भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३३१


माणिक्यादिप्रतिबिम्बस्य तमोविरुद्धसितलोहितादिरूपवतस्तमोरूपच्छायात्वं ·· युक्तम्। न वा तमोरूपच्छायारहिततपनादिप्रतिबिम्बस्य तथात्वमुपपन्नम्।

ननु तर्हि प्रतिबिम्बरूपच्छायायास्तमोरूपत्वासम्भवे द्रव्यान्तरत्वमस्तु, क्लृप्तद्रव्यानन्तर्भावे तमोवद् द्रव्यान्तरत्वाकल्पनोपपत्तेरिति चेत्, तत् किं द्रव्यान्तरं प्रतीयमानरूपपरिमाणसंस्थानविशेषप्रत्यङ्मुखत्वादिधर्म- युक्तम्, तद्रहितं वा स्यात्? अन्त्ये न तेन द्रव्यान्तरेण रूपविशेषादि-


आदिका प्रतिबिम्ब, जो कि तमसे अत्यन्त विरुद्ध श्वेत और रक्त है, वह अन्धकाररूप छाया कैसे हो सकता है, अर्थात् किसी प्रकारसे भी मोती आदि की छाया अन्धकार रूप नहीं † हो सकती है। और अन्धकाररूप छायासे रहित सूर्यके प्रतिबिम्बको छाया रूप मानना युक्तियुक्त नहीं हो सकता है, अतः उनका मत तुच्छ है।

यदि पुनः इस विषयमें शङ्का हो कि प्रतिबिम्बरूप छाया अन्धकाररूप भले ही न हो सके, परन्तु अन्य द्रव्यरूप हो सकेगी, क्योंकि उसका पृथ्वी आदि द्रव्यमें अन्तर्भाव न होनेपर भी अन्धकारके समान ❊ उसे अन्य द्रव्य मान सकते हैं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस विषयमें विकल्प हो सकता है कि प्रतिबिम्बरूप वह द्रव्यान्तर क्या प्रतीयमान रूप, परिमाण, संस्थान- विशेष और प्रत्यङ्मुखत्व आदि धर्मोंसे युक्त है या उनसे रहित है? यदि द्वितीय पक्षका अङ्गीकार करो, तो उस कल्पित द्रव्यान्तरसे रूपविशेष


† तात्पर्य यह है कि अन्धकार द्रव्यका गुण है नीलरूप, मोती, माणिक्य, आदिके प्रति- बिम्ब छायामें भी क्रमशः श्वेत और रक्त (लोहित) रूप ही देखे जाते हैं, अतः उन्हें अन्धकार कैसे मान सकते हैं, क्योंकि वह अत्यन्त विरुद्ध है। यदि कथंचित् ऐसा मान भी लिया जाय, तो भी जिसकी कभी छाया (अन्धकार) ही नहीं है, ऐसे अन्धकारके अनाश्रय सूर्यका जल आदिमें प्रतिबिम्ब देखा जाता है, उस प्रतिबिम्बको अन्धकाररूप छाया कैसे मान सकते हैं, अतः प्रतिबिम्बको अन्धकाररूप छाया नहीं मान सकते हैं। अत एव छायाके दृष्टान्तसे उसे सत्य भी नहीं मान सकते हैं, यह प्रतिबिम्बमिथ्यात्ववादियोंका मत है।

❊ यद्यपि नैयायिक लोग अन्धकारको प्रकृष्ट प्रकाशक तेजोभावरूप मानते हैं, तथापि सिद्धान्तमें वह अभावरूप नहीं है, किन्तु पृथ्वी आदि नौ द्रव्योंके समान दशम द्रव्यरूप माना गया है, इसी प्रकार प्रतिबिम्बको भी अन्धकारके समान एकादशवाँ द्रव्य मानेंगे, यह भाव है।

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