सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३६० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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निष्प्रपञ्चब्रह्मप्रतिपत्तिर्भवतीति तत्प्रतिपत्त्युपायतया श्रुतिषु सृष्टिप्रलयोपन्यासः, न तात्पर्येणेति भाष्याद्युद्घोषः। व्यर्थस्तर्हि तात्पर्याभावे वियत्प्राणपादयोर्वियदादिसर्गतत्क्रमादिविषयश्रुतीनां परस्परविरोधपरिहाराय यत्नः ? न व्यर्थः। न्यायव्युत्पत्त्यर्थमभ्युपेत्य तात्पर्यं तत्तदुच्यते।
सूत्रेषु सृष्टिचिन्ता तु कृत्वाचिन्ताप्रदर्शनम् ॥
स्वाप्नवत्फलसंवादः शुद्धिर्वा कर्मणां फलम् ॥४४॥
सूत्रोंमें सृष्टिका विचार तो, कृत्वाचिन्ताका प्रदर्शन ही है, और वैदिक कर्मोंका फलसंवाद स्वप्नके समान है, अथवा उनका फल अन्तःकरणकी शुद्धि है ॥४४॥
उक्तं हि शास्त्रदर्पणे—
'श्रुतीनां सृष्टितात्पर्यं स्वीकृत्येदमिहेरितम् ।
ब्रह्मात्मैक्यपरत्वात्तु तासां तन्नैव विद्यते ॥' इति ।
होती है, इसलिए समस्त प्रपञ्चशून्य ब्रह्मकी अवगतिके उपायस्वरूपसे श्रुतियोंमें सृष्टि और प्रलयका कथन किया गया है, वस्तुतः सृष्टि आदिका प्रतिपादन करना श्रुतियोंका तात्पर्यविषयीभूत अर्थ नहीं है, इस प्रकार भाष्य आदि बड़े बड़े निबन्धोंमें सहस्रशः प्रतिपादन किया गया है। यदि वियदादिसर्ग और उसके क्रमके प्रतिपादनमें श्रुतियोंका तात्पर्य नहीं है, तो वियत्पाद और प्राणपादमें परस्पर विरोधके परिहारमें जिस प्रयत्नका अवलम्बन सूत्रकार, भाष्यकार प्रभृतिने किया है, वह व्यर्थ होगा। नहीं, व्यर्थ नहीं होगा, क्योंकि न्यायोंकी व्युत्पत्तिके लिए कथञ्चित् तात्पर्यका अङ्गीकार करके वियत्पाद और प्राणपादमें यत्नानुष्ठान किया है।
* शास्त्र दर्पणमें कहा भी है—
'श्रुतीनां सृष्टि०' ('स इमाँल्लोकानसृजत' इत्यादि सृष्टिप्रतिपादक
ब्रह्म है, ऐसा सृष्टि-वाक्योंसे ग्रहण करा कर पीछे निषेधवाक्योंसे आरोपित संसार-कारणत्वके निषेधसे जीव और प्रपञ्चशून्य ब्रह्मके ऐक्यका—प्रतिपादन करते हैं। इसलिए सृष्टिवाक्योंका—निषेधवाक्योंमें अपेक्षित निषेध्योंका समर्पण करके, उनके साथ एकवाक्यतापन्न होकर निष्प्रपञ्च ब्रह्मका प्रतिपादन ही—प्रयोजन है, स्वार्थमात्र प्रतिपादनप्रयोजन नहीं है, यह भाव है।
* जिन अनुभवानन्द स्वामीजीके शिष्य श्रीमलानन्द स्वामीजीने भामतीके ऊपर कल्पतरु व्याख्या की है, उन्हींके स्वरचित ब्रह्मसूत्रानुगामी 'शास्त्रदर्पण' नामक ग्रन्थमें यह श्लोक है, [ द्रष्टव्य—अ० १ पा० ४ सू० ४ पृ० ८७ वाणीविलास प्रेस श्रीरङ्गम् ]।