भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 388
३५८सिद्धान्तलेशसंग्रह[द्वितीय परिच्छेद

पूर्वसिद्धत्वेन कल्प्यते, किञ्चिच्चेदानीमुत्पाद्यमानत्वेन, एवं जागरेऽपि किञ्चित् कल्प्यमानं सादित्वेन कल्प्यते, किञ्चिदन्यथेति तावता साद्यनादिविभागोपपत्तेः । एतेन कार्यकारणविभागोऽपि व्याख्यात इति ॥

अविद्याव्यतिरिक्ते वा दृष्टिसृष्टिरितीतेरे ॥४२॥

कुछ लोग कहते हैं कि अविद्या आदिसे अतिरिक्त पदार्थोंमें ही दृष्टिसृष्टि है ॥४२॥

अन्ये तु वस्तुतोऽनाद्येवाऽविद्याऽऽदि । तत्र दृष्टिसृष्टिनोपेयते, किन्तु ततोऽन्यत्र प्रपञ्चमात्रे इत्याहुः ॥

नन्वेवं श्रौतसर्गस्य कल्पकः को न कश्चन ॥
अध्यारोप्यापवादो हि निष्प्रपञ्चत्वसिद्धये ॥४३॥

यदि शङ्का हो कि श्रौत संसारका कल्पक कौन है ? तो कहिए कि—कोई नहीं है, क्योंकि निष्प्रपञ्च ब्रह्मकी सिद्धिके लिए ही आरोप करके अपवाद है ॥४३॥


पूर्वसिद्धरूपसे कल्पना की जाती है और किसीकी उसी कालमें उत्पद्यमानरूपसे कल्पना की जाती है, वैसे ही जागरणमें भी किसीकी—आकाशादि कल्प्यमान पदार्थकी—सादिरूपसे कल्पना की जाती है और किसी की—अविद्यादि पदार्थ की—अनादिरूपसे कल्पना की जाती है, इस कल्पनासे सादि और अनादि पदार्थोंके विभागकी उपपत्ति हो सकती है । साद्यनादि-विभागकी उपपत्तिका कथनसे कार्यकारणभावकी* भी उपपत्ति हुई समझनी चाहिए ।

कुछ लोग कहते हैं कि अविद्या जीव आदि छः पदार्थ वस्तुतः-अनादि ही हैं, उनमें दृष्टि-सृष्टि नहीं मानते हैं, किन्तु अविद्यादिसे भिन्न सम्पूर्ण कार्य प्रपञ्चमें दृष्टिसृष्टि मानते हैं, अतः दोष नहीं है ।


* प्रत्यक्षके प्रति घट आदि विषय जो कारण हैं, उनको घटादिप्रत्यक्षसे पूर्व अज्ञात ही मानना पड़ेगा, अन्यथा कार्य-कारणभावका विघात होगा, इसी प्रकार अविद्यासे उपहित एक चिदात्मा ही यदि अपनेमें संसारकी कल्पना करता है, तो संसारी जीवके एक होनेसे गुरुशिष्यविभाग और देवतिर्यगादिविभाग अनुपपन्न होगा, ऐसी शङ्का करके कहते हैं कि सादि-अनादि-विभागके युक्तिसिद्धत्वका प्रतिपादिपादन करनेसे यह मालूम होता है कि वस्तुतः प्रत्यक्ष के प्रति विषय के कारण न होनेपर भी उसकी कारणरूपसे कल्पना है, यह भाव है ।