सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 419, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवोपाधिभेद-विचार ] भाषानुवादसहित ३८९
अत्र केचिदाहुः—भोगायतनभेदतद्भेदावनुसन्धानानुसन्धानप्रयोजकोपाधी, शरीरावच्छिन्नवेदनायास्तदवच्छिन्नेनाऽनुसन्धानात् चरणावच्छिन्नवेदनाया हस्तावाच्छिन्नेनाऽनुसन्धानाच्च। 'हस्तावच्छिन्नोऽहं पादावच्छिन्नवेदनामनुभवामि' इत्यप्रत्ययात्। कथं तर्हि चरणलग्नकण्टकोद्धाराय हस्तव्यापारः? नाऽयं हस्तव्यापारः, हस्तावाच्छिन्नानुसन्धानात्, किन्तु अवयवावयविनोश्चरणशरीरयोर्भेदासत्त्वेन चरणावच्छिन्नवेदना शरीरावच्छिन्नेन 'अहं चरणे वेदनानान्' इत्यनुसन्धीयते इति तदनुसन्धानात्। एवं चैत्रमैत्रशरीरयोरभेदाभावात् चैत्रशरीरावच्छिन्नवेदना न मैत्रशरीरा-
इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि भोगायतनका† अभेद और उसका भेद सुखादिके अनुसन्धान और अननुसन्धानमें क्रमशः प्रयोजक उपाधि हैं, क्योंकि शरीरावच्छिन्न वेदनाका—सुख-दुःखका—शरीरावच्छिन्न आत्मासे ही अनुसन्धान होता है और चरणावच्छिन्न वेदनाका हस्तावाच्छिन्न आत्मासे अनुसन्धान नहीं होता है, कारण कि 'हस्तावच्छिन्न मैं चरणावच्छिन्न वेदनाका अनुभव करता हूँ' इस प्रकारका अनुभव नहीं होता है। तो पैरमें लगे हुए कांटेको निकालनेके लिए हाथ व्यापार क्यों करता है? नहीं यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि हाथका यह व्यापार (कण्टकोद्धारक व्यापार) हस्तावाच्छिन्न चैतन्यवृत्ति दुःखादिके अनुसन्धानसे नहीं होता है, किन्तु चरणं और शरीरका (जो कि अवयव और अवयवीरूप हैं) परस्पर भेद न होनेसे चरणसे अवच्छिन्न आत्मामें रहनेवाली वेदनाका 'मैं चरणमें दुःखी हूँ' इस प्रकार शरीरावच्छिन्न आत्मा ही अनुसन्धान करता है, अतः शरीरावच्छिन्न आत्माको चरणावच्छिन्न आत्मामें रहनेवाले दुःखादिका अनुसन्धान होनेसे उस स्थलमें हस्तादिव्यापार होता है। इसीलिए चैत्र और मैत्रके शरीरोंका परस्पर तादात्म्य न होनेसे चैत्रशरीरावच्छिन्न आत्मामें रहनेवाली वेदनाका मैत्रशरीरावच्छिन्न आत्मा अनुसन्धान नहीं करता है। और चैत्र तथा मैत्र दोनोंके शरीरोंमें अनुस्यूत-
† भोगायतनशब्दका अर्थ है अवच्छेदकतासम्बन्धसे सुख या दुःखके साक्षात्कारका आश्रय, वह शरीर है अथवा हस्त, पाद आदि अवयव हैं। इनकी अभिन्नतासे सुख आदिका अनुभव है, और भिन्नतासे अननुभव होता है, देवदत्तका शरीर एक है, इसलिए देवदत्तशरीरावच्छिन्न आत्मामें रहनेवाले सुख, दुःख आदिका देवदत्तको अनुसन्धान होता है, यज्ञदत्तका शरीर भिन्न है, अतः उसके सुखादिका अनुभव नहीं होता।