सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
जीवोपाधिभेद-विचार ] भाषानुवादसहित ३८९
अत्र केचिदाहुः—भोगायतनभेदतद्भेदावनुसन्धानानुसन्धानप्रयोजकोपाधी, शरीरावच्छिन्नवेदनायास्तदवच्छिन्नेनाऽनुसन्धानात् चरणावच्छिन्नवेदनाया हस्तावाच्छिन्नेनाऽनुसन्धानाच्च। 'हस्तावच्छिन्नोऽहं पादावच्छिन्नवेदनामनुभवामि' इत्यप्रत्ययात्। कथं तर्हि चरणलग्नकण्टकोद्धाराय हस्तव्यापारः? नाऽयं हस्तव्यापारः, हस्तावाच्छिन्नानुसन्धानात्, किन्तु अवयवावयविनोश्चरणशरीरयोर्भेदासत्त्वेन चरणावच्छिन्नवेदना शरीरावच्छिन्नेन 'अहं चरणे वेदनानान्' इत्यनुसन्धीयते इति तदनुसन्धानात्। एवं चैत्रमैत्रशरीरयोरभेदाभावात् चैत्रशरीरावच्छिन्नवेदना न मैत्रशरीरा-
इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि भोगायतनका† अभेद और उसका भेद सुखादिके अनुसन्धान और अननुसन्धानमें क्रमशः प्रयोजक उपाधि हैं, क्योंकि शरीरावच्छिन्न वेदनाका—सुख-दुःखका—शरीरावच्छिन्न आत्मासे ही अनुसन्धान होता है और चरणावच्छिन्न वेदनाका हस्तावाच्छिन्न आत्मासे अनुसन्धान नहीं होता है, कारण कि 'हस्तावच्छिन्न मैं चरणावच्छिन्न वेदनाका अनुभव करता हूँ' इस प्रकारका अनुभव नहीं होता है। तो पैरमें लगे हुए कांटेको निकालनेके लिए हाथ व्यापार क्यों करता है? नहीं यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि हाथका यह व्यापार (कण्टकोद्धारक व्यापार) हस्तावाच्छिन्न चैतन्यवृत्ति दुःखादिके अनुसन्धानसे नहीं होता है, किन्तु चरणं और शरीरका (जो कि अवयव और अवयवीरूप हैं) परस्पर भेद न होनेसे चरणसे अवच्छिन्न आत्मामें रहनेवाली वेदनाका 'मैं चरणमें दुःखी हूँ' इस प्रकार शरीरावच्छिन्न आत्मा ही अनुसन्धान करता है, अतः शरीरावच्छिन्न आत्माको चरणावच्छिन्न आत्मामें रहनेवाले दुःखादिका अनुसन्धान होनेसे उस स्थलमें हस्तादिव्यापार होता है। इसीलिए चैत्र और मैत्रके शरीरोंका परस्पर तादात्म्य न होनेसे चैत्रशरीरावच्छिन्न आत्मामें रहनेवाली वेदनाका मैत्रशरीरावच्छिन्न आत्मा अनुसन्धान नहीं करता है। और चैत्र तथा मैत्र दोनोंके शरीरोंमें अनुस्यूत-
† भोगायतनशब्दका अर्थ है अवच्छेदकतासम्बन्धसे सुख या दुःखके साक्षात्कारका आश्रय, वह शरीर है अथवा हस्त, पाद आदि अवयव हैं। इनकी अभिन्नतासे सुख आदिका अनुभव है, और भिन्नतासे अननुभव होता है, देवदत्तका शरीर एक है, इसलिए देवदत्तशरीरावच्छिन्न आत्मामें रहनेवाले सुख, दुःख आदिका देवदत्तको अनुसन्धान होता है, यज्ञदत्तका शरीर भिन्न है, अतः उसके सुखादिका अनुभव नहीं होता।
३९० सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
वच्छिन्नेनाऽनुसन्धीयते । नाप्युभयशरीरानुस्यूतावयव्यन्तरावच्छिन्नेनाऽनुसन्धीयते । उभयानुस्यूतस्याऽवयविनो भोगायतनस्यैवाऽभावादिति न चैत्रशरीरलग्नकण्टकोद्धाराय मैत्रशरीरव्यापारप्रसङ्ग इति ।
अन्ये विश्लिष्टतद्भेदं भोगासाङ्कर्यकारणम् ॥ ६४ ॥
अन्य लोग विश्लिष्ट उपाधिका भेद भोगके असाङ्कर्यका प्रयोजक है, ऐसा कहते हैं ॥ ६४ ॥
अन्ये तु विश्लिष्टोपाधिभेदोऽननुसन्धानप्रयोजकः । तथा च हस्ता-वच्छिन्नस्य चरणावच्छिन्नवेदनानुसन्धानाभ्युपगमेऽपि न दोषः । न चैवं सति गर्भस्थस्य मातृसुखानुसन्धानप्रसङ्गः । एकस्मिन्नवयविन्य-वयवभावेनाऽननुप्रविष्टयोर्विश्लिष्टशब्देन विवक्षितत्वाद् मातृगर्भशरीरयोस्तथात्वादित्याहुः ।
