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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ
३३०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

ध्यासः, इह तु बिम्बसन्निधानानुरोधेन मुखाकृतिविशेषाध्यास इति ।

न च प्रतिबिम्बस्य स्वरूपतो मिथ्यात्वे ब्रह्मप्रतिबिम्बजीवस्यापि मिथ्यात्वापत्तिर्दोषः । प्रतिबिम्बजीवस्य तथात्वेऽप्यवच्छिन्नजीवस्य सत्यतया मुक्तिभाक्त्वोपपत्तेरिति ।

न च्छाया नापि वस्त्वन्यत्प्रतिबिम्बमसम्भवात् ।

प्रतिबिम्ब बिम्बकी न छाया है और न अन्य वस्तु है क्योंकि उन दोनोंका सम्भव नहीं है ।

यत्तु प्रतिबिम्बं दर्पणादिषु मुखच्छायाविशेषरूपतया सत्यमेवेति कस्यचिन्मतम्, तन्न । छाया हि नाम शरीरादेस्तत्तदवयवैरालोके कियद्देशव्यापिनि निरुद्धे तत्र देशे लब्धात्मकं तम एव । न च मौक्तिक-

अशुभके हेतुभूत अदृष्टके † अनुरोधसे पुरुषाकृतिविशेषका अध्यास होता है और प्रकृतमें बिम्बके सामीप्यके अनुरोधसे मुखाकृतिविशेषका अध्यास होता है ।

यदि प्रतिबिम्ब स्वरूपसे मिथ्या माना जाय, तो ब्रह्मके प्रतिबिम्ब जीवमें भी मिथ्यात्व प्रसक्त होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतिबिम्बभूत जीव मिथ्या है, तो भी अवच्छिन्न जीवके सत्यस्वरूप होनेसे मुक्तिभागिता हो सकती है ।

कुछ लोग कहते हैं कि दर्पण आदिमें दिखनेवाला प्रतिबिम्ब मुखकी छायाविशेष * है और वह सत्यस्वरूप ही है, परन्तु उन लोगोंका मत युक्त नहीं है, कारण कि शरीर आदिकी जो छाया है—वह कुछ देशमें व्याप्त आलोकके शरीरके उन-उन अवयवोंसे निरुद्ध होनेपर उन उन देशोंमें आनेवाला—तमोरूप ही है, अन्य कोई पदार्थ नहीं है, और मौक्तिक, माणिक्य


† प्रतिमुखके अध्यासमें मुखसामान्यानुभवजन्य संस्कार यदि कारण माना जाय, तो चैत्रमुख और दर्पणके परस्पर सान्निध्यमें अन्य मुखका भी स्वप्नके समान अध्यास प्रसक्त होगा, इसीका 'इयांस्तु' ग्रन्थसे उत्तर देते हैं ।

* यद्यपि वृक्ष आदिकी छायामें नैल्यका भास होता है, और प्रतिबिम्बमें प्रायः नैल्य नहीं देखा जाता है, इससे प्रतिबिम्बको छाया मानना एक प्रकारसे अनुचित सा ही है, तथापि उसको छायाविशेष माननेमें कोई दोष नहीं है अर्थात् वृक्ष आदिकी नीलरूप युक्त जैसे छाया है, वैसे ही दर्पण आदिमें पड़नेवाला प्रतिबिम्ब भी विलक्षण छायाभेद ही है, इसलिए बिम्बसे छायाके भिन्न होनेपर भी वृक्ष आदिकी छायाके समान वह सत्य ही है, असत्य नहीं है, क्योंकि छायाका लोकमें मिथ्यात्वेन ग्रहण नहीं हो सकता है इसी विशेष अर्थका सूचन करनेके लिए मूलकारने 'छायाविशेष'में विशेष पद दिया है, यह भाव है ।

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प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३३१


माणिक्यादिप्रतिबिम्बस्य तमोविरुद्धसितलोहितादिरूपवतस्तमोरूपच्छायात्वं ·· युक्तम्। न वा तमोरूपच्छायारहिततपनादिप्रतिबिम्बस्य तथात्वमुपपन्नम्।

ननु तर्हि प्रतिबिम्बरूपच्छायायास्तमोरूपत्वासम्भवे द्रव्यान्तरत्वमस्तु, क्लृप्तद्रव्यानन्तर्भावे तमोवद् द्रव्यान्तरत्वाकल्पनोपपत्तेरिति चेत्, तत् किं द्रव्यान्तरं प्रतीयमानरूपपरिमाणसंस्थानविशेषप्रत्यङ्मुखत्वादिधर्म- युक्तम्, तद्रहितं वा स्यात्? अन्त्ये न तेन द्रव्यान्तरेण रूपविशेषादि-


आदिका प्रतिबिम्ब, जो कि तमसे अत्यन्त विरुद्ध श्वेत और रक्त है, वह अन्धकाररूप छाया कैसे हो सकता है, अर्थात् किसी प्रकारसे भी मोती आदि की छाया अन्धकार रूप नहीं † हो सकती है। और अन्धकाररूप छायासे रहित सूर्यके प्रतिबिम्बको छाया रूप मानना युक्तियुक्त नहीं हो सकता है, अतः उनका मत तुच्छ है।

यदि पुनः इस विषयमें शङ्का हो कि प्रतिबिम्बरूप छाया अन्धकाररूप भले ही न हो सके, परन्तु अन्य द्रव्यरूप हो सकेगी, क्योंकि उसका पृथ्वी आदि द्रव्यमें अन्तर्भाव न होनेपर भी अन्धकारके समान ❊ उसे अन्य द्रव्य मान सकते हैं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस विषयमें विकल्प हो सकता है कि प्रतिबिम्बरूप वह द्रव्यान्तर क्या प्रतीयमान रूप, परिमाण, संस्थान- विशेष और प्रत्यङ्मुखत्व आदि धर्मोंसे युक्त है या उनसे रहित है? यदि द्वितीय पक्षका अङ्गीकार करो, तो उस कल्पित द्रव्यान्तरसे रूपविशेष


† तात्पर्य यह है कि अन्धकार द्रव्यका गुण है नीलरूप, मोती, माणिक्य, आदिके प्रति- बिम्ब छायामें भी क्रमशः श्वेत और रक्त (लोहित) रूप ही देखे जाते हैं, अतः उन्हें अन्धकार कैसे मान सकते हैं, क्योंकि वह अत्यन्त विरुद्ध है। यदि कथंचित् ऐसा मान भी लिया जाय, तो भी जिसकी कभी छाया (अन्धकार) ही नहीं है, ऐसे अन्धकारके अनाश्रय सूर्यका जल आदिमें प्रतिबिम्ब देखा जाता है, उस प्रतिबिम्बको अन्धकाररूप छाया कैसे मान सकते हैं, अतः प्रतिबिम्बको अन्धकाररूप छाया नहीं मान सकते हैं। अत एव छायाके दृष्टान्तसे उसे सत्य भी नहीं मान सकते हैं, यह प्रतिबिम्बमिथ्यात्ववादियोंका मत है।

❊ यद्यपि नैयायिक लोग अन्धकारको प्रकृष्ट प्रकाशक तेजोभावरूप मानते हैं, तथापि सिद्धान्तमें वह अभावरूप नहीं है, किन्तु पृथ्वी आदि नौ द्रव्योंके समान दशम द्रव्यरूप माना गया है, इसी प्रकार प्रतिबिम्बको भी अन्धकारके समान एकादशवाँ द्रव्य मानेंगे, यह भाव है।

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३३२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

घटितप्रतिबिम्बोपलम्भनिर्वाह इति व्यर्थं तत्कल्पनम् । प्रथमे तु कथमेकस्मिन्नल्पपरिमाणे युगपदसंकीर्णतया प्रतीयमानानां महापरिमाणानामनेकमुखप्रतिबिम्बानां सत्यतानिर्वाहः ? कथं च निबिडावयवानुस्यूते दर्पणे तथैवाऽवतिष्ठमाने तदन्तर्हनुनासिकाद्यनेकनिम्नोन्नतप्रदेशवतो द्रव्यान्तरस्योत्पत्तिः ? किं च सितपीतरक्ताद्यनेकवर्णादिमतः प्रतिबिम्बस्योत्पत्तौ दर्पणमध्ये स्थितं तत्सन्निहितं न तादृशं कारणमस्ति ।

यद्युच्येत—'उपाधिमध्यविश्रान्तियोग्यपरिमाणानामेव प्रतिबिम्बानां महापरिमाणज्ञानं तादृशनिम्नोन्नतादिज्ञानं च भ्रम एव । यथापूर्वं दर्पण-


आदिसे युक्त उपलभ्यमान प्रतिबिम्बका निर्वाह नहीं हो सकता है, अतः ऐसे निरर्थक द्रव्यान्तरको मानना† अयुक्त है। प्रथम पक्ष मानो, तो अल्प परिमाणवाले एक ही दर्पणमें युगपत् ( एक कालमें ) असंकीर्णरूपसे प्रतीयमान बड़े परिमाणवाले अनेक मुखप्रतिबिम्बोंमें सत्यताका निर्वाह कैसे हो सकेगा ‡ । अर्थात् सत्यताका निर्वाह नहीं हो सकेगा । और दूसरी बात यह भी है कि अत्यन्त घने अवयवोंसे अनुस्यूत दर्पण, जो ज्योंका त्यों है, उसमें हनु, नासिका आदि अनेक निम्न उन्नत प्रदेशोंसे युक्त अन्य द्रव्यकी उत्पत्ति भी कैसे हो सकती है ? किञ्च, श्वेत, पीत, रक्त आदि अनेक रङ्गोंसे युक्त प्रतिबिम्बकी उत्पत्तिमें दर्पणके भीतर स्थित, अथवा उसके समीपवर्ती कोई श्वेत आदि वर्णोंसे युक्त कारण भी नहीं है, जिससे कि उस प्रतिबिम्बात्मक द्रव्यान्तरकी उत्पत्ति भी हो सके ।

