सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 367, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३३७
भावे दर्पणे चैत्रमुखाभावे वा प्रत्यक्षतोऽवगम्यमाने विक्षेपशक्त्यंशस्यापि निवृत्त्यवश्यम्भावेन तत्काले तयोस्सन्निधाने सति उपादानाभावेन प्रतिबिम्बभ्रमाभावप्रसङ्गात् । अतो मूलाज्ञानमेव प्रतिबिम्बाध्यासस्योपादानम् । न चात्राऽप्युक्तदोषतौल्यम् । पराग्विषयवृत्तिपरिणामानां स्वस्वविषयावच्छिन्नचैतन्यप्रदेशे मूलाज्ञानावरणशक्त्यंशाभिभावकत्वेऽपि तदीयविक्षेपशक्त्यंशानिवर्तकत्वात् । अन्यथा तत्प्रदेशस्थितव्यावहारिकविक्षेपाणामपि विलयापत्तेः ।
सन्निधानके पूर्वक्षणमें ही बिम्बभूत चैत्रके मुखमें दर्पणस्थत्व आदि दर्पण-संसर्गके अभावका अर्थात् चैत्रमुखमें दर्पणस्थत्वादि नहीं हैं, इस प्रकारके अभावका अथवा दर्पणमें चैत्रका मुख नहीं है, इस प्रकार प्रत्यक्षसे दर्पणमें चैत्रमुखके अभावका ग्रहण होनेपर प्रतिबन्धकके न रहनेसे विक्षेपशक्त्यंशसे युक्त अज्ञानकी भी निवृत्ति अवश्य होगी, इस परिस्थितिमें विक्षेपशक्त्यंशनिवर्तक साक्षात्कारकी उत्पत्तिके द्वितीय क्षणमें चैत्रमुख और उपाधिका सान्निध्य होनेपर भी उपादानके (विक्षेपशक्त्यंशयुक्त अवस्थारूप अज्ञानके) न होनेके कारण अधिष्ठानसे युक्त विष्णुमित्रको 'दर्पणमें चैत्रमुख है' इस प्रकार प्रतिबिम्बाध्यास नहीं होगा, अतः—अवस्थारूप अज्ञानके प्रतिबिम्बाध्यासके प्रति कारण न होनेसे—उसके प्रति मूलाज्ञानको ही उपादानकारण मानना चाहिए । यदि शङ्का हो कि इसमें भी पूर्वोक्त दोष तुल्य ही है, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि पुरोवर्ती घटादिविषय आकारसे परिणत अन्तःकरणकी वृत्तियां यद्यपि अपने-अपने विषयावच्छिन्न चैतन्यप्रदेशमें मूलाज्ञानके आवरणशक्त्यंशकी निवृत्ति करती हैं, तथापि वे वृत्तियाँ अज्ञानके विक्षेपांशकी निवृत्ति नहीं करती हैं, ऐसा अभ्युपगम है । यदि यह न माना जाय, तो उस-उस प्रदेशमें स्थित व्यावहारिक विषयोंका भी विलोप हो जायगा ।
होती है । उत्तर क्षणमें ही चैत्रमुखका दर्पणाभिमुख्य होनेपर विष्णुमित्रको 'दर्पणमें चैत्रका मुख है' इस प्रकार भ्रम होता, उसमें दर्पणस्थत्व आदिकी उत्पत्ति नहीं होगी, क्योंकि विक्षेपशक्तिसे युक्त अज्ञानरूप उपादान नहीं है, इस अभिप्रायसे 'बिम्बोपाधि' इत्यादिसे उपाधिसन्निधानरूप विक्षेपशक्त्यंशनिवृत्तिप्रतिबन्धकप्रयुक्त ज्ञानमें आवरणशक्त्यंश निवर्तकत्वका खण्डन किया जाता है, यह भाव है ।
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