भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 590 में से

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पृष्ठ 354
३२४सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ द्वितीय परिच्छेद

यत्तु 'नात्र मुखम्' इति दर्पणे मुखसंसर्गमात्रस्य बाधः, न मुखस्येति । तन्न; 'नेदं रजतम्' इत्यत्रापि इदमर्थे रजततादात्म्यमात्रस्य बाधो, न रजतस्येत्यापत्तेः । यदि च इदमंशे रजतस्य तादात्म्येनाऽध्यासाद् 'नेदं रजतम्' इति तादात्म्येन रजतस्यैव बाधः, न तादात्म्यमात्रस्य, तदा दर्पणे मुखस्य संसर्गतयाऽध्यासाद् 'नात्र मुखम्' इति संसर्गतया मुखस्यैव बाधः, न संसर्गमात्रस्येति तुल्यम् ।

यत्तु धर्मिणोऽप्यध्यासकल्पने गौरवमिति, तद् रजताभासकल्पनागौरववत् प्रामाणिकत्वान्न दोषः । स्वनेत्रगोलकादिप्रतिबिम्बभ्रमस्थले बिम्बापरोक्ष्यकल्पनोपायाभावात् । नयनरश्मीनामुपाधिप्रतिहतानां बिम्बप्राप्तिकल्पने हि दृष्टविरुद्धं बहापद्यते । कथं हि जलसन्निकर्षे केषुचिन्न-


और पूर्वमें जो कहा गया है कि 'यहाँ मुख नहीं है, इस प्रकारका जो बाध होता है, वह दर्पणमें मुखसंसर्गका ही बाध होता है, मुखका बाध नहीं होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं है) इस बाधस्थलमें भी तुल्ययुक्तिसे इदमर्थमें रजतके तादात्म्यमात्रका बाध प्रसक्त होगा, रजतका नहीं होगा । यह भी आपत्ति आ सकती है । यदि कहा जाय कि इदमंशमें रजतका तादात्म्यसे अध्यास होता है, इसलिए 'नेदं रजतम्' इससे तादात्म्येन रजतका ही बाध होता है, तादात्म्यमात्रका नहीं होता, तो हम भी इस रीतिसे कह सकते हैं कि दर्पणमें मुखका संसर्गरूपसे ही अध्यास होता है, अतः 'नात्र मुखम्' इससे संसर्गरूपसे मुखका ही बाध होता है, केवल संसर्गका बाध नहीं होता है ।

और जो यह कहा है कि धर्मीके अध्यासकी कल्पनामें गौरव है, तो वह भी युक्त नहीं है, शुक्तिमें रजताध्यासकी कल्पनामें जैसे गौरव प्रामाणिक है, वैसे ही प्रतिबिम्बाध्यास भी * प्रामाणिक है, अतः गौरव दोष नहीं है । और स्वकीय नेत्रगोलक आदिके प्रतिबिम्बविभ्रमस्थलमें बिम्बभूत मुखकी अपरोक्षताकी कल्पनामें कोई हेतु भी नहीं है । यदि उक्त दोषके परिहारके लिए नयनकी रश्मियोंका उपाधिके आघातसे बिम्बके प्रति गमन माना जाय, तो प्रमाणविरुद्ध भी अनेक प्रसङ्ग आ सकते हैं । [इसी दृष्टविरुद्ध


  • अर्थात् बाधकज्ञान उभयत्र समानरूपसे प्रमाण है, यह भाव है ।
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