भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 352
३२२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

चैत्रमुखाद् भेदेन तत्सदृशत्वेन च पार्श्वस्थैः स्पष्टं निरीक्ष्यमाणं दर्पणे तत्प्रतिबिम्बं ततो भिन्नं स्वरूपतो मिथ्यैव, स्वकरगतादिव रजताच्छुक्तिरजतम् । न च 'दर्पणे मम मुखं भाति' इति बिम्बाभेदज्ञानविरोधः, स्पष्टभेदद्वित्वप्रत्यङ्मुखत्वादिविज्ञानविरोघेनाऽभेदज्ञानासम्भवात् । 'दर्पणे मम मुखम्' इति व्यपदेशस्य स्वच्छायामुखे स्वमुखव्यपदेशवद् गौणत्वाच्च । न चाऽभेदज्ञानविरोधाद् भेदव्यपदेश एव गौणः किं न स्यादिति शङ्क्यम्, बालानां प्रतिबिम्बे पुरुषान्तरभ्रमस्य हानोपादित्सार्थक्रियापर्यन्त-

चैत्र जिस कालमें अपना मुख दर्पणमें देखता है, उस कालमें पासके मनुष्य ग्रीवास्थ बिम्बभूत चैत्रके मुखसे भिन्न और सदृश प्रतिबिम्बभूत मुखको स्पष्टरूपसे देखते हैं और वह स्वरूपतः मिथ्या ही है, जैसे कि अपने हाथके रजतसे भिन्न और उसके सदृश स्पष्ट दिखनेवाला शुक्तिरजत स्वरूपतः मिथ्या होता है। यदि शङ्का हो कि प्रतिबिम्ब बिम्बसे भिन्न कैसे हो सकता है, क्योंकि 'दर्पणमें मेरा मुख भासता है' इस प्रकार बिम्बसे प्रतिबिम्बका अभेद भासता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतिबिम्ब और बिम्बका स्पष्टभेद, द्वित्व, प्रत्यङ्मुखत्व, प्राङ्मुखत्व आदिके ज्ञानसे विरोध होनेके कारण अभेदज्ञान हो ही नहीं सकता है। और 'दर्पणमें मेरा मुख है' इस प्रकारका व्यपदेश तो जैसे अपने छायामुखमें अपने मुखका व्यवहार होता है, वैसे ही गौण है *। इसपर यदि शङ्का हो कि अभेदज्ञानके विरोधसे भेदव्यपदेश ही तुल्ययुक्तिसे गौण क्यों न माना जाय ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि बालकोंको प्रतिबिम्बमें अन्य पुरुषका भ्रम होता है, जिससे हान ( त्याग ), उपादित्सा ( ग्रहण करनेकी इच्छा ) आदि जो उसकी अर्थक्रिया होती है, उसका अपलाप किसी रीतिसे नहीं कर सकते हैं †। इसपर भी यदि पुनः शङ्का हो कि बुद्धिमान् पुरुष भी


* 'दर्पणमें मेरा मुख दिखता है', 'मेरा मुख मलिन है', 'मेरा मुख दीर्घ है', 'दर्पण आदिमें मेरा ग्रीवास्थ मुख ही है' इत्यादि अनेक अभेदोंका अनुभव होता है, अतः अभेदानुभव ही मुख्य है, और भेदानुभव तो अभेदानुभवके विरोधसे केवल औपचारिक है, अतः बिम्ब और प्रतिबिम्बका वास्तविक भेद न होनेपर भी कल्पित भेद मान करके उक्त अभेदानुभवोंकी उपपत्ति हो सकती है, यह पूर्वपक्षका भाव है।

† तात्पर्य यह कि प्रतिबिम्बविषयक प्रवृत्ति आदि लोकमें होती है, अतः उसका अवश्य भेद मानना चाहिए, इसीलिए अज्ञानी बालक जलाशय आदिमें अत्यन्त भयंकर प्रतिबिम्बको देखकर