सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 355, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३२५
यनरश्मिषु अप्रतिहतमन्तर्गच्छत्सु अन्ये जलसम्बन्धेनाऽपि प्रतिहन्यमाना- -नितान्तमृदवः सकलनयनरश्मिप्रतिघातिनं किरणसमूहं निर्जित्य तन्मध्यगतं सूर्य्यमण्डलं प्रविशेयुः । कथं च चन्द्रावलोकन इव तत्प्रतिबिम्बावलोकनेऽपि अमृतशीतलं तद्विम्बसन्निकर्षाविशेषे लोचनयोः शैत्याभिव्यक्त्या आप्या- यनं न स्यात् । कथं च जलसम्बन्धेनाऽपि प्रतिहन्यमानाः शिलादिसम्बन्धेन न प्रतिहन्येरन् । तत्प्रतिहत्या परावृत्तौ वा नयनगोलकादिभिर्न संसृज्येरन् । तत्संसर्गे वा संसृष्टं न साक्षात्कारयेयुः । दोषेणापि हि विशेषां- शग्रहणमात्रं प्रतिबध्यमानं दृश्यते, न तु सन्निकृष्टधर्मिस्वरूपग्रहणमपि ।
प्रसङ्गका उपपादन करते हैं ] । और जलके साथ सन्निकर्ष होनेपर कुछ नयन- रश्मियाँ अप्रतिहतरूपसे भीतर ( जलके अन्दर ) जाती हैं, यह माननेपर भी जलके सम्बन्धसे प्रतिहत होनेवाले, अत एव सर्वथा कोमल अन्य रश्मियाँ— सम्पूर्ण नयनरश्मियोंका प्रतिघात करनेवाले सूर्यकिरणके समूहको जीत कर, अर्थात् उसको दबाकर उनके मध्यवर्ती सूर्यमण्डलमें कैसे प्रवेश करेंगी ? अर्थात् कभी सूर्यमण्डलको ग्रहण नहीं कर सकती हैं । और बिम्बभूत चन्द्रके दर्शनके समान उसके प्रतिबिम्बके दर्शनसे भी नेत्रोंमें शैत्यकी अभिव्यक्ति द्वारा उष्णताकी शान्ति क्यों नहीं होती है ? अर्थात् बिम्ब और प्रतिबिम्बका अभेद- माननेवालोंके पक्षमें प्रतिबिम्बके दर्शनसे भी नेत्रोंकी गर्मी शान्त होनी चाहिए, क्योंकि अमृतके समान अत्यन्त शीतल चन्द्रबिम्बके साथ सन्निकर्ष ( बिम्ब प्रतिबिम्बाभेदवादियोंके मतमें ) समान ही है । और जिन नेत्ररश्मियोंका जलादि जैसे पदार्थोंसे आघात होता है, उनका शिला आदिके सम्बन्धसे प्रतिघात क्यों नहीं होता है ? अर्थात् शिलादिसे उनका प्रतिघात होना ही चाहिए, यह भाव है, यदि माना जाय कि शिला आदिसे भी प्रतिघात होता है, तो फिर लौटकर नयनगोलकके साथ सम्बन्ध क्यों नहीं होता है ? यदि इसपर कहो कि नेत्रगोलकके साथ उनका सम्बन्ध होता है, तो वे नयनगोलक आदिका ग्रहण क्यों नहीं करती है ? यदि दोषविशेषसे इस प्रश्नका परिहार करेंगे, तो उसका यही उत्तर है कि दोषसे विशेष अंशका केवल ग्रहण ही प्रतिबद्ध देखा जाता है, सन्निकृष्ट ( सम्बद्ध ) धर्मीके स्वरूपका ग्रहण प्रतिबद्ध नहीं देखा जाता है ।