिबन्धकत्वकी उपपत्ति हो सकती है, तो
* समाधानका तात्पर्य यह है कि द्रव्यके चाक्षुषप्रत्यक्षमें द्रव्यगत महत्त्व और उद्भूतरूप कारण है, यह मानी हुई बात है । इसी प्रकार बाह्य वस्तुके प्रत्यक्षके प्रति दिवाल आदि पदार्थ सन्निकर्षके निरसन द्वारा ही प्रतिबन्धक हैं, यह कॢप्त है। इस अवस्थामें प्रतिबिम्ब और बिम्बके अभेदपक्षमें बिम्बका चाक्षुष प्रत्यक्ष ही प्रतिबिम्बका चाक्षुष प्रत्यक्ष है, अतः बिम्बभूत मुख आदिमें रहनेवाले स्थूलत्व और उद्भूतरूपको कॢप्त चाक्षुष प्रत्यक्षसे अन्यत्र कारण नहीं मानना पड़ता है, अतः लाघव है, और शुक्तिरजतके समान साक्षीसे भास्य अनिर्वचनीय प्रतिबिम्बाध्यासकी उत्पत्तिपक्षमें, तो प्रतिबिम्बाध्यासमें प्रतिबिम्बसन्निकर्षको कारण माननेसे, वायु और परमाणु आदिके चाक्षुष प्रसङ्गके निवारणके लिए बिम्बगत महत्त्व और उद्भूतरूपको—महत्त्व और स्थौल्यका आश्रयीभूत द्रव्यरूप बिम्बसे उत्पन्न होनेवाले प्रतिबिम्बके अध्यासकी उत्पत्तिमें भी—कारण मानना होगा, यह गौरव है । इसी प्रकार बिम्ब और प्रतिबिम्बके अभेदपक्षमें यह माना जाता है कि नयनरश्मियाँ परावृत्त होकर बिम्बके साथ सम्बद्ध होती हैं; इससे प्रतिबिम्बविभ्रममें भी बिम्बसन्निकर्षके हेतु होनेसे घट आदिके चक्षुर्जन्य ज्ञानके समान प्रतिबिम्बके चाक्षुषमें भी दिवाल आदि सन्निकर्षके विघटनद्वारा ही प्रतिबन्धक होंगे, अकॢप्त साक्षात् प्रतिबन्धक नहीं होंगे, अतः लाघव है, प्रतिबिम्बके अध्यासपक्षमें तो बिम्बसन्निकर्षके हेतुत्वका अभ्युपगम न होनेसे कुड्यादिमें (दिवाल आदिमें) कॢप्त सन्निकर्षविघटकत्व कह नहीं सकते हैं, अतः कुड्यादिमें प्रतिबिम्ब अध्यासके प्रति साक्षात् ही प्रतिबन्धकताकी ही कल्पना करनी होगी, अन्यथा व्यवहितका भी प्रतिबिम्ब प्रसक्त होगा, इसलिए गौरव है, अतः 'अव्यवहित' इत्यादि ग्रन्थोक्त नियमसे भी उपपत्ति नहीं हो सकती है ।
३२० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [द्वितीय परिच्छेद
चक्षुःसन्निकर्षमात्रस्य कारणत्वविलोपप्रसङ्गाच्च । दर्पणे मिथ्यामुखाध्यास- वादिनाऽपि कारणत्रयान्तर्गतसंस्कारसिद्ध्यर्थं नयनरश्मीनां कदाचित्- परावृत्य स्वमुखग्राहकत्वकल्पनयैव पूर्वानुभवस्य समर्थनीयत्वांच्च । न च नासादिप्रदेशावच्छिन्नपूर्वानुभवादेव संस्कारोपपत्तिः । तावता नयनगोल- कादिप्रतिबिम्बाध्यासानुपपत्तेः तटाकसलिला तटविटपिसमारूढादृष्टचर- पुरुषप्रतिबिम्बाध्यासस्थले कथमपि पूर्वानुभवस्य दुर्वचत्वाच्च । एवं चोपाधिप्रतिहतनयनरश्मीनां बिम्बं प्राप्य तद्ग्राहकत्वेऽवश्यं वक्तव्ये फलबलाद्दर्पणाद्यभिहतानामेव बिम्बं प्राप्य तद्ग्राहकत्वम्, न शिलादि-
फिर चक्षुःसन्निकर्षमात्रमें प्रत्यक्षकारणत्वका विलोप प्रसक्त हो जायगा । और यह भी बात है कि जो दर्पणमें मिथ्याभूत मुखप्रतिबिम्ब मानता है, उसको भी दोष, सम्प्रयोग और संस्कार इन तीन कारणोंके अन्तर्गत संस्कारकी सिद्धिके लिए किसी समयमें नयनरश्मियाँ परावृत्त होकर ही स्वमुखकी ग्राहक होती हैं, इस प्रकारकी कल्पना करके पूर्वानुभवका समर्थन करना पड़ेगा । यदि शङ्का हो कि नासिका आदि प्रदेशसे युक्त पूर्वके अनुभवसे ही उक्त स्थलमें संस्कारकी उपपत्ति हो सकती है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि नासिका आदि प्रदेशसे युक्त पूर्वानुभवसे नयनगोलक आदि प्रतिबिम्बाध्यासकी उपपत्ति नहीं हो सकती है और तालाबके जलमें किसी समयमें नहीं देखे गये और किनारेके वृक्षके ऊपर चढ़े हुए पुरुषके प्रतिबिम्बस्थलमें किसी रीतिसे भी पूर्वानुभवका समर्थन भी नहीं कर सकते हैं । इस अवस्थामें उक्त प्रकारसे उपाधिसे आहत होकर चक्षुकी रश्मियाँ लौटकर बिम्बको ग्रहण करती हैं, इस प्रकार अवश्य कहना होगा, परन्तु अनुभवके आधारपर यह भी कहना होगा कि दर्पण आदि स्वच्छ उपाधिके प्रतिघातसे लौटी हुई रश्मियाँ ही बिम्बका ग्रहण करती हैं, शिला आदिसे आहत हुई रश्मियाँ नहीं ग्रहण करती हैं, अतः शिला आदिमें प्रतिबिम्ब नहीं होता है। जो उपाधियाँ अत्यन्त स्वच्छ नहीं हैं, ऐसी ताम्र आदि उपाधियोंसे आहत नयन- रश्मियाँ मलिन उपाधिके सम्बन्धसे मुख आदि बिम्बभूत पदार्थोंके नयन- गोलक आदि संस्थानोंका ग्रहण नहीं कर सकती हैं, [ अतः शिलादिसे वैलक्षण्य होनेपर भी उनमें कार्त्स्न्येन प्रतिबिम्बग्राहकत्व नहीं है, यह भाव है।] और
प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३२१
प्रतिहतानाम् । अनतिस्वच्छताम्रादिप्रतिहतानां मलिनोपाधिसम्बन्धदोषाद् मुखादिसंस्थानविशेषग्राहकत्वं साक्षात् सूर्यं प्रेप्सूनामिव उपाधिं प्राप्य निवृत्तानां न तथा सौरतेजसा प्रतिहतिरिति न प्रतिबिम्बसूर्यावलोकने साक्षात्तदवलोकने इवाऽशक्यत्वम् । जलाद्युपाधिसन्निकर्षे केषांचिदुपाधिप्रतिहतानां बिम्बप्राप्तावपि केषांचित्तदन्तर्गमनेनान्तरसिकतादिग्रहणमित्यादिकल्पनान्न कश्चिद् दोष इति ।
अद्वैतविद्याचार्यास्तु पार्श्वस्थैर्भेददर्शनात् ।
ग्रीवास्थादन्यदध्यस्तं प्रतिबिम्बमुखं विदुः ॥ २१ ॥
अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं कि समीपस्थ मनुष्य मुख्य मुखसे प्रतिबिम्बभूत मुखका भेद देखते हैं, अतः ग्रीवास्थ मुखसे अध्यस्त प्रतिबिम्बभूत मुख भिन्न है ॥२१॥
अद्वैतविद्याकृतस्तु प्रतिबिम्बस्य मिथ्यात्वमभ्युपगच्छतां त्रिविधजीववादिनां विद्यारण्यगुरुप्रभृतीनामभिप्रायमेवमाहुः—
साक्षात् सूर्यको देखनेकी इच्छासे प्रवृत्त हुईं नयनरश्मियाँ जैसे सूर्यके तेजसे पराहत होती हैं, वैसे उपाधिके प्रति जाकर लौटी हुई नेत्रकी रश्मियाँ सूर्यके तेजसे आहत नहीं होती हैं, इसलिए साक्षात् सूर्यके अवलोकनमें जैसी कठिनाई होती है, वैसी प्रतिबिम्बित सूर्यके अवलोकनमें नहीं होती है । जल आदि उपाधिके सन्निकर्षमें कुछ नेत्रकी किरणें उपाधिसे आहत होकर बिम्बदेश तक जाती हैं, तो भी अवशिष्ट कुछ रश्मियाँ उपाधिके भीतर जाकर उसमें की बालू आदिका ग्रहण करती हैं, इत्यादि कल्पना करनेसे कुछ भी *दोष नहीं है ।
प्रतिबिम्बको मिथ्या और जीवको पारमार्थिक, व्यावहारिक और प्रातिभासिक भेदसे त्रिविध माननेवाले श्रीविद्यारण्यप्रभृतियोंका अभिप्राय अद्वैताचार्य निम्न प्रकारसे कहते हैं—
* नयनरश्मियाँ परावृत्त होकर बिम्बको ग्रहण करती हैं, यही सुरेश्वराचार्यजीका भी मत है—
