सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
शक्त्यंशेनानुवृत्तिसम्भवात् तदेवोपादानम् । बिम्बोपाधिसन्निधिनिवृत्ति-सचिवं चाऽधिष्ठानज्ञानं सोपादानस्य तस्य निवर्तकमिति ।
मूलाविद्याऽथवा हेतुर्विक्षेपांशेन संस्थिता ।
बिम्बादिदोषजन्यत्वान्मिथ्येत्यन्ये प्रचक्षते ॥ २५ ॥
अथवा विक्षेप अंशसे स्थित मूलाऽविद्या प्रतिबिम्बाध्यासकी हेतु है बिम्ब आदिके दोषसे जन्य होनेके कारण प्रतिबिम्ब मिथ्या है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं ॥ २५ ॥
अन्ये तु ज्ञानस्य विक्षेपशक्त्यंशं विहायाऽऽवरणशक्त्यंशमात्रनिवर्तकत्वं न स्वाभाविकम्, ब्रह्मज्ञानेन मूलाज्ञानस्य शुक्त्यादिज्ञानेनाऽवस्थाऽज्ञा-नस्य चाऽऽवरणशक्त्यंशमात्रनिवृत्तौ तस्य विक्षेपशक्त्या सर्वदाऽनुवृत्ति-प्रसङ्गात् । न च बिम्बोपाधिसन्निधिरूपविक्षेपशक्त्यंशनिवृत्तिप्रतिबन्धक-प्रयुक्तं तत् । बिम्बोपाधिसन्निधानात् प्रागेव बिम्बे चैत्रमुखे दर्पणसंसर्गाद्य-
अधिष्ठानके अज्ञानकी निवृत्ति† होनेपर भी विक्षेपशक्तिरूप अंशसे युक्त अज्ञानकी अनुवृत्ति होनेसे वही विक्षेपशक्तिरूप अंशसे युक्त अज्ञान प्रतिबिम्बा-ध्यासके प्रति कारण है। बिम्ब और उपाधिकी सन्निधिकी निवृत्तिसे युक्त अधिष्ठान-ज्ञान (दर्पणमें मेरा मुख नहीं है) उपादानसहित अध्यासका निवर्तक है।
कुछ लोग तो कहते हैं कि अज्ञानके विक्षेपशक्तिरूप अंशको छोड़कर केवल आवरणशक्त्यंशका निवर्तक ज्ञान स्वभावतः नहीं हो सकता है, क्योंकि, ब्रह्मज्ञान-से मूलाज्ञानका और शुक्ति आदिके ज्ञानसे अवस्थारूप अज्ञानका केवल आवरण शक्त्यंश ही यदि निवृत्त होगा, तो विक्षेपशक्त्यंशसे युक्त अज्ञानकी सर्वदा अर्थात् विदेहकैवल्यावस्थामें भी अनुवृत्ति प्रसक्त होगी। यदि शङ्का हो कि बिम्ब और उपाधि (दर्पण आदि) के सान्निध्यरूप विक्षेप शक्त्यंशकी निवृत्तिके प्रतिबन्धकसे युक्त ही ज्ञान केवल आवरण शक्त्यंशको निवृत्त करता है, स्वभावतः नहीं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि * बिम्ब और दर्पण आदि उपाधिके आभिमुख्यलक्षण
* प्रतिबिम्ब और बिम्बके अभेदपक्षमें प्रतिबिम्बकी उत्पत्ति न होनेपर भी बिम्बभूत चैत्रके मुखमें बिम्बत्व और प्रतिबिम्बत्व आदि अनिर्वचनीय धर्म उत्पन्न होते हैं, ऐसा माना गया है, अतः चैत्रके मुखावच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाला अज्ञान ही उसका कारण होगा, दर्पणकी सन्निधिके पूर्वमें विष्णुमित्र द्वारा चैत्रमुखके निरीक्ष्यमाण होनेपर उस समय प्रतिबन्धकके न रहनेसे चैत्रमुखविषयक विष्णुमित्रके साक्षात्कारसे विक्षेपशक्तिसे युक्त उस अज्ञानकी निवृत्ति