सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
| ३४४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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न्ववहङ्कृत्यवच्छिन्नेऽनवच्छिन्ने च नोचितः ।
स्वाप्नाध्यासोऽनहंभावाच्चक्षुराद्यनपेक्षणात् ॥ ३० ॥
अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्यमें तथा अहङ्कारानवच्छिन्न चैतन्यमें स्वाप्नाध्यास होना युक्त नहीं है, क्योंकि स्वाप्नपदार्थोंके साक्षीसे भिन्नदेशस्थ होनेसे साक्षात् तथा चक्षु आदिके उपरत होनेसे उनके द्वारा भी अहंवृत्ति नहीं हो सकती है ॥ ३० ॥
नन्यनवच्छिन्नचैतन्ये अहङ्कारोपहितचैतन्ये वा स्वाप्नप्रपञ्चाध्यास इति प्रागुक्तं पक्षद्वयमप्ययुक्तम् । आद्ये स्वप्नगजादेरहङ्कारोपहितसाक्षिणो विच्छिन्नदेशत्वेन सुखादिवदन्तःकरणवृत्तिसंसर्गमनपेक्ष्य तेन प्रकाशनस्य चक्षुरादीनामुपरततया वृत्त्युदयासम्भवेन तेन प्रकाशनस्य चाऽयोगात् । द्वितीये 'इदं रजतम्' इतिवत् 'अहं गजः' इति वा 'अहं सुखी' इतिवद् 'अहं गजवान्' इति वाऽध्यासप्रसङ्गात् ।
अत्र द्वितीय आचख्युः केचिद्देहान्तरेव तम् ।
स्वाप्नधीवृत्त्यभिव्यक्तशुद्धचैतन्यसंश्रयम् ॥ ३१ ॥
यहाँपर द्वितीय पक्षमें कोई लोग समाधान देते हैं कि देहके भीतर ही स्वाप्न पदार्थोंको विषय करनेवाली वृत्तिसे अभिव्यक्त शुद्ध चैतन्यमें स्वाप्न पदार्थोंका अध्यास होता है ॥ ३१ ॥
अब शङ्का होती है अनवच्छिन्न चैतन्यमें अथवा अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्यमें स्वाप्न प्रपञ्चका अध्यास होता है, ऐसा जो पक्षद्वय पूर्वमें कहा गया है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि अनवच्छिन्न चैतन्याधिष्ठानत्व-पक्षमें [ स्वप्नकालीन गज आदिको शरीरसे अन्य देशस्थत्व ही कहना होगा, इसमें यह विकल्प हो सकता है कि क्या उन स्वाप्न पदार्थोंका साक्षीसे भास होता है, या इन्द्रियोंसे ? प्रथम कल्प, तो युक्त नहीं है, क्योंकि ] स्वाप्न गज आदि पदार्थोंका अहङ्कारोपहित साक्षीरूप चैतन्यसे पृथक्देशस्थ होनेके कारण सुख आदिके समान अन्तःकरणकी वृत्तिकी अपेक्षा न करके उस साक्षीसे उन स्वाप्न पदार्थोंका अवभास नहीं हो सकता है; द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है, क्योंकि स्वप्न समयमें चक्षु आदिके उपरत होनेसे वृत्तिका सम्भव न होनेके कारण वृत्तिसंसर्गकी अपेक्षा करके भी साक्षीसे प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है । अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्यके स्वप्नाध्यासाधिष्ठानत्वपक्षमें 'इदं रजतम्' ( यह रजत है ) इस प्रकारका जैसे ज्ञान होता है, वैसे ही 'अहं गजः' ( मैं हाथी हूँ ) इस प्रकारका अथवा 'मैं सुखी हूँ' इस ज्ञानके समान मैं गजवान् हूँ' इस प्रकारका अध्यास प्रसक्त होगा ।
स्वाप्न पदार्थोंके अधिष्ठानका विचार] भाषानुवादसहित ३४५
अत्र केचिदाद्यपक्षं समर्थयन्ते—अहङ्कारानवच्छिन्नचैतन्यं न देहाद्वहिः स्वाप्नप्रपञ्चस्याऽधिष्ठानमुपेयते, किन्तु तदन्तरेव। अत एव दृश्यमानपरिमाणोचितदेशसम्पत्त्यभावात् स्वाप्नगजादीनां मायामयत्वमुच्यते। एवं चाऽन्तःकरणस्य देहाद्वहिरस्वातन्त्र्याज्जागरणे बाह्यशुक्तीदमंशादिगोचरवृत्त्युत्पादाय चक्षुराद्यपेक्षायामपि देहान्तरन्तःकरणस्य स्वतन्त्रस्य स्वयमेव वृत्तिसम्भवाद्देहान्तरन्तःकरणवृत्त्यभिव्यक्तस्याऽनवच्छिन्नचैतन्यस्याऽधिष्ठानत्वे न काचिदनुपपत्तिः। अत एत यथा जागरणे सम्प्रयोगजन्यवृत्त्यभिव्यक्तशुक्तीदमंशावच्छिन्नचैतन्यस्थिताऽविद्या रूप्याकारेण विवर्तते, तथा स्वप्नेऽपि देहस्याऽन्तरन्तःकरणवृत्तौ निद्रादिदोषोपहितायामभिव्यक्तचैतन्यस्थाविद्या अदृष्टोद्बोधितनानाविषयसंस्कारसहिता प्रपञ्चाकारेण विवर्ततामिति विवरणोपन्यासे भारतीतीर्थवचनमिति।
यहांपर कुछ लोग प्रथम पक्षका ही समर्थन करते हैं—अहङ्कारादिसे अनवच्छिन्न चैतन्य देहसे बाहर स्वाप्न प्रपञ्चका अधिष्ठान नहीं होता है, किन्तु देहके भीतर ही अधिष्ठान होता है। इसीसे अर्थात् आन्तर चैतन्यके अधिष्ठान होनेसे ही दृश्यमान परिमाणसे युक्त हाथी आदिका शरीरके भीतर उचित स्थान न होनेके कारण उनको सूत्रकार बादरायणने प्रातिभासिक कहा है। इस युक्तिके अनुसार आन्तर चैतन्यके स्वाप्नाध्यासाधिष्ठानत्वकी सिद्धि होनेपर यद्यपि देहके बाहर अन्तःकरण स्वतन्त्र नहीं है, अतः जाग्रत् अवस्थामें बाह्य शुक्तिके इदमंशाकारवृत्तिको उत्पन्न करनेके लिए वह चक्षुकी अपेक्षा करता है, तथापि देहके अवान्तर प्रदेशमें अन्तःकरणकी स्वतन्त्रता होनेके कारण चक्षु आदिकी अपेक्षा न करके ही उसकी स्वतः वृत्ति हो सकती है, अतः देहके भीतर अन्तःकरणकी वृत्तिसे अभिव्यक्त अनवच्छिन्न चैतन्यको अधिष्ठान माननेपर भी कोई विरोध नहीं है। इसीसे—'जैसे जाग्रत् अवस्थामें सम्प्रयोगजन्य (इन्द्रियके सम्बन्धसे उत्पन्न) वृत्तिसे अभिव्यक्त शुक्तिके इदमंशसे अवच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाली अविद्या रजताकारसे परिणत होती है, वैसे ही स्वप्नमें भी निद्रा, पित्तोद्रेक आदि दोषोंसे उपहित देहके अवान्तर भागमें अन्तःकरणकी वृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्यमें रहनेवाली अविद्या, जो कि अदृष्टविशेषसे उद्बोधित अनेक विषयोंके संस्कारसे युक्त है, विचित्र प्रपञ्चके आकारमें परिणत होती है—इस प्रकारका विवरणोपन्यासमें भारतीतीर्थमुनिका वचन भी है।
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| ३४६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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अन्येऽनहमवच्छिन्नाविद्याविम्विताचिद्गतम् ।
तद्भास्यं तदधिष्ठानवृत्त्या मातरि तत्प्रथाम् ॥ ३२ ॥
अहङ्कारसे अवच्छिन्न अविद्यामें प्रतिबिम्बित चैतन्यमें ही स्वाप्नाध्यास होता है और उसीसे उसका प्रकाश होता है, प्रमातामें स्वप्नका प्रकाश, तो अधिष्ठानविषयक अन्तःकरणवृत्तिकृत अभेदाभिव्यक्तिसे होता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥३२॥
अन्ये त्वनवच्छिन्नचैतन्यं न वृत्त्यभिव्यक्तं सत् स्वाप्नप्रपञ्चस्याऽधिष्ठानम्, अशब्दमूलकानवच्छिन्नचैतन्यगोचरवृत्त्युदयासम्भवाद् अहङ्काराद्यवच्छिन्नचैतन्य एवाऽहमाकारवृत्त्युदयदर्शनात् । तस्मात् स्वतोऽपरोक्षमहङ्काराद्यनवच्छिन्नचैतन्यं तदधिष्ठानम् ।