‘दर्पणाभिहता दृष्टिः परावृत्य स्वमाननम् ।
व्याप्नुवत्याभिमुख्येन व्यत्यस्तं दर्शयेन्मुखम् ॥’
अर्थात् दर्पण आदि उपाधियोंसे प्रतिहत दृष्टि लौटकर अपने ग्रीवास्थ मुखको व्याप्त करती हुई विपरीत मुखका आभिमुख्यसे ग्रहण कराती है, यह भाव है ।
४१
| ३२२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
|---|
चैत्रमुखाद् भेदेन तत्सदृशत्वेन च पार्श्वस्थैः स्पष्टं निरीक्ष्यमाणं दर्पणे तत्प्रतिबिम्बं ततो भिन्नं स्वरूपतो मिथ्यैव, स्वकरगतादिव रजताच्छुक्तिरजतम् । न च 'दर्पणे मम मुखं भाति' इति बिम्बाभेदज्ञानविरोधः, स्पष्टभेदद्वित्वप्रत्यङ्मुखत्वादिविज्ञानविरोघेनाऽभेदज्ञानासम्भवात् । 'दर्पणे मम मुखम्' इति व्यपदेशस्य स्वच्छायामुखे स्वमुखव्यपदेशवद् गौणत्वाच्च । न चाऽभेदज्ञानविरोधाद् भेदव्यपदेश एव गौणः किं न स्यादिति शङ्क्यम्, बालानां प्रतिबिम्बे पुरुषान्तरभ्रमस्य हानोपादित्सार्थक्रियापर्यन्त-
चैत्र जिस कालमें अपना मुख दर्पणमें देखता है, उस कालमें पासके मनुष्य ग्रीवास्थ बिम्बभूत चैत्रके मुखसे भिन्न और सदृश प्रतिबिम्बभूत मुखको स्पष्टरूपसे देखते हैं और वह स्वरूपतः मिथ्या ही है, जैसे कि अपने हाथके रजतसे भिन्न और उसके सदृश स्पष्ट दिखनेवाला शुक्तिरजत स्वरूपतः मिथ्या होता है। यदि शङ्का हो कि प्रतिबिम्ब बिम्बसे भिन्न कैसे हो सकता है, क्योंकि 'दर्पणमें मेरा मुख भासता है' इस प्रकार बिम्बसे प्रतिबिम्बका अभेद भासता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतिबिम्ब और बिम्बका स्पष्टभेद, द्वित्व, प्रत्यङ्मुखत्व, प्राङ्मुखत्व आदिके ज्ञानसे विरोध होनेके कारण अभेदज्ञान हो ही नहीं सकता है। और 'दर्पणमें मेरा मुख है' इस प्रकारका व्यपदेश तो जैसे अपने छायामुखमें अपने मुखका व्यवहार होता है, वैसे ही गौण है *। इसपर यदि शङ्का हो कि अभेदज्ञानके विरोधसे भेदव्यपदेश ही तुल्ययुक्तिसे गौण क्यों न माना जाय ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि बालकोंको प्रतिबिम्बमें अन्य पुरुषका भ्रम होता है, जिससे हान ( त्याग ), उपादित्सा ( ग्रहण करनेकी इच्छा ) आदि जो उसकी अर्थक्रिया होती है, उसका अपलाप किसी रीतिसे नहीं कर सकते हैं †। इसपर भी यदि पुनः शङ्का हो कि बुद्धिमान् पुरुष भी
* 'दर्पणमें मेरा मुख दिखता है', 'मेरा मुख मलिन है', 'मेरा मुख दीर्घ है', 'दर्पण आदिमें मेरा ग्रीवास्थ मुख ही है' इत्यादि अनेक अभेदोंका अनुभव होता है, अतः अभेदानुभव ही मुख्य है, और भेदानुभव तो अभेदानुभवके विरोधसे केवल औपचारिक है, अतः बिम्ब और प्रतिबिम्बका वास्तविक भेद न होनेपर भी कल्पित भेद मान करके उक्त अभेदानुभवोंकी उपपत्ति हो सकती है, यह पूर्वपक्षका भाव है।
† तात्पर्य यह कि प्रतिबिम्बविषयक प्रवृत्ति आदि लोकमें होती है, अतः उसका अवश्य भेद मानना चाहिए, इसीलिए अज्ञानी बालक जलाशय आदिमें अत्यन्त भयंकर प्रतिबिम्बको देखकर
प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३२३
स्यादपलपितुमशक्यत्वात् । न च प्रेक्षावतामपि स्वमुखविशेषपरिज्ञानाय दर्पणाद्युपादानदर्शनाद् अभेदज्ञानमप्यर्थक्रियापर्यन्तमिति वाच्यम्, भेदेऽपि प्रतिबिम्बस्य बिम्बसमानाकारत्वनियमविशेषपरिज्ञानादेव तदुपादानोपपत्तेः ।
* अपने मुखकी विशेषता जाननेकी इच्छासे दर्पण आदिका परिग्रह करते हैं, अतः अर्थक्रियापर्यन्त, तो अभेदज्ञान भी है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि बिम्ब और प्रतिबिम्बका स्वरूपतः भेद प्रतीत होनेपर भी प्रतिबिम्ब बिम्बका समानाकार ही होता है, इस नियमविशेषके परिज्ञानसे ही दर्पण आदिके ग्रहणमें प्रेक्षावान्की † प्रवृत्ति होती है ।
पलायन करते हैं, सौम्य और प्रीतिकर प्रतिबिम्बको देखकर उसको ग्रहण करनेकी इच्छा करते हैं और प्रतिबिम्बप्रदेश तक जाते हैं, अतः प्रतिबिम्ब और बिम्बका परस्पर भेद अवश्य मानना चाहिए, अभेद नहीं ।
* शङ्का करनेवालेका भाव यह है कि यदि बिम्ब और प्रतिबिम्बका वस्तुतः भेद ही है, तो परीक्षकोंको उसका परिज्ञान ठीक ठीक होगा ही । इस अवस्थामें वे जो अपने मुखकी विशेषता जाननेके लिए दर्पण आदिका ग्रहण करते हैं, वह नहीं होना चाहिए । परन्तु उनकी प्रवृत्ति दर्पण आदिके परिग्रहमें होती है, अतः बिम्ब और प्रतिबिम्बका अभेद है, यह निर्विवाद है ।
† समाधानका सारांश यह है कि बिम्ब और प्रतिबिम्बके स्वरूपतः भेदका निश्चय पूर्वोक्त युक्तियोंसे उन परीक्षकोंको यद्यपि है, तथापि प्रतिबिम्बमें बिम्बसमानाकारत्व नियमविशेषके परिज्ञानसे दर्पण आदिका ग्रहण करनेमें उनकी प्रवृत्ति होती है ।
वस्तुतस्तु बिम्ब और प्रतिबिम्बमें अभेदपक्षकी कल्पना ही युक्त है, क्योंकि उसमें लाघव है और बिम्बप्रतिबिम्ब भावापन्नरूपसे श्रुतिसिद्ध जीव और ब्रह्मके अभेदकी प्रतिपत्तिमें उपयोगी होनेके कारण लौकिक बिम्ब और प्रतिबिम्बका अभेद श्रुतिसे प्रमाणित भी है । प्रतिबिम्बभूत जीव ही जब ब्रह्माभिन्न हो सकता है, तो तदतिरिक्त पारमार्थिक अवच्छिन्न जीवकी आवश्यकता ही क्या है ? बिम्ब और प्रतिबिम्बके अभेदमें 'यथा ह्ययं ज्योति०' इत्यादि श्रुति भी प्रमाण हो सकती है—जैसे एक सूर्य अनेक जल आदि उपाधियोंमें प्रतिबिम्बित होनेसे नाना होता है, और स्वतः एक ही है । इन प्रमाणोंसे बिम्ब और प्रतिबिम्बका अभेद ही सिद्ध होता है, भेद सिद्ध नहीं होता, इसलिए पूर्वोक्त विवरणकारका ही मत श्रेष्ठ है, यद्यपि सूक्ष्म विचारसे अभेदपक्ष ही ठीक है, इसीलिए भामती आदि ग्रन्थोंमें लौकिकबिम्ब और प्रतिबिम्बके दृष्टान्तसे ही जीव और ब्रह्मका अभेद व्यवस्थित किया गया है, तथापि यह प्रतिबिम्बोत्पत्तिप्रक्रिया मन्दाधिकारियोंके लिए अर्थात् उनको अपनी बुद्धिके अनुसार तत्त्वका अधिगम हो, इसलिए प्रतिपादित है । अधिकांश कृष्णालंकार टीका पृ० ३१६ काशी चौ० सु० में देखना चाहिए ।
| ३२४ | सिद्धान्तलेशसंग्रहे | [ द्वितीय परिच्छेद |
|---|
यत्तु 'नात्र मुखम्' इति दर्पणे मुखसंसर्गमात्रस्य बाधः, न मुखस्येति । तन्न; 'नेदं रजतम्' इत्यत्रापि इदमर्थे रजततादात्म्यमात्रस्य बाधो, न रजतस्येत्यापत्तेः । यदि च इदमंशे रजतस्य तादात्म्येनाऽध्यासाद् 'नेदं रजतम्' इति तादात्म्येन रजतस्यैव बाधः, न तादात्म्यमात्रस्य, तदा दर्पणे मुखस्य संसर्गतयाऽध्यासाद् 'नात्र मुखम्' इति संसर्गतया मुखस्यैव बाधः, न संसर्गमात्रस्येति तुल्यम् ।
