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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 378
३४८सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ द्वितीय परिच्छेद

भेदाभिव्यक्त्या प्रमातृचैतन्यस्याऽपि 'इदं पश्यामि' इति व्यवहार इत्याहुः।
आद्येऽहङ्कृत्युपहितचिदाभासास्पदं परे।
अहन्ताधीप्रसक्तिस्तु नाहङ्काराविशेषणात् ॥ ३३ ॥

अहङ्कारसे उपहित चैतन्याभास स्वप्नका अधिष्ठान है, अतः आद्यपक्षमें—अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्याधिष्ठानत्वपक्षमें—अहङ्कारका विशेषण रूपसे प्रवेश न होनेके कारण 'अहं गजः' इत्यादि प्रतीति नहीं होती है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ ३३ ॥

अपरे तु द्वितीयं पक्षं समर्थयन्ते—अहङ्कारावच्छिन्नचैतन्यमधिष्ठानमित्यहङ्कारस्य विशेषणभावेनाऽधिष्ठानकोटिप्रवेशो नोपेयते, किं त्वहङ्कारोपहितं तत्प्रतिविम्बरूपचैतन्यमात्रमधिष्ठानमिति, अतो न'अहं गजः' इत्याद्यनुभवप्रसङ्ग इति।
इदंवृत्तिचिदाभासे इत्थं रजतकल्पनात् ।
नाहं रजतमस्तीत्तदनन्यनरवेद्यता ॥ ३४ ॥

इसी प्रकार इदमाकार वृत्तिसे उपहित चिदाभासमें रजतकी कल्पना होनेसे 'अहं रजतम्' ऐसी प्रतीति नहीं होती है और अन्य पुरुष वेद्यता भी नहीं है ॥ ३४ ॥

एवं शुक्तिरजतमपि शुक्तीदमंशावच्छिन्नचैतन्यप्रतिबिम्बे वृत्तिमदन्तःकरणगतेऽध्यस्यते। शुक्तीदमंशावच्छिन्नबिम्बचैतन्ये सर्वसाधारणे तस्या-


अभेदाभिव्यक्तिसे प्रमातृचैतन्यमें भी 'मैं यह देखता हूँ' इस प्रकार व्यवहार देखा जाता है।

कुछ लोग तो द्वितीय पक्षका—अहङ्कारसे अवच्छिन्न चैतन्य स्वप्नाध्यासका अधिष्ठान है, इसीका—समर्थन करते हैं—अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्य अधिष्ठान है, इससे अहङ्कारका अधिष्ठानकोटिमें विशेषणरूपसे प्रवेश नहीं करते हैं, किन्तु अहङ्कारसे उपहित अहङ्कारमें प्रतिबिम्बित चैतन्य ही अधिष्ठान होता है, ऐसा अङ्गीकार करते हैं, इसलिए 'अहं गजः' (मैं हाथी हूँ) ऐसा अनुभव नहीं होता है।

इसी प्रकार शुक्तिरजत भी शुक्तिके इदमंशावच्छिन्न चैतन्यके वृत्ति युक्त अन्तःकरणमें पड़े हुए प्रतिबिम्बमें अध्यस्त होता है, शुक्तीदमंशावच्छिन्न बिम्ब


सम्बन्ध होनेपर प्रमातृत्वकी प्राप्ति होनेपर प्रमातामें स्वप्नद्रष्टृत्वकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है।