रूपसे अनुवर्तमान किसी अन्य अवयवीसे अवच्छिन्न आत्मासे भी अनुसन्धान नहीं हो सकता है, क्योंकि उभय अर्थात् चैत्र और मैत्र दोनोंके शरीरमें अनुवर्तमान सुखदुःखका आश्रयीभूत कोई अवयवी ही नहीं है, इसलिए चैत्रके शरीरमें लगे हुए कण्टकके निकालनेके लिए मैत्रके शरीरका व्यापार प्रसक्त नहीं होता है ।
कुछ लोग कहते हैं कि विश्लिष्ट (विश्लेष—विभाग—को प्राप्त हुई) भोगायतनरूप उपाधिका भेद अननुसन्धानका प्रयोजक है । इसलिए हस्ता-वच्छिन्न आत्माको चरणावच्छिन्न आत्मामें रहनेवाले दुःखादिका अनुभव होगा, तो भी कोई हानि नहीं है * । यदि शङ्का हो कि उक्त विश्लिष्ट उपाधिको ही अननुसन्धानका प्रयोजक माना जाय, तो गर्भस्थ जीवको माताके सुखका अनुसन्धान प्रसक्त होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जिनका एक अवयवीमें अवयवभावसे प्रवेश नहीं है, उन्हींको विश्लिष्टशब्दसे कहा जाता है, अतः माताके और गर्भके शरीरका एक अवयवीमें अवयवरूपसे प्रवेश न होनेसे उक्त दोष नहीं है ।
* भोगायतनभूत हस्त और चरणका परस्पर भेद होनेपर भी वे विश्लिष्ट नहीं है, अतः विश्लिष्ट भोगायतनभेदरूप अननुसन्धानके प्रयोजक नहीं होनेसे चरणावच्छिन्न आत्माके दुःख आदिका हस्तावच्छिन्नसे यदि अनुभव हो, तो भी दोष नहीं है, यह भाव है ।
जीवोपाधिभेद-विचार] भाषानुवादसहित ३९१
न च—
'उद्यतायुधदोर्दण्डाः पतितस्वशिरोऽक्षिभिः ।
पश्यन्तः पातयन्ति स्म कवन्धा अप्यरीनिह ॥'
इति भारत्तोक्त्या विश्लेषेऽप्यनुसन्धानमवगतमिति वाच्यम् , तत्रापि शिरःकवन्धयोरेकस्मिन् अवयविन्यवयवभावेनाऽनुप्रविष्टचरत्वात् शिरश्छेदनानन्तरं मूर्च्छामरणयोरन्यतरावश्यंभावेन दृष्टविरुद्धार्थस्य तादृशवचनस्य कैमुत्यन्यायेन योधोत्साहातिशयप्रशंसापरत्वात् । तादृशप्रभावयुक्तपुरुष-
यदि शङ्का हो कि 'उद्यतायुध०' ( जिनके भुजदण्डमें आयुध उद्यत हैं, ऐसे कबन्ध भी—[ जिन योद्धाओंके सिर छिन्न हो गए हैं, वे कबन्ध कहे जाते हैं ] गिरे हुए अपने सिरको अक्षियोंसे देखते हुए रणभूमिमें शत्रुओंके प्राण लेते हैं। ) इस महाभारतकी उक्तिसे ज्ञात होता है कि उपाधिका विश्लेष होने-पर भी † अनुसन्धान होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस स्थलमें भी सिर और कबन्धका एक अवयवीमें अवयवरूपसे पूर्वमें प्रवेश होनेसे मस्तक छेदनके बाद मूर्च्छा या मरण इन दोनोंमें से कोई अवश्य होता है, इस-लिए प्रत्यक्षसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेवाले उक्त वचनको कैमुतिक-न्यायसे ‡ योद्धाओंके उत्साहातिशयका प्रशंसार्थक ही मानना होगा। अथवा विशिष्ट × प्रभावसे युक्त पुरुषविशेषविषयक होनेसे उक्त वचनको यथार्थ
† जैसे चैत्र और मैत्रके शरीर विश्लिष्ट हैं, वैसे ही कबन्ध और उसका मस्तक विश्लिष्ट है, तो भी विश्लिष्ट शिरोवच्छिन्न चैतन्यसे कबन्धावच्छिन्न आत्माके योद्धापनका अनुसन्धान होता है, अतः व्यभिचार है, यह भाव है।
‡ अर्थात् जब कबन्ध भी शत्रुओंसे टक्कर लेते हैं, तब अन्य जीवित योद्धाओंके उत्साहमें क्या कहना है, यह भाव है।
× तात्पर्य यह है. कि उक्त महाभारतका वचन प्रशंसार्थक नहीं है, प्रत्युत यथार्थ है, क्योंकि योगप्रभावसे या वरदानके माहात्म्यसे मस्तक छेदनके अनन्तर भी युद्धका अनु-सन्धान हो सकता है, तो फिर विश्लिष्ट उपाधि अननुसन्धानकी प्रयोजक है, इस नियमका व्यभिचार तो स्थिर ही है, इस प्रकारकी शङ्का हो, तो इसका 'तादृक्' इत्यादि मूलसे परिहार करते हैं—अर्थात् उक्त महाभारतका वचन उन्हीं पुरुषोंको उद्देश कर कहता है, जो वीर पुरुष योगी या वरदान प्राप्त किये हुए थे, उनके मस्तकका छेदन होनेपर भी अपने गिरे हुए सिर आदिसे अनुसन्धान करके वे अपने शत्रुओंसे लड़ते थे, इसलिए योगादिप्रभावविधुर पुरुषोंके अननुसन्धानमें विश्लिष्ट उपाधि प्रयोजक है, योगादिप्रभावयुक्त पुरुषोंके प्रति वह प्रयोजक नहीं है।