यत्तु धर्मिणोऽप्यध्यासकल्पने गौरवमिति, तद् रजताभासकल्पनागौरववत् प्रामाणिकत्वान्न दोषः । स्वनेत्रगोलकादिप्रतिबिम्बभ्रमस्थले बिम्बापरोक्ष्यकल्पनोपायाभावात् । नयनरश्मीनामुपाधिप्रतिहतानां बिम्बप्राप्तिकल्पने हि दृष्टविरुद्धं बहापद्यते । कथं हि जलसन्निकर्षे केषुचिन्न-
और पूर्वमें जो कहा गया है कि 'यहाँ मुख नहीं है, इस प्रकारका जो बाध होता है, वह दर्पणमें मुखसंसर्गका ही बाध होता है, मुखका बाध नहीं होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं है) इस बाधस्थलमें भी तुल्ययुक्तिसे इदमर्थमें रजतके तादात्म्यमात्रका बाध प्रसक्त होगा, रजतका नहीं होगा । यह भी आपत्ति आ सकती है । यदि कहा जाय कि इदमंशमें रजतका तादात्म्यसे अध्यास होता है, इसलिए 'नेदं रजतम्' इससे तादात्म्येन रजतका ही बाध होता है, तादात्म्यमात्रका नहीं होता, तो हम भी इस रीतिसे कह सकते हैं कि दर्पणमें मुखका संसर्गरूपसे ही अध्यास होता है, अतः 'नात्र मुखम्' इससे संसर्गरूपसे मुखका ही बाध होता है, केवल संसर्गका बाध नहीं होता है ।
और जो यह कहा है कि धर्मीके अध्यासकी कल्पनामें गौरव है, तो वह भी युक्त नहीं है, शुक्तिमें रजताध्यासकी कल्पनामें जैसे गौरव प्रामाणिक है, वैसे ही प्रतिबिम्बाध्यास भी * प्रामाणिक है, अतः गौरव दोष नहीं है । और स्वकीय नेत्रगोलक आदिके प्रतिबिम्बविभ्रमस्थलमें बिम्बभूत मुखकी अपरोक्षताकी कल्पनामें कोई हेतु भी नहीं है । यदि उक्त दोषके परिहारके लिए नयनकी रश्मियोंका उपाधिके आघातसे बिम्बके प्रति गमन माना जाय, तो प्रमाणविरुद्ध भी अनेक प्रसङ्ग आ सकते हैं । [इसी दृष्टविरुद्ध
- अर्थात् बाधकज्ञान उभयत्र समानरूपसे प्रमाण है, यह भाव है ।
प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३२५
यनरश्मिषु अप्रतिहतमन्तर्गच्छत्सु अन्ये जलसम्बन्धेनाऽपि प्रतिहन्यमाना- -नितान्तमृदवः सकलनयनरश्मिप्रतिघातिनं किरणसमूहं निर्जित्य तन्मध्यगतं सूर्य्यमण्डलं प्रविशेयुः । कथं च चन्द्रावलोकन इव तत्प्रतिबिम्बावलोकनेऽपि अमृतशीतलं तद्विम्बसन्निकर्षाविशेषे लोचनयोः शैत्याभिव्यक्त्या आप्या- यनं न स्यात् । कथं च जलसम्बन्धेनाऽपि प्रतिहन्यमानाः शिलादिसम्बन्धेन न प्रतिहन्येरन् । तत्प्रतिहत्या परावृत्तौ वा नयनगोलकादिभिर्न संसृज्येरन् । तत्संसर्गे वा संसृष्टं न साक्षात्कारयेयुः । दोषेणापि हि विशेषां- शग्रहणमात्रं प्रतिबध्यमानं दृश्यते, न तु सन्निकृष्टधर्मिस्वरूपग्रहणमपि ।
प्रसङ्गका उपपादन करते हैं ] । और जलके साथ सन्निकर्ष होनेपर कुछ नयन- रश्मियाँ अप्रतिहतरूपसे भीतर ( जलके अन्दर ) जाती हैं, यह माननेपर भी जलके सम्बन्धसे प्रतिहत होनेवाले, अत एव सर्वथा कोमल अन्य रश्मियाँ— सम्पूर्ण नयनरश्मियोंका प्रतिघात करनेवाले सूर्यकिरणके समूहको जीत कर, अर्थात् उसको दबाकर उनके मध्यवर्ती सूर्यमण्डलमें कैसे प्रवेश करेंगी ? अर्थात् कभी सूर्यमण्डलको ग्रहण नहीं कर सकती हैं । और बिम्बभूत चन्द्रके दर्शनके समान उसके प्रतिबिम्बके दर्शनसे भी नेत्रोंमें शैत्यकी अभिव्यक्ति द्वारा उष्णताकी शान्ति क्यों नहीं होती है ? अर्थात् बिम्ब और प्रतिबिम्बका अभेद- माननेवालोंके पक्षमें प्रतिबिम्बके दर्शनसे भी नेत्रोंकी गर्मी शान्त होनी चाहिए, क्योंकि अमृतके समान अत्यन्त शीतल चन्द्रबिम्बके साथ सन्निकर्ष ( बिम्ब प्रतिबिम्बाभेदवादियोंके मतमें ) समान ही है । और जिन नेत्ररश्मियोंका जलादि जैसे पदार्थोंसे आघात होता है, उनका शिला आदिके सम्बन्धसे प्रतिघात क्यों नहीं होता है ? अर्थात् शिलादिसे उनका प्रतिघात होना ही चाहिए, यह भाव है, यदि माना जाय कि शिला आदिसे भी प्रतिघात होता है, तो फिर लौटकर नयनगोलकके साथ सम्बन्ध क्यों नहीं होता है ? यदि इसपर कहो कि नेत्रगोलकके साथ उनका सम्बन्ध होता है, तो वे नयनगोलक आदिका ग्रहण क्यों नहीं करती है ? यदि दोषविशेषसे इस प्रश्नका परिहार करेंगे, तो उसका यही उत्तर है कि दोषसे विशेष अंशका केवल ग्रहण ही प्रतिबद्ध देखा जाता है, सन्निकृष्ट ( सम्बद्ध ) धर्मीके स्वरूपका ग्रहण प्रतिबद्ध नहीं देखा जाता है ।
| ३२६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
|---|
प्रतिमुखाध्यासपक्षे तु न किञ्चिद् दृष्टविरुद्धं कल्पनीयम् ।
तथा हि—अन्यवहितस्थूलोद्भूतरूपस्यैव चाक्षुषाध्यासदर्शनाद् बिम्बगतस्थौल्योद्भूतरूपयोः स्वाश्रयसाक्षात्कारकारणत्वेन क्लृप्तयोः स्वाश्रयप्रतिबिम्बाध्यासेऽपि कारणत्वम्, कुड्याद्यावरणद्रव्यस्य त्वगिन्द्रियादिन्यायेन प्राप्यकारितयाऽवगतनयनसन्निकर्षविघटनद्वारा व्यवहितवस्तुसाक्षात्कारप्रतिबन्धकत्वेन क्लृप्तस्य व्यवहितप्रतिबिम्बाध्यासेऽपि विनैव द्वारान्तरं प्रतिबन्धकत्वं च कल्पनीयम् । तत्र को विरोधः क्वचित् कारणत्वादिना क्लृप्तस्य फलवलादन्यत्रापि कारणत्वादिकल्पने ।
जिस पक्षमें बिम्ब और प्रतिबिम्बका अभेद न मानकर अनिर्वचनीय प्रतिबिम्बाध्यासकी ही उत्पत्ति मानी जाती है, उस पक्षमें किसी भी व्यवहार-विरुद्ध कारण या प्रतिबन्धककी कल्पना नहीं की जाती है ।
किसी प्रकारके व्यवधानसे रहित स्थूल और उद्भूत रूपवान्का ही चाक्षुष अध्यास लोकमें देखा जाता है, इससे बिम्बमें रहनेवाले स्थूलत्व और उद्भूतरूप, जो अपने आधारके प्रत्यक्षमें * कारणतारूपसे विनिश्चित हैं, वे आश्रयके प्रतिबिम्बाध्यासमें भी कारण हैं, ऐसी कल्पना कर सकते हैं । दिवाल आदि जितने आवारक द्रव्य हैं, वे—त्वगिन्द्रियके समान † प्राप्यकारित्वरूपसे निश्चित नेत्रके सन्निकर्षके विघटन द्वारा ही व्यवहित वस्तुके साक्षात्कारमें प्रतिबन्धक क्लृप्त हैं, अतः व्यवहितके प्रतिबिम्बाध्यासमें भी किसी द्वारविशेषकी अपेक्षा न करके ही वे प्रतिबन्धक हैं, ऐसी कल्पना की जाती है । कहींपर कारणत्व आदि रूपसे निश्चित वस्तुमें फलके बलसे यदि अन्यत्र भी कारणत्व आदिकी कल्पना की जाय, तो उसमें क्या विरोध है, अर्थात् कुछ भी विरोध नहीं है, यह भाव है ।
* अर्थात् महत्त्व और उद्भूतरूप इन दोनोंमें उनके आश्रयीभूत द्रव्यविषयक चाक्षुष-प्रत्यक्षमात्रके प्रति कारणता है। यह घटादि प्रत्यक्ष स्थलमें देखा गया है, अतः क्लृप्त है ।