अत एव संक्षेपशारीरके—( सं० शा० अ० १ श्लो० ४१ )
‘अपरोक्षरूपविषयभ्रमधीरपरोक्षमास्पदमपेक्ष्य भवेत् ।
मनसा स्वतो नयनतो यदि वा स्वपनभ्रमादिषु तथा प्रथितेः’ ॥
इति श्लोकेनाऽपरोक्षाध्यासापेक्षितमधिष्ठानापरोक्ष्यं क्वचित् स्वतः,
कुछ लोग कहते हैं कि अनवच्छिन्न चैतन्य वृत्तिद्वारा अभिव्यक्त होकर स्वाप्न प्रपञ्चका अधिष्ठान नहीं होता है, क्योंकि शास्त्रसे अतिरिक्त प्रमाणसे जन्य अनवच्छिन्नचैतन्यविषयक वृत्तिकी उत्पत्ति हो ही नहीं सकती है, क्योंकि अहङ्कार, शरीर आदिसे अवच्छिन्न चैतन्यविषयक ही अहमाकार वृत्तिकी उत्पत्ति देखी जाती है । इससे स्वतः अर्थात् वृत्तिके बिना अभिव्यक्त अपरोक्ष चैतन्य ही स्वाप्न प्रपञ्चका अधिष्ठान है ।
स्वतः अपरोक्ष चैतन्यको स्वप्नाध्यासका अधिष्ठान स्वीकार करनेसे ही संक्षेपशारीरकमें—
‘अपरोक्ष०’ ( अपरोक्षरूप जो शुक्तिरजतादिविषयक भ्रमरूप बुद्धि है, अथवा अपरोक्ष रूप जो शुक्ति रजतादि, तद् विषयक भ्रमरूप जो बुद्धि है, वह अपरोक्ष अधिष्ठानकी अपेक्षा रखकर होती है, और यह अधिष्ठानापरोक्ष्य मनसे, स्वतः अथवा चक्षुसे होता है, क्योंकि स्वप्नभ्रममें अन्वय-व्यतिरेकसे वैसा ही देखा जाता है ) इस श्लोकसे अपरोक्षाध्यासके लिए अपेक्षित अधिष्ठानका आप-
स्वाप्न पदार्थोंके अधिष्ठानका विचार] भाषानुवाद सहित ३४७
क्वचिन्मानसवृत्त्या, क्वचिद् बहिरिन्द्रियवृत्त्येत्यभिधाय,
‘स्वतोऽपरोक्षा चितिरत्र विश्रमस्तथाऽपि रूपाकृतिरेव जायते ।
मनोनिमित्तं स्वपने मुहुर्मुहुर्विनाऽपि चक्षुर्विषयं स्वमास्पदम् ॥
मनोऽवगम्येऽप्यपरोक्षतावलात्तथाऽम्बरे रूपमुपोल्लिखन् भ्रमः ।
सितादिभेदैर्बहुधा समीक्ष्यते तथाऽक्षिगम्ये रजतादिविभ्रमे ॥’
इत्याद्यनन्तरश्लोकेन स्वप्नाध्यासे स्वतोऽधिष्ठानापरोक्ष्यमुदाहृतम् । न चाहङ्कारानवच्छिन्नचैतन्यमात्रमावृतमिति वृत्तिमन्तरेण न तदभिव्यक्तिरिति वाच्यम्, ब्रह्मचैतन्यमेवावृतमविद्याप्रतिविम्वजीवचैतन्यमहङ्कारानवच्छिन्नमप्यनावृतमित्युपगमात् । एवं चाहङ्कारानवच्छिन्नचैतन्येऽध्यस्यमाने स्वाप्नगजादौ तत्समनियताधिष्ठानगोचरान्तःकरणादिवृत्तिकुता-
रोक्ष्य * कहीं स्वतः, कहीं मानसवृत्तिसे कहीं बहिरिन्द्रियजन्य वृत्तिसे उत्पन्न होता है, ऐसा कह कर ‘स्वतोऽपरोक्षा ०’ (यद्यपि स्वप्नाध्यासरूप भ्रमका स्वतः अपरोक्ष चैतन्य ही अधिष्ठान है, तथापि उस चैतन्यमें मनोगत बुद्धिवासनाके प्रभावसे चक्षुर्ग्राह्य बाह्य रूपादि आलम्बनके बिना अनेक विषयाकारोंसे युक्त वह भ्रम बार-बार उत्पन्न होता है, वैसे मनोगम्य आकाशमें अपरोक्षताके वलसे अपरोक्ष चिदात्माके साथ अभेदाभिव्यक्तिसे—रूपोल्लेखी विभ्रम होता है, वैसे ही चक्षुसे दिखनेवाले रजतादिविभ्रममें श्वेत आदि अनेक प्रकार देखे जाते हैं ।) इत्यादि अनन्तरके श्लोकोंसे स्वप्नाध्यासमें अधिष्ठानका आपरोक्ष्य ( प्रत्यक्ष ) स्वतः ही दिखलाया है । यदि शङ्का हो कि अहङ्कारानवच्छिन्न चैतन्यमात्र तो आवृत है, अतः वृत्तिके विना उसकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ब्रह्मचैतन्य ही आवृत्त है, और अविद्यामें प्रतिविम्बित अहङ्कारसे अनवच्छिन्न भी जीवचैतन्य अनावृत है, ऐसा स्वीकार किया गया है, इस अवस्थामें अर्थात् स्वतः अपरोक्ष जीवचैतन्यके अधिष्ठान होनेपर अहङ्कारानवच्छिन्न चैतन्यमें अध्यस्यमान स्वप्नके गज आदि प्रपञ्चमें स्वाप्न प्रपञ्चके समनियत † अधिष्ठानविषयक अन्तःकरण आदिकी वृत्तियोंसे सम्पादित
* शुक्ति-रजत स्थलमें नयनसन्निकर्षसे अधिष्ठानका आपरोक्ष्य है, गगननीलत्वके अध्यासमें मनसे अधिष्ठानापरोक्ष्य है और स्वाप्नाध्यासमें स्वतः अधिष्ठानका आपरोक्ष्य है, यह भाव है ।
† जब गज आदिका अध्यास होता है, तब अधिष्ठानविषयक अन्तःकरणकी अविद्यावृत्ति उत्पन्न होती ही है, इसलिए स्वाप्न प्रपञ्चके अधिष्ठानभूत चैतन्यके साथ वृत्तियुक्त अन्तःकरणके
| ३४८ | सिद्धान्तलेशसंग्रहे | [ द्वितीय परिच्छेद |
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भेदाभिव्यक्त्या प्रमातृचैतन्यस्याऽपि 'इदं पश्यामि' इति व्यवहार इत्याहुः।
आद्येऽहङ्कृत्युपहितचिदाभासास्पदं परे।
अहन्ताधीप्रसक्तिस्तु नाहङ्काराविशेषणात् ॥ ३३ ॥
अहङ्कारसे उपहित चैतन्याभास स्वप्नका अधिष्ठान है, अतः आद्यपक्षमें—अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्याधिष्ठानत्वपक्षमें—अहङ्कारका विशेषण रूपसे प्रवेश न होनेके कारण 'अहं गजः' इत्यादि प्रतीति नहीं होती है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ ३३ ॥
अपरे तु द्वितीयं पक्षं समर्थयन्ते—अहङ्कारावच्छिन्नचैतन्यमधिष्ठानमित्यहङ्कारस्य विशेषणभावेनाऽधिष्ठानकोटिप्रवेशो नोपेयते, किं त्वहङ्कारोपहितं तत्प्रतिविम्बरूपचैतन्यमात्रमधिष्ठानमिति, अतो न'अहं गजः' इत्याद्यनुभवप्रसङ्ग इति।
इदंवृत्तिचिदाभासे इत्थं रजतकल्पनात् ।
नाहं रजतमस्तीत्तदनन्यनरवेद्यता ॥ ३४ ॥
इसी प्रकार इदमाकार वृत्तिसे उपहित चिदाभासमें रजतकी कल्पना होनेसे 'अहं रजतम्' ऐसी प्रतीति नहीं होती है और अन्य पुरुष वेद्यता भी नहीं है ॥ ३४ ॥
एवं शुक्तिरजतमपि शुक्तीदमंशावच्छिन्नचैतन्यप्रतिबिम्बे वृत्तिमदन्तःकरणगतेऽध्यस्यते। शुक्तीदमंशावच्छिन्नबिम्बचैतन्ये सर्वसाधारणे तस्या-
अभेदाभिव्यक्तिसे प्रमातृचैतन्यमें भी 'मैं यह देखता हूँ' इस प्रकार व्यवहार देखा जाता है।
कुछ लोग तो द्वितीय पक्षका—अहङ्कारसे अवच्छिन्न चैतन्य स्वप्नाध्यासका अधिष्ठान है, इसीका—समर्थन करते हैं—अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्य अधिष्ठान है, इससे अहङ्कारका अधिष्ठानकोटिमें विशेषणरूपसे प्रवेश नहीं करते हैं, किन्तु अहङ्कारसे उपहित अहङ्कारमें प्रतिबिम्बित चैतन्य ही अधिष्ठान होता है, ऐसा अङ्गीकार करते हैं, इसलिए 'अहं गजः' (मैं हाथी हूँ) ऐसा अनुभव नहीं होता है।
इसी प्रकार शुक्तिरजत भी शुक्तिके इदमंशावच्छिन्न चैतन्यके वृत्ति युक्त अन्तःकरणमें पड़े हुए प्रतिबिम्बमें अध्यस्त होता है, शुक्तीदमंशावच्छिन्न बिम्ब
सम्बन्ध होनेपर प्रमातृत्वकी प्राप्ति होनेपर प्रमातामें स्वप्नद्रष्टृत्वकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है।
