भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 590 में से

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पृष्ठ 395

सृष्टिके कल्पकका विचार ] भाषानुवादसहित ३६५


भावेऽपि सिध्यतीति भाष्यटीकाविवरणेषु तदध्यासे कारणत्रितयसम्पादनादियत्नो व्यर्थ इति चेद्,

अत्राहुः साक्षिवेद्यत्वादहङ्कारस्पृहादिकम् ।
प्रातिभासिकमेवेति चित्सुखाचार्ययोगिनः ॥४८॥

उक्त शङ्काके समाधानमें योगी चित्सुखाचार्य कहते हैं कि अहङ्कार और उसके धर्म साक्षिवेद्य होनेसे [ शुक्तिरजतके समान ] प्रातिभासिक ही हैं ॥४८॥

अहङ्कारादीनामपि केवलसाक्षिवेद्यतया शुक्तिरजतवत् प्रातिभासिकत्वमभिमतमिति चित्सुखाचार्याः ॥

चैतन्यस्याऽप्रमाणस्य प्रमाणत्वेन कीर्तनात् ।
तं तु रामाद्वयाचार्याः प्रौढिवादं प्रचक्षते ॥४९॥

अप्रमाणभूत चैतन्यमें प्रमाणत्वके कथनसे उस कारणत्रितय प्रतिपादक भाष्यटीकादि ग्रन्थको रामाद्वयाचार्य प्रौढिवादमात्र मानते हैं ॥४९॥

अभ्युपेत्यवादमात्रं तत्, 'अद्वितीयाधिष्ठानब्रह्मात्मप्रमाणस्य चैतन्यस्य' इत्यादितत्तत्यकारणत्रितयसम्पादनग्रन्थस्य चैतन्यस्य प्रमाकरणत्वे वेदान्त-

उन अहङ्कारादिके प्रातिभासिक न माननेपर भी हो सकता है, फिर भाष्य, टीका और विवरणमें अहङ्कार आदिके अध्यासमें कारणत्रयके सम्पादन आदिमें जो प्रयत्न किया गया है, वह व्यर्थ ही है ?

नहीं, व्यर्थ नहीं है, क्योंकि केवल साक्षीसे वेद्य होनेके कारण शुक्ति-रजतके समान अहङ्कार आदि प्रातिभासिक ही हैं, ऐसा चित्सुखाचार्य मानते हैं ।

† उक्त विषयमें रामाद्वयाचार्यका कहना है कि भाष्य; टीका आदि सब ग्रन्थ केवल अभ्युपेत्यवाद ही हैं अर्थात् अहङ्कार आदिमें प्रातिभासिकत्वका केवल आपाततः स्वीकार करके भाष्य, टीकादिमें कारणत्रयका सम्पादन किया गया है, वस्तुस्थितिका अङ्गीकार करके नहीं किया गया है, क्योंकि वहाँके 'अद्वितीया०' ( अद्वितीय अधिष्ठानरूप ब्रह्मात्मामें चैतन्य ही प्रमाण है ) इत्यादि


† इनका तात्पर्य यह है कि अहङ्कार आदि भले ही केवल साक्षीसे वेद्य हों, परन्तु उन्हें शुक्तिरजतादिके समान प्रातिभासिक मानना अयुक्त है, क्योंकि अहङ्कार आदिका व्यवहारकालमें बाध नहीं देखा जाता है, इसलिए ये वस्तुतः प्रातिभासिक नहीं हैं, परन्तु उनके प्रातिभासिकत्व-का आपाततः अङ्गीकार करके कारणत्रयजन्यत्वका समर्थन भाष्य आदिमें किया गया है ।