† जैसे त्वगिन्द्रय विषयदेशको प्राप्त होकर ही उस विषयका ग्रहण करती है, वैसे ही चक्षुरिन्द्रिय भी विषयदेश को प्राप्त करके ही विषयका ग्रहण करती है, अतः उसको प्राप्यकारी कहा जाता है। अतः पूर्वमें—दिवाल आदिमें साक्षात्कार प्रतिबन्धकत्व माननेसे सन्निकर्षमात्रका विलोप प्रसङ्ग होगा, यह जो कहा था, वह निराकृत हुआ समझना चाहिए, क्योंकि सन्निकर्षमें हेतुत्वग्राहक प्रमाणके अनुरोधसे सन्निकर्षके विघटन द्वारा ही कुड्यादिमें प्रत्यक्षकी प्रतिबन्धकता मानी जाती है,
प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३२७
एतेनोपाधिप्रतिहतनयनरश्मीनां बिम्बप्राप्त्यनुपगमे व्यवहितस्योद्भूतरूपादिरहितस्य च चाक्षुषप्रतिबिम्बभ्रमप्रसङ्ग इति निरस्तम्।
किं च तदुपगमे एव उक्तदूषणप्रसङ्गः। कथम् ? साक्षात् सूर्यावलोकन इव विना चक्षुर्विक्षेपमवनतमौलिना निरीक्ष्यमाणे सलिले ततः प्रतिहतानां नयनरश्मीनामूर्ध्वमुत्प्लुत्य बिम्बसूर्यग्राहकत्ववत् तिर्यक्चक्षुर्विक्षेपं विना ऋजुचक्षुषा दर्पणे विलोक्यमाने तत्प्रतिहतानां पार्श्वस्थमुखग्राहकत्ववच्च वदनसाचीकरणाभावेऽप्युपाधिप्रतिहतानां पृष्ठभागव्यवहितग्राहकत्वं
इससे अर्थात् बिम्बगत अव्यवहितत्व, स्थूलत्व और उद्भूतरूपत्व आदिकी प्रतिबिम्बध्यासके प्रति हेतुता होनेसे—उपाधिसे आहत नयनरश्मियोंका बिम्बके प्रति गमन न माना जाय, तो व्यवहित या उद्भूतरूप आदिसे रहित वस्तुका चाक्षुष प्रतिबिम्बाध्यास प्रसक्त होगा—इस आपत्तिका भी निरास हुआ ही समझना चाहिए।
किञ्च, आहत रश्मियोंका बिम्बके प्रति गमन माननेमें ही व्यवहितका प्रतिबिम्ब प्रसक्त होगा। कैसे होगा ? इस प्रकार होगा—जैसे साक्षात् गगनस्थ सूर्यमण्डलको देखनेके लिए चक्षुका विक्षेप (चक्षुको सूर्यकी ओर करना) आवश्यक है, परन्तु उसके बिना अधोमुखसे निरीक्ष्यमाण जलमें उससे (जलसे) प्रतिहत नयनकी किरणें ऊपर जाकर बिम्बका ग्रहण करती हैं, और जैसे [पार्श्वस्थ (समीपस्थ) पुरुषको ग्रहण करनेके लिए चक्षुके तिरछेपनकी आवश्यकता होती है] तिरछे देखे बिना सीधे नेत्रोंसे देखे जाते हुए दर्पणमें उससे (दर्पणसे) प्रतिहत नेत्ररश्मियाँ पार्श्वस्थ मुखको ग्रहण करती हैं, वैसे ही वदनके साचीकरणके * बिना भी दर्पण आदि उपाधिसे प्रतिहत रश्मियोंसे पृष्ठभागसे व्यवहित पदार्थोंका भी ग्रहण होना
प्रकृतमें प्रतिबिम्बाध्यासमें कुड्यादिव्यवहित मुखादि साक्षात्प्रतिबन्धक माना जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, अन्यथा प्रतिबिम्बकी उत्पत्तिमें बिम्बसन्निकर्षको कारण न माननेके कारण व्यवहित वस्तुका भी प्रसङ्ग आ सकता है, अतः दिवाल आदिसे व्यवहित मुखादिमें प्रतिबिम्बोत्पत्तिकी प्रतिबन्धकता माननी चाहिए, यह भाव है।
* चक्षुसे पृष्ठभागसे व्यवहित पदार्थका ग्रहण करनेमें उपयुक्त मुखका व्यापार अर्थात् पीछेके पदार्थको देखनेमें मुखको जो उसकी ओर घूमाना पड़ता है, इसी व्यापार की प्रकृतमें साचीकरणशब्दसे विवक्षा की गई है, यह भाव है।
| ३२८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
|---|
तावद् दुर्वारम् । उपाधिप्रतिहतनयनरश्मीनां प्रतिनिवृत्तिनियमं विहाय यत्र बिम्बं तत्रैव गमनोपगमात् । तथा मलिनदर्पणे श्यामतया गौरमुखप्रतिबिम्बस्थले विद्यमानस्यापि बिम्बगतगौररूपस्य चाक्षुषज्ञानेऽनुपयोगितया पीतशङ्खभ्रमन्यायेनारोप्यरूपवैशिष्टयेनैव बिम्बमुखस्य चाक्षुषत्वं निर्वाह्यमिति, तथैव नीरूपस्यापि दर्पणोपाधिश्यामलत्ववैशिष्ट्येन चाक्षुषप्रतिबिम्बभ्रमविषयत्वमपि दुर्वारम् । स्वतो नीरूपस्यापि नभसोऽध्यस्तनैल्यवैशिष्ट्येन
चाहिए, क्योंकि उपाधिसे प्रतिहत नेत्ररश्मियोंके प्रतिनिवृत्तिनियमका † परित्याग करके जहाँ बिम्ब हो, वहीं गमनका उपगम है । तथा इसी प्रकारसे ‡ मलिन दर्पणमें गौरमुखके प्रतिबिम्बित होनेपर उस प्रतिबिम्बका श्यामरूपसे भान होता है, गौर रूपसे नहीं, इससे बिम्बमें गौर रूपके रहनेपर भी उसका चाक्षुष ज्ञानमें उपयोग न होनेसे पीतशङ्खभ्रमन्यायसे * आरोपित रूपके सम्बन्धसे ही बिम्बकी चाक्षुषताका निर्वाह करना चाहिए, इस अवस्थामें नीरूप आकाश आदिका भी दर्पण आदिके श्यामत्व सम्बन्धसे चाक्षुषप्रतिबिम्बभ्रम हो सकता है, क्योंकि † आकाशके स्वतः नीरूप होनेपर भी अध्यस्त नैल्यके
† प्रतिनिवृत्तिनियम—नेत्रगोलकके अभिमुख विषयसे आहत रश्मियाँ फिर गोलकके द्वारा शरीरके भीतर जाती हैं, इस प्रकारका नियम ।
‡ उपाधिप्रतिहत नयनरश्मियोंके प्रतिनिवृत्तिनियमाभाव पक्षमें पृष्ठभागव्यवहित प्रतिबिम्बकी आपत्ति हो सकती है, वैसे ही नीरूप वायुका भी चाक्षुष प्रतिबिम्ब प्रसक्त हो सकता है, इस प्रकार दूषणान्तरके समुच्चयके लिये तथा शब्द है ।
* कवितार्किकमतके उपपादनके अवसरमें शंखका आरोप्य पीतरूपके सम्बन्धसे ही भ्रम हो सकता है, अन्यथा नहीं, यह कहा जा चुका है, इसी पीतशङ्खन्यायसे, यह भाव है ।
वस्तुतस्तु 'द्रव्यके चाक्षुष प्रत्यक्षमें द्रव्यगत उद्भूतरूप ही कारण है' इस नियमके विद्यमान होनेसे नीरूप द्रव्यका चाक्षुष प्रतिबिम्ब—भ्रम हो ही नहीं सकता है। मलिन दर्पणमें गौर मुखके प्रतिबिम्ब भ्रमस्थलमें और पीतशङ्ख आदि भ्रमस्थलमें 'श्याम मुख' और 'पीतशङ्ख' इस प्रकारके भ्रमके पूर्वमें अध्यासके प्रति कारणभूत धर्मिज्ञानमें गौर और शुक्ल आदि कारण होनेसे उपयोगके अभावकी सिद्धि नहीं हो सकती है, अर्थात् बिम्बगत गौर रूप आदिकी उपयोगिता धर्मिज्ञानके लिए अवश्य है । द्रव्य चाक्षुषमें रूपविषयकत्वनियमाभाव कवितार्किकके मतमें दिखलाया भी जा चुका है ।
† कवितार्किकमतसे ही आरोप्यरूपविशिष्टत्वेन आकाशका चाक्षुष ज्ञान माना जाता हैं, वस्तुतस्तु अन्य पूर्वाचार्योंको यह स्वीकृत नहीं है, उनके मतसे गगनमें समन्ताद् व्याप्त
प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार ] भाषानुवादसहित ३२९
चाक्षुषत्वसंप्रतिपत्तेः । तस्मात् स्वरूपतः प्रतिमुखाध्यासपक्ष एव श्रेयान् ।
सामान्यतोऽपि संस्कारो विशेषारोपकारणम् ।
स्वप्ने तथैव वाच्यत्वादिह बिम्बानुसारिता ॥ २२ ॥
सामान्यतः संस्कार विशेषारोपमें कारण होता है, क्योंकि स्वप्नमें अदृष्टानुरोधसे पुरुषाकृति विशेषका अध्यास कहा गया है, अतः प्रकृतमें बिम्बानुसारितासे मुखाकृतिका अध्यास होगा ॥ २२ ॥