यदि कहा जाय कि दर्पण आदि उपाधियोंके बीचमें जिस परिमाणसे विश्रान्ति कर सके, ऐसे ही परिमाणसे युक्त प्रतिबिम्ब उत्पन्न होते हैं, और उनमें महापरिमाणका जो अवभास होता है और हनु, नासिका आदि जो निम्नोन्नतादि ज्ञान होता है, वह भ्रमात्मक ही है । एवं उसके अवयवोंकी अव-


† अर्थात् प्रतिबिम्बको रूपादिरहित माननेपर रूपादिमुक्त प्रतिबिम्बका जो प्रत्यक्ष होता है, उसके साथ विरोध होगा, यह भाव है।
‡ तात्पर्य यह है कि छोटे दर्पणमें एक कालमें ही अनेक बड़े बड़े असंकीर्णरूपसे प्रतीयमान प्रतिबिम्बोंके द्रव्यान्तर होनेपर भी उन्हें सत्यस्वरूप नहीं मान सकते हैं । मिथ्या माननेपर तो जैसे स्वप्नावस्थामें छोटे शरीरान्तराकाशमें बड़े बड़े रथ, गज आदिका उपलम्भ होता है, वैसे ही स्वल्प परिमाणवाले दर्पणोंमें उनकी उपपत्ति हो सकती है ।

प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३३३

तदवयवावस्थानाविरोधेन तादृक्प्रतिबिम्बोत्पादनसमर्थं च किञ्चित् कारणं कल्प्यम्' इति । तर्हि शुक्तिरजतमपि सत्यमस्तु । तत्रापि शुक्तौ यथापूर्वं स्थितायामेव तत्तादात्म्यापन्नरजतोत्पादनसमर्थं किञ्चित्कारणं परिकल्प्य तस्य रजतस्य दोषत्वाभिमतकारणसहकृतेन्द्रियग्राह्यत्वनियमवर्णनोपपत्तेः किं 'शुक्तिरजतमसत्यम्, प्रतिबिम्बः सत्यः' इत्यर्धजरतीयन्यायेन । न च तथा सति 'रजतम्' इति दृश्यमानायाः शुक्तेरग्नौ प्रक्षेपे रजतवद् द्रवीभा-

स्थिति पूर्ववत् ही रहे, इसलिए उनका अविरोधी तथा उस प्रतिबिम्बके उत्पादनमें समर्थ किसी कारण द्रव्यकी भी कल्पना करनी चाहिए* । इसलिए प्रतिबिम्बके द्रव्यान्तर और सत्य होनेमें कोई विरोध नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस युक्तिसे शुक्तिरजत भी सत्य हो जायगा । अर्थात् शुक्ति-रजतमें भी यथापूर्व अवस्थित शुक्तिमें ही शुक्तितादात्म्यापन्न रजतके उत्पादनमें समर्थ किसी कारणविशेषकी कल्पना करके उस रजतमें दोषत्वसे अभिमत कारण† सहकृत इन्द्रियग्राह्यत्वं नियमको मानकर उपपत्ति हो सकती है फिर 'शुक्तिरजत असत्य है' और प्रतिबिम्ब सत्य है ? इस अर्धजरतीयन्यायके ‡ अङ्गीकारका प्रयोजन ही क्या है ? यदि शङ्का हो कि शुक्तिरजतको सत्य नहीं मान सकते हैं, कारण कि उनके सत्य होनेपर रजतरूपसे देखी गई शुक्ति का अग्निमें प्रक्षेप करनेपर रजतके समान द्रवीभावकी आपत्ति होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अग्नि और कस्तूरीके प्रतिबिम्बमें जैसे उष्णता और


* जैसे नीवारके अवयवोंमें व्रीहीके अवयव मीमांसकोंने माने हैं, वैसे ही दर्पणके अवयवोंमें संयुक्त प्रतिबिम्बके अवयवोंकी भी कल्पना करनी चाहिए, यह तात्पर्य है। यहाँ शङ्का करनेवालेका भाव यह है कि प्रतिबिम्ब स्वयं सत्य है और उसमें प्रतीयमान धर्म असत्य हैं।

† यदि शुक्तिरजत सत्य माना जायगा तो उसका अस्तित्व सदा शुक्तिमें होनेके कारण शुक्ति-प्रत्यक्षकालमें भी रजतका प्रत्यक्ष होना चाहिए, इस शङ्काका इस नियमसे परिहार किया गया अर्थात् शुक्तिमें रजतके होनेपर भी उसका प्रत्यक्ष तभी होगा जब इन्द्रिय दोषसहकृत होगी, अतः पूर्वोक्त दोष नहीं आ सकता है, यह भाव है।

‡ जरती—वृद्धा, उसके आधे हिस्सेकी मुख आदिकी अभिलाषा करना और अवशिष्ट भागकी इच्छा नहीं करना, इसमें कोई युक्ति नहीं है, वैसे प्रकृतमें शुक्तिरजतको मिथ्या मानना और प्रतिबिम्बको सत्य मानना, युक्तिविधुर है।

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३३४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद

वापत्तिः । अनलकस्तूरिकादिप्रतिबिम्बस्यौष्ण्यसौरभादिराहित्यवच्छुक्तिरजतस्य द्रवीभावयोग्यताराहित्योपपत्तेः ।

अथोच्येत—'नेदं रजतम्', 'मिथ्यैव रजतमभाद्' इति सर्वसंप्रतिपन्नवाधान्न शुक्तिरजतं सत्यम्' इति । तर्हि 'दर्पणे मुखं नास्ति, मिथ्यैवात्र दर्पणे मुखमभाद्' इत्यादिसर्वसिद्धवाधात् प्रतिबिम्बमप्यसत्यमित्येव युक्तम् । तस्मादसङ्गतः प्रतिबिम्बसत्यत्ववादः ।

नन्वध्यासोऽप्ययुक्तोऽस्योपादानाज्ञानसंक्षयात् ॥ २३ ॥

प्रतिबिम्ब मिथ्या है यह कथन भी अयुक्त है क्योंकि शुक्तिरजतके समान उसके उपादान कारण अज्ञान का नाश हो गया है ॥ २३ ॥

ननु तन्मिथ्यात्ववादोऽप्ययुक्तः, शुक्तिरजत इव कस्यचिदन्वय-

सौगन्ध्य नहीं है, वैसे ही शुक्तिरजतमें द्रवीभावकी योग्यता नहीं है, इस प्रकार कह सकते हैं।

यदि कहा जाय कि 'यह रजत नहीं है' 'मिथ्या ही रजत देखा गया' इस प्रकार जगतप्रसिद्ध बाधसे शुक्तिरजत सत्य नहीं हो सकता, तो तुल्ययुक्त्या यह भी कह सकते हैं कि दर्पणमें * मिथ्या ही मुख देखा गया, इस प्रकारके सर्वजनीन बाधके अनुभवसे प्रतिबिम्ब भी असत्य हो सकता है। इसलिए प्रतिबिम्ब सत्यत्ववाद असङ्गत है।

यदि शङ्का † हो कि प्रतिबिम्बका मिथ्यात्ववाद भी युक्तिहीन ही है,


* जिस पक्षमें बिम्ब और प्रतिबिम्बका अभेद है, उस पक्षमें प्रतिबिम्बमें जो मिथ्यात्वका अनुभव होता है, वह प्रतिबिम्बत्वरूपसे प्रतिबिम्बको विषय करता है, स्वरूपतः प्रतिबिम्बको विषय नहीं करता है, यह ज्ञातव्य है। यदि शङ्का हो कि शुक्तिरजतमें जो मिथ्यात्वक अनुभव होता है, वह इदमर्थ तादात्म्यापन्नत्वरूपसे रजतको विषय करता है, स्वरूपतः रजतको विषय नहीं करता है, इस प्रकार शुक्तिरजतस्थलमें कहकर रजत और इदमर्थका तादात्म्य ही कल्पित है, रजत कल्पित नहीं है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शुक्तिमें अनिर्वचनीय रजतकी उत्पत्ति यदि नहीं मानी जायगी, तो रजतका प्रत्यक्ष हो ही नहीं सकता है, अतः उसकी उत्पत्ति अवश्य माननी चाहिए। उसकी उत्पत्तिमें अन्वय और व्यतिरेकसे अनिर्वचनीय अज्ञान ही कारण है, अन्य नहीं है, अतः वह मिथ्या ही हो सकता है, क्योंकि शुक्तिरजतमें सत्यत्वसाधक अनन्यथासिद्ध कोई प्रमाण नहीं है, जैसे कि बिम्ब और प्रतिबिम्बके अभेद पक्षमें प्रतिबिम्बमें सत्यत्वसाधक प्रमाण पूर्वमें है । अतः शुक्तिरजतमें मिथ्यात्वावगाही अनुभव स्वरूपतः रजतका अवगाहन करता है इससे शुक्तिरजत मिथ्या ही है, यह भाव है।

† प्रतिबिम्बाध्यासमें अज्ञान उपादान कारण नहीं है, क्योंकि दर्पण आदि अधिष्ठानोंकी

प्रतिबिम्बका सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३३५


व्यतिरेकशालिनः कारणस्याऽज्ञानस्य निवर्तकस्य च ज्ञानस्य चाऽनिरूपणात्।

अत्र केचिदविद्याऽत्राऽऽवरणांशे विनश्यति ।
विक्षेपांशे तु बिम्बादिप्रतिबद्धाऽस्य कारणम् ॥ २४ ॥

इसपर कुछ लोग कहते हैं कि यहांपर अज्ञानका आवरण अंशसे नाश हो जाता है और विक्षेप अंशसे अज्ञान रहता है। वही बिम्बसम्बद्ध प्रतिबिम्ब मुखका कारण होता है ॥ २४ ॥

अत्र केचित् — यद्यपि सर्वात्मनाऽधिष्ठानज्ञानानन्तरमपि जायमाने प्रतिबिम्बाध्यासे नाऽधिष्ठानावरणमज्ञानमुपादानम्, न वाऽधिष्ठानविशेषांशज्ञानं निवर्तकम्, तथाऽप्यधिष्ठानाज्ञानस्यावरणशक्त्यंशेन निवृत्तावपि विक्षेप-


क्योंकि शुक्तिरजतके समान किसी अन्वय और व्यतिरेकसे युक्त अज्ञानरूप कारणका और निवर्तक ज्ञानका निरुपण नहीं ‡ हो सकता है ?

इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि सामान्य और विशेषरूपसे※ अधिष्ठानके ज्ञानके अनन्तर उत्पन्न होनेवाले प्रतिबिम्बाध्यासमें अधिष्ठानका आवारक अज्ञान उपादान नहीं है और अधिष्ठानके विशेषांशका ज्ञान प्रतिबिम्बाध्यासका निवर्तक नहीं है, तथापि आवरणशक्तिसे युक्त


अधिगति सर्वात्मना होनेके कारण अज्ञान निवृत्त हो गया है, और अधिष्ठान साक्षात्कारके रहते प्रतिबिम्बाध्यासकी अनुवृत्ति होनेके कारण ज्ञान अधिष्ठानज्ञान निवर्त्यत्वरूप मिथ्यात्व भी उनमें नहीं है, अतः प्रतिबिम्ब मिथ्यात्ववाद असङ्गत है, यह पूर्वपक्षका भाव है।

‡ जैसे शुक्तिरजत भ्रमस्थलमें शुक्तिका अज्ञान अन्वय और व्यतिरेकमें शुक्तिरजताध्यासका कारण है, जैसा कि निरूपण किया जा चुका है, वैसे प्रतिबिम्बाध्यासमें दर्पणका अज्ञान होनेपर प्रतिबिम्बाध्यास होगा और उसके अभावमें नहीं होगा। इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेकसे युक्त अज्ञानका निरूपण नहीं कर सकते हैं और प्रतिबिम्बाध्यासका निर्वतक ज्ञान भी उपलब्ध नहीं होता है, अतः प्रतिबिम्बमिथ्यात्ववाद असङ्गत है।

※ शुक्तिमें जब रजतका अध्यास होता है, तब पूर्वमें शुक्तिका इदन्त्वसामान्यरूपसे ज्ञान होता है शुक्तित्वादिविशेषरूपसे नहीं होता है, अतः शुक्तिरजतमें अधिष्ठानके विशेषका आवरण अज्ञान उपादान हो सकता है, प्रकृतमें प्रतिबिम्बाध्यासके पूर्वमें इदन्त्व सामान्यसे और दर्पणत्वादिविशेषसे अधिष्ठानका साक्षात्कार होनेके कारण सर्वांशमें ही दर्पण आदिका साक्षात्कार है, अतः अधिष्ठानविशेषांशावरणकृत अज्ञानके निवृत्त होनेके कारण वह प्रतिबिम्बाध्यासके प्रति उपादान नहीं हो सकता है, यह युक्त है, तथापि अज्ञानके एकदेशकी निवृत्ति होनेके कारण अवशिष्टविक्षेपांशयुक्त अज्ञान ही प्रतिबिम्बाध्यासके प्रति उपादान है, अतः विरोध नहीं है, यह भाव है।

३३६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद


शक्त्यंशेनानुवृत्तिसम्भवात् तदेवोपादानम् । बिम्बोपाधिसन्निधिनिवृत्ति-सचिवं चाऽधिष्ठानज्ञानं सोपादानस्य तस्य निवर्तकमिति ।

मूलाविद्याऽथवा हेतुर्विक्षेपांशेन संस्थिता ।
बिम्बादिदोषजन्यत्वान्मिथ्येत्यन्ये प्रचक्षते ॥ २५ ॥

अथवा विक्षेप अंशसे स्थित मूलाऽविद्या प्रतिबिम्बाध्यासकी हेतु है बिम्ब आदिके दोषसे जन्य होनेके कारण प्रतिबिम्ब मिथ्या है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं ॥ २५ ॥

अन्ये तु ज्ञानस्य विक्षेपशक्त्यंशं विहायाऽऽवरणशक्त्यंशमात्रनिवर्तकत्वं न स्वाभाविकम्, ब्रह्मज्ञानेन मूलाज्ञानस्य शुक्त्यादिज्ञानेनाऽवस्थाऽज्ञा-नस्य चाऽऽवरणशक्त्यंशमात्रनिवृत्तौ तस्य विक्षेपशक्त्या सर्वदाऽनुवृत्ति-प्रसङ्गात् । न च बिम्बोपाधिसन्निधिरूपविक्षेपशक्त्यंशनिवृत्तिप्रतिबन्धक-प्रयुक्तं तत् । बिम्बोपाधिसन्निधानात् प्रागेव बिम्बे चैत्रमुखे दर्पणसंसर्गाद्य-


अधिष्ठानके अज्ञानकी निवृत्ति† होनेपर भी विक्षेपशक्तिरूप अंशसे युक्त अज्ञानकी अनुवृत्ति होनेसे वही विक्षेपशक्तिरूप अंशसे युक्त अज्ञान प्रतिबिम्बा-ध्यासके प्रति कारण है। बिम्ब और उपाधिकी सन्निधिकी निवृत्तिसे युक्त अधिष्ठान-ज्ञान (दर्पणमें मेरा मुख नहीं है) उपादानसहित अध्यासका निवर्तक है।

कुछ लोग तो कहते हैं कि अज्ञानके विक्षेपशक्तिरूप अंशको छोड़कर केवल आवरणशक्त्यंशका निवर्तक ज्ञान स्वभावतः नहीं हो सकता है, क्योंकि, ब्रह्मज्ञान-से मूलाज्ञानका और शुक्ति आदिके ज्ञानसे अवस्थारूप अज्ञानका केवल आवरण शक्त्यंश ही यदि निवृत्त होगा, तो विक्षेपशक्त्यंशसे युक्त अज्ञानकी सर्वदा अर्थात् विदेहकैवल्यावस्थामें भी अनुवृत्ति प्रसक्त होगी। यदि शङ्का हो कि बिम्ब और उपाधि (दर्पण आदि) के सान्निध्यरूप विक्षेप शक्त्यंशकी निवृत्तिके प्रतिबन्धकसे युक्त ही ज्ञान केवल आवरण शक्त्यंशको निवृत्त करता है, स्वभावतः नहीं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि * बिम्ब और दर्पण आदि उपाधिके आभिमुख्यलक्षण


* प्रतिबिम्ब और बिम्बके अभेदपक्षमें प्रतिबिम्बकी उत्पत्ति न होनेपर भी बिम्बभूत चैत्रके मुखमें बिम्बत्व और प्रतिबिम्बत्व आदि अनिर्वचनीय धर्म उत्पन्न होते हैं, ऐसा माना गया है, अतः चैत्रके मुखावच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाला अज्ञान ही उसका कारण होगा, दर्पणकी सन्निधिके पूर्वमें विष्णुमित्र द्वारा चैत्रमुखके निरीक्ष्यमाण होनेपर उस समय प्रतिबन्धकके न रहनेसे चैत्रमुखविषयक विष्णुमित्रके साक्षात्कारसे विक्षेपशक्तिसे युक्त उस अज्ञानकी निवृत्ति

प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३३७


भावे दर्पणे चैत्रमुखाभावे वा प्रत्यक्षतोऽवगम्यमाने विक्षेपशक्त्यंशस्यापि निवृत्त्यवश्यम्भावेन तत्काले तयोस्सन्निधाने सति उपादानाभावेन प्रतिबिम्बभ्रमाभावप्रसङ्गात् । अतो मूलाज्ञानमेव प्रतिबिम्बाध्यासस्योपादानम् । न चात्राऽप्युक्तदोषतौल्यम् । पराग्विषयवृत्तिपरिणामानां स्वस्वविषयावच्छिन्नचैतन्यप्रदेशे मूलाज्ञानावरणशक्त्यंशाभिभावकत्वेऽपि तदीयविक्षेपशक्त्यंशानिवर्तकत्वात् । अन्यथा तत्प्रदेशस्थितव्यावहारिकविक्षेपाणामपि विलयापत्तेः ।