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विशेषविषयत्वेन भूतार्थवादत्वेऽपि निरुक्तस्योत्सर्गतोऽननुसन्धानतन्त्रत्वा- विघाताच्च । अत एवोक्तवक्ष्यमाणपक्षेषु योगिनां जातिस्मराणां च शरीरान्तरवृत्तान्तानुसन्धाने न दोषप्रसक्तिः ।
देहभेदं परे प्राहुर्बाल्यादिषु न तद्भिदा । माययाऽपचयौ देहो दीपवन्नैव चाणुभिः ॥ ६५ ॥
अन्य लोग कहते हैं कि 'शरीरका भेद भोगके असाङ्कर्यका प्रयोजक है' बाल्या- वस्था आदिका शरीर भिन्न नहीं है दीपकके समान मायासे छोटा और बड़ा शरीर होता है, अणुओंसे नहीं होता है ॥ ६५ ॥
अपरे तु शरीरैक्यभेदावनुसन्धानतदभावप्रयोजकोपाधी, बाल्यभवा- न्तरानुभूतयोरनुसन्धानतदभावदृष्टेः । न च बाल्ययौवनयोरपि शरीरभेदः शङ्कनीयः, प्रत्यभिज्ञानात् । न च परिमाणभेदेन तद्भेदावगमः,
मान लिया जाय, तो भी उक्त विशिष्टोपाधिभेदके स्वाभाविक अननुसन्धानके प्रयोजकत्वका व्याघात नहीं हो सकता है । उक्त प्रयोजकके औत्सर्गिक होनेसे कहे हुए और कहे जानेवाले पक्षमें योगी और पूर्वकी जातिस्मरण करनेवालोंके अन्य शरीरके वृत्तान्तके अनुसन्धानमें कोई दोष नहीं है ।
कुछ लोग तो कहते हैं कि शरीरका ऐक्य और शरीरका भेद ही अनु- सन्धान और अननुसन्धानमें क्रमशः प्रयोजक उपाधि हैं, क्योंकि बाल्यावस्थामें और जन्मान्तरमें अनुभूत पदार्थोंका वृद्धावस्थामें अनुसन्धान और इस जन्ममें अननुसन्धान देखा* जाता है । यदि शङ्का हो कि बाल्यावस्था और युवास्थाके शरीरोंका भेद है ? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'वही यह शरीर है' इस प्रकार उनकी ऐक्यावगाहिनी प्रत्यभिज्ञा होती है । यदि शङ्का हो कि बाल्य और युवावस्थाके शरीरोंका परिमाणके भेदसे भेद है, तो यह भी युक्त नहीं
* अर्थात् बाल्यावस्थामें जिस किसी पदार्थविशेषका अनुभव किया गया है, उसका युवावस्थामें स्मरण होता है, उसका कारण यही है, कि बाल्य और यौवन अवस्थाका शरीर एक है, और जन्मान्तरमें अनुभूत पदार्थका जो स्मरण नहीं होता है, उसमें कारण यही है कि जन्मान्तरका शरीर और इस जन्मका शरीर परस्पर भिन्न है, अतः इस अनुभवसे अनुसन्धान और अननुसन्धानमें शरीरैक्य और शरीरभेदको क्रमशः प्रयोजक माननेमें कोई हानि नहीं है, यह भाव है।
जीवोपाधि-विचार ] भाषानुवादसहित ३९३
एकस्मिन् वृक्षे मूलाग्रभेदेनेव कालभेदेनेकस्मिन्नेकपरिमाणान्वयोपपत्तेः ।
नन्ववयवोपचयमन्तरेण न परिमाणभेदः । अवयवाश्च पश्चादापतन्तो न पूर्वसिद्धं शरीरं परियुज्यन्ते इति परिमाणभेदे शरीरभेद आवश्यक इति चेत्, न; प्रदीपारोपणसमसमयसौधोदरव्यापिप्रभामण्डलविकासत-त्पिधानसमसमयतत्संकोचाद्यनुरोधिनः परमाणुप्रक्रिययोरसम्भवादस्याऽनभ्युपगमात् । विवर्तवादे चैन्द्रजालिकदर्शितशरीरवद् विनैवाऽवयवोपचयं मायया शरीरस्य वृद्धद्युपपत्तेरित्याहुः ।
लिङ्गभेदं परेऽ —
कुछ लोग अन्तःकरणके भेदको असाङ्कर्यका प्रयोजक मानते हैं ।
इतरे त्वन्तःकरणाभेदतद्भेदाभ्यामनुसन्धानानुसन्धानव्यवस्थामाहुः ।
अयं च पक्षः प्रागुपपादितः ।
है, क्योंकि एक ही वृक्षमें मूल और अग्रके भेदसे जैसे भेदका अवभास होता है, वैसे ही एक ही शरीरमें कालभेदसे अनेक परिमाणोंका सम्बन्ध हो सकता है, यह भाव है ।