स्वाप्न पदार्थोंके अनुभवप्रकारका विचार] भाषानुवादसहित ३४९
ध्यासे सुखादिवदनन्यवेद्यत्वाभावप्रसङ्गादिति केचित् ।
अन्ये तु बिम्बचैतन्ये रजताध्यासवादिनः ।
प्राहुस्तत्तदविद्योत्थन्तत्तत्पुरुषगोचरम् ॥ ३५ ॥
कुछ लोगोंका कहना है कि बिम्बचैतन्यमें रजतका अध्यास होता है और तत्-तत् पुरुषोंके अज्ञानसे उत्पन्न तत्-तत् रजतका तत्-तत् पुरुषाणोंको प्रत्यक्ष होता है ॥ ३५ ॥
केचित्तु बिम्बचैतन्य एव तदध्यासमभ्युपेत्य 'यदीयाज्ञानोपादानकं यत्, तत्तस्यैव प्रत्यक्षम्, न जीवान्तरस्य इत्यनन्यवेद्यत्वमुपपादयन्ति ॥५॥
नन्वस्तु रजताध्यासे कथञ्चिच्चाक्षुषत्वधीः ।
कथं स्वप्नगजज्ञाने तस्याः साधु समर्थनम् ॥ ३६ ॥
अत्र शङ्का होती है कि यद्यपि रजताध्यासमें कथञ्चित् चाक्षुषत्वका उपपादन हो सकता है, तथापि स्वाप्नगजादिज्ञानमें चाक्षुषत्वका समर्थन कैसे कर सकते है ? ॥ ३६ ॥
ननु शुक्तिरजताध्यासे चाक्षुषत्वानुभवः साक्षाद्वाऽधिष्ठानज्ञानद्वारा तदपेक्षणाद्वा समर्थ्यते । स्वाप्नगजादिचाक्षुषत्वानुभवः कथं समर्थनीयः ।
चैतन्यमें, जो सर्वसाधारण है, उसका अध्यास माना जायगा, तो सुखादिके समान अनन्यवेद्यत्वके अभावका प्रसङ्ग होगा, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ।
कुछ लोग तो बिम्बचैतन्यमें ही रजतादिका अध्यास होता है, ऐसा मान कर जिसके अज्ञानरूप उपादानसे जिसकी उत्पत्ति हुई हो, वह उसी जीवको प्रत्यक्ष होता है, जीवान्तरको नहीं, इस प्रकार अनन्यवेद्यत्वका उपपादन करते हैं ॥ ५ ॥
अत्र शङ्का होती है कि शुक्तिमें रजतका जो अध्यास होता है, उसमें चक्षुरिन्द्रियग्राह्यत्वका जो अनुभव होता है, वह साक्षात् अथवा अधिष्ठानके ज्ञानद्वारा चक्षुकी अपेक्षा होनेसे होता है । [स्वप्नप्रपञ्चके अधिष्ठानका निरूपण करके स्वाप्न पदार्थोंके अनुभवका उपपादन करनेके लिए इस ग्रन्थका उपक्रम है। शुक्तिरजतका अनुभव इन्द्रियसे होता है, इस प्रकारके पूर्वमें उक्त कवितार्किक मतके अनुसार 'साक्षात्' कहा गया है । और जिस मतमें शुक्तिरजत आदि भ्रान्त पदार्थ साक्षिभास्य हैं, उस मतसे 'अधिष्ठानज्ञानद्वारा' इत्यादि ग्रन्थका कथन है, क्योंकि इस मतमें भी धर्मिज्ञानद्वारा
३५० सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
खानां विरामादग्राह्यप्रातिभासिकनिह्नवात् । स्वयञ्ज्योतिष्ट्ववादाच्च न स्वाप्नेन्द्रियकल्पना ॥ ३७ ॥
उक्त शङ्काके परिहारमें कहते हैं कि स्वप्नमें इन्द्रियोंके उपरत होनेसे, तथा अग्राह्य इन्द्रियोंके प्रातिभासिक न होनेसे और स्वयंप्रकाशत्वकी उक्ति होनेसे स्वाप्न इन्द्रियोंकी कल्पना नहीं है, अतः स्वाप्नपदार्थोंमें चाक्षुषत्वका भी भ्रम है ॥ ३७ ॥
उच्यते—न तावत् तत्समर्थनाय स्वाप्नदेहवद्विषयवच्च इन्द्रियाणामपि प्रातिभासिको विवर्तः शक्यते वक्तुम्, प्रातिभासिकस्याऽज्ञातसत्त्वा-भावात्। इन्द्रियाणां चातीन्द्रियाणां सत्त्वेऽज्ञातसत्त्वस्य वाच्यत्वात्। नापि व्यावहारिकाणामेवेन्द्रियाणां स्वस्वगोलकेभ्यो निष्क्रम्य स्वाप्न-देहमाश्रित्य स्वस्वविषयग्राहकत्वं वक्तुं शक्यते, स्वप्नसमये तेषां व्यापारराहित्यरूपोपरतिश्रवणात्। व्यावहारिकस्य स्पर्शनेन्द्रियस्य स्वो-चितव्यावहारिकदेशसम्पत्तिविधुरान्तःशरीरे स्वाधिकपरिमाणकृत्स्नस्वाप्न-शरीरव्यापित्वायोगाच्च। तदेकदेशाश्रयत्वे च तस्य स्वाप्नजलावगाहनजन्य-
चक्षुकी अपेक्षा शुक्तिरजतके लिए होती ही है, यह भाव है ]। परन्तु स्वाप्न गज आदिके चाक्षुषत्वका जो अनुभव होता है, उसका समर्थन कैसे किया जाता है ?
इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं—स्वाप्न प्रपञ्चमें चाक्षुषत्वका प्रतिपादन करनेके लिए स्वाप्न देह और विषयोंकी नाई इन्द्रियोंका भी प्राति-भासिक विवर्त नहीं मान सकते हैं, क्योंकि प्रातिभासिक पदार्थकी अज्ञात सत्ता नहीं मानी जाती है। अतीन्द्रिय इन्द्रियोंका यदि प्रातिभासिक विवर्त माना जाय, तो उनकी भी अज्ञात सत्ता ही कही जायगी, [ क्योंकि वे सर्वत्र व्यवहारमें अज्ञात सत्तावाली ही देखी जाती हैं।] और यह भी नहीं कह सकते हैं कि व्यावहारिक इन्द्रियाँ अपने अपने गोलकसे (स्थानसे) निकलकर स्वाप्न शरीरका आश्रय करके अपने-अपने विषयोंका ग्रहण करती हैं, क्योंकि स्वप्नके समयमें उनका व्यापार नहीं होता है अर्थात् स्वप्नमें इन्द्रियाँ उपरत रहती हैं, ऐसा श्रुतिमें कहा गया है और व्यावहारिक स्पर्शेन्द्रिय (त्वक्) का अपने उपयुक्त व्यावहारिक देशकी सम्पत्तिसे शून्य शरीरके भीतर अपनेसे अधिक परिमाण-वाले स्वाप्न शरीरमें व्यापित्वकी उपपत्ति भी नहीं हो सकती है। यदि उस
स्वाप्न पदार्थोंके अनुभवप्रकारका विचार] भाषानुवादसहित ३५१
सर्वाङ्गीणशीतस्पर्शानिर्वाहात् ।
अत एव 'स्वप्ने जाग्रदिन्द्रियाणामुपरतावपि तैजसव्यवहारोपयुक्तानि सूक्ष्मशरीरावयवभूतानि सूक्ष्मेन्द्रियाणि सन्तीति तैस्स्वाप्नपदार्थानामैन्द्रियकत्वम्, इत्युपपादनशङ्काऽपि निरस्ता । जाग्रदिन्द्रियव्यतिरिक्तसूक्ष्मेन्द्रियाप्रसिद्धेः ।
किञ्च, 'अत्रायं पुरुषः स्वयञ्ज्योतिः' इति जागरे आदित्यादिज्योतिर्व्यतिकराच्चक्षुरादिवृत्तिसञ्चाराच्च दुर्विचेकमात्मनः स्वयंज्योतिष्ट्वमिति स्वप्नावस्थामधिकृत्य तत्राऽऽत्मनः स्वयञ्ज्योतिष्ट्वं प्रतिपादयति । अन्यथा तस्य सर्वदा स्वयञ्ज्योतिष्ट्वेनाऽत्रेति वैयर्थ्यात् । तत्र यदि स्वप्नेऽपि चक्षुरादिवृत्तिसञ्चारः कल्प्येत, तदा तत्राऽपि जागर इव तस्य स्वयञ्ज्योतिष्ट्वं दुर्विनेचं स्यादित्युदाहृता श्रुतिः पीड्येत ।
स्पर्शेन्द्रियका—स्वाप्न शरीरका—एक देश—आश्रय—माना जाय, तो स्वाप्नजलमें अवगाहन करनेसे सम्पूर्ण अङ्गोंमें जो शैत्यका अनुभव होता है, उसका निर्वाह नहीं हो सकेगा ।
इसीसे 'स्वप्नमें जाग्रत् इन्द्रियोंके उपरत होनेपर भी तैजस और व्यवहारके लिए उपयुक्त सूक्ष्म शरीरके अवयवभूत सूक्ष्म इन्द्रियाँ हैं, इसलिए उन्हींसे स्वाप्न पदार्थोंका ऐन्द्रियकज्ञान होता है' इस प्रकारकी उपपादन-शङ्का भी निरस्त हुई, क्योंकि जाग्रत् इन्द्रियोंके समान उनसे भिन्न सूक्ष्म इन्द्रियाँ प्रसिद्ध नहीं हैं ।