सन्निधानके पूर्वक्षणमें ही बिम्बभूत चैत्रके मुखमें दर्पणस्थत्व आदि दर्पण-संसर्गके अभावका अर्थात् चैत्रमुखमें दर्पणस्थत्वादि नहीं हैं, इस प्रकारके अभावका अथवा दर्पणमें चैत्रका मुख नहीं है, इस प्रकार प्रत्यक्षसे दर्पणमें चैत्रमुखके अभावका ग्रहण होनेपर प्रतिबन्धकके न रहनेसे विक्षेपशक्त्यंशसे युक्त अज्ञानकी भी निवृत्ति अवश्य होगी, इस परिस्थितिमें विक्षेपशक्त्यंशनिवर्तक साक्षात्कारकी उत्पत्तिके द्वितीय क्षणमें चैत्रमुख और उपाधिका सान्निध्य होनेपर भी उपादानके (विक्षेपशक्त्यंशयुक्त अवस्थारूप अज्ञानके) न होनेके कारण अधिष्ठानसे युक्त विष्णुमित्रको 'दर्पणमें चैत्रमुख है' इस प्रकार प्रतिबिम्बाध्यास नहीं होगा, अतः—अवस्थारूप अज्ञानके प्रतिबिम्बाध्यासके प्रति कारण न होनेसे—उसके प्रति मूलाज्ञानको ही उपादानकारण मानना चाहिए । यदि शङ्का हो कि इसमें भी पूर्वोक्त दोष तुल्य ही है, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि पुरोवर्ती घटादिविषय आकारसे परिणत अन्तःकरणकी वृत्तियां यद्यपि अपने-अपने विषयावच्छिन्न चैतन्यप्रदेशमें मूलाज्ञानके आवरणशक्त्यंशकी निवृत्ति करती हैं, तथापि वे वृत्तियाँ अज्ञानके विक्षेपांशकी निवृत्ति नहीं करती हैं, ऐसा अभ्युपगम है । यदि यह न माना जाय, तो उस-उस प्रदेशमें स्थित व्यावहारिक विषयोंका भी विलोप हो जायगा ।


होती है । उत्तर क्षणमें ही चैत्रमुखका दर्पणाभिमुख्य होनेपर विष्णुमित्रको 'दर्पणमें चैत्रका मुख है' इस प्रकार भ्रम होता, उसमें दर्पणस्थत्व आदिकी उत्पत्ति नहीं होगी, क्योंकि विक्षेपशक्तिसे युक्त अज्ञानरूप उपादान नहीं है, इस अभिप्रायसे 'बिम्बोपाधि' इत्यादिसे उपाधिसन्निधानरूप विक्षेपशक्त्यंशनिवृत्तिप्रतिबन्धकप्रयुक्त ज्ञानमें आवरणशक्त्यंश निवर्तकत्वका खण्डन किया जाता है, यह भाव है ।

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३३८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

न च प्रतिबिम्बस्य मूलाज्ञानकार्यत्वे व्यावहारिकत्वापत्तिः । अविद्यातिरिक्तदोषजन्यत्वस्य व्यावहारिकत्वप्रयोजकत्वात् । प्रकृते च तदतिरिक्तबिम्बोपाधिसन्निधानदोषसद्भावेन प्रातिभासिकत्वोपपत्तेः ।

बिम्बापसरणाध्यक्षाद्विक्षेपांशस्य बाधनम् ।
विरोधादथवा ब्रह्मज्ञानेनैवास्य बाधनम् ॥ २६ ॥

बिम्बकी सन्निधिकी निवृत्तिसे युक्त अधिष्ठानसाक्षात्कारसे विक्षेप अंश का बाध होता है, क्योंकि दोनोंका परस्पर विरोध है अथवा केवल ब्रह्मज्ञानसे ही विक्षेप अंशका नाश होता है ॥ २६ ॥

न चैवं सति बिम्बोपाधिसन्निधिनिवृत्तिसहकृतस्याप्यधिष्ठानज्ञानस्य प्रतिबिम्बाध्यासानिवर्तकत्वप्रसङ्गः, तन्मूलाज्ञाननिवर्तकत्वाभावादिति वाच्यम्, विरोधाभावात् । ब्रह्मज्ञानानिवर्तकत्वेऽपि तदुपादानक-

यदि शङ्का हो कि प्रतिबिम्बाध्यासके प्रति मूलाज्ञान उपादान माना जायगा, तो घटादिके समान वे भी व्यावहारिक होंगे, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि व्यावहारिकत्वके प्रति केवल अविद्या ही कारण होती है, और यहांपर अविद्यासे अतिरिक्त बिम्ब और उपाधिके सान्निध्य आदि दोषोंका भी कारणत्वरूपसे अवस्थान होनेसे व्यावहारिकत्वकी आपत्ति नहीं हो सकती है, किन्तु प्रातिभासिकत्वकी ही उपपत्ति हो सकती है ।

यदि पुनः शङ्का हो कि प्रतिबिम्बाध्यास मूलाज्ञानका कार्य होगा, तो बिम्ब और उपाधिके सान्निध्यकी निवृत्तिसे युक्त अधिष्ठानसाक्षात्कार भी प्रतिबिम्बाध्यासका निवर्तक नहीं हो सकेगा, क्योंकि शुक्तिरजत आदि स्थलमें केवल अधिष्ठानका साक्षात्कार ही निवर्तक देखा गया है, अतः उक्त सान्निध्यनिवृत्तिसहकृत अधिष्ठानसाक्षात्कार मूलाज्ञानका निवर्तक नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि विरोधके न होनेसे * अधिष्ठानसाक्षात्कार ब्रह्मज्ञानका निवर्तक न होनेपर भी ब्रह्मज्ञान ( मूलाज्ञान ) है उपादान


* ज्ञान और अज्ञानका वहींपर ही विरोध होता है, जहाँपर वे दोनों समानविषयक हों, इसीसे पटाज्ञानकी घटज्ञानसे निवृत्ति नहीं होती है । प्रकृतमें मूलाज्ञान ब्रह्मविषयक है, और प्रतिबिम्बाध्यासका अधिष्ठानसाक्षात्कार दर्पणावच्छिन्न चैतन्यविषयक है, अतः उनका समानविषयकत्वरूप विरोधका प्रयोजक न होनेसे विरोध नहीं है, अतः यदि उक्त अधिष्ठानके ज्ञानको ब्रह्मज्ञानका निवर्तक न माना जाय, तो भी ग्रन्थोक्तरीतिसे अधिष्ठानज्ञानमें अध्यासके निवर्तकत्वकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है ।

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प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३३९


प्रतिबिम्बाध्यासविरोधिविषयकतायाऽधिष्ठानयाथात्म्यज्ञानस्य प्रतिबन्धकविरहसचिवस्य तन्निवर्तकत्वोपपत्तेः । अवस्थाऽज्ञानोपादानत्वपक्षेऽपि तस्य प्राचीनाधिष्ठानज्ञाननिवर्तितावरणशक्तिकस्य समानविषयत्वभङ्गेन प्रतिबन्धकाभावकालीनाधिष्ठानज्ञानेन निवर्तयितुमशक्यतया प्रतिबिम्बाध्यासमात्रस्यैव तन्निवर्त्यत्वस्योपेयत्वात् । अथवा स्त्रोपादानाज्ञाननिवर्तकब्रह्मज्ञान-


जिसका, ऐसे प्रतिबिम्बाध्यासके प्रति विरोधिविषयक होनेसे—'दर्पणमें मुख नहीं है, इत्यादिरूप अधिष्ठानयथार्थज्ञानके अभावविषयक होनेसे—प्रतिबन्धक ( उक्त सन्निधान ) की निवृत्तिसहकृत अधिष्ठानयथार्थज्ञान मूलाज्ञानका निवर्तक हो सकता है । जो लोग अवस्थारूप अज्ञानको प्रतिबिम्बाध्यासका उपादान मानते हैं, उनके पक्षमें भी * अवस्थारूप अज्ञानके, जिसकी कि आवरणशक्ति 'दर्पणमें मुख नहीं है' इस प्रकारके प्रतिबिम्बाध्यासके प्राक्तन अधिष्ठानसाक्षात्कारसे निवृत्त हो गई है, † समानविषयत्वका भङ्ग होनेसे बिम्ब और उपाधिकी सन्निधिरूप प्रतिबन्धकके अभावकालीन अधिष्ठानज्ञानसे उस अवस्थारूप अज्ञानकी निवृत्ति नहीं कर सकते हैं, अतः प्रतिबिम्बाध्यासमात्र ही अधिष्ठानसाक्षात्कारसे निवृत्त होता है, ऐसा माना गया है। ‡ अथवा प्रतिबिम्बाध्यासके प्रति उपादानभूत अज्ञानके निवर्तक ब्रह्मज्ञानसे


* जिस पक्षमें प्रतिबिम्बाध्यासको अवस्थारूप अज्ञानसे जन्य मानते हैं, उस पक्षमें भी बिम्ब और उपाधिके सान्निध्यकी निवृत्तिसे युक्त अधिष्ठानसाक्षात्कार ही उस अध्यासके उपादानका ( अज्ञानका ) निवर्तक होता है, यह मानना होगा, इसीसे ज्ञान अज्ञानका ही निवर्तक है और अज्ञानका कार्य तो उपादानकी निवृत्तिसे निवृत्त होता है, इस प्रकारका पञ्चपादिकाकारका वचन सार्थक होता है, इस प्रकार आशङ्का करके अवस्थारूप अज्ञानके उपादानत्वपक्षसे प्रतिबिम्बाध्यासकी निवृत्तिका प्रकार बतलाते हैं, यह भाव है ।