यदि शङ्का हो कि अवयवोंकी वृद्धिके विना परिमाणका भेद नहीं हो सकता है । और पीछेसे आनेवाले अवयव पूर्वसिद्ध शरीरके साथ सम्बद्ध नहीं हो सकते हैं, इससे परिमाणके भेदसे शरीरका † भेद आवश्यक है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रदीपके जलानेके समयमें ही महलके अन्दर व्याप्त होनेवाले प्रभामण्डलके विकासका और प्रदीपके आच्छादनकालमें ही उक्त प्रभामण्डलके संकोचका अनुसरण न करनेवालेकी परमाणुप्रक्रियाका सम्भव न होनेसे उक्त परिमाणभेदका अङ्गीकार ही नहीं है । विवर्तवादमें तो ऐन्द्रजालिकसे दिखलाये गये शरीरके समान अवयवकी वृद्धिके बिना ही मायासे शरीरकी वृद्धि हो सकती है ।
कुछ लोग कहते है कि अन्तःकरणके अभेद और उसके भेदसे ही अनुसन्धान और अननुसन्धानकी उपपत्ति हो सकती है । इस पक्षका पूर्वमें उपपादन किया जा चुका है ।
† तात्पर्य यह है कि पूर्वसिद्ध शरीर उत्तरकालभावी बड़े शरीरके प्रति उपादान नहीं हो सकता है, इसलिए पूर्व शरीरका नाश होनेके बाद पूर्व शरीरके अवयव और पीछे आनेवाले
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| ३९४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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विद्याभेदमन्ये प्रवक्षते ।
कोई लोग अज्ञानके भेदको उक्त असाङ्कर्यका प्रयोजक कहते हैं।
केचित्तु 'अज्ञानानि जीवभेदोपाधिभूतानि नाना' इति स्वीकृत्य तद्भेदा-
भेदाभ्याम् अनुसन्धानाननुसन्धानव्यवस्थामाहुः ॥ १२ ॥
अदृष्टानियमादिभ्यः कारणादेर्व्यवस्थास्थितिः ॥ ६६ ॥
अदृष्टानियम आदिके कारण आदिकी व्यवस्था होती है ॥ ६६ ॥
अत्र केचिद् ( उ० मी० अ० २ पा० ३ सू० ४३ ) 'अंशो नाना-
व्यपदेशाद्' इत्यधिकरणे 'अदृष्टानियमात्' ( उ० मी० अ० २ पा० ३
सू० ५१ ) 'अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम्' ( उ० मी० अ० २ पा० ३
सू० ५२ ) 'प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावाद्' ( उ० मी० अ० २ पा० ३
कुछ लोग जीवके उपाधिभूत अज्ञान अनेक हैं, इस प्रकार अङ्गीकार
करके अज्ञानके अभेद और भेदसे अनुसन्धान और अननुसन्धानकी व्यवस्थाका
उपपादन करते हैं ॥ १२ ॥
इस विषयमें कुछ लोग कहते हैं * 'अंशो नानाव्यपदेशात्' 'अदृष्टानिय-
मात्' † 'अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम्' ‡ 'प्रदेशादिचेन्नान्तर्भावात्' इन सूत्रोंकी
उपचित अवयव दोनों मिलकर अन्य शरीरका द्वयणुकादिक्रमसे आरम्भ करते हैं, अतः शरीरोंके परिमाणके भेदसे शरीरोंका भी भेद अवश्य मानना चाहिए, यह पूर्वपक्षका भाव है।
* जीव ब्रह्मका अंश है, क्योंकि 'य आत्मनि' श्रुतिमें जीव और ब्रह्मका नानात्व व्यपदिष्ट है। इस विषयमें यदि शङ्का हो कि ब्रह्म तो अंशवान् नहीं है ऐसी परिस्थितिमें जीव ब्रह्मका अंश कैसे होगा ? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे घटादिसे अवच्छिन्न आकाश महाकाशका अंश होता है, वैसे ही प्रकृतमें भी हो सकता है अर्थात् अवच्छिन्न चैतन्य अनवच्छिन्न चैतन्यका अंश है, ऐसा माना जा सकता है, वस्तुतः नहीं है, यह सूत्रका एक हिस्सा है, परन्तु सूत्रका पूर्णस्वरूप—'अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके' इतना है, इसका विस्तार अच्युत-ग्रन्थमालामुद्रित भाषानुवादसहित शाङ्करभाष्यके पृ० १५०८ में देखना चाहिए ।
'अदृष्टानियमात्' साङ्ख्यमतमें प्रधानमें रहनेवाला अदृष्ट और न्यायमतमें अदृष्टका हेतु आत्ममनःसंयोग हरएक आत्माके प्रति साधारण है, अतः 'यह इसका अदृष्ट है' इस प्रकार व्यवस्था न होनेके कारण भोगादिका साङ्कर्य उनके मतमें भी समान है, यह इस सूत्रका अर्थ है।
