सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 374, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३४४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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न्ववहङ्कृत्यवच्छिन्नेऽनवच्छिन्ने च नोचितः ।
स्वाप्नाध्यासोऽनहंभावाच्चक्षुराद्यनपेक्षणात् ॥ ३० ॥
अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्यमें तथा अहङ्कारानवच्छिन्न चैतन्यमें स्वाप्नाध्यास होना युक्त नहीं है, क्योंकि स्वाप्नपदार्थोंके साक्षीसे भिन्नदेशस्थ होनेसे साक्षात् तथा चक्षु आदिके उपरत होनेसे उनके द्वारा भी अहंवृत्ति नहीं हो सकती है ॥ ३० ॥
नन्यनवच्छिन्नचैतन्ये अहङ्कारोपहितचैतन्ये वा स्वाप्नप्रपञ्चाध्यास इति प्रागुक्तं पक्षद्वयमप्ययुक्तम् । आद्ये स्वप्नगजादेरहङ्कारोपहितसाक्षिणो विच्छिन्नदेशत्वेन सुखादिवदन्तःकरणवृत्तिसंसर्गमनपेक्ष्य तेन प्रकाशनस्य चक्षुरादीनामुपरततया वृत्त्युदयासम्भवेन तेन प्रकाशनस्य चाऽयोगात् । द्वितीये 'इदं रजतम्' इतिवत् 'अहं गजः' इति वा 'अहं सुखी' इतिवद् 'अहं गजवान्' इति वाऽध्यासप्रसङ्गात् ।
अत्र द्वितीय आचख्युः केचिद्देहान्तरेव तम् ।
स्वाप्नधीवृत्त्यभिव्यक्तशुद्धचैतन्यसंश्रयम् ॥ ३१ ॥
यहाँपर द्वितीय पक्षमें कोई लोग समाधान देते हैं कि देहके भीतर ही स्वाप्न पदार्थोंको विषय करनेवाली वृत्तिसे अभिव्यक्त शुद्ध चैतन्यमें स्वाप्न पदार्थोंका अध्यास होता है ॥ ३१ ॥
अब शङ्का होती है अनवच्छिन्न चैतन्यमें अथवा अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्यमें स्वाप्न प्रपञ्चका अध्यास होता है, ऐसा जो पक्षद्वय पूर्वमें कहा गया है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि अनवच्छिन्न चैतन्याधिष्ठानत्व-पक्षमें [ स्वप्नकालीन गज आदिको शरीरसे अन्य देशस्थत्व ही कहना होगा, इसमें यह विकल्प हो सकता है कि क्या उन स्वाप्न पदार्थोंका साक्षीसे भास होता है, या इन्द्रियोंसे ? प्रथम कल्प, तो युक्त नहीं है, क्योंकि ] स्वाप्न गज आदि पदार्थोंका अहङ्कारोपहित साक्षीरूप चैतन्यसे पृथक्देशस्थ होनेके कारण सुख आदिके समान अन्तःकरणकी वृत्तिकी अपेक्षा न करके उस साक्षीसे उन स्वाप्न पदार्थोंका अवभास नहीं हो सकता है; द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है, क्योंकि स्वप्न समयमें चक्षु आदिके उपरत होनेसे वृत्तिका सम्भव न होनेके कारण वृत्तिसंसर्गकी अपेक्षा करके भी साक्षीसे प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है । अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्यके स्वप्नाध्यासाधिष्ठानत्वपक्षमें 'इदं रजतम्' ( यह रजत है ) इस प्रकारका जैसे ज्ञान होता है, वैसे ही 'अहं गजः' ( मैं हाथी हूँ ) इस प्रकारका अथवा 'मैं सुखी हूँ' इस ज्ञानके समान मैं गजवान् हूँ' इस प्रकारका अध्यास प्रसक्त होगा ।