सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 379, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वाप्न पदार्थोंके अनुभवप्रकारका विचार] भाषानुवादसहित ३४९
ध्यासे सुखादिवदनन्यवेद्यत्वाभावप्रसङ्गादिति केचित् ।
अन्ये तु बिम्बचैतन्ये रजताध्यासवादिनः ।
प्राहुस्तत्तदविद्योत्थन्तत्तत्पुरुषगोचरम् ॥ ३५ ॥
कुछ लोगोंका कहना है कि बिम्बचैतन्यमें रजतका अध्यास होता है और तत्-तत् पुरुषोंके अज्ञानसे उत्पन्न तत्-तत् रजतका तत्-तत् पुरुषाणोंको प्रत्यक्ष होता है ॥ ३५ ॥
केचित्तु बिम्बचैतन्य एव तदध्यासमभ्युपेत्य 'यदीयाज्ञानोपादानकं यत्, तत्तस्यैव प्रत्यक्षम्, न जीवान्तरस्य इत्यनन्यवेद्यत्वमुपपादयन्ति ॥५॥
नन्वस्तु रजताध्यासे कथञ्चिच्चाक्षुषत्वधीः ।
कथं स्वप्नगजज्ञाने तस्याः साधु समर्थनम् ॥ ३६ ॥
अत्र शङ्का होती है कि यद्यपि रजताध्यासमें कथञ्चित् चाक्षुषत्वका उपपादन हो सकता है, तथापि स्वाप्नगजादिज्ञानमें चाक्षुषत्वका समर्थन कैसे कर सकते है ? ॥ ३६ ॥
ननु शुक्तिरजताध्यासे चाक्षुषत्वानुभवः साक्षाद्वाऽधिष्ठानज्ञानद्वारा तदपेक्षणाद्वा समर्थ्यते । स्वाप्नगजादिचाक्षुषत्वानुभवः कथं समर्थनीयः ।
चैतन्यमें, जो सर्वसाधारण है, उसका अध्यास माना जायगा, तो सुखादिके समान अनन्यवेद्यत्वके अभावका प्रसङ्ग होगा, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ।
कुछ लोग तो बिम्बचैतन्यमें ही रजतादिका अध्यास होता है, ऐसा मान कर जिसके अज्ञानरूप उपादानसे जिसकी उत्पत्ति हुई हो, वह उसी जीवको प्रत्यक्ष होता है, जीवान्तरको नहीं, इस प्रकार अनन्यवेद्यत्वका उपपादन करते हैं ॥ ५ ॥
अत्र शङ्का होती है कि शुक्तिमें रजतका जो अध्यास होता है, उसमें चक्षुरिन्द्रियग्राह्यत्वका जो अनुभव होता है, वह साक्षात् अथवा अधिष्ठानके ज्ञानद्वारा चक्षुकी अपेक्षा होनेसे होता है । [स्वप्नप्रपञ्चके अधिष्ठानका निरूपण करके स्वाप्न पदार्थोंके अनुभवका उपपादन करनेके लिए इस ग्रन्थका उपक्रम है। शुक्तिरजतका अनुभव इन्द्रियसे होता है, इस प्रकारके पूर्वमें उक्त कवितार्किक मतके अनुसार 'साक्षात्' कहा गया है । और जिस मतमें शुक्तिरजत आदि भ्रान्त पदार्थ साक्षिभास्य हैं, उस मतसे 'अधिष्ठानज्ञानद्वारा' इत्यादि ग्रन्थका कथन है, क्योंकि इस मतमें भी धर्मिज्ञानद्वारा