सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 360, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३३० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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ध्यासः, इह तु बिम्बसन्निधानानुरोधेन मुखाकृतिविशेषाध्यास इति ।
न च प्रतिबिम्बस्य स्वरूपतो मिथ्यात्वे ब्रह्मप्रतिबिम्बजीवस्यापि मिथ्यात्वापत्तिर्दोषः । प्रतिबिम्बजीवस्य तथात्वेऽप्यवच्छिन्नजीवस्य सत्यतया मुक्तिभाक्त्वोपपत्तेरिति ।
न च्छाया नापि वस्त्वन्यत्प्रतिबिम्बमसम्भवात् ।
प्रतिबिम्ब बिम्बकी न छाया है और न अन्य वस्तु है क्योंकि उन दोनोंका सम्भव नहीं है ।
यत्तु प्रतिबिम्बं दर्पणादिषु मुखच्छायाविशेषरूपतया सत्यमेवेति कस्यचिन्मतम्, तन्न । छाया हि नाम शरीरादेस्तत्तदवयवैरालोके कियद्देशव्यापिनि निरुद्धे तत्र देशे लब्धात्मकं तम एव । न च मौक्तिक-
अशुभके हेतुभूत अदृष्टके † अनुरोधसे पुरुषाकृतिविशेषका अध्यास होता है और प्रकृतमें बिम्बके सामीप्यके अनुरोधसे मुखाकृतिविशेषका अध्यास होता है ।
यदि प्रतिबिम्ब स्वरूपसे मिथ्या माना जाय, तो ब्रह्मके प्रतिबिम्ब जीवमें भी मिथ्यात्व प्रसक्त होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतिबिम्बभूत जीव मिथ्या है, तो भी अवच्छिन्न जीवके सत्यस्वरूप होनेसे मुक्तिभागिता हो सकती है ।
कुछ लोग कहते हैं कि दर्पण आदिमें दिखनेवाला प्रतिबिम्ब मुखकी छायाविशेष * है और वह सत्यस्वरूप ही है, परन्तु उन लोगोंका मत युक्त नहीं है, कारण कि शरीर आदिकी जो छाया है—वह कुछ देशमें व्याप्त आलोकके शरीरके उन-उन अवयवोंसे निरुद्ध होनेपर उन उन देशोंमें आनेवाला—तमोरूप ही है, अन्य कोई पदार्थ नहीं है, और मौक्तिक, माणिक्य
† प्रतिमुखके अध्यासमें मुखसामान्यानुभवजन्य संस्कार यदि कारण माना जाय, तो चैत्रमुख और दर्पणके परस्पर सान्निध्यमें अन्य मुखका भी स्वप्नके समान अध्यास प्रसक्त होगा, इसीका 'इयांस्तु' ग्रन्थसे उत्तर देते हैं ।
* यद्यपि वृक्ष आदिकी छायामें नैल्यका भास होता है, और प्रतिबिम्बमें प्रायः नैल्य नहीं देखा जाता है, इससे प्रतिबिम्बको छाया मानना एक प्रकारसे अनुचित सा ही है, तथापि उसको छायाविशेष माननेमें कोई दोष नहीं है अर्थात् वृक्ष आदिकी नीलरूप युक्त जैसे छाया है, वैसे ही दर्पण आदिमें पड़नेवाला प्रतिबिम्ब भी विलक्षण छायाभेद ही है, इसलिए बिम्बसे छायाके भिन्न होनेपर भी वृक्ष आदिकी छायाके समान वह सत्य ही है, असत्य नहीं है, क्योंकि छायाका लोकमें मिथ्यात्वेन ग्रहण नहीं हो सकता है इसी विशेष अर्थका सूचन करनेके लिए मूलकारने 'छायाविशेष'में विशेष पद दिया है, यह भाव है ।