सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 353, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३२३
स्यादपलपितुमशक्यत्वात् । न च प्रेक्षावतामपि स्वमुखविशेषपरिज्ञानाय दर्पणाद्युपादानदर्शनाद् अभेदज्ञानमप्यर्थक्रियापर्यन्तमिति वाच्यम्, भेदेऽपि प्रतिबिम्बस्य बिम्बसमानाकारत्वनियमविशेषपरिज्ञानादेव तदुपादानोपपत्तेः ।
* अपने मुखकी विशेषता जाननेकी इच्छासे दर्पण आदिका परिग्रह करते हैं, अतः अर्थक्रियापर्यन्त, तो अभेदज्ञान भी है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि बिम्ब और प्रतिबिम्बका स्वरूपतः भेद प्रतीत होनेपर भी प्रतिबिम्ब बिम्बका समानाकार ही होता है, इस नियमविशेषके परिज्ञानसे ही दर्पण आदिके ग्रहणमें प्रेक्षावान्की † प्रवृत्ति होती है ।
पलायन करते हैं, सौम्य और प्रीतिकर प्रतिबिम्बको देखकर उसको ग्रहण करनेकी इच्छा करते हैं और प्रतिबिम्बप्रदेश तक जाते हैं, अतः प्रतिबिम्ब और बिम्बका परस्पर भेद अवश्य मानना चाहिए, अभेद नहीं ।
* शङ्का करनेवालेका भाव यह है कि यदि बिम्ब और प्रतिबिम्बका वस्तुतः भेद ही है, तो परीक्षकोंको उसका परिज्ञान ठीक ठीक होगा ही । इस अवस्थामें वे जो अपने मुखकी विशेषता जाननेके लिए दर्पण आदिका ग्रहण करते हैं, वह नहीं होना चाहिए । परन्तु उनकी प्रवृत्ति दर्पण आदिके परिग्रहमें होती है, अतः बिम्ब और प्रतिबिम्बका अभेद है, यह निर्विवाद है ।
† समाधानका सारांश यह है कि बिम्ब और प्रतिबिम्बके स्वरूपतः भेदका निश्चय पूर्वोक्त युक्तियोंसे उन परीक्षकोंको यद्यपि है, तथापि प्रतिबिम्बमें बिम्बसमानाकारत्व नियमविशेषके परिज्ञानसे दर्पण आदिका ग्रहण करनेमें उनकी प्रवृत्ति होती है ।
वस्तुतस्तु बिम्ब और प्रतिबिम्बमें अभेदपक्षकी कल्पना ही युक्त है, क्योंकि उसमें लाघव है और बिम्बप्रतिबिम्ब भावापन्नरूपसे श्रुतिसिद्ध जीव और ब्रह्मके अभेदकी प्रतिपत्तिमें उपयोगी होनेके कारण लौकिक बिम्ब और प्रतिबिम्बका अभेद श्रुतिसे प्रमाणित भी है । प्रतिबिम्बभूत जीव ही जब ब्रह्माभिन्न हो सकता है, तो तदतिरिक्त पारमार्थिक अवच्छिन्न जीवकी आवश्यकता ही क्या है ? बिम्ब और प्रतिबिम्बके अभेदमें 'यथा ह्ययं ज्योति०' इत्यादि श्रुति भी प्रमाण हो सकती है—जैसे एक सूर्य अनेक जल आदि उपाधियोंमें प्रतिबिम्बित होनेसे नाना होता है, और स्वतः एक ही है । इन प्रमाणोंसे बिम्ब और प्रतिबिम्बका अभेद ही सिद्ध होता है, भेद सिद्ध नहीं होता, इसलिए पूर्वोक्त विवरणकारका ही मत श्रेष्ठ है, यद्यपि सूक्ष्म विचारसे अभेदपक्ष ही ठीक है, इसीलिए भामती आदि ग्रन्थोंमें लौकिकबिम्ब और प्रतिबिम्बके दृष्टान्तसे ही जीव और ब्रह्मका अभेद व्यवस्थित किया गया है, तथापि यह प्रतिबिम्बोत्पत्तिप्रक्रिया मन्दाधिकारियोंके लिए अर्थात् उनको अपनी बुद्धिके अनुसार तत्त्वका अधिगम हो, इसलिए प्रतिपादित है । अधिकांश कृष्णालंकार टीका पृ० ३१६ काशी चौ० सु० में देखना चाहिए ।