सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 399, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंमिथ्या पदार्थोंके अर्थक्रियाकारित्वका उपपादन-विचार] भाषानुवादसहित ३६९
दर्शनस्पर्शनादिवृत्तिरूपस्य स्वप्नप्रपञ्चसाक्षिण्यध्यस्तस्य कल्पनामात्रसिद्धत्वात्, नह्युपरतेन्द्रियस्य चक्षुरादिवृत्तयः सत्याः सम्भवन्ति । न च तद्विषयापरोक्ष्यमात्रं सुखजनकम्, तच्च साक्षिरूपं सदेवेति वाच्यम्, दर्शनात् स्पर्शने कामिन्याः, पदा स्पर्शनात् पाणिना स्पर्शने; भुजङ्गस्याऽ-
नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि वह * ज्ञान भी, जो कि दर्शन, स्पर्शन आदि वृत्तिरूप और स्वप्नप्रपञ्चके साक्षीमें अध्यस्त है, केवल कल्पनासे ही सिद्ध है, क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ उपरत हुई हैं, ऐसे पुरुषके चक्षु आदिकी वृत्तियाँ सत्य नहीं हो सकती हैं । यदि शङ्का हो कि स्वाप्न विषयका अपरोक्ष्य ही सुखजनक है और वह साक्षिरूप होनेसे सत्य है, अतः अनुपपत्ति नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जागरणमें सुन्दरीके दर्शनकी अपेक्षा स्पर्श करनेमें †
* शङ्का समाधानका तात्पर्य यह है कि स्वाप्न सुख आदिकी उत्पत्ति स्वाप्न अङ्गना आदिसे नहीं होती है, किन्तु उनके ज्ञानसे होती है, अतः असत्यसे सत्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है, किन्तु सत्यसे सत्यकी उत्पत्ति होती है । प्रकृतमें स्वाप्न अङ्गना आदिका ज्ञान साक्षिरूप है, अतः अनुपपत्ति नहीं है, यह पूर्वपक्षका आशय है, इसका उत्तर है कि मनोमात्रजन्य वृत्तिरूप ज्ञान सत्य है या चक्षुरादिजन्य वृत्तिरूप ज्ञान सत्य है अथवा केवल साक्षिरूप ज्ञान सत्य है । इस विकल्पमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि इसमें भी यह विकल्प हो सकता है कि केवल उक्त वृत्ति ही भयादिकी हेतु है या स्वाप्न भुजङ्ग आदिरूप विषयसे विशेषित वृत्ति हेतु है ? इसमें पहला पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि यत्किञ्चित् वृत्तिसे भी मुख आदिकी स्वप्नमें उत्पत्ति होने लगेगी, द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि वृत्तिमात्रके सत्य होनेपर भी विषयोंके असत्य होनेसे उन विषयोंसे विशिष्ट वृत्ति असत्य होगी, इसलिए प्रातिभासिक ज्ञानसे व्यावहारिक अर्थक्रिया उत्पन्न हो सकती है, अतः उक्त उदाहरण युक्त ही है, ऐसा समझ कर प्रथम कहे गये विकल्पमेंसे द्वितीय पक्ष का अर्थात् चक्षुरादिजन्य वृत्तिरूप ज्ञानस्वरूपका 'ज्ञानस्यापि' इत्यादि मूलसे परिहार किया गया है । तृतीय विकल्पका 'न च तद्विषया' इत्यादिसे परिहार किया गया है । अतः 'स्वाप्न अङ्गनादिज्ञान सत्य है, यह कहना असङ्गत है ।
† जागरण अवस्थामें यह अक्सर देखा गया है और अनुभवसिद्ध भी है कि किसी रमणीके दर्शनकी अपेक्षा स्पर्शसे अधिक सुख होता है, एवमेव सर्पके पुच्छस्पर्शकी अपेक्षा सिरके स्पर्शसे भय अधिक होता है । अतः यह मानना आवश्यक है कि केवल विषयापरोक्ष्यसे सुख, भय आदिकी उत्पत्ति नहीं होती है, किन्तु दर्शन, स्पर्शन आदि रूपवृत्तिविशेषसे युक्त विषयोंके अपरोक्ष्यसे ही सुख आदिकी उत्पत्ति होती है, इसी प्रकार स्वप्नमें भी तत्-तत् विषयोंके केवल अपरोक्ष्यसे सुखादिकी उत्पत्ति नहीं होती है, किन्तु तादृशवृत्तिविशेषोंसे विशेषित विषयोंके अपरोक्ष्यसे ही उनकी उत्पत्ति होती है। इसलिए केवल
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