† साधारण मनके संयोग आदिसे होनेवाले सङ्कल्प आदि भी अदृष्ट नियमके सम्पादक नहीं हैं, अतः भोगका साङ्कर्य ज्योंका त्यों है ।
‡ प्रदेशभेदादिति चेन्नान्तर्भावात्—आत्माओंके विभु होनेपर भी शरीरावच्छिन्न आत्म-
उपाधिभेद होनेपर भी सुखाद्यनुसन्धानका साङ्कर्यापादन] भाषानुवादसहित ३९५
सू० ५३) इतिसूत्रतद्गतभाष्यरीतिमनुसृत्य एकस्मिन्नात्मन्युपाधिभेदेन व्यवस्थानुपगमे कणभुगादिरीत्याऽऽत्मभेदवादेऽपि व्यवस्थाऽनुपपत्तितौल्यमाहुः ।
तथाहि—चैत्रचरणलग्नकण्टकेन चैत्रस्य वेदनोत्पादनसमये अन्येषामप्यात्मनां कुतो वेदना न जायते । सर्वात्मना सर्वगतत्वेन चैत्रशरीरान्तर्भावाविशेषात् । न च 'यस्य शरीरे कण्टकवेधादि, तस्यैव वेदना, नाऽन्येषाम्' इति व्यवस्था । 'सर्वात्मसन्निधावुत्पद्यमानं शरीरं कस्यचिदेव, नाऽन्येषाम्' इति नियन्तुमशक्यत्वात् ।
न च 'यददृष्टोत्पादितं यच्छरीरम्, तत्तदीयम्' इति नियमः । अदृष्ट-
और इनके भाष्यकी प्रणालीका अनुसरण करके एक आत्मामें उपाधिकी भिन्नतासे व्यवस्थाका अङ्गीकार न करनेपर कणाद आदिकी रीतिसे आत्माके भेदवादमें भी सुख आदिकी व्यवस्था नहीं हो सकती है ।
* जैसे कि चैत्रके पैरमें चुभे हुए कण्टकसे जब चैत्रको दुःख उत्पन्न होता है, उस कालमें दूसरे जीवोंको भी दुःख क्यों नहीं होता है ? क्योंकि सभी आत्माओंके व्यापक होनेसे चैत्रके शरीरमें भी उनका अन्तर्भाव समान ही है । यदि शङ्का हो कि 'जिसके शरीरमें कांटा चुभा हो, उसीके शरीरमें वेदना होती है' ऐसा नियम है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रत्येक आत्माके सामीप्यमें उत्पन्न हुआ शरीर 'किसी व्यक्तिविशेषका होता है, दूसरोंका नहीं होता' इस प्रकार नियम नहीं कर सकते हैं ।
यदि शङ्का हो कि 'जिस अदृष्टसे जिसका शरीर उत्पन्न हुआ है, वह उसीका है' ऐसा नियम है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस प्रकार अदृष्टका भी नियम नहीं कर सकते हैं, कारण कि जब उसी प्रकारके अदृष्टके
प्रदेशसे अभिसन्धि ( संकल्प ) आदिकी व्यवस्था हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि आत्मामें विभुत्व होनेसे सभीमें सबका सम्बन्ध होनेके कारण 'यह इसका शरीर है' यह नियम नहीं हो सकता है, अतः उक्त दोष समान है, यह भाव है ।
* इस ग्रन्थसे 'अदृष्टानियमात्' इत्यादि सूत्रोंका, जो कि पूर्वमें मूलमें ही उपन्यस्त हैं, उनका स्पष्टीकरण करते हैं, इससे यह निश्चित होगा कि उपाधिभेदके बिना आत्माओंको नाना मान कर भी भोगादिके साङ्कर्यका परिहार नहीं कर सकते हैं ।
| ३९६ | सिद्धान्तलेशसंग्रहे | [ द्वितीय परिच्छेदे |
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स्याऽपि नियमासिद्धेः। यदा हि तददृष्टोत्पादनाय केनचिदात्मना संयुज्यते मनः, संयुज्यत एव तदाऽन्यैरपि। कथं कारणसाधारण्ये क्वचिदेव तददृष्टमुत्पद्येत। ननु मनस्संयोगमात्रसाधारण्येऽपि 'अहमिदं फलं प्राप्नुवान्' इति अभिसन्धिरदृष्टोत्पादककर्मानुकूलकृतिरित्येवमादि व्यवस्थितमिति तत एवाऽदृष्टनियमो भविष्यतीति चेत्, न; अभिसन्ध्यादीनामपि साधारणमनस्संयोगादिनिष्पाद्यतया व्यवस्थित्यसिद्धेः। ननु स्वकीयमनस्संयोगोऽभिसन्ध्यादिकारणमिति मनस्संयोग एवाऽसाधारणो भविष्यतीति, न; 'नित्यं सर्वात्मसंयुक्तं मनः कस्यचिदेव स्वम्' इति नियन्तुमशक्यत्वात्। न चाऽदृष्टविशेषादात्मविशेषाणां मनसस्स्वस्वामिभावसिद्धिः। तस्याऽप्यदृष्टस्य पूर्ववद् व्यवस्थित्यसिद्धेः।
