सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 372, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३४२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद . |
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अपरे तु जाग्रद्भोगप्रदकर्मोपरमे सति जाग्रत्प्रपञ्चद्रष्टारं प्रतिबिम्बरूपं व्यावहारिकं जीवं तद्दृश्यं जाग्रत्प्रपञ्चमप्यावृत्य जायमानो निद्रारूपो मूलाज्ञानस्यावस्थाभेदः स्वाप्नप्रपञ्चाध्यासोपादानम्, न मूलज्ञानम् । न च निद्राया अवस्थाज्ञानरूपत्वे मानाभावः । मूलाज्ञानेनावृतस्य जाग्रत्प्रपञ्चद्रष्टुः व्यावहारिकजीवस्य 'मनुष्योऽहम्, ब्राह्मणोऽहम्, देवदत्तपुत्रोऽहम्' इत्यादिना स्वात्मानमसन्दिग्धाविपर्यस्तमभिमन्यमानस्य तदीयचिरपरिचयेन तं प्रति सर्वदा अनावृतैकरूपस्याऽनुभूतस्वपितामहात्य-
† कोई लोग कहते हैं कि जाग्रत् भोगको देनेवाले कर्मके उपरत होनेपर जाग्रत् प्रपञ्चको देखनेवाले प्रतिबिम्बरूप व्यावहारिक जीव और उस जीवसे दीखनेवाले जाग्रत्प्रपञ्चको भी आवृत करके उत्पन्न होनेवाले मूलाज्ञानकी अवस्थारूप निद्रा-दोष स्वाप्नाध्यासका उपादान है, मूलाज्ञान उपादान नहीं है । यदि शङ्का हो कि निद्राके अवस्थारूप अज्ञान होनेमें प्रमाण नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यदि निद्राको अवस्थारूप अज्ञान न माना जायगा, तो मूलाज्ञानसे आवृत जाग्रत् प्रपञ्चको देखनेवाला व्यावहारिक जीव जो कि अपने आत्माके विषयमें 'मैं मनुष्य हूँ, मैं ब्राह्मण हूँ, मैं देवदत्तका पुत्र हूँ' इत्यादिरूपसे असन्दिग्ध और अविपर्यस्त अभिमान करता है, उसका और अपने दीर्घकालके परिचयसे ⁕ अपने प्रति सर्वदा अनावृत और एकरूपसे अनुभूत स्वकीय
व्यवहारकालमें जिसका बाध हो, वह प्रातिभासिक है, इस सिद्धान्तका अनुसरण करके स्वप्नप्रपञ्चमें प्रातिभासिकत्वका उपपादन करते हैं ।
† अधिष्ठानका यथार्थज्ञान अध्यासका निवर्तक है, ऐसा यदि नियम माना जाय, तो भी प्रकृतमें कोई हानि नहीं है, ऐसा मान कर 'अपरे तु' के पक्षका उत्थान है । इस मतमें व्यावहारिक जीव स्वप्नको देखनेवाले जीवका अधिष्ठान माना जाता है और व्यावहारिक जगत् स्वाप्नजगत्का अधिष्ठान माना जाता है, अनवच्छिन्न चैतन्य आदि नहीं, उक्त दो प्रकारके अधिष्ठानके आवरण द्वारा ही निद्रारूप अवस्थाऽज्ञान द्रष्टा और दृश्यात्मक प्रपञ्चका उपादान है, मूल अज्ञान नहीं, क्योंकि वह मूलाज्ञान केवल ब्रह्मचैतन्यका ही आवरक है, अतः व्यावहारिक जीवादिका आवरक नहीं हो सकता है । इसलिए व्यावहारिक जीव और जगद्विषयक ज्ञानसे, जो कि अधिष्ठानका यथार्थ ज्ञानात्मक है, स्वप्नाध्यासकी निवृत्ति होगी, यह भाव है ।
⁕ देवदत्तका पुत्र अपने पितामह आदिके मरणका अनुभव करके पीछे प्रतिमास या प्रतिवत्सर श्राद्ध, तर्पण आदि करता है, अतः उनके मरणविषयक अनुभव और स्मरणका पुनः पुनः अभ्यास ही चिरपरिचय है, इसलिए अपने पितामहके अत्यय आदिमें जरा भी सन्देह और भ्रम नहीं है, अतः एकरूपसे ही स्वकीय पितामहादिविनाशसे प्रपञ्चकी अनुवृत्ति होती है, यह भाव है।