न च तत्रापि पूर्वानुभवसंस्कारदौर्घट्यम्, पुरुषसामान्यानुभवसंस्कारमात्रेण स्वप्नेष्वदृष्टचरपुरुषाध्यासवन्मुखसामान्यानुभवसंस्कारमात्रेण दर्पणेषु मुखविशेषाध्यासोपपत्तेः ।
इयांस्तु भेदः—स्वप्नेषु शुभाशुभहेत्वदृष्टानुरोधेन पुरुषाकृतिविशेषा-
संसर्गसे चाक्षुषत्व माना गया है, इसलिए स्वरूपतः प्रतिबिम्बाध्यासकी उत्पत्ति होती है, यही पक्ष अधिकारी विशेषके लिए श्रेयस्कर है।
प्रतिबिम्बाध्यास पक्षमें अध्यासके कारण संस्कारकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि अध्यस्यमान मुखके सजातीय मुखका * पूर्वमें कदापि अनुभव हुआ ही नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, कारण कि जैसे सामान्य पुरुषविषयक अनुभवसे जायमान संस्कारमात्रसे स्वप्नमें किसी समय अननुभूत पुरुषका अध्यास होता है, वैसे ही मुखके सामान्य अनुभवसे जायमान संस्कारमात्रसे दर्पणमें मुखविशेषका अध्यास हो सकता है ।
स्वप्न और प्रतिबिम्बाध्यासमें केवल इतना ही विशेष है कि स्वप्नमें शुभ और
सूर्यके आलोक आदि विषयक चाक्षुष वृत्तिसे आलोक आदिसे अवच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्तिके कालमें आलोक आदिमें अनुगत गगनसे अवच्छिन्न चैतन्यकी भी अभिव्यक्ति मानकर अभिव्यक्त गगनावच्छिन्न साक्षीमें नैल्य आदिका अध्यास मान कर नैल्य आदिसे विशिष्ट गगन साक्षीसे भासता है, यह प्रकृतमें ज्ञातव्य है।
* पहले यह जो कहा गया है कि उपाधिसे प्रतिहत नयनरश्मियोंका बिम्बके प्रति गमन न माना जाय, तो अध्यस्यमान मुखसदृश मुखविषयक अनुभवके पूर्वमें न होनेके कारण अध्यासके कारण संस्कारकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है, अतः उपाधिसे टक्कर खाकर रश्मियां बिम्बको ग्रहण करती हैं, यह मानना चाहिए, इसका प्रकृत ग्रन्थसे खण्डन करते हैं ।
४२
| ३३० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
|---|
ध्यासः, इह तु बिम्बसन्निधानानुरोधेन मुखाकृतिविशेषाध्यास इति ।
न च प्रतिबिम्बस्य स्वरूपतो मिथ्यात्वे ब्रह्मप्रतिबिम्बजीवस्यापि मिथ्यात्वापत्तिर्दोषः । प्रतिबिम्बजीवस्य तथात्वेऽप्यवच्छिन्नजीवस्य सत्यतया मुक्तिभाक्त्वोपपत्तेरिति ।
न च्छाया नापि वस्त्वन्यत्प्रतिबिम्बमसम्भवात् ।
प्रतिबिम्ब बिम्बकी न छाया है और न अन्य वस्तु है क्योंकि उन दोनोंका सम्भव नहीं है ।
यत्तु प्रतिबिम्बं दर्पणादिषु मुखच्छायाविशेषरूपतया सत्यमेवेति कस्यचिन्मतम्, तन्न । छाया हि नाम शरीरादेस्तत्तदवयवैरालोके कियद्देशव्यापिनि निरुद्धे तत्र देशे लब्धात्मकं तम एव । न च मौक्तिक-
अशुभके हेतुभूत अदृष्टके † अनुरोधसे पुरुषाकृतिविशेषका अध्यास होता है और प्रकृतमें बिम्बके सामीप्यके अनुरोधसे मुखाकृतिविशेषका अध्यास होता है ।
यदि प्रतिबिम्ब स्वरूपसे मिथ्या माना जाय, तो ब्रह्मके प्रतिबिम्ब जीवमें भी मिथ्यात्व प्रसक्त होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतिबिम्बभूत जीव मिथ्या है, तो भी अवच्छिन्न जीवके सत्यस्वरूप होनेसे मुक्तिभागिता हो सकती है ।
कुछ लोग कहते हैं कि दर्पण आदिमें दिखनेवाला प्रतिबिम्ब मुखकी छायाविशेष * है और वह सत्यस्वरूप ही है, परन्तु उन लोगोंका मत युक्त नहीं है, कारण कि शरीर आदिकी जो छाया है—वह कुछ देशमें व्याप्त आलोकके शरीरके उन-उन अवयवोंसे निरुद्ध होनेपर उन उन देशोंमें आनेवाला—तमोरूप ही है, अन्य कोई पदार्थ नहीं है, और मौक्तिक, माणिक्य
† प्रतिमुखके अध्यासमें मुखसामान्यानुभवजन्य संस्कार यदि कारण माना जाय, तो चैत्रमुख और दर्पणके परस्पर सान्निध्यमें अन्य मुखका भी स्वप्नके समान अध्यास प्रसक्त होगा, इसीका 'इयांस्तु' ग्रन्थसे उत्तर देते हैं ।
* यद्यपि वृक्ष आदिकी छायामें नैल्यका भास होता है, और प्रतिबिम्बमें प्रायः नैल्य नहीं देखा जाता है, इससे प्रतिबिम्बको छाया मानना एक प्रकारसे अनुचित सा ही है, तथापि उसको छायाविशेष माननेमें कोई दोष नहीं है अर्थात् वृक्ष आदिकी नीलरूप युक्त जैसे छाया है, वैसे ही दर्पण आदिमें पड़नेवाला प्रतिबिम्ब भी विलक्षण छायाभेद ही है, इसलिए बिम्बसे छायाके भिन्न होनेपर भी वृक्ष आदिकी छायाके समान वह सत्य ही है, असत्य नहीं है, क्योंकि छायाका लोकमें मिथ्यात्वेन ग्रहण नहीं हो सकता है इसी विशेष अर्थका सूचन करनेके लिए मूलकारने 'छायाविशेष'में विशेष पद दिया है, यह भाव है ।
प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३३१
माणिक्यादिप्रतिबिम्बस्य तमोविरुद्धसितलोहितादिरूपवतस्तमोरूपच्छायात्वं ·· युक्तम्। न वा तमोरूपच्छायारहिततपनादिप्रतिबिम्बस्य तथात्वमुपपन्नम्।
ननु तर्हि प्रतिबिम्बरूपच्छायायास्तमोरूपत्वासम्भवे द्रव्यान्तरत्वमस्तु, क्लृप्तद्रव्यानन्तर्भावे तमोवद् द्रव्यान्तरत्वाकल्पनोपपत्तेरिति चेत्, तत् किं द्रव्यान्तरं प्रतीयमानरूपपरिमाणसंस्थानविशेषप्रत्यङ्मुखत्वादिधर्म- युक्तम्, तद्रहितं वा स्यात्? अन्त्ये न तेन द्रव्यान्तरेण रूपविशेषादि-
आदिका प्रतिबिम्ब, जो कि तमसे अत्यन्त विरुद्ध श्वेत और रक्त है, वह अन्धकाररूप छाया कैसे हो सकता है, अर्थात् किसी प्रकारसे भी मोती आदि की छाया अन्धकार रूप नहीं † हो सकती है। और अन्धकाररूप छायासे रहित सूर्यके प्रतिबिम्बको छाया रूप मानना युक्तियुक्त नहीं हो सकता है, अतः उनका मत तुच्छ है।
यदि पुनः इस विषयमें शङ्का हो कि प्रतिबिम्बरूप छाया अन्धकाररूप भले ही न हो सके, परन्तु अन्य द्रव्यरूप हो सकेगी, क्योंकि उसका पृथ्वी आदि द्रव्यमें अन्तर्भाव न होनेपर भी अन्धकारके समान ❊ उसे अन्य द्रव्य मान सकते हैं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस विषयमें विकल्प हो सकता है कि प्रतिबिम्बरूप वह द्रव्यान्तर क्या प्रतीयमान रूप, परिमाण, संस्थान- विशेष और प्रत्यङ्मुखत्व आदि धर्मोंसे युक्त है या उनसे रहित है? यदि द्वितीय पक्षका अङ्गीकार करो, तो उस कल्पित द्रव्यान्तरसे रूपविशेष
† तात्पर्य यह है कि अन्धकार द्रव्यका गुण है नीलरूप, मोती, माणिक्य, आदिके प्रति- बिम्ब छायामें भी क्रमशः श्वेत और रक्त (लोहित) रूप ही देखे जाते हैं, अतः उन्हें अन्धकार कैसे मान सकते हैं, क्योंकि वह अत्यन्त विरुद्ध है। यदि कथंचित् ऐसा मान भी लिया जाय, तो भी जिसकी कभी छाया (अन्धकार) ही नहीं है, ऐसे अन्धकारके अनाश्रय सूर्यका जल आदिमें प्रतिबिम्ब देखा जाता है, उस प्रतिबिम्बको अन्धकाररूप छाया कैसे मान सकते हैं, अतः प्रतिबिम्बको अन्धकाररूप छाया नहीं मान सकते हैं। अत एव छायाके दृष्टान्तसे उसे सत्य भी नहीं मान सकते हैं, यह प्रतिबिम्बमिथ्यात्ववादियोंका मत है।
