भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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३७०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

मर्मस्थले स्पर्शनाद् मर्मस्थले स्पर्शने सुखविशेषस्य भयविशेषस्य चाऽनुभवसिद्धत्वेन स्वप्नेऽपि तत्तत्सुखभयादिविशेषस्य कल्पितदर्शनस्पर्शनादिवृत्तिविशेषजन्यत्वस्य वक्तव्यत्वादिति।

अन्तर्वाह्यपुमध्यस्ततमसोऽर्थक्रियेक्षणात्।
दीपादिनाश्यतादृष्टेर्युक्तमेतदितीतरे ॥ ५२ ॥

स्वप्नमें बाह्यपुरुषसे अध्यस्त घरके भीतरके अंधकारमें अर्थक्रिया—घटाद्यावरण और दीपादिनाश्यता—देखी जाती है, अतः पूर्वोक्त अद्वैताचार्यसम्मत पक्ष युक्त ही है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं॥ ५२॥

तथा जागरे घटादिप्रकाशनक्षमतत्रत्यपुरुषान्तरनिरीक्ष्यमाणालोकवत्यपवरके सद्यः प्रविष्टेन पुंसा कल्पितस्य सन्तमसस्य प्रसिद्धसन्तमसोचितार्थक्रियाकारित्वं दृष्टम्। तेन तं प्रति घटाद्यावरणम्, दीपाद्यानयने तदपसरणम्, तन्नयने पुनरावरणमित्यादेर्दर्शनादित्यपि केचित्।

और वहां भी पैरसे स्पर्शकी अपेक्षा हस्तसे स्पर्श करनेमें, और सर्पके अमर्मस्थलके स्पर्शकी अपेक्षा मर्मस्थलके स्पर्श करनेमें क्रमशः अधिक सुखविशेष और भयविशेष अनुभवसिद्ध है, इसलिए स्वप्नमें भी तत्-तत् सुख, भय आदि विशेष—कल्पित दर्शन, स्पर्शन आदि वृत्तिविशेषोंसे—जन्य हैं, यह कह सकते हैं।

इसी * प्रकार जाग्रदवस्था में घट आदि पदार्थोंका प्रकाशन करनेमें समर्थ तथा छोटे घरमें स्थित अन्य पुरुषों द्वारा दृश्यमान तेजसे युक्त छोटे घर में भी तत्क्षण प्रविष्ट पुरुष द्वारा कल्पित अन्धकार, प्रसिद्ध अन्धकारके सदृश, अर्थक्रियाकारी देखा जाता है, क्योंकि उस अन्धकारसे उस पुरुषके प्रति घटादिका आवरण, दीप आदिके लानेपर उसका अपसरण और दीप आदिके हटानेपर पुनः संवरण आदि अनुभूत होते हैं—ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं।


विषयापरोक्ष्यके सत्य होनेपर भी उक्त विशिष्ट आपरोक्ष्यके प्रातिभासिक होनेके कारण प्रातिभासिकसे व्यावहारिक सत्यकी उत्पत्ति हो सकती है, यह भाव है।

* पूर्वोक्त प्रकारसे स्वप्नावस्था में असत्यसे सत्य अर्थक्रियाका उपपादन किया गया, जागरणमें भी असत्यसे सत्य अर्थक्रिया होती है, यह भी कुछ लोगों का सम्मत पक्ष है, अब उसे कहते हैं।

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