भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 389, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 389

सृष्टिके कल्पकका विचार ] भाषानुवादसहित ३५९


नन्वेवमपि श्रुतिमात्रप्रतीतस्य वियदादिसर्गतत्क्रमादेः कः कल्पकः ? न कोऽपि । किमालम्बना तर्हि 'आत्मन आकाशः सम्भूतः' इत्यादि-श्रुतिः ? निष्प्रपञ्चब्रह्मात्मैक्यावलम्बनेत्यवेहि । अध्यारोपापवादाभ्यां

यदि शङ्का हो कि अविद्यासे उपहित आत्मा पूर्वोक्त युक्तिसे प्रत्यक्ष वस्तुका कल्पक भले ही † हो, परन्तु केवल श्रुतिमात्रसे प्रतीत आकाश आदि प्रपञ्च और उनके क्रम आदिका कल्पक कौन होगा ? अर्थात् कोई नहीं होगा, तो यह शङ्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि वस्तुतः उसका कोई कल्पक नहीं है। इस परिस्थितिमें पूर्वपक्षी पूछता है कि 'आत्मनः०' (आत्मासे आकाशकी उत्पत्ति हुई) इत्यादि श्रुति निरालम्ब होगी, नहीं, निरालम्ब नहीं होगी, क्योंकि पूर्वपक्षीको यह जानना चाहिए कि उन श्रुतियोंका आलम्बन प्रपञ्चशून्य ब्रह्म और जीवका ऐक्य है, [ अतः उनके प्रामाण्यके विषयमें पूर्वपक्ष नहीं हो सकता है ]। अध्यारोप और अपवादसे ❊ प्रपञ्चशून्य ब्रह्मकी अवगति


  • 'दृष्टिसमये एव प्रपञ्चसृष्टिः' (दृष्टिकालमें ही प्रपञ्च-सृष्टि) इस मतमें दृष्टिशब्दसे प्रत्यक्षप्रतीति ही विवक्षित है, परोक्षप्रतीति विवक्षित नहीं है क्योंकि प्रत्यक्षप्रतीति ही विषयाभिन्न होनेसे प्रातिभासिक पदार्थकी ग्राहक हो सकती है, इस परिस्थितिमें वियदादि पदार्थ प्रातिभासिक सिद्ध नहीं होंगें, क्योंकि वे केवल श्रुतिमात्रगम्य हैं, यदि आकाशादि प्रपञ्च—श्रुति और प्रत्यक्ष दोनोंसे—प्रतीत होते, तो प्रत्यक्षके विषय होनेसे घटादिके समान वे आकाशादि पदार्थ भी प्रातिभासिक सिद्ध होते, परन्तु ऐसा होता नहीं, अतः आकाशादि, जो केवल श्रुतिसे सिद्ध हैं, उनका कल्पक कौन है ? यह प्रश्नकर्ताका भाव है।

† अध्यारोपशब्दका अर्थ है किसी सत्यवस्तुमें असत्यवस्तुका आरोप, जैसे कि सत्य रज्जुमें सर्पका आरोप करके ही 'यह सर्प है' ऐसी प्रतीति होती है । और इसी आरोपित वस्तुका बाध अपवाद है । यह बाध श्रौत, यौक्तिक और प्रत्यक्ष भेदसे तीन प्रकारका है 'नेह नानास्ति' इत्यादि बाध श्रौत है, कटक, कुण्डल आदि अपने उपादान भूत सुवर्णसे भिन्न नहीं है, ऐसा निश्चय करके दृश्यमान घटादिमें मिथ्यात्वके अवधारणसे प्रपञ्चमें ब्रह्मात्मकत्वका जो निश्चय होता है, यह यौक्तिक बाध है और यह रज्जु है, सर्प नहीं, इस प्रत्यक्षसे जैसे सर्पका बाध होता है, वैसे ही तत्त्वमस्यादि वाक्यसे उत्पन्न सच्चिदानन्दात्मक ब्रह्म मैं हूँ, इस प्रत्यक्षसे ब्रह्मात्मत्वनिश्चय होता है, वह प्रत्यक्षबाध है। इस प्रकारके अध्यारोप और अपवाद से निष्प्रपञ्च ब्रह्मकी प्रतिपत्ति होती है, यह भाव है, लोकमें जैसे आकाशस्वरूपके परिज्ञान करानेके लिए प्रवृत्त पुरुष पहले नील्य और विशालता आदिका ग्रहण कराकर अनन्तर 'यह आकाश वस्तुतः नील नहीं है' इस प्रकारके अपवादसे नीरूप, व्यापक और उदासीन गगनतत्त्वका निश्चय कराता है, वैसे ही वेदान्त भी पहले वियदादिका कारण

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या) · पृष्ठ 389, कुल 590 में से · BharatKosha