❊ यद्यपि नैयायिक लोग अन्धकारको प्रकृष्ट प्रकाशक तेजोभावरूप मानते हैं, तथापि सिद्धान्तमें वह अभावरूप नहीं है, किन्तु पृथ्वी आदि नौ द्रव्योंके समान दशम द्रव्यरूप माना गया है, इसी प्रकार प्रतिबिम्बको भी अन्धकारके समान एकादशवाँ द्रव्य मानेंगे, यह भाव है।
| ३३२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
|---|
घटितप्रतिबिम्बोपलम्भनिर्वाह इति व्यर्थं तत्कल्पनम् । प्रथमे तु कथमेकस्मिन्नल्पपरिमाणे युगपदसंकीर्णतया प्रतीयमानानां महापरिमाणानामनेकमुखप्रतिबिम्बानां सत्यतानिर्वाहः ? कथं च निबिडावयवानुस्यूते दर्पणे तथैवाऽवतिष्ठमाने तदन्तर्हनुनासिकाद्यनेकनिम्नोन्नतप्रदेशवतो द्रव्यान्तरस्योत्पत्तिः ? किं च सितपीतरक्ताद्यनेकवर्णादिमतः प्रतिबिम्बस्योत्पत्तौ दर्पणमध्ये स्थितं तत्सन्निहितं न तादृशं कारणमस्ति ।
यद्युच्येत—'उपाधिमध्यविश्रान्तियोग्यपरिमाणानामेव प्रतिबिम्बानां महापरिमाणज्ञानं तादृशनिम्नोन्नतादिज्ञानं च भ्रम एव । यथापूर्वं दर्पण-
आदिसे युक्त उपलभ्यमान प्रतिबिम्बका निर्वाह नहीं हो सकता है, अतः ऐसे निरर्थक द्रव्यान्तरको मानना† अयुक्त है। प्रथम पक्ष मानो, तो अल्प परिमाणवाले एक ही दर्पणमें युगपत् ( एक कालमें ) असंकीर्णरूपसे प्रतीयमान बड़े परिमाणवाले अनेक मुखप्रतिबिम्बोंमें सत्यताका निर्वाह कैसे हो सकेगा ‡ । अर्थात् सत्यताका निर्वाह नहीं हो सकेगा । और दूसरी बात यह भी है कि अत्यन्त घने अवयवोंसे अनुस्यूत दर्पण, जो ज्योंका त्यों है, उसमें हनु, नासिका आदि अनेक निम्न उन्नत प्रदेशोंसे युक्त अन्य द्रव्यकी उत्पत्ति भी कैसे हो सकती है ? किञ्च, श्वेत, पीत, रक्त आदि अनेक रङ्गोंसे युक्त प्रतिबिम्बकी उत्पत्तिमें दर्पणके भीतर स्थित, अथवा उसके समीपवर्ती कोई श्वेत आदि वर्णोंसे युक्त कारण भी नहीं है, जिससे कि उस प्रतिबिम्बात्मक द्रव्यान्तरकी उत्पत्ति भी हो सके ।
यदि कहा जाय कि दर्पण आदि उपाधियोंके बीचमें जिस परिमाणसे विश्रान्ति कर सके, ऐसे ही परिमाणसे युक्त प्रतिबिम्ब उत्पन्न होते हैं, और उनमें महापरिमाणका जो अवभास होता है और हनु, नासिका आदि जो निम्नोन्नतादि ज्ञान होता है, वह भ्रमात्मक ही है । एवं उसके अवयवोंकी अव-
† अर्थात् प्रतिबिम्बको रूपादिरहित माननेपर रूपादिमुक्त प्रतिबिम्बका जो प्रत्यक्ष होता है, उसके साथ विरोध होगा, यह भाव है।
‡ तात्पर्य यह है कि छोटे दर्पणमें एक कालमें ही अनेक बड़े बड़े असंकीर्णरूपसे प्रतीयमान प्रतिबिम्बोंके द्रव्यान्तर होनेपर भी उन्हें सत्यस्वरूप नहीं मान सकते हैं । मिथ्या माननेपर तो जैसे स्वप्नावस्थामें छोटे शरीरान्तराकाशमें बड़े बड़े रथ, गज आदिका उपलम्भ होता है, वैसे ही स्वल्प परिमाणवाले दर्पणोंमें उनकी उपपत्ति हो सकती है ।
प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३३३
तदवयवावस्थानाविरोधेन तादृक्प्रतिबिम्बोत्पादनसमर्थं च किञ्चित् कारणं कल्प्यम्' इति । तर्हि शुक्तिरजतमपि सत्यमस्तु । तत्रापि शुक्तौ यथापूर्वं स्थितायामेव तत्तादात्म्यापन्नरजतोत्पादनसमर्थं किञ्चित्कारणं परिकल्प्य तस्य रजतस्य दोषत्वाभिमतकारणसहकृतेन्द्रियग्राह्यत्वनियमवर्णनोपपत्तेः किं 'शुक्तिरजतमसत्यम्, प्रतिबिम्बः सत्यः' इत्यर्धजरतीयन्यायेन । न च तथा सति 'रजतम्' इति दृश्यमानायाः शुक्तेरग्नौ प्रक्षेपे रजतवद् द्रवीभा-
स्थिति पूर्ववत् ही रहे, इसलिए उनका अविरोधी तथा उस प्रतिबिम्बके उत्पादनमें समर्थ किसी कारण द्रव्यकी भी कल्पना करनी चाहिए* । इसलिए प्रतिबिम्बके द्रव्यान्तर और सत्य होनेमें कोई विरोध नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस युक्तिसे शुक्तिरजत भी सत्य हो जायगा । अर्थात् शुक्ति-रजतमें भी यथापूर्व अवस्थित शुक्तिमें ही शुक्तितादात्म्यापन्न रजतके उत्पादनमें समर्थ किसी कारणविशेषकी कल्पना करके उस रजतमें दोषत्वसे अभिमत कारण† सहकृत इन्द्रियग्राह्यत्वं नियमको मानकर उपपत्ति हो सकती है फिर 'शुक्तिरजत असत्य है' और प्रतिबिम्ब सत्य है ? इस अर्धजरतीयन्यायके ‡ अङ्गीकारका प्रयोजन ही क्या है ? यदि शङ्का हो कि शुक्तिरजतको सत्य नहीं मान सकते हैं, कारण कि उनके सत्य होनेपर रजतरूपसे देखी गई शुक्ति का अग्निमें प्रक्षेप करनेपर रजतके समान द्रवीभावकी आपत्ति होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अग्नि और कस्तूरीके प्रतिबिम्बमें जैसे उष्णता और
* जैसे नीवारके अवयवोंमें व्रीहीके अवयव मीमांसकोंने माने हैं, वैसे ही दर्पणके अवयवोंमें संयुक्त प्रतिबिम्बके अवयवोंकी भी कल्पना करनी चाहिए, यह तात्पर्य है। यहाँ शङ्का करनेवालेका भाव यह है कि प्रतिबिम्ब स्वयं सत्य है और उसमें प्रतीयमान धर्म असत्य हैं।
† यदि शुक्तिरजत सत्य माना जायगा तो उसका अस्तित्व सदा शुक्तिमें होनेके कारण शुक्ति-प्रत्यक्षकालमें भी रजतका प्रत्यक्ष होना चाहिए, इस शङ्काका इस नियमसे परिहार किया गया अर्थात् शुक्तिमें रजतके होनेपर भी उसका प्रत्यक्ष तभी होगा जब इन्द्रिय दोषसहकृत होगी, अतः पूर्वोक्त दोष नहीं आ सकता है, यह भाव है।
‡ जरती—वृद्धा, उसके आधे हिस्सेकी मुख आदिकी अभिलाषा करना और अवशिष्ट भागकी इच्छा नहीं करना, इसमें कोई युक्ति नहीं है, वैसे प्रकृतमें शुक्तिरजतको मिथ्या मानना और प्रतिबिम्बको सत्य मानना, युक्तिविधुर है।
३३४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद
वापत्तिः । अनलकस्तूरिकादिप्रतिबिम्बस्यौष्ण्यसौरभादिराहित्यवच्छुक्तिरजतस्य द्रवीभावयोग्यताराहित्योपपत्तेः ।
अथोच्येत—'नेदं रजतम्', 'मिथ्यैव रजतमभाद्' इति सर्वसंप्रतिपन्नवाधान्न शुक्तिरजतं सत्यम्' इति । तर्हि 'दर्पणे मुखं नास्ति, मिथ्यैवात्र दर्पणे मुखमभाद्' इत्यादिसर्वसिद्धवाधात् प्रतिबिम्बमप्यसत्यमित्येव युक्तम् । तस्मादसङ्गतः प्रतिबिम्बसत्यत्ववादः ।
नन्वध्यासोऽप्ययुक्तोऽस्योपादानाज्ञानसंक्षयात् ॥ २३ ॥