किञ्च, 'अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः' (स्वप्नावस्थामें पुरुष स्वयंज्योति-स्वप्रकाश है) यह श्रुति—जाग्रत् अवस्थामें आदित्य आदिके प्रकाशके सम्पर्कसे और चक्षु आदिकी वृत्तियोंका संचार होनेसे आत्मामें स्वयंप्रकाशत्वका निर्वचन अशक्य है, अतः स्वप्नावस्थाका अधिकार करके ही आत्मामें स्वयंज्योतिष्ट्वका—प्रतिपादन करती है, यदि वैसा न माना जाय, तो आत्माके सर्वदा स्वप्रकाश होनेके कारण श्रुतिमें उक्त 'अत्र' शब्द व्यर्थ होगा । उक्त प्रकारके अभिप्राय सिद्ध होनेपर यदि स्वप्नमें भी चक्षु आदिका संचार माना जाय, तो स्वप्नमें भी जाग्रत् अवस्थाके समान स्वयंज्योतिष्ट्वका निर्वचन अशक्य होनेसे उदाहृत श्रुतिके साथ विरोध प्रसक्त होगा ।
| ३५२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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ननु स्वप्ने चक्षुराद्युपरमकल्पनेऽपि अन्तःकरणमनुपरतमास्त इति परिशेषासिद्धेर्न स्वयञ्ज्योतिष्ट्वविवेकः; मैवम्, 'कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वाद्' इत्यधिकरणे (उ० मी० अ० २ पा० ३ सू० ३३) न्यायनिर्णयोक्तरीत्याऽन्तःकरणस्य चक्षुरादिकरणान्तरनिरपेक्षस्य ज्ञानसाधनत्वाभावाद्वा, तत्त्वप्रदीपिकोक्तरीत्या स्वप्ने तस्यैव गजाद्याकारेण परिणामेन ज्ञानकर्मतयाऽवस्थितत्वेन तदानीं ज्ञानसाधनत्वायोगाद्वा परिशेषोपपत्तेः ।
न च स्वप्नेऽन्तःकरणवृत्त्यभावे उत्थितस्य स्वप्नदृष्टगजाद्यनुसन्धानानुपपत्तिः; सुषुप्तिक्लृप्तया अविद्यावृत्त्या तदुपपत्तेः । सुषुप्तौ तदवस्थोपहितमेव स्वरूपचैतन्यमज्ञानसुखादिप्रकाशः उत्थितस्यानुसन्धानमुपाधिभूतावस्थाविनाशजन्यरूपसंस्कारेणेति वेदान्तकौमुद्यभिमते सुषुप्तावविद्या-
यदि शङ्का हो कि स्वप्नावस्थामें चक्षु आदिके उपरत होनेपर भी अन्तःकरण अनुपरत ही रहता है, इसलिए परिशेषकी — अवभासकान्तराभावकी — असिद्धि होनेसे आत्मामें स्वयंज्योतिष्ट्वकी हानि तो बनी ही है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात्' * इस अधिकरणमें न्यायनिर्णयके कथनानुसार चक्षु आदि अन्य करणोंसे निरपेक्ष ज्ञानसाधनताका अभाव अन्तःकरणमें है, अर्थात् स्वप्नज्ञानका मन उपादान है, करण नहीं है, क्योंकि उपादान और करण एक नहीं होता है, यह भाव है। अथवा तत्त्वप्रदीपिकाके वचनके अनुसार स्वप्नमें अन्तःकरण ही गज आदिके आकारमें परिणत होता है, अतः ज्ञानकर्मत्वरूपसे अवस्थित अन्तःकरण स्वप्नावस्थामें ज्ञानसाधन हो ही नहीं सकता है ।
यदि शङ्का हो कि स्वप्नमें अन्तःकरणकी वृत्ति न मानी जाय, तो स्वप्नमें देखे गये गज आदिका अनुसन्धान नहीं होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सुषुप्तिमें क्लृप्त अविद्यावृत्तिसे अनुसन्धानकी (स्मृतिकी) उपपत्ति हो सकती है । सुषुप्तिमें निद्रावस्थासे युक्त स्वरूपचैतन्य ही अज्ञान, सुख आदिका प्रकाश है, जागनेपर जो उनका स्मरण होता है, वह उपाधिभूत अवस्थाके विनाशसे उत्पन्न होनेवाले संस्कारसे ही
✡ आत्मा ही कर्ता है बुद्धि नहीं है, क्योंकि कर्ताके लिए अपेक्षित उपायोंका बोध करानेमें समर्थ विधिशास्त्र उपलब्ध होता है, यह सूत्रका अर्थ है । 'चक्षुरादीनां चैतन्येन विषय सम्बन्धार्थत्वात्' (ब्रह्मसूत्र शा० भा० १४७९ पृ० अच्युतग्रन्थमाला काशी मु०) इत्यादि न्यायनिर्णयकी पङ्क्ति है !
स्वाप्न पदार्थोंके अनुभव-प्रकारका विचार] भाषानुवादसहित ३५३
वृत्त्यभावपक्षे इहापि स्वाप्नगजादिभासकचैतन्योपाधिभूतस्वप्नावस्थाविनाश-
रूपसंस्कारादनुसन्धानोपपत्तेश्च ।
अथवा 'तदेतत् सत्त्वं येन स्वप्नं पश्यति' इत्यादिश्रुतेरस्तु स्वप्नेऽपि
कल्पतरूक्तरीत्या स्वाप्नगजादिगोचरान्तःकरणवृत्तिः । न च तावता
परिशेषासिद्धिः । अन्तःकरणस्य 'अहम्' इति गृह्यमाणस्य सर्वात्मना जीवै-
क्येनाऽध्यस्ततया लोकदृष्ट्या तस्य तद्व्यतिरेकाप्रसिद्धेः परिशेषार्थं चक्षुरा-
दिव्यापाराभावमात्रस्यैवाऽपेक्षितत्वात् । 'प्रसिद्धदृश्यमात्रं दृगवभासयोग्यम्'
इति निश्चयसत्त्वेन परिशेषार्थमन्यानपेक्षणात् ।
होता है, इस प्रकार वेदान्तकौमुदीमें स्वीकृत सुषुप्तिमें अविद्यावृत्तिके अभाव-पक्षमें स्वप्नावस्थामें भी स्वाप्न गज आदिके अवभासक चैतन्यके उपाधिभूत स्वप्नावस्थाके विनाशसे उत्पन्न संस्कारसे स्मरणकी उपपत्ति हो सकती है ।
अथवा 'तदेतत् सत्त्वम्०' ( वही सत्त्व—अन्तःकरण है, जिससे स्वप्न देखा जाता है ) इत्यादि श्रुतिसे * कल्पतरुकारके कथनानुसार स्वाप्न रथ, गज आदि पदार्थोंको विषय करनेवाली अन्तःकरणकी वृत्ति रहे तो भी कोई हानि नहीं है । यदि शङ्का हो कि स्वप्नमें यदि अन्तःकरणकी अवस्थिति मानी जाय, तो परिशेषकी असिद्धि होगी ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'अहम्' रूपसे गृह्यमाण अन्तःकरणके सर्वात्मना जीवतादात्म्यरूपसे अध्यस्त होनेसे व्यवहारदृष्टिसे अन्तःकरणमें जीवभेदकी असिद्धि होनेके कारण परिशेषके लिए चक्षु आदि बाह्य करणोंके व्यापारका अभावमात्र ही अपेक्षित है; कारण कि प्रसिद्ध दृश्यमात्र पदार्थ द्रष्टाके अवभासयोग्य हैं, इस प्रकार निश्चय होनेसे परिशेषके लिए अन्य चक्षु आदि व्यापारकी अपेक्षा नहीं होती है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि जागरणके समान स्वप्नमें भी गज आदि स्वाप्न पदार्थोंका अवगाहन करनेवाली वृत्ति यदि मानी जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, इसीसे जाग्रत् होनेपर संस्कार द्वारा सुषुप्तिके अज्ञान आदिके
* कल्पतरुकारने कहा है कि सत्त्वशब्दसे कहलानेवाले अन्तःकरणकी तृतीया श्रुतिसे स्वाप्नगजादिविषयकज्ञानकरणता है, इसलिए श्रुतिके आधारसे ( तदेतत् इत्यादि श्रुतिसे ) स्वप्नमें चाक्षुषवृत्तिके न होनेपर भी मानसवृत्ति है, अतः संस्कारकी अनुपपत्ति नहीं है, यह भाव है ।
४५
३५४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
अत्राऽऽहुरत एवाऽत्र चाक्षुषत्वादिधीर्भ्रमः ॥
स्वप्नमें चक्षु आदिके व्यापारके न होनेसे स्वाप्न पदार्थोंमें चाक्षुषत्व आदिका ज्ञान भ्रमात्मक ही है, ऐसा कहते हैं ।
तस्मात् सर्वथाऽपि स्वप्ने चक्षुरादिव्यापारासम्भवात् स्वाप्नगजादौ चाक्षुषत्वाद्यनुभवो भ्रम एव ।
अन्वयव्यतिरेकादिकल्पनाऽप्यक्षिकल्पना ॥३८॥
असंभावितसाहस्रदर्शनात् स्वप्नदर्शने ॥