उत्पादनके लिए किसी आत्माके साथ मनका सम्बन्ध होता, तब दूसरे आत्माओंके साथ भी मनका सम्बन्ध है ही, [ क्योंकि आत्मा व्यापक है ]। इसलिए आत्ममनःसंयोगरूप असमवायिकारण और समवायिकारणरूप आत्माके साधारण होनेसे किसी स्थलविशेषमें वह उत्पन्न होता है, यह कैसे होगा। यदि शङ्का हो कि केवल आत्ममनःसंयोगके साधारण होनेपर भी 'मैं इस फलको प्राप्त करूँ' इस प्रकार अभिसन्धि (फलकी इच्छा) और अदृष्टके उत्पादक कर्मोंके अनुकूल कृति आदि नियमित हैं, अतः उन्हींसे ही उक्त अदृष्टका नियम होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अभिसन्धि ( फलेच्छा ) प्रभृति भी सर्वसाधारण आत्ममनःसंयोगसे ही निष्पादित होते हैं, अतः अभिसन्धि आदि भी नियमत नहीं हो सकते हैं। यदि शङ्का हो कि स्वकीय मनःसंयोग ही अभिसन्धि आदिका कारण है, इसलिए मनःसंयोग ही असाधारण कारण है, सामान्य कारण नहीं है, अतः अदृष्टनियम हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, नित्य और सभी आत्माओंके साथ सम्बद्ध मन किसी व्यक्तिविशेषका होकर स्वकीय होता है, ऐसा भी नियम नहीं हो सकता है। यदि शङ्का हो कि अदृष्टविशेषसे ही तत्-तत् आत्मा तत्-तत् मनोंके स्वामी हैं ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस अदृष्टकी पूर्वके समान व्यवस्था नहीं हो सकती है।
उपाधिभेद होनेपर भी सुखाद्यनुसंधानका सांकर्यापादन] भाषानुवादसहित ३९७
नन्वात्मनां विभुत्वेऽपि तेषां प्रदेशविशेषा एव बन्धभाज इति आत्मान्तराणां चैत्रशरीरे तत्प्रदेशविशेषाभावात् सुखदुःखादिव्यवस्था भविष्यतीति, न; यस्मिन् प्रदेशे चैत्रः सुखाद्यनुभूय तस्मात् प्रदेशादपक्रान्तस्तस्मिन्नेव मैत्रे समागते तस्यापि तत्र सुखदुःखादिदर्शनेन शरीरान्तरे आत्मन्तरप्रदेशविशेषस्याऽप्यन्तर्भावात् । तस्मादात्मभेदेऽपि व्यवस्था दुरुपपादेव । कथंचित्तदुपपादने च श्रुत्यनुरोधाल्लाघवाच्चैकात्म्यमङ्गीकृत्य तत्रैव तदुपपादनं कर्तुं युक्तमिति ॥ १३ ॥
यदि शङ्का हो कि आत्माओंके स्वतः व्यापक होनेपर भी उनके प्रदेशविशेष ही सुख, दुःख आदि बन्धके आश्रय हैं, अतः चैत्रशरीरमें अन्य आत्माओंके प्रदेशविशेषोंकी अवस्थिति न रहनेके कारण सुख, दुःख आदिकी व्यवस्था होगी ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जिस * प्रदेशमें चैत्रने सुख, दुःख आदिका अनुभव किया हो, उस प्रदेशसे उसके हट जानेपर उसी प्रदेशमें आये हुए मैत्रके भी सुख, दुःख आदि देखे जाते हैं, अतः अन्य शरीरमें दूसरे आत्माके प्रदेश भी अन्तर्भूत हैं, इससे आत्माभेद पक्षमें भी व्यवस्थाका उपपादन अशक्य ही है, किसी प्रकारसे सुख, दुःख आदिके साङ्कर्य-परिहार किया जाय, तो भी श्रुतिके † अनुसार और लाघवसे एक आत्माका अङ्गीकार करके उसीमें सुखादिकी व्यवस्था करनी चाहिए ॥१३॥
* पूर्वपक्षसे यह नियम फलित होता है कि एक शरीरमें एक ही आत्माका प्रदेश है, अन्य आत्माका नहीं, परन्तु यह असङ्गत है, क्योंकि प्रदेशसे वही आत्माका प्रदेश लिया जायगा जो कि अदृष्टका आश्रय होगा, क्योंकि सुख, दुःख आदि अव्याप्यवृत्ति हैं, इस अवस्थामें जिस आसन आदि प्रदेशमें चैत्रका शरीर अवस्थित होकर चैत्रसुखका आश्रय होता है, उसी प्रदेशमें चैत्रशरीरके हट जानेपर मैत्रका शरीर बैठ जाय तो वह सुखाश्रय देखा जाता है । इस अवस्थामें पीछे आये हुए मैत्रशरीरमें चैत्र और मैत्रके आत्मप्रदेशोंका, जो कि अदृष्टके आश्रय हैं, प्रवेश होनेसे उसमें ( मैत्रशरीरमें ) चैत्र और मैत्र दोनोंके भोगका प्रसङ्ग होगा । यदि इसमें शङ्का हो कि पूर्वके शरीरके अपक्रान्त होनेपर उसके साथ साथ चैत्रशरीरमें रहनेवाले आत्माके प्रदेशका भी अपसरण होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रदेशवाले आत्माके स्थिर होनेके कारण, प्रदेशका चलना बन ही नहीं सकता । इसी प्रणालीके अनुसार इतर आत्माओंमें भी प्रदेशान्तर्भावप्रयुक्त साङ्कर्य तदवस्थ ही है, अतः आत्मभेदवादियोंका मत सर्वथा अश्रद्धेय तथा युक्ति और प्रमाणसे विधुर है, यह भाव है ।
