भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 373, कुल 590 में से

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स्वाप्न पदार्थोंके अधिष्ठानका-विचार] भाषानुवादसहित ३५३


यादिजाग्रत्प्रपञ्चवृत्तान्तस्य च स्वप्नसमये केनचिदावरणाभावे जागरण इव स्वप्नेऽपि 'व्याघ्रोऽहम्, शूद्रोऽहम्, यज्ञदत्तपुत्रोऽहम्' इत्यादिभ्रमस्य स्वपितामहजीवद्दशादिभ्रमस्य चाभावप्रसङ्गेन निद्राया एव तत्कालोत्पन्नव्यावहारिकजगज्जीवावारकाज्ञानावस्थाभेदरूपत्वसिद्धेः । न चैवं जीवस्याऽप्यावृतत्वात् स्वप्नप्रपञ्चस्य द्रष्टृभावप्रसङ्गः । स्वप्नप्रपञ्चेन सह द्रष्टृजीवस्यापि प्रातिभासिकाध्यासात् । एवं च पुनर्जाग्रद्भोगप्रदकर्मोद्भूते बोधे व्यावहारिकजीवस्वरूपज्ञानात् स्वोपादाननिद्रारूपाज्ञाननिवर्तकादेव स्वप्नप्रपञ्चबाधः । न चैवं तद्द्रष्टुः प्रातिभासिकजीवस्यापि ततो बाधे 'स्वप्ने करिणमन्वभूवम्' इत्यनुसन्धानं न स्यादिति वाच्यम् । व्यावहारिकजीवे प्रातिभासिकजीवस्याऽध्यस्ततया तदनुभवान्न व्यावहारिकजीवस्यानुसन्धानोपगमेऽप्यतिप्रसङ्गाभावादित्याहुः ।

पितामहके विनाश आदि जाग्रत्प्रपञ्चका स्वप्नकालमें किसी कारणसे आवरणका अभाव होनेपर जागरणके समान स्वप्नमें भी 'मैं ब्राह्मण हूँ, 'मैं शूद्र हूँ, 'मैं यज्ञदत्तका पुत्र हूँ' इत्यादि भ्रमका और स्वकीय पितामहके जीवनदशा आदि भ्रमका अभाव प्रसक्त हो जायगा, इसलिए निद्राको ही निद्राकालमें उत्पन्न व्यावहारिक जगत् और जीवको आवृत्त करनेवाली अज्ञानकी अवस्था मानना चाहिए। यदि फिर शङ्का हो कि जीव भी यदि उस कालमें आवृत्त होगा, तो स्वप्नप्रपञ्चका द्रष्टा नहीं होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि स्वप्नप्रपञ्चके साथ-साथ द्रष्टारूप जीव भी प्रातिभासिक उत्पन्न होता है। व्यावहारिक जीव और जगत्‌के स्वप्न जीव और जगत्‌के अधिष्ठान सिद्ध होनेपर फिर जाग्रत्कालीन भोगके देनेवाले कर्मसे उत्पन्न जागरण होनेपर 'मैं मनुष्य हूँ' इत्यादि रूपसे व्यावहारिक जीवके स्वरूप ज्ञानसे ही जो अपने उपादानभूत निद्रारूप अज्ञानका निवर्तक है, स्वाप्न प्रपञ्चका बाध होता है। यदि फिर शङ्का हो कि स्वाप्न प्रपञ्चके द्रष्टा प्रातिभासिक जीवका भी जागरणसे बाध होगा, तो 'स्वप्नमें हाथीका मैंने अनुभव किया था' इस प्रकारका स्मरण नहीं होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि व्यावहारिक जीवमें प्रातिभासिक जीवके अध्यस्त होनेके कारण प्रातिभासिक जीवके अनुभवसे व्यावहारिक जीवका अनुसन्धान माना जाय तो भी कोई हानि नहीं है।