इत्थमेव हि शुक्त्यादौ रूप्याद्यध्यक्षधीगतिः ॥३९॥
स्वाप्न भ्रममें चक्षुके साथ ज्ञानका अन्वय-व्यतिरेक और चक्षु आदि कल्पित ही हैं, क्योंकि स्वप्नमें असम्भावित हजारों पदार्थ देखे जाते हैं, इसी प्रकारकी शुक्ति आदिमें रूप्य आदिके प्रत्यक्ष ज्ञानकी भी गति है ॥३८॥३९॥
ननु स्वप्नेऽपि चक्षुरुन्मीलने गजाद्यनुभवः, तन्निमीलने नेति जागर
स्मरण कोई बाधक नहीं है । .. इसपर शङ्का यह होती है कि स्वप्नमें अन्तःकरणके माननेपर 'अत्रायम्' इत्यादि श्रुतिसे आत्माका जो अवशेष कहा गया है वह बाधित होगा, तथा स्वयंज्योतिष्ट्व भी उपपन्न नहीं होगा है, परन्तु यह शङ्का ठीक नहीं है, क्योंकि सर्वतोभावेन अन्तःकरणका जीवचैतन्यके साथ ऐक्य 'मैं देखता हूँ' इत्यादि रूपसे अध्यस्त होनेके कारण उसका द्रष्टृत्वरूपसे ग्रहण होता है, इसलिए अज्ञ पुरुषोंकी दृष्टिसे चिदात्माका अन्तःकरणसे भेद ही गृहीत नहीं होता है, अतः परिशेषके लिए लोकप्रसिद्ध द्रष्टृ भिन्न चक्षु आदिके व्यापारका अभाव ही अपेक्षित है, अन्तःकरणवृत्तिलक्षण व्यापारका द्रष्टाके व्यापाररूपसे ग्रहण होता है, अतः उसके रहनेपर भी परिशेषकी असिद्धि नहीं है ] ।
इससे स्वप्नमें किसी प्रकारसे भी चक्षु आदिके व्यापारका सम्भव न होनेके कारण स्वाप्न गज आदि पदार्थोंमें होनेवाला चाक्षुषत्वानुभव भ्रमात्मक ही है, यह भाव है ।
यदि शङ्का हो कि स्वप्नावस्थामें भी चक्षुके खोलनेपर स्वाप्न गज आदि पदार्थोंका अनुभव होता है, और चक्षुओंके बन्द करनेपर उन पदार्थोंका भान
स्वाप्नं पदार्थोंके अनुभव-प्रकारका विचार] भाषानुवादसहित ३५५
इव गजाद्यनुभवस्य चक्षुरुन्मीलनाद्यनुविधानं प्रतीयते इति चेत्, 'चक्षुषा रजतादिकं पश्यामि'इत्यनुभवोदयमपि कश्चित् स्वप्नभ्रमो भविष्यति यत् केवलसाक्षिरूपे स्वाप्नगजाद्यनुभवे चक्षुराद्यनुविधानं तदनुविधायिनी वृत्तिर्वाऽध्यस्यते । किमिव हि दुर्घटमपि भ्रमं माया न करोति विशेषतो निद्रारूपेण परिणता, यस्या माहात्म्यात् स्वप्ने रथः प्रतीतः क्षणेन मनुष्यः प्रतीयते, स च क्षणेन मार्जारः । स्वप्नद्रष्टुश्च न पूर्वापरविरोधानुसन्धानम्। तस्मादन्वयाद्यनुविधानप्रतीतितौल्येऽपि जाग्रद्गजाद्यनुभव एव चक्षुरादि-जन्यः, न स्वाप्नगजाद्यनुभवः ॥ .
दृष्टिसृष्टिविदस्त्वाहुर्गतिं जाग्रद्धियोऽप्यमूं ॥
अर्थसृष्टेः पुराऽर्थेषु सन्निकर्षादिसम्भवात् ॥४०॥
दृष्टिसृष्टिवादियोंका कहना है कि जाग्रत्कालीन घटादिके ज्ञानोंकी भी स्वप्नकालीन पदार्थोंके ज्ञानोंकी नाई ही गति है, क्योंकि अर्थदृष्टिके पूर्वमें अर्थोंमें इन्द्रियोंका सन्निकर्ष नहीं है ॥४०॥
नहीं होता है, इसलिए जाग्रत् गज आदिके अनुभवके समान चक्षुरुन्मीलनके साथ अन्वय-व्यतिरेक देखा जाता है, अतः स्वाप्न पदार्थोंके चाक्षुषत्वानुभवको भ्रमात्मक कैसे मान सकते हैं ? तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'चक्षुसे रजत आदि देखता हूँ' इस भ्रमात्मक अनुभवके समान यह भी कोई स्वप्नभ्रम होगा, जो कि केवल साक्षीरूप स्वाप्नगज आदिके अनुभवमें चक्षु आदिका अन्वयव्यतिरेक या चक्षु आदिके अन्वय-व्यतिरेकसे युक्त मानसवृत्ति ( अर्थात् पूर्वमें कल्पतरुके वचनके अनुसार कल्पित स्वाप्न प्रपञ्चगोचर मानसवृत्तिमें चक्षु आदिका अनुविधान ) अध्यस्त होती है । क्योंकि ऐसा कौन दुर्घट भ्रमरूप कार्य है जिसे माया नहीं कर सकती हो, वहाँपर भी विशेषतः निद्रारूपसे परिणत माया तो सभी कुछ कर सकती है । कारण कि निद्रारूपसे परिणत जिस मायाके प्रभावसे स्वप्नमें रथरूपसे देखा गया पदार्थ क्षणमें मनुष्य बन जाता है, वही एक क्षणमें बिल्ली प्रतीत होता है और स्वप्नके द्रष्टाको पूर्वापरके विरोधकी भी प्रतीति नहीं होती है । इसलिए चक्षु आदिके अन्वय-व्यतिरेककी प्रतीति होनेपर भी जाग्रत् गज आदिका अनुभव ही चक्षु आदिसे जन्य है, स्वाप्नगजादिका अनुभव चक्षु आदिसे जन्य नहीं है ।
| ३५६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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दृष्टिसृष्टिवादिनस्तु कल्पितस्याऽज्ञातसत्त्वमनुपपन्नमिति कृत्स्नस्य जाग्रत्प्रपञ्चस्य दृष्टिसमसमयां सृष्टिमुपेत्य घटादिदृष्टेश्चक्षुःसन्निकर्षानुविधान-प्रतीतिं दृष्टेः पूर्वं घटाद्यभावेनासङ्गच्छमानां स्वप्नवदेवं समर्थयमानाः जाग्रद्गजाद्यनुभवोऽपि न चाक्षुष इत्याहुः ॥
निरुपाधिरथाऽन्यो वा कल्पकः प्रथमे भवेत् ॥
मुक्तस्य संसृतिः को वा द्वितीये मोहकल्पकः ॥४१॥
प्रपञ्चका कल्पक निरुपाधिक आत्मा है अथवा सोपाधिक आत्मा है ? प्रथम पक्षमें मुक्त पुरुषको संसारप्राप्ति होगी और द्वितीय पक्षमें अज्ञानका कल्पक कौन होगा॥४१॥
ननु दृष्टिसृष्टिमवलम्ब्य कृत्स्नस्य जाग्रत्प्रपञ्चस्य कल्पितत्वोपगमे कस्तस्य कल्पकः—निरुपाधिरात्मा वा, अविद्योपहितो वा ? नाद्यः, मोक्षेऽपि साधनान्तरनिरपेक्षस्य कल्पकस्य सत्त्वेन प्रपञ्चानुवृत्त्या संसारा-
* दृष्टिसृष्टिवादियोंका कहना है कि जो पदार्थ कल्पित है, उसकी अज्ञातसत्ता हो ही नहीं सकती है, अतः सम्पूर्ण जाग्रत्प्रपञ्चकी दृष्टि-समकालीन सृष्टि मानकर घटादिदृष्टिमें चक्षुके सन्निकर्षका अनुविधानप्रत्यय दृष्टिके पूर्वमें घटादिका अभाव होनेसे नहीं हो सकता है, अतः स्वप्नके समान जाग्रत् कालीन घट आदिका अनुभव भी चाक्षुष नहीं है ॥६॥
अब शङ्का होती है कि यदि दृष्टिसृष्टिका अवलम्बन करके सम्पूर्ण प्रपञ्च कल्पित माना जाय, तो उसकी कल्पना करनेवाला कौन है ? अविद्यारूप उपाधिसे रहित आत्मा है अथवा अविद्यारूप उपाधिसे उपहित आत्मा है ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि मोक्षमें भी, अन्य साधनोंकी अपेक्षा न करनेवाले निरुपाधिक कल्पक आत्माकी अवस्थिति होनेके कारण, प्रपञ्चकी अनुवृत्ति होगी, इससे मोक्ष और संसारमें कोई अन्तर नहीं रह जायगा। अविद्यासे उपहित आत्मा
* अनेक पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानसे जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, ऐसे शुद्धसत्त्व पुरुष स्वप्नप्रपञ्चसे जाग्रत्प्रपञ्चमें कुछ भी विलक्षणता नहीं देखते हैं, उन ब्रह्मविद्याभिलाषियोंका लक्ष्य करके स्वप्न और जाग्रत् अवस्था में समस्त संसारकी उत्पत्ति और लयका प्रतिपाद करनेवाली श्रुतिका अनुसरण करके दृष्टिसृष्टिवादका पूर्वाचार्योंने निरूपण किया है, इसी वादका अवलम्बन करके प्रसङ्गवश जाग्रत्पदार्थोंमें भी चाक्षुषत्वानुभवको भ्रान्त बतलाते हैं, यह भाव है।