† आवरणके विनष्ट होनेपर दर्पणाद्यवच्छिन्न चैतन्य अवस्थारूप अज्ञानका विषय नहीं हो सकता है, अतः अधिष्ठानज्ञान अवस्थारूप अज्ञानका समानविषयक नहीं होगा, इस परिस्थितिमें उनका परस्पर निवर्त्य-निवर्तकभाव नहीं हो सकता है, केवल प्रतिबिम्बाध्यासमात्रकी ही निवृत्ति ज्ञान करता है, यह अवस्थारूप अज्ञानके प्रतिबिम्बाध्यासोपादानत्वपक्षमें मानना होगा, यह भाव है।

‡ उक्त पक्षके अनुसार निवर्त्यनिवर्तकभावकी उपपत्ति करनेपर भी 'ज्ञान अज्ञानका ही निवर्तक है, इस पञ्चपादिकाकारके वचनके साथ अविरोध नहीं होता है, अतः 'अथवा' पक्ष है ।

३४० : सिद्धान्तलेशसंग्रहं [ द्वितीय परिच्छेद

निवर्त्य एवायमध्यासोऽस्तु । व्यावहारिकत्वापत्तिस्तु अविद्यातिरिक्तदोष- जन्यत्वेन प्रत्युक्तेत्याहुः ॥ ४ ॥

सुषुप्त्याख्यं तमोऽज्ञानं तद्बीजं स्वप्नबोधयोः ।
इत्याचार्योक्तिः स्वाप्नाध्यासोऽप्येवं प्रतीयताम् ॥ २७ ॥

जो सुषुप्तिनामक अज्ञानरूप अंधकार है वह स्वप्न और जागरणका कारण है ऐसा आचार्योंका वचन है, अतएव स्वाप्न अध्यासको भी प्रातिभासिक ही समझना चाहिये ॥ २७ ॥

एवं स्वाप्नाध्यासस्याऽप्यनवच्छिन्नचैतन्ये अहङ्कारोपहितचैतन्ये वाऽवस्था- रूपाज्ञानशून्येऽध्यासात् ।
'सुषुप्त्याख्यं तमोऽज्ञानं यद् बीजं स्वप्नबोधयोः' ।
इति आचार्याणां स्वप्नजाग्रत्प्रपञ्चयोरेकाज्ञानकार्यत्वोक्तेश्च मूलाज्ञानकार्यतया स्वोपादाननिवर्तकब्रह्मज्ञानैकबाध्यस्य अविद्याऽतिरिक्तनिद्रादिदोषजन्यतयैव प्रातिभासिकत्वमिति केचिदाहुः ।

जाग्रत्प्रबोधबाध्यत्वमन्ये स्वप्नस्य मन्वते ।
दण्डभ्रान्तेरहिभ्रान्त्या दृढयेवात्र बाधनम् ॥ २८ ॥

और लोग मानते हैं कि जैसे दृढ सर्पभ्रम से दण्डभ्रम का बाध होता है, वैसे ही स्वाप्न अध्यास का जाग्रत्-ज्ञान से बाध होता है ॥ २८ ॥


ही इस अध्यासकी निवृत्ति होती है, और इसे व्यावहारिक तो इसलिए नहीं मान सकते हैं कि यह अविद्यासे अतिरिक्त दोषसे जन्य है ॥ ४ ॥

पूर्वोक्त न्यायके अनुसार स्वप्नाध्यास भी मूलाविद्याका कार्य है, क्योंकि अहङ्कार आदिसे अनवच्छिन्न अथवा अहङ्कारसे अवच्छिन्न चैतन्यमें, जो अवस्थारूप अज्ञानसे शून्य है, अध्यास होता है और जो सुषुप्तिरूप अज्ञानाख्य अन्धकार है, वह जाग्रत् और सुषुप्तिका कारण है, इस प्रकार आचार्योंने जाग्रत् और स्वप्नप्रपञ्चको एक ही अज्ञानका कार्य कहा है, अतः अपने उपादान मूलाविद्याके निवर्तक ब्रह्मज्ञानसे ही उसकी निवृत्ति होती है और वह अविद्यातिरिक्त निद्रा आदि दोषसे जन्य है, अतः प्रातिभासिक है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ।

स्वाप्न पदार्थोंके अधिष्ठानका विचार] भाषानुवादसहित ३४१

अन्ये तु 'बाध्यन्ते चैते रथादयः स्वप्नदृष्टाः प्रबोधे' इति भाष्योक्तेः, 'अविद्यात्मकबन्धप्रत्यनीकत्वाद् जाग्रद्बोधवद्' इति विवरणदर्शनाद्, उत्थितस्य स्वप्नमिथ्यात्वानुभवाच्च जाग्रद्बोधस्स्वप्नाध्यासनिवर्तक इति ब्रह्मज्ञानेतरज्ञानबाध्यतयैव तस्य प्रातिभासिकत्वम् । न चाधिष्ठानयाथात्म्यागोचरं स्वोपादानाज्ञाननिवर्तकं ज्ञानं कथमध्यासनिवर्तकं स्यादिति वाच्यम्, रज्जुसर्पाध्यासस्य स्वोपादानाज्ञाननिवर्तकाधिष्ठानयाथात्म्यज्ञानेनेव तत्रैव स्वानन्तरोत्पन्नदण्डभ्रमेणापि निवृत्तिदर्शनादित्याहुः ।

जाग्रत्प्रपञ्चमावृत्य जीवं निद्रा तमोमयी ।
स्वाप्नमाविष्करोत्यर्थं बोध्यं प्राग्जीवबोधतः ॥ २९ ॥

जाग्रत्कालीन प्रपञ्च और जीवको आवृत करके अन्धकाररूप निद्रा जबतक कि जीवको ज्ञान नहीं होता तबतक प्रातिभासिक स्वप्नप्रपञ्चकी उत्पत्ति करती है ॥ २९ ॥

❊ कुछ लोग कहते हैं कि स्वप्नाध्यास जाग्रत्कालीन ज्ञानसे निवृत्त होता है, अतः ब्रह्मज्ञानसे इतर ज्ञानसे निवर्त्य होनेके कारण ही वह प्रातिभासिक है, क्योंकि स्वप्नमें दीखनेवाले रथ आदिकी जाग्रत्कालीन ज्ञानसे निवृत्ति होती है, इस प्रकारकी भाष्योक्ति है तथा अविद्यात्मक अर्थात् अविद्याकार्य होनेसे अविद्यारूप प्रपञ्चके जाग्रत्कालीन ज्ञानके समान निवर्तक होनेसे, इस प्रकारका विवरण ग्रन्थ है और सुषुप्तिसे उठनेके बाद स्वप्नमें मिथ्यात्वका अनुभव है, अतः स्वप्नाध्यासकी जाग्रत्कालीन बोधसे ही निवृत्ति होती है, अतः ब्रह्मज्ञानेतर ज्ञानसे बाध्य होनेसे ही स्वप्नप्रपञ्च प्रातिभासिक है । यदि शङ्का हो कि अधिष्ठानके यथार्थ स्वरूपका अवगाहन न करनेवाला और स्वप्नोपादान मूलाऽज्ञानको निवृत्त न करनेवाला जाग्रत्कालीन ज्ञान स्वप्नाध्यासका निवर्तक नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे रज्जुमें उत्पन्न हुए सर्पाध्यासकी उसके उपादानभूत रज्जुके अज्ञानकी निवृत्ति करनेवाले अधिष्ठानयथार्थज्ञानसे निवृत्ति होती है, वैसे ही उसी रज्जुमें बादको उत्पन्न हुए दण्डके भ्रमसे भी सर्पाध्यासकी निवृत्ति देखी जाती है, इसी प्रकार प्रकृतमें अधिष्ठानके याथात्म्यका अवगाहन न करे तो भी जाग्रद्बोध स्वप्नाध्यासकी निवृत्ति कर सकता है ।


* अविद्यातिरिक्तदोषजन्यत्व ही प्रातिभासिकत्वप्रयोजक है, इस मतके अनुसार निद्रा आदि दोषजन्यत्व ही स्वप्नप्रपञ्चमें प्रातिभासिकत्व है, इसका उपपादन किया गया। अब

३४२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद .

अपरे तु जाग्रद्भोगप्रदकर्मोपरमे सति जाग्रत्प्रपञ्चद्रष्टारं प्रतिबिम्बरूपं व्यावहारिकं जीवं तद्दृश्यं जाग्रत्प्रपञ्चमप्यावृत्य जायमानो निद्रारूपो मूलाज्ञानस्यावस्थाभेदः स्वाप्नप्रपञ्चाध्यासोपादानम्, न मूलज्ञानम् । न च निद्राया अवस्थाज्ञानरूपत्वे मानाभावः । मूलाज्ञानेनावृतस्य जाग्रत्प्रपञ्चद्रष्टुः व्यावहारिकजीवस्य 'मनुष्योऽहम्, ब्राह्मणोऽहम्, देवदत्तपुत्रोऽहम्' इत्यादिना स्वात्मानमसन्दिग्धाविपर्यस्तमभिमन्यमानस्य तदीयचिरपरिचयेन तं प्रति सर्वदा अनावृतैकरूपस्याऽनुभूतस्वपितामहात्य-