प्रतिबिम्ब मिथ्या है यह कथन भी अयुक्त है क्योंकि शुक्तिरजतके समान उसके उपादान कारण अज्ञान का नाश हो गया है ॥ २३ ॥
ननु तन्मिथ्यात्ववादोऽप्ययुक्तः, शुक्तिरजत इव कस्यचिदन्वय-
सौगन्ध्य नहीं है, वैसे ही शुक्तिरजतमें द्रवीभावकी योग्यता नहीं है, इस प्रकार कह सकते हैं।
यदि कहा जाय कि 'यह रजत नहीं है' 'मिथ्या ही रजत देखा गया' इस प्रकार जगतप्रसिद्ध बाधसे शुक्तिरजत सत्य नहीं हो सकता, तो तुल्ययुक्त्या यह भी कह सकते हैं कि दर्पणमें * मिथ्या ही मुख देखा गया, इस प्रकारके सर्वजनीन बाधके अनुभवसे प्रतिबिम्ब भी असत्य हो सकता है। इसलिए प्रतिबिम्ब सत्यत्ववाद असङ्गत है।
यदि शङ्का † हो कि प्रतिबिम्बका मिथ्यात्ववाद भी युक्तिहीन ही है,
* जिस पक्षमें बिम्ब और प्रतिबिम्बका अभेद है, उस पक्षमें प्रतिबिम्बमें जो मिथ्यात्वका अनुभव होता है, वह प्रतिबिम्बत्वरूपसे प्रतिबिम्बको विषय करता है, स्वरूपतः प्रतिबिम्बको विषय नहीं करता है, यह ज्ञातव्य है। यदि शङ्का हो कि शुक्तिरजतमें जो मिथ्यात्वक अनुभव होता है, वह इदमर्थ तादात्म्यापन्नत्वरूपसे रजतको विषय करता है, स्वरूपतः रजतको विषय नहीं करता है, इस प्रकार शुक्तिरजतस्थलमें कहकर रजत और इदमर्थका तादात्म्य ही कल्पित है, रजत कल्पित नहीं है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शुक्तिमें अनिर्वचनीय रजतकी उत्पत्ति यदि नहीं मानी जायगी, तो रजतका प्रत्यक्ष हो ही नहीं सकता है, अतः उसकी उत्पत्ति अवश्य माननी चाहिए। उसकी उत्पत्तिमें अन्वय और व्यतिरेकसे अनिर्वचनीय अज्ञान ही कारण है, अन्य नहीं है, अतः वह मिथ्या ही हो सकता है, क्योंकि शुक्तिरजतमें सत्यत्वसाधक अनन्यथासिद्ध कोई प्रमाण नहीं है, जैसे कि बिम्ब और प्रतिबिम्बके अभेद पक्षमें प्रतिबिम्बमें सत्यत्वसाधक प्रमाण पूर्वमें है । अतः शुक्तिरजतमें मिथ्यात्वावगाही अनुभव स्वरूपतः रजतका अवगाहन करता है इससे शुक्तिरजत मिथ्या ही है, यह भाव है।
† प्रतिबिम्बाध्यासमें अज्ञान उपादान कारण नहीं है, क्योंकि दर्पण आदि अधिष्ठानोंकी
प्रतिबिम्बका सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३३५
व्यतिरेकशालिनः कारणस्याऽज्ञानस्य निवर्तकस्य च ज्ञानस्य चाऽनिरूपणात्।
अत्र केचिदविद्याऽत्राऽऽवरणांशे विनश्यति ।
विक्षेपांशे तु बिम्बादिप्रतिबद्धाऽस्य कारणम् ॥ २४ ॥
इसपर कुछ लोग कहते हैं कि यहांपर अज्ञानका आवरण अंशसे नाश हो जाता है और विक्षेप अंशसे अज्ञान रहता है। वही बिम्बसम्बद्ध प्रतिबिम्ब मुखका कारण होता है ॥ २४ ॥
अत्र केचित् — यद्यपि सर्वात्मनाऽधिष्ठानज्ञानानन्तरमपि जायमाने प्रतिबिम्बाध्यासे नाऽधिष्ठानावरणमज्ञानमुपादानम्, न वाऽधिष्ठानविशेषांशज्ञानं निवर्तकम्, तथाऽप्यधिष्ठानाज्ञानस्यावरणशक्त्यंशेन निवृत्तावपि विक्षेप-
क्योंकि शुक्तिरजतके समान किसी अन्वय और व्यतिरेकसे युक्त अज्ञानरूप कारणका और निवर्तक ज्ञानका निरुपण नहीं ‡ हो सकता है ?
इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि सामान्य और विशेषरूपसे※ अधिष्ठानके ज्ञानके अनन्तर उत्पन्न होनेवाले प्रतिबिम्बाध्यासमें अधिष्ठानका आवारक अज्ञान उपादान नहीं है और अधिष्ठानके विशेषांशका ज्ञान प्रतिबिम्बाध्यासका निवर्तक नहीं है, तथापि आवरणशक्तिसे युक्त
अधिगति सर्वात्मना होनेके कारण अज्ञान निवृत्त हो गया है, और अधिष्ठान साक्षात्कारके रहते प्रतिबिम्बाध्यासकी अनुवृत्ति होनेके कारण ज्ञान अधिष्ठानज्ञान निवर्त्यत्वरूप मिथ्यात्व भी उनमें नहीं है, अतः प्रतिबिम्ब मिथ्यात्ववाद असङ्गत है, यह पूर्वपक्षका भाव है।
‡ जैसे शुक्तिरजत भ्रमस्थलमें शुक्तिका अज्ञान अन्वय और व्यतिरेकमें शुक्तिरजताध्यासका कारण है, जैसा कि निरूपण किया जा चुका है, वैसे प्रतिबिम्बाध्यासमें दर्पणका अज्ञान होनेपर प्रतिबिम्बाध्यास होगा और उसके अभावमें नहीं होगा। इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेकसे युक्त अज्ञानका निरूपण नहीं कर सकते हैं और प्रतिबिम्बाध्यासका निर्वतक ज्ञान भी उपलब्ध नहीं होता है, अतः प्रतिबिम्बमिथ्यात्ववाद असङ्गत है।
※ शुक्तिमें जब रजतका अध्यास होता है, तब पूर्वमें शुक्तिका इदन्त्वसामान्यरूपसे ज्ञान होता है शुक्तित्वादिविशेषरूपसे नहीं होता है, अतः शुक्तिरजतमें अधिष्ठानके विशेषका आवरण अज्ञान उपादान हो सकता है, प्रकृतमें प्रतिबिम्बाध्यासके पूर्वमें इदन्त्व सामान्यसे और दर्पणत्वादिविशेषसे अधिष्ठानका साक्षात्कार होनेके कारण सर्वांशमें ही दर्पण आदिका साक्षात्कार है, अतः अधिष्ठानविशेषांशावरणकृत अज्ञानके निवृत्त होनेके कारण वह प्रतिबिम्बाध्यासके प्रति उपादान नहीं हो सकता है, यह युक्त है, तथापि अज्ञानके एकदेशकी निवृत्ति होनेके कारण अवशिष्टविक्षेपांशयुक्त अज्ञान ही प्रतिबिम्बाध्यासके प्रति उपादान है, अतः विरोध नहीं है, यह भाव है।
३३६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
शक्त्यंशेनानुवृत्तिसम्भवात् तदेवोपादानम् । बिम्बोपाधिसन्निधिनिवृत्ति-सचिवं चाऽधिष्ठानज्ञानं सोपादानस्य तस्य निवर्तकमिति ।
मूलाविद्याऽथवा हेतुर्विक्षेपांशेन संस्थिता ।
बिम्बादिदोषजन्यत्वान्मिथ्येत्यन्ये प्रचक्षते ॥ २५ ॥
अथवा विक्षेप अंशसे स्थित मूलाऽविद्या प्रतिबिम्बाध्यासकी हेतु है बिम्ब आदिके दोषसे जन्य होनेके कारण प्रतिबिम्ब मिथ्या है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं ॥ २५ ॥
अन्ये तु ज्ञानस्य विक्षेपशक्त्यंशं विहायाऽऽवरणशक्त्यंशमात्रनिवर्तकत्वं न स्वाभाविकम्, ब्रह्मज्ञानेन मूलाज्ञानस्य शुक्त्यादिज्ञानेनाऽवस्थाऽज्ञा-नस्य चाऽऽवरणशक्त्यंशमात्रनिवृत्तौ तस्य विक्षेपशक्त्या सर्वदाऽनुवृत्ति-प्रसङ्गात् । न च बिम्बोपाधिसन्निधिरूपविक्षेपशक्त्यंशनिवृत्तिप्रतिबन्धक-प्रयुक्तं तत् । बिम्बोपाधिसन्निधानात् प्रागेव बिम्बे चैत्रमुखे दर्पणसंसर्गाद्य-
अधिष्ठानके अज्ञानकी निवृत्ति† होनेपर भी विक्षेपशक्तिरूप अंशसे युक्त अज्ञानकी अनुवृत्ति होनेसे वही विक्षेपशक्तिरूप अंशसे युक्त अज्ञान प्रतिबिम्बा-ध्यासके प्रति कारण है। बिम्ब और उपाधिकी सन्निधिकी निवृत्तिसे युक्त अधिष्ठान-ज्ञान (दर्पणमें मेरा मुख नहीं है) उपादानसहित अध्यासका निवर्तक है।