[सृष्टिकल्पक-विचार] भाषानुवादसहित ३५७
विशेषप्रसङ्गात् । न द्वितीयः, अविद्याया अपि कल्पनीयत्वेन तत्कल्पनात्प्रागेव कल्पकसिद्धेर्वक्तव्यत्वात् ।
अत्राहुः पूर्वसंकॢप्तमोहयुक्तोऽन्यकल्पकः ॥
उक्त शङ्काके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि पूर्व-पूर्व कल्पित अविद्यासे युक्त आत्मा ही उत्तर उत्तर अविद्याका कल्पक है ।
अत्र केचिदाहुः—पूर्वपूर्वकल्पिताविद्योपहित उत्तरोत्तराविद्याकल्पकः । अनिदंप्रथमत्वाच्च कल्पककल्पनाप्रवाहस्य नानवस्थादोषः । न चाऽविद्याया अनादित्वोपगमाच्छुक्तिरजतवत् कल्पितत्वं न युज्यते, अन्यथा साद्यनादिविभागानुपपत्तेरिति वाच्यम्, यथा स्वप्ने कल्प्यमानं गोपुरादि किञ्चित्
संसारका कल्पक है, यह द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि अविद्या भी कल्पित ही है, इससे उस अविद्याकी कल्पनासे पहले ही कल्पक अविद्योपहित आत्माका अस्तित्व मानना होगा, [ परन्तु वह तो है नहीं, अतः अविद्याकी सृष्टि हो ही नहीं सकेगी ] ।
इस आक्षेपके परिहारमें कोई लोग कहते हैं कि पूर्व-पूर्व कल्पित अविद्यासे उपहित आत्मा ही उत्तर-उत्तर अविद्याका कल्पक है । यह अविद्या प्रथम कल्पित है यह बात नहीं होगी, इससे कल्पक और कल्पनाके प्रवाहमें अनवस्था दोष नहीं है, [ क्योंकि प्रपञ्चकल्पकत्वरूपसे श्रुतिसिद्ध अविद्योपहित आत्मा पूर्व-पूर्व अविद्याके बिना प्रपञ्चका कल्पक ही नहीं हो सकता है] । यदि यह शङ्का हो कि अविद्याका अनादिरूपसे स्वीकार किया गया है, इसलिए शुक्ति-रजतके समान उसको कल्पित नहीं मान सकते हैं, यदि हठात् उसे कल्पित मानोगे तो सादि * और अनादिका जो विभाग किया गया है, वह असङ्गत होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे स्वप्नमें कल्प्यमान किसी गोपुर आदिकी—
* 'जीव ईशो विशुद्धा चित्तथा जीवेशयोर्भिदा ।
अविद्या तच्चितोर्योगः षडस्माकमनादयः ॥'
जीव, ईश्वर, विशुद्ध ब्रह्म, जीव और ईश्वरका भेद, अविद्या, अविद्या और चैतन्यका सम्बन्ध, ये छः पदार्थ वेदान्तमतमें अनादि हैं और अन्य सादि हैं, यह श्लोकका अर्थ है, यदि अविद्या कल्पित मानी जाय, तो इस श्लोकसे अनादि और सादिका जो विभाग किया गया है, वह विरुद्ध होगा, यह भाव है ।
| ३५८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [द्वितीय परिच्छेद |
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पूर्वसिद्धत्वेन कल्प्यते, किञ्चिच्चेदानीमुत्पाद्यमानत्वेन, एवं जागरेऽपि किञ्चित् कल्प्यमानं सादित्वेन कल्प्यते, किञ्चिदन्यथेति तावता साद्यनादिविभागोपपत्तेः । एतेन कार्यकारणविभागोऽपि व्याख्यात इति ॥
अविद्याव्यतिरिक्ते वा दृष्टिसृष्टिरितीतेरे ॥४२॥
कुछ लोग कहते हैं कि अविद्या आदिसे अतिरिक्त पदार्थोंमें ही दृष्टिसृष्टि है ॥४२॥
अन्ये तु वस्तुतोऽनाद्येवाऽविद्याऽऽदि । तत्र दृष्टिसृष्टिनोपेयते, किन्तु ततोऽन्यत्र प्रपञ्चमात्रे इत्याहुः ॥
नन्वेवं श्रौतसर्गस्य कल्पकः को न कश्चन ॥
अध्यारोप्यापवादो हि निष्प्रपञ्चत्वसिद्धये ॥४३॥
यदि शङ्का हो कि श्रौत संसारका कल्पक कौन है ? तो कहिए कि—कोई नहीं है, क्योंकि निष्प्रपञ्च ब्रह्मकी सिद्धिके लिए ही आरोप करके अपवाद है ॥४३॥
पूर्वसिद्धरूपसे कल्पना की जाती है और किसीकी उसी कालमें उत्पद्यमानरूपसे कल्पना की जाती है, वैसे ही जागरणमें भी किसीकी—आकाशादि कल्प्यमान पदार्थकी—सादिरूपसे कल्पना की जाती है और किसी की—अविद्यादि पदार्थ की—अनादिरूपसे कल्पना की जाती है, इस कल्पनासे सादि और अनादि पदार्थोंके विभागकी उपपत्ति हो सकती है । साद्यनादि-विभागकी उपपत्तिका कथनसे कार्यकारणभावकी* भी उपपत्ति हुई समझनी चाहिए ।
कुछ लोग कहते हैं कि अविद्या जीव आदि छः पदार्थ वस्तुतः-अनादि ही हैं, उनमें दृष्टि-सृष्टि नहीं मानते हैं, किन्तु अविद्यादिसे भिन्न सम्पूर्ण कार्य प्रपञ्चमें दृष्टिसृष्टि मानते हैं, अतः दोष नहीं है ।
* प्रत्यक्षके प्रति घट आदि विषय जो कारण हैं, उनको घटादिप्रत्यक्षसे पूर्व अज्ञात ही मानना पड़ेगा, अन्यथा कार्य-कारणभावका विघात होगा, इसी प्रकार अविद्यासे उपहित एक चिदात्मा ही यदि अपनेमें संसारकी कल्पना करता है, तो संसारी जीवके एक होनेसे गुरुशिष्यविभाग और देवतिर्यगादिविभाग अनुपपन्न होगा, ऐसी शङ्का करके कहते हैं कि सादि-अनादि-विभागके युक्तिसिद्धत्वका प्रतिपादिपादन करनेसे यह मालूम होता है कि वस्तुतः प्रत्यक्ष के प्रति विषय के कारण न होनेपर भी उसकी कारणरूपसे कल्पना है, यह भाव है ।
सृष्टिके कल्पकका विचार ] भाषानुवादसहित ३५९
नन्वेवमपि श्रुतिमात्रप्रतीतस्य वियदादिसर्गतत्क्रमादेः कः कल्पकः ? न कोऽपि । किमालम्बना तर्हि 'आत्मन आकाशः सम्भूतः' इत्यादि-श्रुतिः ? निष्प्रपञ्चब्रह्मात्मैक्यावलम्बनेत्यवेहि । अध्यारोपापवादाभ्यां
यदि शङ्का हो कि अविद्यासे उपहित आत्मा पूर्वोक्त युक्तिसे प्रत्यक्ष वस्तुका कल्पक भले ही † हो, परन्तु केवल श्रुतिमात्रसे प्रतीत आकाश आदि प्रपञ्च और उनके क्रम आदिका कल्पक कौन होगा ? अर्थात् कोई नहीं होगा, तो यह शङ्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि वस्तुतः उसका कोई कल्पक नहीं है। इस परिस्थितिमें पूर्वपक्षी पूछता है कि 'आत्मनः०' (आत्मासे आकाशकी उत्पत्ति हुई) इत्यादि श्रुति निरालम्ब होगी, नहीं, निरालम्ब नहीं होगी, क्योंकि पूर्वपक्षीको यह जानना चाहिए कि उन श्रुतियोंका आलम्बन प्रपञ्चशून्य ब्रह्म और जीवका ऐक्य है, [ अतः उनके प्रामाण्यके विषयमें पूर्वपक्ष नहीं हो सकता है ]। अध्यारोप और अपवादसे ❊ प्रपञ्चशून्य ब्रह्मकी अवगति
- 'दृष्टिसमये एव प्रपञ्चसृष्टिः' (दृष्टिकालमें ही प्रपञ्च-सृष्टि) इस मतमें दृष्टिशब्दसे प्रत्यक्षप्रतीति ही विवक्षित है, परोक्षप्रतीति विवक्षित नहीं है क्योंकि प्रत्यक्षप्रतीति ही विषयाभिन्न होनेसे प्रातिभासिक पदार्थकी ग्राहक हो सकती है, इस परिस्थितिमें वियदादि पदार्थ प्रातिभासिक सिद्ध नहीं होंगें, क्योंकि वे केवल श्रुतिमात्रगम्य हैं, यदि आकाशादि प्रपञ्च—श्रुति और प्रत्यक्ष दोनोंसे—प्रतीत होते, तो प्रत्यक्षके विषय होनेसे घटादिके समान वे आकाशादि पदार्थ भी प्रातिभासिक सिद्ध होते, परन्तु ऐसा होता नहीं, अतः आकाशादि, जो केवल श्रुतिसे सिद्ध हैं, उनका कल्पक कौन है ? यह प्रश्नकर्ताका भाव है।