† कोई लोग कहते हैं कि जाग्रत् भोगको देनेवाले कर्मके उपरत होनेपर जाग्रत् प्रपञ्चको देखनेवाले प्रतिबिम्बरूप व्यावहारिक जीव और उस जीवसे दीखनेवाले जाग्रत्प्रपञ्चको भी आवृत करके उत्पन्न होनेवाले मूलाज्ञानकी अवस्थारूप निद्रा-दोष स्वाप्नाध्यासका उपादान है, मूलाज्ञान उपादान नहीं है । यदि शङ्का हो कि निद्राके अवस्थारूप अज्ञान होनेमें प्रमाण नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यदि निद्राको अवस्थारूप अज्ञान न माना जायगा, तो मूलाज्ञानसे आवृत जाग्रत् प्रपञ्चको देखनेवाला व्यावहारिक जीव जो कि अपने आत्माके विषयमें 'मैं मनुष्य हूँ, मैं ब्राह्मण हूँ, मैं देवदत्तका पुत्र हूँ' इत्यादिरूपसे असन्दिग्ध और अविपर्यस्त अभिमान करता है, उसका और अपने दीर्घकालके परिचयसे ⁕ अपने प्रति सर्वदा अनावृत और एकरूपसे अनुभूत स्वकीय


व्यवहारकालमें जिसका बाध हो, वह प्रातिभासिक है, इस सिद्धान्तका अनुसरण करके स्वप्नप्रपञ्चमें प्रातिभासिकत्वका उपपादन करते हैं ।

† अधिष्ठानका यथार्थज्ञान अध्यासका निवर्तक है, ऐसा यदि नियम माना जाय, तो भी प्रकृतमें कोई हानि नहीं है, ऐसा मान कर 'अपरे तु' के पक्षका उत्थान है । इस मतमें व्यावहारिक जीव स्वप्नको देखनेवाले जीवका अधिष्ठान माना जाता है और व्यावहारिक जगत् स्वाप्नजगत्का अधिष्ठान माना जाता है, अनवच्छिन्न चैतन्य आदि नहीं, उक्त दो प्रकारके अधिष्ठानके आवरण द्वारा ही निद्रारूप अवस्थाऽज्ञान द्रष्टा और दृश्यात्मक प्रपञ्चका उपादान है, मूल अज्ञान नहीं, क्योंकि वह मूलाज्ञान केवल ब्रह्मचैतन्यका ही आवरक है, अतः व्यावहारिक जीवादिका आवरक नहीं हो सकता है । इसलिए व्यावहारिक जीव और जगद्विषयक ज्ञानसे, जो कि अधिष्ठानका यथार्थ ज्ञानात्मक है, स्वप्नाध्यासकी निवृत्ति होगी, यह भाव है ।

⁕ देवदत्तका पुत्र अपने पितामह आदिके मरणका अनुभव करके पीछे प्रतिमास या प्रतिवत्सर श्राद्ध, तर्पण आदि करता है, अतः उनके मरणविषयक अनुभव और स्मरणका पुनः पुनः अभ्यास ही चिरपरिचय है, इसलिए अपने पितामहके अत्यय आदिमें जरा भी सन्देह और भ्रम नहीं है, अतः एकरूपसे ही स्वकीय पितामहादिविनाशसे प्रपञ्चकी अनुवृत्ति होती है, यह भाव है।

स्वाप्न पदार्थोंके अधिष्ठानका-विचार] भाषानुवादसहित ३५३


यादिजाग्रत्प्रपञ्चवृत्तान्तस्य च स्वप्नसमये केनचिदावरणाभावे जागरण इव स्वप्नेऽपि 'व्याघ्रोऽहम्, शूद्रोऽहम्, यज्ञदत्तपुत्रोऽहम्' इत्यादिभ्रमस्य स्वपितामहजीवद्दशादिभ्रमस्य चाभावप्रसङ्गेन निद्राया एव तत्कालोत्पन्नव्यावहारिकजगज्जीवावारकाज्ञानावस्थाभेदरूपत्वसिद्धेः । न चैवं जीवस्याऽप्यावृतत्वात् स्वप्नप्रपञ्चस्य द्रष्टृभावप्रसङ्गः । स्वप्नप्रपञ्चेन सह द्रष्टृजीवस्यापि प्रातिभासिकाध्यासात् । एवं च पुनर्जाग्रद्भोगप्रदकर्मोद्भूते बोधे व्यावहारिकजीवस्वरूपज्ञानात् स्वोपादाननिद्रारूपाज्ञाननिवर्तकादेव स्वप्नप्रपञ्चबाधः । न चैवं तद्द्रष्टुः प्रातिभासिकजीवस्यापि ततो बाधे 'स्वप्ने करिणमन्वभूवम्' इत्यनुसन्धानं न स्यादिति वाच्यम् । व्यावहारिकजीवे प्रातिभासिकजीवस्याऽध्यस्ततया तदनुभवान्न व्यावहारिकजीवस्यानुसन्धानोपगमेऽप्यतिप्रसङ्गाभावादित्याहुः ।

पितामहके विनाश आदि जाग्रत्प्रपञ्चका स्वप्नकालमें किसी कारणसे आवरणका अभाव होनेपर जागरणके समान स्वप्नमें भी 'मैं ब्राह्मण हूँ, 'मैं शूद्र हूँ, 'मैं यज्ञदत्तका पुत्र हूँ' इत्यादि भ्रमका और स्वकीय पितामहके जीवनदशा आदि भ्रमका अभाव प्रसक्त हो जायगा, इसलिए निद्राको ही निद्राकालमें उत्पन्न व्यावहारिक जगत् और जीवको आवृत्त करनेवाली अज्ञानकी अवस्था मानना चाहिए। यदि फिर शङ्का हो कि जीव भी यदि उस कालमें आवृत्त होगा, तो स्वप्नप्रपञ्चका द्रष्टा नहीं होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि स्वप्नप्रपञ्चके साथ-साथ द्रष्टारूप जीव भी प्रातिभासिक उत्पन्न होता है। व्यावहारिक जीव और जगत्‌के स्वप्न जीव और जगत्‌के अधिष्ठान सिद्ध होनेपर फिर जाग्रत्कालीन भोगके देनेवाले कर्मसे उत्पन्न जागरण होनेपर 'मैं मनुष्य हूँ' इत्यादि रूपसे व्यावहारिक जीवके स्वरूप ज्ञानसे ही जो अपने उपादानभूत निद्रारूप अज्ञानका निवर्तक है, स्वाप्न प्रपञ्चका बाध होता है। यदि फिर शङ्का हो कि स्वाप्न प्रपञ्चके द्रष्टा प्रातिभासिक जीवका भी जागरणसे बाध होगा, तो 'स्वप्नमें हाथीका मैंने अनुभव किया था' इस प्रकारका स्मरण नहीं होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि व्यावहारिक जीवमें प्रातिभासिक जीवके अध्यस्त होनेके कारण प्रातिभासिक जीवके अनुभवसे व्यावहारिक जीवका अनुसन्धान माना जाय तो भी कोई हानि नहीं है।

३४४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

न्ववहङ्कृत्यवच्छिन्नेऽनवच्छिन्ने च नोचितः ।
स्वाप्नाध्यासोऽनहंभावाच्चक्षुराद्यनपेक्षणात् ॥ ३० ॥

अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्यमें तथा अहङ्कारानवच्छिन्न चैतन्यमें स्वाप्नाध्यास होना युक्त नहीं है, क्योंकि स्वाप्नपदार्थोंके साक्षीसे भिन्नदेशस्थ होनेसे साक्षात् तथा चक्षु आदिके उपरत होनेसे उनके द्वारा भी अहंवृत्ति नहीं हो सकती है ॥ ३० ॥

नन्यनवच्छिन्नचैतन्ये अहङ्कारोपहितचैतन्ये वा स्वाप्नप्रपञ्चाध्यास इति प्रागुक्तं पक्षद्वयमप्ययुक्तम् । आद्ये स्वप्नगजादेरहङ्कारोपहितसाक्षिणो विच्छिन्नदेशत्वेन सुखादिवदन्तःकरणवृत्तिसंसर्गमनपेक्ष्य तेन प्रकाशनस्य चक्षुरादीनामुपरततया वृत्त्युदयासम्भवेन तेन प्रकाशनस्य चाऽयोगात् । द्वितीये 'इदं रजतम्' इतिवत् 'अहं गजः' इति वा 'अहं सुखी' इतिवद् 'अहं गजवान्' इति वाऽध्यासप्रसङ्गात् ।

अत्र द्वितीय आचख्युः केचिद्देहान्तरेव तम् ।
स्वाप्नधीवृत्त्यभिव्यक्तशुद्धचैतन्यसंश्रयम् ॥ ३१ ॥

यहाँपर द्वितीय पक्षमें कोई लोग समाधान देते हैं कि देहके भीतर ही स्वाप्न पदार्थोंको विषय करनेवाली वृत्तिसे अभिव्यक्त शुद्ध चैतन्यमें स्वाप्न पदार्थोंका अध्यास होता है ॥ ३१ ॥

अब शङ्का होती है अनवच्छिन्न चैतन्यमें अथवा अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्यमें स्वाप्न प्रपञ्चका अध्यास होता है, ऐसा जो पक्षद्वय पूर्वमें कहा गया है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि अनवच्छिन्न चैतन्याधिष्ठानत्व-पक्षमें [ स्वप्नकालीन गज आदिको शरीरसे अन्य देशस्थत्व ही कहना होगा, इसमें यह विकल्प हो सकता है कि क्या उन स्वाप्न पदार्थोंका साक्षीसे भास होता है, या इन्द्रियोंसे ? प्रथम कल्प, तो युक्त नहीं है, क्योंकि ] स्वाप्न गज आदि पदार्थोंका अहङ्कारोपहित साक्षीरूप चैतन्यसे पृथक्देशस्थ होनेके कारण सुख आदिके समान अन्तःकरणकी वृत्तिकी अपेक्षा न करके उस साक्षीसे उन स्वाप्न पदार्थोंका अवभास नहीं हो सकता है; द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है, क्योंकि स्वप्न समयमें चक्षु आदिके उपरत होनेसे वृत्तिका सम्भव न होनेके कारण वृत्तिसंसर्गकी अपेक्षा करके भी साक्षीसे प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है । अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्यके स्वप्नाध्यासाधिष्ठानत्वपक्षमें 'इदं रजतम्' ( यह रजत है ) इस प्रकारका जैसे ज्ञान होता है, वैसे ही 'अहं गजः' ( मैं हाथी हूँ ) इस प्रकारका अथवा 'मैं सुखी हूँ' इस ज्ञानके समान मैं गजवान् हूँ' इस प्रकारका अध्यास प्रसक्त होगा ।