† 'तत्त्वमसि' 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार आत्माका भेद भासता ही
| ३५८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [द्वितीय परिच्छेद |
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एवमण्वात्मवादेऽपि भोगश्चेशे प्रसज्यते । तथाऽन्ये बहवो दोषा विद्वद्भिः संप्रदर्शिताः ॥ ६७ ॥
इसी प्रकार आत्माके अणुत्ववादमें भी ईश्वरमें भोगकी प्रसक्ति होगी, इसी प्रकार विद्वानोंने दूसरे अनेक दोष अणुवादमें कहे हैं ॥ ६७ ॥
सन्तु तर्ह्यणव एवात्मानः, यदि विभुत्वे व्यवस्था न सुवचा । मैवम्, आत्मनामणुत्वे कदाचित् सर्वाङ्गीणसुखोदयस्य करशिरश्चरणाधिष्ठानस्य चाऽनुपपत्तेः ।
यदत्राऽर्वाचीनकल्पनम्—उत्क्रान्तिगत्यागतिश्रवणान्यथानुपपत्त्या 'अणुर्ह्येष आत्मा यं वा एते सिनीतः पुण्यं च पापं च' 'वालाग्रशतभागस्य' इत्यादिश्रुतिषु साक्षादणुत्वश्रवणेन च अणव एव जीवाः । तेषामणुत्वेऽपि
यदि जीवोंको विभु माननेपर व्यवस्था नहीं होती है, तो अणुपरिमाण ही मानो इस प्रकारकी यदि शङ्का हो, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि आत्माको अणु माननेपर किसी समय जो सम्पूर्ण शरीरमें सुखानुभव होता है, उसकी और कभी एक ही समयमें हाथ, मस्तक और चरणकी जो प्रेरणा होती है, उसकी अनुपपत्ति होगी ।
इस विषयमें कुछ अर्वाचीनोंने कल्पना की है कि आत्माकी उत्क्रान्ति *, गति और आगति आदिकी अनुपपत्ति न हो, इसलिए और 'अणुर्ह्येष०' (जिस आत्माको पुण्य और पाप बाँधते हैं, वह आत्मा अणु है) 'वालाग्र०' (केशके अग्रभागका सौवां भाग जीव है) इत्यादि श्रुतियोंमें तो साक्षात् जीवके अणुत्वका प्रतिपादन है, इसलिए जीव अणुपरिमाणवाले ही हैं। उनके अणुपरिमाण होनेपर भी दीपप्रभाके † दृष्टान्तसे
नहीं है, किन्तु आत्माका ऐक्य ही बुद्धिपथमें उतरता है, और अनेक आत्माओंके अङ्गीकारकी अपेक्षा एक आत्मा माननेमें कितना लाघव और विरोधाभाव है, यह वेदान्तरसिक जानते ही हैं, यह तात्पर्य है ।
* 'समुत्क्रान्तम्' इत्यादि श्रुति आत्माका उत्क्रमण आदि दिखलाती है ।
† जैसे दीपकी प्रभा अपने आश्रय दीपको छोड़कर अन्य गृहोदरादि प्रदेशमें व्याप्त होती है, वैसे ही ज्ञान, सुख आदि अपने आश्रय अणु आत्माको छोड़कर शरीर आदिमें व्याप्त हो सकते हैं, यह भाव है ।
जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३९९
ज्ञानसुखादीनां प्रदीपप्रभान्यायेन आश्रयातिरिक्तप्रदेशविशेषव्यापिगुणतया न सर्वाङ्गीणसुखानुपलब्धिः । 'द्रोणं बृहस्पतेर्भागम्' इत्यादिस्मृत्यनुरोधेन जीवानामांशसत्त्वात् । करशिरश्चरणाद्यनुगतेषु सुखदुःखादियौगपद्यं कायव्यूहगतेषु योगिनां भोगवैचित्र्यं चेति न काचिदनुपपत्तिः । एवं च जीवाना-मणुत्वेनाऽसङ्करात् सुख दुःखादिव्यवस्था विभोरीश्वराद् भेदश्चेति ।
अत्रोक्तमद्वैतदीपिकायाम्—एवमपि कथं व्यवस्थासिद्धिः । चैत्रस्य 'पादे वेदना, शिरसि सुखम्' इति स्वांशभेदगतसुखदुःखानुसन्धानवद्