† अध्यारोपशब्दका अर्थ है किसी सत्यवस्तुमें असत्यवस्तुका आरोप, जैसे कि सत्य रज्जुमें सर्पका आरोप करके ही 'यह सर्प है' ऐसी प्रतीति होती है । और इसी आरोपित वस्तुका बाध अपवाद है । यह बाध श्रौत, यौक्तिक और प्रत्यक्ष भेदसे तीन प्रकारका है 'नेह नानास्ति' इत्यादि बाध श्रौत है, कटक, कुण्डल आदि अपने उपादान भूत सुवर्णसे भिन्न नहीं है, ऐसा निश्चय करके दृश्यमान घटादिमें मिथ्यात्वके अवधारणसे प्रपञ्चमें ब्रह्मात्मकत्वका जो निश्चय होता है, यह यौक्तिक बाध है और यह रज्जु है, सर्प नहीं, इस प्रत्यक्षसे जैसे सर्पका बाध होता है, वैसे ही तत्त्वमस्यादि वाक्यसे उत्पन्न सच्चिदानन्दात्मक ब्रह्म मैं हूँ, इस प्रत्यक्षसे ब्रह्मात्मत्वनिश्चय होता है, वह प्रत्यक्षबाध है। इस प्रकारके अध्यारोप और अपवाद से निष्प्रपञ्च ब्रह्मकी प्रतिपत्ति होती है, यह भाव है, लोकमें जैसे आकाशस्वरूपके परिज्ञान करानेके लिए प्रवृत्त पुरुष पहले नील्य और विशालता आदिका ग्रहण कराकर अनन्तर 'यह आकाश वस्तुतः नील नहीं है' इस प्रकारके अपवादसे नीरूप, व्यापक और उदासीन गगनतत्त्वका निश्चय कराता है, वैसे ही वेदान्त भी पहले वियदादिका कारण
| ३६० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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निष्प्रपञ्चब्रह्मप्रतिपत्तिर्भवतीति तत्प्रतिपत्त्युपायतया श्रुतिषु सृष्टिप्रलयोपन्यासः, न तात्पर्येणेति भाष्याद्युद्घोषः। व्यर्थस्तर्हि तात्पर्याभावे वियत्प्राणपादयोर्वियदादिसर्गतत्क्रमादिविषयश्रुतीनां परस्परविरोधपरिहाराय यत्नः ? न व्यर्थः। न्यायव्युत्पत्त्यर्थमभ्युपेत्य तात्पर्यं तत्तदुच्यते।
सूत्रेषु सृष्टिचिन्ता तु कृत्वाचिन्ताप्रदर्शनम् ॥
स्वाप्नवत्फलसंवादः शुद्धिर्वा कर्मणां फलम् ॥४४॥
सूत्रोंमें सृष्टिका विचार तो, कृत्वाचिन्ताका प्रदर्शन ही है, और वैदिक कर्मोंका फलसंवाद स्वप्नके समान है, अथवा उनका फल अन्तःकरणकी शुद्धि है ॥४४॥
उक्तं हि शास्त्रदर्पणे—
'श्रुतीनां सृष्टितात्पर्यं स्वीकृत्येदमिहेरितम् ।
ब्रह्मात्मैक्यपरत्वात्तु तासां तन्नैव विद्यते ॥' इति ।
होती है, इसलिए समस्त प्रपञ्चशून्य ब्रह्मकी अवगतिके उपायस्वरूपसे श्रुतियोंमें सृष्टि और प्रलयका कथन किया गया है, वस्तुतः सृष्टि आदिका प्रतिपादन करना श्रुतियोंका तात्पर्यविषयीभूत अर्थ नहीं है, इस प्रकार भाष्य आदि बड़े बड़े निबन्धोंमें सहस्रशः प्रतिपादन किया गया है। यदि वियदादिसर्ग और उसके क्रमके प्रतिपादनमें श्रुतियोंका तात्पर्य नहीं है, तो वियत्पाद और प्राणपादमें परस्पर विरोधके परिहारमें जिस प्रयत्नका अवलम्बन सूत्रकार, भाष्यकार प्रभृतिने किया है, वह व्यर्थ होगा। नहीं, व्यर्थ नहीं होगा, क्योंकि न्यायोंकी व्युत्पत्तिके लिए कथञ्चित् तात्पर्यका अङ्गीकार करके वियत्पाद और प्राणपादमें यत्नानुष्ठान किया है।
* शास्त्र दर्पणमें कहा भी है—
'श्रुतीनां सृष्टि०' ('स इमाँल्लोकानसृजत' इत्यादि सृष्टिप्रतिपादक
ब्रह्म है, ऐसा सृष्टि-वाक्योंसे ग्रहण करा कर पीछे निषेधवाक्योंसे आरोपित संसार-कारणत्वके निषेधसे जीव और प्रपञ्चशून्य ब्रह्मके ऐक्यका—प्रतिपादन करते हैं। इसलिए सृष्टिवाक्योंका—निषेधवाक्योंमें अपेक्षित निषेध्योंका समर्पण करके, उनके साथ एकवाक्यतापन्न होकर निष्प्रपञ्च ब्रह्मका प्रतिपादन ही—प्रयोजन है, स्वार्थमात्र प्रतिपादनप्रयोजन नहीं है, यह भाव है।
* जिन अनुभवानन्द स्वामीजीके शिष्य श्रीमलानन्द स्वामीजीने भामतीके ऊपर कल्पतरु व्याख्या की है, उन्हींके स्वरचित ब्रह्मसूत्रानुगामी 'शास्त्रदर्पण' नामक ग्रन्थमें यह श्लोक है, [ द्रष्टव्य—अ० १ पा० ४ सू० ४ पृ० ८७ वाणीविलास प्रेस श्रीरङ्गम् ]।
सृष्टिके कल्पकका विचार ] भाषानुवादसहित ३६१
ज्योतिष्टोमादिश्रुतिबोधितानुष्ठानात् फलसिद्धिः स्वाप्नश्रुतिबोधिता- नुष्ठानप्रयुक्तफलसंवादतुल्या । ज्योतिष्टोमादिश्रुतीनां च सत्त्वशुद्धिद्वारा ब्रह्मणि तात्पर्यान्नाऽप्रामाण्यमित्यादिदृष्टिसृष्टिव्युत्पादनप्रक्रियाप्रपञ्चस्त्वाकर- ग्रन्थेषु द्रष्टव्यः । अयमेको दृष्टिसमसमया विश्वसृष्टिरिति दृष्टिसृष्टिवादः ।
दृष्टिरेव हि विश्वस्य सृष्टिरित्यपरा विधा ॥
ज्ञानस्वरूपमेवाऽऽहुरित्येतत्स्मृतियायिनः ॥४५॥
स्मृत्यनुसारी कुछ लोग दृष्टि ही संसारसृष्टि है, ऐसा दृष्टिसृष्टिका अन्य प्रकार है और यह संसार ज्ञानस्वरूप है, ऐसा कहते हैं ॥४५॥
श्रुतियोंका स्वार्थमें तात्पर्य मानकर ही वियत्पाद और प्राणपादमें विरोधका समाधान किया गया है, क्योंकि सृष्टिप्रतिपादक श्रुतियोंका तात्पर्य वस्तुतः ब्रह्मात्मैक्यमें ही होनेसे सृष्टिके प्रतिपादनमें उनका अभिप्राय है ही नहीं ) ।
'ज्योतिष्टोमेन यजेत स्वर्गकामः' ( स्वर्गको † चाहनेवाला ज्योतिष्टोम याग करे ) इत्यादि श्रुतियोंसे प्रतिपादित अनुष्ठानसे स्वर्गरूप फलकी सिद्धि वैसी ही है, जैसी कि स्वप्नावस्थामें उक्त श्रुतिकी कल्पना करके उससे ज्योतिष्टोम आदिका परिज्ञान प्राप्त कर उसके अनुष्ठानसे फलकी प्राप्ति हो अर्थात् जैसे पुरुष स्वप्नकालमें परिकल्पित श्रुतियोंसे स्वर्ग आदिके साधनविशेषोंको जानकर उनके अनुष्ठानसे मिथ्या ही फल प्राप्त करता है, वैसे ही जागरणमें भी उन श्रुतियोंसे साधनविशेषोंकी अवगति द्वारा उनका अनुष्ठान करके मिथ्या स्वर्गादि फल प्राप्त करता है, यह भाव है । और अन्तःकरणकी शुद्धि द्वारा ज्योतिष्टोमादि यागकी प्रतिपादक श्रुतियाँ‡ ब्रह्मका ही परिज्ञान कराती हैं, अतः वे निष्प्रमाण नहीं हैं, इत्यादि दृष्टिसृष्टिवादका विवेचन-प्रकार आकर ग्रन्थोंमें देखना चाहिए । एक यह—दृष्टि समकालीन ही संसारकी उत्पत्ति है, इस प्रकारका—दृष्टिसृष्टिवाद है ।
† 'यन्न दुःखेन सम्भिन्नं न च ग्रस्तमनन्तरम् । अभिलाषोपनीतञ्च तत्सुखं स्वःपदास्पदम्' अर्थात् जिस सुखमें दुःखकी मात्रा न हो, जिसका नाश न हो—जो चिरस्थायी हो और जो इच्छानुसार प्राप्त होता हो, वह सुख स्वर्गशब्दसे कहा जाता है ।