स्वाप्न पदार्थोंके अधिष्ठानका विचार] भाषानुवादसहित ३४५

अत्र केचिदाद्यपक्षं समर्थयन्ते—अहङ्कारानवच्छिन्नचैतन्यं न देहाद्वहिः स्वाप्नप्रपञ्चस्याऽधिष्ठानमुपेयते, किन्तु तदन्तरेव। अत एव दृश्यमानपरिमाणोचितदेशसम्पत्त्यभावात् स्वाप्नगजादीनां मायामयत्वमुच्यते। एवं चाऽन्तःकरणस्य देहाद्वहिरस्वातन्त्र्याज्जागरणे बाह्यशुक्तीदमंशादिगोचरवृत्त्युत्पादाय चक्षुराद्यपेक्षायामपि देहान्तरन्तःकरणस्य स्वतन्त्रस्य स्वयमेव वृत्तिसम्भवाद्देहान्तरन्तःकरणवृत्त्यभिव्यक्तस्याऽनवच्छिन्नचैतन्यस्याऽधिष्ठानत्वे न काचिदनुपपत्तिः। अत एत यथा जागरणे सम्प्रयोगजन्यवृत्त्यभिव्यक्तशुक्तीदमंशावच्छिन्नचैतन्यस्थिताऽविद्या रूप्याकारेण विवर्तते, तथा स्वप्नेऽपि देहस्याऽन्तरन्तःकरणवृत्तौ निद्रादिदोषोपहितायामभिव्यक्तचैतन्यस्थाविद्या अदृष्टोद्बोधितनानाविषयसंस्कारसहिता प्रपञ्चाकारेण विवर्ततामिति विवरणोपन्यासे भारतीतीर्थवचनमिति।

यहांपर कुछ लोग प्रथम पक्षका ही समर्थन करते हैं—अहङ्कारादिसे अनवच्छिन्न चैतन्य देहसे बाहर स्वाप्न प्रपञ्चका अधिष्ठान नहीं होता है, किन्तु देहके भीतर ही अधिष्ठान होता है। इसीसे अर्थात् आन्तर चैतन्यके अधिष्ठान होनेसे ही दृश्यमान परिमाणसे युक्त हाथी आदिका शरीरके भीतर उचित स्थान न होनेके कारण उनको सूत्रकार बादरायणने प्रातिभासिक कहा है। इस युक्तिके अनुसार आन्तर चैतन्यके स्वाप्नाध्यासाधिष्ठानत्वकी सिद्धि होनेपर यद्यपि देहके बाहर अन्तःकरण स्वतन्त्र नहीं है, अतः जाग्रत् अवस्थामें बाह्य शुक्तिके इदमंशाकारवृत्तिको उत्पन्न करनेके लिए वह चक्षुकी अपेक्षा करता है, तथापि देहके अवान्तर प्रदेशमें अन्तःकरणकी स्वतन्त्रता होनेके कारण चक्षु आदिकी अपेक्षा न करके ही उसकी स्वतः वृत्ति हो सकती है, अतः देहके भीतर अन्तःकरणकी वृत्तिसे अभिव्यक्त अनवच्छिन्न चैतन्यको अधिष्ठान माननेपर भी कोई विरोध नहीं है। इसीसे—'जैसे जाग्रत् अवस्थामें सम्प्रयोगजन्य (इन्द्रियके सम्बन्धसे उत्पन्न) वृत्तिसे अभिव्यक्त शुक्तिके इदमंशसे अवच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाली अविद्या रजताकारसे परिणत होती है, वैसे ही स्वप्नमें भी निद्रा, पित्तोद्रेक आदि दोषोंसे उपहित देहके अवान्तर भागमें अन्तःकरणकी वृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्यमें रहनेवाली अविद्या, जो कि अदृष्टविशेषसे उद्बोधित अनेक विषयोंके संस्कारसे युक्त है, विचित्र प्रपञ्चके आकारमें परिणत होती है—इस प्रकारका विवरणोपन्यासमें भारतीतीर्थमुनिका वचन भी है।

४४

३४६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

अन्येऽनहमवच्छिन्नाविद्याविम्विताचिद्गतम् ।
तद्भास्यं तदधिष्ठानवृत्त्या मातरि तत्प्रथाम् ॥ ३२ ॥

अहङ्कारसे अवच्छिन्न अविद्यामें प्रतिबिम्बित चैतन्यमें ही स्वाप्नाध्यास होता है और उसीसे उसका प्रकाश होता है, प्रमातामें स्वप्नका प्रकाश, तो अधिष्ठानविषयक अन्तःकरणवृत्तिकृत अभेदाभिव्यक्तिसे होता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥३२॥

अन्ये त्वनवच्छिन्नचैतन्यं न वृत्त्यभिव्यक्तं सत् स्वाप्नप्रपञ्चस्याऽधिष्ठानम्, अशब्दमूलकानवच्छिन्नचैतन्यगोचरवृत्त्युदयासम्भवाद् अहङ्काराद्यवच्छिन्नचैतन्य एवाऽहमाकारवृत्त्युदयदर्शनात् । तस्मात् स्वतोऽपरोक्षमहङ्काराद्यनवच्छिन्नचैतन्यं तदधिष्ठानम् ।

अत एव संक्षेपशारीरके—( सं० शा० अ० १ श्लो० ४१ )
‘अपरोक्षरूपविषयभ्रमधीरपरोक्षमास्पदमपेक्ष्य भवेत् ।
मनसा स्वतो नयनतो यदि वा स्वपनभ्रमादिषु तथा प्रथितेः’ ॥
इति श्लोकेनाऽपरोक्षाध्यासापेक्षितमधिष्ठानापरोक्ष्यं क्वचित् स्वतः,


कुछ लोग कहते हैं कि अनवच्छिन्न चैतन्य वृत्तिद्वारा अभिव्यक्त होकर स्वाप्न प्रपञ्चका अधिष्ठान नहीं होता है, क्योंकि शास्त्रसे अतिरिक्त प्रमाणसे जन्य अनवच्छिन्नचैतन्यविषयक वृत्तिकी उत्पत्ति हो ही नहीं सकती है, क्योंकि अहङ्कार, शरीर आदिसे अवच्छिन्न चैतन्यविषयक ही अहमाकार वृत्तिकी उत्पत्ति देखी जाती है । इससे स्वतः अर्थात् वृत्तिके बिना अभिव्यक्त अपरोक्ष चैतन्य ही स्वाप्न प्रपञ्चका अधिष्ठान है ।

स्वतः अपरोक्ष चैतन्यको स्वप्नाध्यासका अधिष्ठान स्वीकार करनेसे ही संक्षेपशारीरकमें—

‘अपरोक्ष०’ ( अपरोक्षरूप जो शुक्तिरजतादिविषयक भ्रमरूप बुद्धि है, अथवा अपरोक्ष रूप जो शुक्ति रजतादि, तद् विषयक भ्रमरूप जो बुद्धि है, वह अपरोक्ष अधिष्ठानकी अपेक्षा रखकर होती है, और यह अधिष्ठानापरोक्ष्य मनसे, स्वतः अथवा चक्षुसे होता है, क्योंकि स्वप्नभ्रममें अन्वय-व्यतिरेकसे वैसा ही देखा जाता है ) इस श्लोकसे अपरोक्षाध्यासके लिए अपेक्षित अधिष्ठानका आप-

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स्वाप्न पदार्थोंके अधिष्ठानका विचार] भाषानुवाद सहित ३४७


क्वचिन्मानसवृत्त्या, क्वचिद् बहिरिन्द्रियवृत्त्येत्यभिधाय,

‘स्वतोऽपरोक्षा चितिरत्र विश्रमस्तथाऽपि रूपाकृतिरेव जायते ।
मनोनिमित्तं स्वपने मुहुर्मुहुर्विनाऽपि चक्षुर्विषयं स्वमास्पदम् ॥
मनोऽवगम्येऽप्यपरोक्षतावलात्तथाऽम्बरे रूपमुपोल्लिखन् भ्रमः ।
सितादिभेदैर्बहुधा समीक्ष्यते तथाऽक्षिगम्ये रजतादिविभ्रमे ॥’

इत्याद्यनन्तरश्लोकेन स्वप्नाध्यासे स्वतोऽधिष्ठानापरोक्ष्यमुदाहृतम् । न चाहङ्कारानवच्छिन्नचैतन्यमात्रमावृतमिति वृत्तिमन्तरेण न तदभिव्यक्तिरिति वाच्यम्, ब्रह्मचैतन्यमेवावृतमविद्याप्रतिविम्वजीवचैतन्यमहङ्कारानवच्छिन्नमप्यनावृतमित्युपगमात् । एवं चाहङ्कारानवच्छिन्नचैतन्येऽध्यस्यमाने स्वाप्नगजादौ तत्समनियताधिष्ठानगोचरान्तःकरणादिवृत्तिकुता-

