सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 394, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें३६४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद
र्त्यत्वरूपस्य, सदसद्विलक्षणत्वरूपस्य, प्रतिपन्नोपाधिगतत्रैकालिकनिषेधप्रतियोगित्वरूपस्य वा मिथ्यात्वस्याऽभ्युपगमात् । सत्यत्वपक्षे प्रपञ्चे उक्त-रूपमिथ्यात्वाभावेन ततो भेदात् ।
अहङ्कारादिमिथ्यात्वं नन्वेवं सम्प्रसिध्यति । तदध्यासाय टीकादौ व्यर्था कारणकल्पना ॥४७॥
**शङ्का—**जब आकाश आदिके समान अहङ्कार और उसके धर्म मिथ्या सिद्ध होते हैं, तब उसके मिथ्यात्वके लिए भाष्य, टीका और विवरणमें कारणत्रयकी की गई कल्पना व्यर्थ ही है ॥४७॥
नन्वेवमहङ्कारतद्धर्माणामपि उक्त रूपमिथ्यात्वं वियदादिवत् कल्पितत्वा-
केवल ज्ञानसे निवर्त्यत्वरूप, सदसद्विलक्षणत्वरूप अथवा प्रतिपन्नोपाधिगतत्रैकालिक निषेधप्रतियोगित्वरूप मिथ्यात्व आकाश आदि प्रपञ्चमें सिद्ध ही है। [ अतः सत्यत्वविरोधी उक्त त्रिविध लक्षणोंसे लक्षित मिथ्यात्वके विद्यमान होनेसे उनमें सत्यत्वकी प्रसक्ति नहीं है, यह भाव है ] । घटादिके सत्यत्वपक्षमें प्रपञ्चमें उक्त मिथ्यात्वके न होनेसे सत्यत्वपक्षसे दृष्टिसृष्टिपक्षमें भेद है ही ।
यदि शङ्का हो कि * ज्ञाननिवर्त्यत्व आदि यदि मिथ्यात्वके स्वरूप माने जांय, तो आकाशादि प्रपञ्चके समान अहङ्कार और उसके धर्मोंमें कथित मिथ्यात्व
तृतीय प्रतिपन्नोपाधिगतत्रैकालिकनिषेधप्रतियोगित्व मिथ्यात्वका लक्षण है—अर्थात् अधिष्ठानमें ज्ञात जो अत्यन्ताभाव उसका जो प्रतियोगी हो, वह मिथ्या है, जैसे शुक्तिरजतका अधिष्ठान है शुक्ति, उसमें रहनेवाला त्रैकालिक निषेध अत्यन्ताभाव है—शुक्तिमें रजत नहीं है, नहीं था और होगा भी नहीं, इसका प्रतियोगी हुआ रजत, इसलिए रजत मिथ्या है ।
ये मिथ्याके तीनों लक्षण प्रपञ्चमें घटते हैं, क्योंकि आकाश आदि प्रपञ्चका ब्रह्मरूप अधिष्ठानतत्त्वसाक्षात्कारसे बाध होता है, प्रपञ्च सत् एवं असत्से विलक्षण है और ब्रह्मरूप जो उपाधि—अधिष्ठान है, उसमें प्रपञ्चका जो त्रैकालिक निषेध है यह उसका प्रतियोगी भी प्रपञ्च है ।
* 'तथान्तःकरणधर्मान्—कामसङ्कल्पविचिकित्सा······एवमहं प्रत्ययिनम्०' इत्यादि भाष्य, युष्मदर्थलक्षणापन्नोऽहङ्कारोऽध्यस्त इति······'ननु बहिरर्थकरणदोषोर्थगतः······न त्विह कारणान्तरायत्ता इत्यादि टीका ( पृ० २५६ भामत्यादि टीकानवकोपेत भाष्य कलकत्ता मुद्रित ) और इसी पत्रस्थ अद्वितीयचैतन्यात्मनि······इत्यादि विवरण, जिनसे अहङ्कारादि अध्यास सिद्ध किया गया है, इस प्रकृत शङ्काके बीज हैं, यह भाव है ।