‡ कर्मप्रतिपादक वाक्योंसे और उपासनाप्रतिपादक वाक्योंसे विहित कर्म और उपासनाओंका अनुष्ठान करनेवाले पुरुषका ही चित्त शुद्ध होता है, शुद्धचित्त अधिकारी पुरुषको वेदान्त-शास्त्र ब्रह्मज्ञान कराता है, अतः कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्ड अधिकारित्वकी प्राप्ति द्वारा ब्रह्मज्ञानके ही अङ्ग हैं, इसलिए उन दोनों काण्डोंका भी ब्रह्ममें ही तात्पर्य है, स्वर्गसाधनत्वरूप स्वार्थमें नहीं है, अतः उनमें अप्रामाण्य शङ्का नहीं है, यह भाव है ।
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| ३६२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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अन्यस्तु दृष्टिरैव विश्वसृष्टिः । दृश्यस्य दृष्टिभेदे प्रमाणाभावात् ।
‘ज्ञानस्वरूपमेवाऽऽहुर्जगदेतद्विचक्षणाः ।
अर्थस्वरूपं भ्राम्यन्तः पश्यन्त्यन्ये कुदृष्टयः ॥’
इति स्मृतेश्चेति सिद्धान्तमुक्तावल्यादिदर्शितो दृष्टिसृष्टिवादः।
सृष्टिदृष्टिं परे प्राहुः संस्काराद्यनपेक्षणात् ॥
तथाऽपि विश्वं मिथ्यैव बाध्यत्वाच्छ्रुतिमानतः ॥४६॥
यद्यपि संस्कार आदिकी अपेक्षा न होनेके कारण कुछ लोग सृष्टिदृष्टिवादका ही आश्रयण करते हैं, तथापि श्रुति बाधित होनेसे संसार मिथ्या है ॥४६॥
द्विविधेऽपि दृष्टिसृष्टिवादे मनःप्रत्ययमलभमानाः केचिदाचार्याः सृष्टिदृष्टिवादं रोचयन्ते । श्रुतिदर्शितेन क्रमेण परमेश्वरसृष्टमज्ञातसत्तायुक्तमेव विश्वं तत्तद्विषयप्रमाणावतरणे तस्य तस्य दृष्टिसिद्धिरिति ।
* सिद्धान्तमुक्तावली आदिमें दूसरे ही दृष्टिसृष्टिवादका निरूपण किया गया है—दृष्टि ही विश्वसृष्टि है, [अर्थात् स्वप्रकाशज्ञानस्वरूपा दृष्टि ही प्रपञ्चकी सृष्टि है, दृष्टिसमकालीन अन्य प्रपञ्चकी सृष्टि नहीं है, क्योंकि] दृश्य पदार्थको स्वप्रकाशज्ञानस्वरूपसे पृथक् माननेमें कोई प्रमाण नहीं है, और इस अर्थकी प्रतिपादिका स्मृति भी है कि विवेकी पुरुष इस प्रत्यक्षसिद्ध जगत्को ज्ञानात्मक ही कहते हैं, परन्तु कुछ कुदृष्टि-भ्रान्त पुरुष—इसी ज्ञानरूप जगत्को ज्ञानसत्तासे भिन्न देखते हैं ।
उक्त दो प्रकारके दृष्टिसृष्टिवादमें विश्वास न रखते हुए† कुछ आचार्य सृष्टिदृष्टिवादमें अपनी अभिरुचि रखते हैं । श्रुतिमें बतलाये गये क्रमके अनुसार परमेश्वरसे बना हुआ जगत् अज्ञात सत्तासे ही युक्त है, और उन-उन विषयोंमें प्रमाणोंकी प्रवृत्ति होनेपर उन-उन विषयोंका ज्ञान सिद्ध होता है ।
* द्रष्टव्य—जीवानन्द विद्यासागर द्वारा कलकत्तामें मुद्रित सिद्धान्तमुक्तावलीके ३१५ वें पेजमें इस दृष्टिसृष्टिवादका विस्तारसे वर्णन किया गया है—कोऽयं विकारः द्वैतं तद्दृष्टिर्वा? इत्यादिसे ।
† मनःप्रत्ययशब्दका अर्थ है—विश्वास अर्थात् दृष्टिसृष्टिवादमें प्रामाणिकत्वका निश्चय नहीं है, इसमें हेतु यह है कि जाग्रत्प्रपञ्चमें प्रातिभासिकत्वका अङ्गीकार, आकाश आदि सृष्टिका अपलाप, कर्मोपासनाकाण्डमें वर्णित अर्थोंके अनुष्ठानसे होनेवाले स्वर्ग आदिका अपलाप आदि। अतः सृष्टिदृष्टिवाद ही युक्त है अर्थात् श्रुतिमें जिस आकाशादिक्रमसे सृष्टिका प्रतिपादन किया गया है, उसी
सृष्टिके कल्पकका विचार] भाषानुवादसहित ३६३
न चैवं प्रपञ्चस्य कल्पितत्वाभावे श्रुत्यादिप्रतिपन्नस्य सृष्टिप्रलयादिमतः प्रत्यक्षादिप्रतिपन्नार्थक्रियाकारिणश्च तस्य सत्यत्वमेवाऽभ्युपगतं स्यादिति वाच्यम्, शुक्तिरजतादिवत् सम्प्रयोगसंस्कारदोषरूपेण, अधिष्ठानज्ञानसंस्कारदोषरूपेण वा कारणत्रयेणाऽजन्यतया कल्पनासमसमयत्वाभावेऽपि ज्ञानैकनिव-
यदि शङ्का हो कि * उक्त रीतिसे प्रपञ्चको यदि कल्पित न माना जाय, तो श्रुति, स्मृति आदिसे ज्ञात सृष्टि, प्रलय आदिसे युक्त तथा प्रत्यक्ष प्रमाणसे ज्ञात अर्थक्रियाकारित्वसे युक्त संसारमें सत्यता ही स्वीकृत होगी ? तो यह शङ्का † युक्त नहीं है, क्योंकि यद्यपि शुक्ति-रजत आदिके समान सम्प्रयोग, संस्कार और दोषरूप अथवा अधिष्ठानज्ञान, संस्कार और दोषरूप तीन कारणोंसे जन्य न होनेके कारण वियदादि प्रपञ्च कल्पनासमानकालीन नहीं है, तथापि ‡
क्रमसे परमेश्वरसे सृष्टि उत्पन्न होती है, और वह अज्ञात सत्तावाली है, तत्-तत् विषयोंमें तत्-तत् प्रमाणोंकी प्रवृत्ति होनेके अनन्तर आवरणभङ्ग द्वारा तत्-तत् विषयोंका अपरोक्षावभास (दृष्टि) होता है, अतः दृष्टि ही सृष्टि नहीं है, यह सृष्टिदृष्टिवादियोंका भाव है।
* शङ्काका तात्पर्य यह है कि सृष्टिदृष्टिवादके अनुसार प्रपञ्च कल्पित न माना जाय, तो प्रपञ्च सत्य ही सिद्ध होगा, क्योंकि प्रपञ्च सत्य है, श्रुतिसिद्ध होनेसे, ब्रह्मके समान, यह अनुमान प्रमाण है। यद्यपि प्रपञ्च स्वरूपतः प्रत्यक्षसे सिद्ध है, तथापि सृष्टि, प्रलय आदियुक्तत्वरूपसे श्रुति, स्मृति आदिसे ही सिद्ध है, इसी प्रकार प्रपञ्च सत्य है, अर्थक्रियाकारी होनेसे, सृष्टि आदि अर्थक्रिया-कारी ब्रह्मके समान, यह हेतु स्वरूपासिद्ध भी नहीं है, क्योंकि पृथ्वी, जल आदिमें उक्त हेतु प्रत्यक्षसे सिद्ध ही है।
† समाधानका तात्पर्य यह है—यद्यपि आकाशा आदि प्रपञ्चमें कल्पना-समान-कालिकत्व नहीं है, जिसे कि दृष्टिदृष्टिवादियोंने माना है, क्योंकि वहींपर कल्पनासमानकालिकत्व होता है, जहाँपर सम्प्रयोग आदि कारणत्रयजन्यत्व रहता है, तथापि पारमार्थिक सत्यत्वसे विरुद्ध मिथ्यात्व, जिसका (तीन प्रकारोंसे मूलमें निर्वचन किया है) वियदादि प्रपञ्चमें वर्तमान है, अतः इस वादमें भी प्रपञ्च पारमार्थिक सत्य नहीं हो सकता है।
‡ केवल ज्ञाननिवर्त्यत्व—जिसका बाध केवल अधिष्ठानतत्त्वसाक्षात्कार हीसे हो, वह मिथ्यात्व है। जैसे शुक्तिमें उत्पन्न रजतकी निवृत्ति शुक्तिरूप अधिष्ठानके तत्त्वसाक्षात्कारसे होती है, अतः वह मिथ्या है।
सदसद्विलक्षणत्व—जो सत् (त्रिकालावाधित) से और असत् (किसी समयमें भी प्रतीत न होनेवाले) से विलक्षण हो, वह मिथ्या है, जैसे शुक्तिरजत न सत् है और न शशशृङ्गके समान असत् है, अतः शुक्तिरजत मिथ्या है। केवल सद्विलक्षणको मिथ्या कहनेसे असत् शशशृङ्गमें दोष होगा और असद्विलक्षणमात्र कहनेसे ब्रह्ममें अतिव्याप्ति होगी, इसलिए सदस-द्विलक्षण मिथ्याका लक्षण कहा गया है।