रोक्ष्य * कहीं स्वतः, कहीं मानसवृत्तिसे कहीं बहिरिन्द्रियजन्य वृत्तिसे उत्पन्न होता है, ऐसा कह कर ‘स्वतोऽपरोक्षा ०’ (यद्यपि स्वप्नाध्यासरूप भ्रमका स्वतः अपरोक्ष चैतन्य ही अधिष्ठान है, तथापि उस चैतन्यमें मनोगत बुद्धिवासनाके प्रभावसे चक्षुर्ग्राह्य बाह्य रूपादि आलम्बनके बिना अनेक विषयाकारोंसे युक्त वह भ्रम बार-बार उत्पन्न होता है, वैसे मनोगम्य आकाशमें अपरोक्षताके वलसे अपरोक्ष चिदात्माके साथ अभेदाभिव्यक्तिसे—रूपोल्लेखी विभ्रम होता है, वैसे ही चक्षुसे दिखनेवाले रजतादिविभ्रममें श्वेत आदि अनेक प्रकार देखे जाते हैं ।) इत्यादि अनन्तरके श्लोकोंसे स्वप्नाध्यासमें अधिष्ठानका आपरोक्ष्य ( प्रत्यक्ष ) स्वतः ही दिखलाया है । यदि शङ्का हो कि अहङ्कारानवच्छिन्न चैतन्यमात्र तो आवृत है, अतः वृत्तिके विना उसकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ब्रह्मचैतन्य ही आवृत्त है, और अविद्यामें प्रतिविम्बित अहङ्कारसे अनवच्छिन्न भी जीवचैतन्य अनावृत है, ऐसा स्वीकार किया गया है, इस अवस्थामें अर्थात् स्वतः अपरोक्ष जीवचैतन्यके अधिष्ठान होनेपर अहङ्कारानवच्छिन्न चैतन्यमें अध्यस्यमान स्वप्नके गज आदि प्रपञ्चमें स्वाप्न प्रपञ्चके समनियत † अधिष्ठानविषयक अन्तःकरण आदिकी वृत्तियोंसे सम्पादित


* शुक्ति-रजत स्थलमें नयनसन्निकर्षसे अधिष्ठानका आपरोक्ष्य है, गगननीलत्वके अध्यासमें मनसे अधिष्ठानापरोक्ष्य है और स्वाप्नाध्यासमें स्वतः अधिष्ठानका आपरोक्ष्य है, यह भाव है ।
† जब गज आदिका अध्यास होता है, तब अधिष्ठानविषयक अन्तःकरणकी अविद्यावृत्ति उत्पन्न होती ही है, इसलिए स्वाप्न प्रपञ्चके अधिष्ठानभूत चैतन्यके साथ वृत्तियुक्त अन्तःकरणके

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३४८सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ द्वितीय परिच्छेद

भेदाभिव्यक्त्या प्रमातृचैतन्यस्याऽपि 'इदं पश्यामि' इति व्यवहार इत्याहुः।
आद्येऽहङ्कृत्युपहितचिदाभासास्पदं परे।
अहन्ताधीप्रसक्तिस्तु नाहङ्काराविशेषणात् ॥ ३३ ॥

अहङ्कारसे उपहित चैतन्याभास स्वप्नका अधिष्ठान है, अतः आद्यपक्षमें—अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्याधिष्ठानत्वपक्षमें—अहङ्कारका विशेषण रूपसे प्रवेश न होनेके कारण 'अहं गजः' इत्यादि प्रतीति नहीं होती है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ ३३ ॥

अपरे तु द्वितीयं पक्षं समर्थयन्ते—अहङ्कारावच्छिन्नचैतन्यमधिष्ठानमित्यहङ्कारस्य विशेषणभावेनाऽधिष्ठानकोटिप्रवेशो नोपेयते, किं त्वहङ्कारोपहितं तत्प्रतिविम्बरूपचैतन्यमात्रमधिष्ठानमिति, अतो न'अहं गजः' इत्याद्यनुभवप्रसङ्ग इति।
इदंवृत्तिचिदाभासे इत्थं रजतकल्पनात् ।
नाहं रजतमस्तीत्तदनन्यनरवेद्यता ॥ ३४ ॥

इसी प्रकार इदमाकार वृत्तिसे उपहित चिदाभासमें रजतकी कल्पना होनेसे 'अहं रजतम्' ऐसी प्रतीति नहीं होती है और अन्य पुरुष वेद्यता भी नहीं है ॥ ३४ ॥

एवं शुक्तिरजतमपि शुक्तीदमंशावच्छिन्नचैतन्यप्रतिबिम्बे वृत्तिमदन्तःकरणगतेऽध्यस्यते। शुक्तीदमंशावच्छिन्नबिम्बचैतन्ये सर्वसाधारणे तस्या-


अभेदाभिव्यक्तिसे प्रमातृचैतन्यमें भी 'मैं यह देखता हूँ' इस प्रकार व्यवहार देखा जाता है।

कुछ लोग तो द्वितीय पक्षका—अहङ्कारसे अवच्छिन्न चैतन्य स्वप्नाध्यासका अधिष्ठान है, इसीका—समर्थन करते हैं—अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्य अधिष्ठान है, इससे अहङ्कारका अधिष्ठानकोटिमें विशेषणरूपसे प्रवेश नहीं करते हैं, किन्तु अहङ्कारसे उपहित अहङ्कारमें प्रतिबिम्बित चैतन्य ही अधिष्ठान होता है, ऐसा अङ्गीकार करते हैं, इसलिए 'अहं गजः' (मैं हाथी हूँ) ऐसा अनुभव नहीं होता है।

इसी प्रकार शुक्तिरजत भी शुक्तिके इदमंशावच्छिन्न चैतन्यके वृत्ति युक्त अन्तःकरणमें पड़े हुए प्रतिबिम्बमें अध्यस्त होता है, शुक्तीदमंशावच्छिन्न बिम्ब


सम्बन्ध होनेपर प्रमातृत्वकी प्राप्ति होनेपर प्रमातामें स्वप्नद्रष्टृत्वकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है।

स्वाप्न पदार्थोंके अनुभवप्रकारका विचार] भाषानुवादसहित ३४९


ध्यासे सुखादिवदनन्यवेद्यत्वाभावप्रसङ्गादिति केचित् ।

अन्ये तु बिम्बचैतन्ये रजताध्यासवादिनः ।
प्राहुस्तत्तदविद्योत्थन्तत्तत्पुरुषगोचरम् ॥ ३५ ॥

कुछ लोगोंका कहना है कि बिम्बचैतन्यमें रजतका अध्यास होता है और तत्-तत् पुरुषोंके अज्ञानसे उत्पन्न तत्-तत् रजतका तत्-तत् पुरुषाणोंको प्रत्यक्ष होता है ॥ ३५ ॥

केचित्तु बिम्बचैतन्य एव तदध्यासमभ्युपेत्य 'यदीयाज्ञानोपादानकं यत्, तत्तस्यैव प्रत्यक्षम्, न जीवान्तरस्य इत्यनन्यवेद्यत्वमुपपादयन्ति ॥५॥

नन्वस्तु रजताध्यासे कथञ्चिच्चाक्षुषत्वधीः ।
कथं स्वप्नगजज्ञाने तस्याः साधु समर्थनम् ॥ ३६ ॥

अत्र शङ्का होती है कि यद्यपि रजताध्यासमें कथञ्चित् चाक्षुषत्वका उपपादन हो सकता है, तथापि स्वाप्नगजादिज्ञानमें चाक्षुषत्वका समर्थन कैसे कर सकते है ? ॥ ३६ ॥

ननु शुक्तिरजताध्यासे चाक्षुषत्वानुभवः साक्षाद्वाऽधिष्ठानज्ञानद्वारा तदपेक्षणाद्वा समर्थ्यते । स्वाप्नगजादिचाक्षुषत्वानुभवः कथं समर्थनीयः ।

चैतन्यमें, जो सर्वसाधारण है, उसका अध्यास माना जायगा, तो सुखादिके समान अनन्यवेद्यत्वके अभावका प्रसङ्ग होगा, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ।

कुछ लोग तो बिम्बचैतन्यमें ही रजतादिका अध्यास होता है, ऐसा मान कर जिसके अज्ञानरूप उपादानसे जिसकी उत्पत्ति हुई हो, वह उसी जीवको प्रत्यक्ष होता है, जीवान्तरको नहीं, इस प्रकार अनन्यवेद्यत्वका उपपादन करते हैं ॥ ५ ॥

अत्र शङ्का होती है कि शुक्तिमें रजतका जो अध्यास होता है, उसमें चक्षुरिन्द्रियग्राह्यत्वका जो अनुभव होता है, वह साक्षात् अथवा अधिष्ठानके ज्ञानद्वारा चक्षुकी अपेक्षा होनेसे होता है । [स्वप्नप्रपञ्चके अधिष्ठानका निरूपण करके स्वाप्न पदार्थोंके अनुभवका उपपादन करनेके लिए इस ग्रन्थका उपक्रम है। शुक्तिरजतका अनुभव इन्द्रियसे होता है, इस प्रकारके पूर्वमें उक्त कवितार्किक मतके अनुसार 'साक्षात्' कहा गया है । और जिस मतमें शुक्तिरजत आदि भ्रान्त पदार्थ साक्षिभास्य हैं, उस मतसे 'अधिष्ठानज्ञानद्वारा' इत्यादि ग्रन्थका कथन है, क्योंकि इस मतमें भी धर्मिज्ञानद्वारा


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