भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 590 में से

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पृष्ठ 365

प्रतिबिम्बका सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३३५


व्यतिरेकशालिनः कारणस्याऽज्ञानस्य निवर्तकस्य च ज्ञानस्य चाऽनिरूपणात्।

अत्र केचिदविद्याऽत्राऽऽवरणांशे विनश्यति ।
विक्षेपांशे तु बिम्बादिप्रतिबद्धाऽस्य कारणम् ॥ २४ ॥

इसपर कुछ लोग कहते हैं कि यहांपर अज्ञानका आवरण अंशसे नाश हो जाता है और विक्षेप अंशसे अज्ञान रहता है। वही बिम्बसम्बद्ध प्रतिबिम्ब मुखका कारण होता है ॥ २४ ॥

अत्र केचित् — यद्यपि सर्वात्मनाऽधिष्ठानज्ञानानन्तरमपि जायमाने प्रतिबिम्बाध्यासे नाऽधिष्ठानावरणमज्ञानमुपादानम्, न वाऽधिष्ठानविशेषांशज्ञानं निवर्तकम्, तथाऽप्यधिष्ठानाज्ञानस्यावरणशक्त्यंशेन निवृत्तावपि विक्षेप-


क्योंकि शुक्तिरजतके समान किसी अन्वय और व्यतिरेकसे युक्त अज्ञानरूप कारणका और निवर्तक ज्ञानका निरुपण नहीं ‡ हो सकता है ?

इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि सामान्य और विशेषरूपसे※ अधिष्ठानके ज्ञानके अनन्तर उत्पन्न होनेवाले प्रतिबिम्बाध्यासमें अधिष्ठानका आवारक अज्ञान उपादान नहीं है और अधिष्ठानके विशेषांशका ज्ञान प्रतिबिम्बाध्यासका निवर्तक नहीं है, तथापि आवरणशक्तिसे युक्त


अधिगति सर्वात्मना होनेके कारण अज्ञान निवृत्त हो गया है, और अधिष्ठान साक्षात्कारके रहते प्रतिबिम्बाध्यासकी अनुवृत्ति होनेके कारण ज्ञान अधिष्ठानज्ञान निवर्त्यत्वरूप मिथ्यात्व भी उनमें नहीं है, अतः प्रतिबिम्ब मिथ्यात्ववाद असङ्गत है, यह पूर्वपक्षका भाव है।

‡ जैसे शुक्तिरजत भ्रमस्थलमें शुक्तिका अज्ञान अन्वय और व्यतिरेकमें शुक्तिरजताध्यासका कारण है, जैसा कि निरूपण किया जा चुका है, वैसे प्रतिबिम्बाध्यासमें दर्पणका अज्ञान होनेपर प्रतिबिम्बाध्यास होगा और उसके अभावमें नहीं होगा। इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेकसे युक्त अज्ञानका निरूपण नहीं कर सकते हैं और प्रतिबिम्बाध्यासका निर्वतक ज्ञान भी उपलब्ध नहीं होता है, अतः प्रतिबिम्बमिथ्यात्ववाद असङ्गत है।

※ शुक्तिमें जब रजतका अध्यास होता है, तब पूर्वमें शुक्तिका इदन्त्वसामान्यरूपसे ज्ञान होता है शुक्तित्वादिविशेषरूपसे नहीं होता है, अतः शुक्तिरजतमें अधिष्ठानके विशेषका आवरण अज्ञान उपादान हो सकता है, प्रकृतमें प्रतिबिम्बाध्यासके पूर्वमें इदन्त्व सामान्यसे और दर्पणत्वादिविशेषसे अधिष्ठानका साक्षात्कार होनेके कारण सर्वांशमें ही दर्पण आदिका साक्षात्कार है, अतः अधिष्ठानविशेषांशावरणकृत अज्ञानके निवृत्त होनेके कारण वह प्रतिबिम्बाध्यासके प्रति उपादान नहीं हो सकता है, यह युक्त है, तथापि अज्ञानके एकदेशकी निवृत्ति होनेके कारण अवशिष्टविक्षेपांशयुक्त अज्ञान ही प्रतिबिम्बाध्यासके प्रति उपादान है, अतः विरोध नहीं है, यह भाव है।