भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 590 में से

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पृष्ठ 371

स्वाप्न पदार्थोंके अधिष्ठानका विचार] भाषानुवादसहित ३४१

अन्ये तु 'बाध्यन्ते चैते रथादयः स्वप्नदृष्टाः प्रबोधे' इति भाष्योक्तेः, 'अविद्यात्मकबन्धप्रत्यनीकत्वाद् जाग्रद्बोधवद्' इति विवरणदर्शनाद्, उत्थितस्य स्वप्नमिथ्यात्वानुभवाच्च जाग्रद्बोधस्स्वप्नाध्यासनिवर्तक इति ब्रह्मज्ञानेतरज्ञानबाध्यतयैव तस्य प्रातिभासिकत्वम् । न चाधिष्ठानयाथात्म्यागोचरं स्वोपादानाज्ञाननिवर्तकं ज्ञानं कथमध्यासनिवर्तकं स्यादिति वाच्यम्, रज्जुसर्पाध्यासस्य स्वोपादानाज्ञाननिवर्तकाधिष्ठानयाथात्म्यज्ञानेनेव तत्रैव स्वानन्तरोत्पन्नदण्डभ्रमेणापि निवृत्तिदर्शनादित्याहुः ।

जाग्रत्प्रपञ्चमावृत्य जीवं निद्रा तमोमयी ।
स्वाप्नमाविष्करोत्यर्थं बोध्यं प्राग्जीवबोधतः ॥ २९ ॥

जाग्रत्कालीन प्रपञ्च और जीवको आवृत करके अन्धकाररूप निद्रा जबतक कि जीवको ज्ञान नहीं होता तबतक प्रातिभासिक स्वप्नप्रपञ्चकी उत्पत्ति करती है ॥ २९ ॥

❊ कुछ लोग कहते हैं कि स्वप्नाध्यास जाग्रत्कालीन ज्ञानसे निवृत्त होता है, अतः ब्रह्मज्ञानसे इतर ज्ञानसे निवर्त्य होनेके कारण ही वह प्रातिभासिक है, क्योंकि स्वप्नमें दीखनेवाले रथ आदिकी जाग्रत्कालीन ज्ञानसे निवृत्ति होती है, इस प्रकारकी भाष्योक्ति है तथा अविद्यात्मक अर्थात् अविद्याकार्य होनेसे अविद्यारूप प्रपञ्चके जाग्रत्कालीन ज्ञानके समान निवर्तक होनेसे, इस प्रकारका विवरण ग्रन्थ है और सुषुप्तिसे उठनेके बाद स्वप्नमें मिथ्यात्वका अनुभव है, अतः स्वप्नाध्यासकी जाग्रत्कालीन बोधसे ही निवृत्ति होती है, अतः ब्रह्मज्ञानेतर ज्ञानसे बाध्य होनेसे ही स्वप्नप्रपञ्च प्रातिभासिक है । यदि शङ्का हो कि अधिष्ठानके यथार्थ स्वरूपका अवगाहन न करनेवाला और स्वप्नोपादान मूलाऽज्ञानको निवृत्त न करनेवाला जाग्रत्कालीन ज्ञान स्वप्नाध्यासका निवर्तक नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे रज्जुमें उत्पन्न हुए सर्पाध्यासकी उसके उपादानभूत रज्जुके अज्ञानकी निवृत्ति करनेवाले अधिष्ठानयथार्थज्ञानसे निवृत्ति होती है, वैसे ही उसी रज्जुमें बादको उत्पन्न हुए दण्डके भ्रमसे भी सर्पाध्यासकी निवृत्ति देखी जाती है, इसी प्रकार प्रकृतमें अधिष्ठानके याथात्म्यका अवगाहन न करे तो भी जाग्रद्बोध स्वप्नाध्यासकी निवृत्ति कर सकता है ।


* अविद्यातिरिक्तदोषजन्यत्व ही प्रातिभासिकत्वप्रयोजक है, इस मतके अनुसार निद्रा आदि दोषजन्यत्व ही स्वप्नप्रपञ्चमें प्रातिभासिकत्व है, इसका उपपादन किया गया। अब