कुछ लोग तो कहते हैं कि अज्ञानके विक्षेपशक्तिरूप अंशको छोड़कर केवल आवरणशक्त्यंशका निवर्तक ज्ञान स्वभावतः नहीं हो सकता है, क्योंकि, ब्रह्मज्ञान-से मूलाज्ञानका और शुक्ति आदिके ज्ञानसे अवस्थारूप अज्ञानका केवल आवरण शक्त्यंश ही यदि निवृत्त होगा, तो विक्षेपशक्त्यंशसे युक्त अज्ञानकी सर्वदा अर्थात् विदेहकैवल्यावस्थामें भी अनुवृत्ति प्रसक्त होगी। यदि शङ्का हो कि बिम्ब और उपाधि (दर्पण आदि) के सान्निध्यरूप विक्षेप शक्त्यंशकी निवृत्तिके प्रतिबन्धकसे युक्त ही ज्ञान केवल आवरण शक्त्यंशको निवृत्त करता है, स्वभावतः नहीं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि * बिम्ब और दर्पण आदि उपाधिके आभिमुख्यलक्षण
* प्रतिबिम्ब और बिम्बके अभेदपक्षमें प्रतिबिम्बकी उत्पत्ति न होनेपर भी बिम्बभूत चैत्रके मुखमें बिम्बत्व और प्रतिबिम्बत्व आदि अनिर्वचनीय धर्म उत्पन्न होते हैं, ऐसा माना गया है, अतः चैत्रके मुखावच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाला अज्ञान ही उसका कारण होगा, दर्पणकी सन्निधिके पूर्वमें विष्णुमित्र द्वारा चैत्रमुखके निरीक्ष्यमाण होनेपर उस समय प्रतिबन्धकके न रहनेसे चैत्रमुखविषयक विष्णुमित्रके साक्षात्कारसे विक्षेपशक्तिसे युक्त उस अज्ञानकी निवृत्ति
प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३३७
भावे दर्पणे चैत्रमुखाभावे वा प्रत्यक्षतोऽवगम्यमाने विक्षेपशक्त्यंशस्यापि निवृत्त्यवश्यम्भावेन तत्काले तयोस्सन्निधाने सति उपादानाभावेन प्रतिबिम्बभ्रमाभावप्रसङ्गात् । अतो मूलाज्ञानमेव प्रतिबिम्बाध्यासस्योपादानम् । न चात्राऽप्युक्तदोषतौल्यम् । पराग्विषयवृत्तिपरिणामानां स्वस्वविषयावच्छिन्नचैतन्यप्रदेशे मूलाज्ञानावरणशक्त्यंशाभिभावकत्वेऽपि तदीयविक्षेपशक्त्यंशानिवर्तकत्वात् । अन्यथा तत्प्रदेशस्थितव्यावहारिकविक्षेपाणामपि विलयापत्तेः ।
सन्निधानके पूर्वक्षणमें ही बिम्बभूत चैत्रके मुखमें दर्पणस्थत्व आदि दर्पण-संसर्गके अभावका अर्थात् चैत्रमुखमें दर्पणस्थत्वादि नहीं हैं, इस प्रकारके अभावका अथवा दर्पणमें चैत्रका मुख नहीं है, इस प्रकार प्रत्यक्षसे दर्पणमें चैत्रमुखके अभावका ग्रहण होनेपर प्रतिबन्धकके न रहनेसे विक्षेपशक्त्यंशसे युक्त अज्ञानकी भी निवृत्ति अवश्य होगी, इस परिस्थितिमें विक्षेपशक्त्यंशनिवर्तक साक्षात्कारकी उत्पत्तिके द्वितीय क्षणमें चैत्रमुख और उपाधिका सान्निध्य होनेपर भी उपादानके (विक्षेपशक्त्यंशयुक्त अवस्थारूप अज्ञानके) न होनेके कारण अधिष्ठानसे युक्त विष्णुमित्रको 'दर्पणमें चैत्रमुख है' इस प्रकार प्रतिबिम्बाध्यास नहीं होगा, अतः—अवस्थारूप अज्ञानके प्रतिबिम्बाध्यासके प्रति कारण न होनेसे—उसके प्रति मूलाज्ञानको ही उपादानकारण मानना चाहिए । यदि शङ्का हो कि इसमें भी पूर्वोक्त दोष तुल्य ही है, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि पुरोवर्ती घटादिविषय आकारसे परिणत अन्तःकरणकी वृत्तियां यद्यपि अपने-अपने विषयावच्छिन्न चैतन्यप्रदेशमें मूलाज्ञानके आवरणशक्त्यंशकी निवृत्ति करती हैं, तथापि वे वृत्तियाँ अज्ञानके विक्षेपांशकी निवृत्ति नहीं करती हैं, ऐसा अभ्युपगम है । यदि यह न माना जाय, तो उस-उस प्रदेशमें स्थित व्यावहारिक विषयोंका भी विलोप हो जायगा ।
होती है । उत्तर क्षणमें ही चैत्रमुखका दर्पणाभिमुख्य होनेपर विष्णुमित्रको 'दर्पणमें चैत्रका मुख है' इस प्रकार भ्रम होता, उसमें दर्पणस्थत्व आदिकी उत्पत्ति नहीं होगी, क्योंकि विक्षेपशक्तिसे युक्त अज्ञानरूप उपादान नहीं है, इस अभिप्रायसे 'बिम्बोपाधि' इत्यादिसे उपाधिसन्निधानरूप विक्षेपशक्त्यंशनिवृत्तिप्रतिबन्धकप्रयुक्त ज्ञानमें आवरणशक्त्यंश निवर्तकत्वका खण्डन किया जाता है, यह भाव है ।
४३
| ३३८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
|---|
न च प्रतिबिम्बस्य मूलाज्ञानकार्यत्वे व्यावहारिकत्वापत्तिः । अविद्यातिरिक्तदोषजन्यत्वस्य व्यावहारिकत्वप्रयोजकत्वात् । प्रकृते च तदतिरिक्तबिम्बोपाधिसन्निधानदोषसद्भावेन प्रातिभासिकत्वोपपत्तेः ।
बिम्बापसरणाध्यक्षाद्विक्षेपांशस्य बाधनम् ।
विरोधादथवा ब्रह्मज्ञानेनैवास्य बाधनम् ॥ २६ ॥
बिम्बकी सन्निधिकी निवृत्तिसे युक्त अधिष्ठानसाक्षात्कारसे विक्षेप अंश का बाध होता है, क्योंकि दोनोंका परस्पर विरोध है अथवा केवल ब्रह्मज्ञानसे ही विक्षेप अंशका नाश होता है ॥ २६ ॥
न चैवं सति बिम्बोपाधिसन्निधिनिवृत्तिसहकृतस्याप्यधिष्ठानज्ञानस्य प्रतिबिम्बाध्यासानिवर्तकत्वप्रसङ्गः, तन्मूलाज्ञाननिवर्तकत्वाभावादिति वाच्यम्, विरोधाभावात् । ब्रह्मज्ञानानिवर्तकत्वेऽपि तदुपादानक-
यदि शङ्का हो कि प्रतिबिम्बाध्यासके प्रति मूलाज्ञान उपादान माना जायगा, तो घटादिके समान वे भी व्यावहारिक होंगे, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि व्यावहारिकत्वके प्रति केवल अविद्या ही कारण होती है, और यहांपर अविद्यासे अतिरिक्त बिम्ब और उपाधिके सान्निध्य आदि दोषोंका भी कारणत्वरूपसे अवस्थान होनेसे व्यावहारिकत्वकी आपत्ति नहीं हो सकती है, किन्तु प्रातिभासिकत्वकी ही उपपत्ति हो सकती है ।
यदि पुनः शङ्का हो कि प्रतिबिम्बाध्यास मूलाज्ञानका कार्य होगा, तो बिम्ब और उपाधिके सान्निध्यकी निवृत्तिसे युक्त अधिष्ठानसाक्षात्कार भी प्रतिबिम्बाध्यासका निवर्तक नहीं हो सकेगा, क्योंकि शुक्तिरजत आदि स्थलमें केवल अधिष्ठानका साक्षात्कार ही निवर्तक देखा गया है, अतः उक्त सान्निध्यनिवृत्तिसहकृत अधिष्ठानसाक्षात्कार मूलाज्ञानका निवर्तक नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि विरोधके न होनेसे * अधिष्ठानसाक्षात्कार ब्रह्मज्ञानका निवर्तक न होनेपर भी ब्रह्मज्ञान ( मूलाज्ञान ) है उपादान
* ज्ञान और अज्ञानका वहींपर ही विरोध होता है, जहाँपर वे दोनों समानविषयक हों, इसीसे पटाज्ञानकी घटज्ञानसे निवृत्ति नहीं होती है । प्रकृतमें मूलाज्ञान ब्रह्मविषयक है, और प्रतिबिम्बाध्यासका अधिष्ठानसाक्षात्कार दर्पणावच्छिन्न चैतन्यविषयक है, अतः उनका समानविषयकत्वरूप विरोधका प्रयोजक न होनेसे विरोध नहीं है, अतः यदि उक्त अधिष्ठानके ज्ञानको ब्रह्मज्ञानका निवर्तक न माना जाय, तो भी ग्रन्थोक्तरीतिसे अधिष्ठानज्ञानमें अध्यासके निवर्तकत्वकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है ।