सुख, दुःख आदि आश्रयसे अतिरिक्त प्रदेशविशेषमें व्यापी गुण हैं, अतः सर्वाङ्गीण सुख, दुःखोंकी अनुपलब्धि भी नहीं है । और 'द्रोणं बृहस्प०' (द्रोणाचार्य देवाचार्य बृहस्पतिका अंश है) इस स्मृतिके आधारपर जीव सांश भी सिद्ध होते हैं, अतः हाथ, सिर, पैर आदिमें जीवांशोंके अनुगत होनेसे ही सुख, दुःख आदिका यौगपद्य और अनेक शरीरोंके समूहोंमें जीवांशोंके जानेसे योगी लोगोंके भोगका वैचित्र्य होता है, इसलिए जीवाणुवादमें कोई अनुपपत्ति नहीं है । इस प्रकार जीवोंके अणु होनेपर भी एक शरीरमें सभी जीवोंका प्रवेश न होनेके कारण सुख, दुःख आदिकी व्यवस्था और विभु ईश्वरसे भेद भी हो सकता है, [जीवको विभु माननेसे दोनोंके लक्षणमें भेद न होनेके कारण ईश्वरसे जीवका भेद सिद्ध नहीं होगा । जीवको अणु माननेसे तो उन दोनोंमें अत्यन्त वैलक्षण्य होनेके कारण भेद स्पष्टरूपसे सिद्ध होता है, यह भाव है ] ।
इस प्रकारकी अर्वाचीनोंकी कल्पनाका अद्वैतदीपिका नामके ग्रन्थमें परिहार किया गया है कि * जीवमें अणुत्व और सांशत्वके माननेपर भी व्यवस्था किस प्रकार हो सकती हैं ? क्योंकि चैत्रके 'पैरमें वेदना है, सिरमें सुख है' इस प्रकार जीवके भिन्न अंशोंमें रहनेवाले सुख, दुःखोंका जैसे अनुभव होता
* अपने अंशमें रहनेवाले सुख आदिका जीव अनुभव करता है और अन्यजीवगत सुखादिका अनुभव नहीं करता, इस प्रकार स्वीकार करते हुए पूर्वपक्षीको कहना होगा कि भेद अननुसन्धानका प्रयोजक है और अभेद अनुसन्धानका प्रयोजक है, इसमें यह विकल्प हो सकता है—जो अननुसन्धानका प्रयोजक भेद है, वह भेदमात्र हैं अथवा शुद्ध भेद है ? प्रथम पक्षमें अपने अंशावृत्ति सुख आदिका भी चैत्र अनुभव नहीं कर सकेगा, क्योंकि अननुसन्धानमें हेतु वहाँ भेद है, यदि भेदके विद्यमान होनेपर भी वह सुखादिका अनुसन्धान करता है, यह स्वीकार करोगे तो यह भी मानना पड़ेगा कि चैत्रगत सुखादिका अनुसन्धान मैत्र भी
| ४०० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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मैत्रगतसुखदुःखानुसन्धानस्यापि दुर्वारत्वात् । अविशेषो हि चैत्रजीवात्तदंशयोः मैत्रस्य च भेदः । कायव्यूहस्थले वियुज्याऽन्यत्र प्रसरणसमर्थानामंशानां जीवाद् भेदावश्यकंभावाद् अंशांशिनोस्त्वया भेदाभेदाभ्युपगमाच्च । न च शुद्धभेदोऽननुसन्धानप्रयोजक इति वाच्यम्, शुद्धत्वं हि भेदस्यांऽशांशिभावासहचरितत्वं वा अभेदाससहचरितत्वं वा स्यात् ? नाऽऽद्यः, 'अंशो ह्येष परमस्य' 'ममैवांशो जीवलोके' 'अंशो नानाव्यपदेशात्' इति श्रुतिस्मृतिसूत्रैर्जीवस्य ब्रह्मांशत्वप्रतिपादनेन ब्रह्मजीवयोर्भोगसाङ्कर्यप्रसङ्गात् ।
ननु जीवांशानां जीवं प्रतीव जीवस्य ब्रह्म प्रति नांशत्वम्, किन्तु
है, वैसे ही मैत्रमें रहनेवाले सुख, दुःखोंके अनुभवका भी कैसे परिहार कर सकते हैं, क्योंकि जैसे चैत्रके जीवसे उसके अंशोंका भेद है, वैसे ही चैत्रजीवसे मैत्रका भी भेद है । योगीके कायव्यूह स्थलमें अंशीसे विभक्त होकर अन्य स्थलमें प्रसक्त होनेवाले अंशोंका जीवसे भेद अवश्य होगा, और तुम अंश और अंशीका भेदाभेद स्वीकार करते हो । यदि शङ्का हो कि शुद्ध भेद ही अननुसन्धानका प्रयोजक है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शुद्धभेदका अर्थ क्या अंशांशिभावका असाहचर्य है, अथवा अभेदका असाहचर्य है ? इसमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि † 'अंशो ह्येष परमस्य' 'ममैवांशो जीवलोके' 'अंशो नानाव्यपदेशात्' इस प्रकारकी श्रुति, स्मृति और सूत्रोंसे जीवमें ब्रह्मांशत्वका प्रतिपादन होनेसे जीव और ब्रह्ममें भोगसाङ्कर्य प्रसक्त होगा ।
* यदि शङ्का हो कि जीवके प्रति जीवांश जैसे मुख्य अंश है, वैसे ब्रह्मके
करता है, इसी बातको 'चैत्रस्य' इत्यादि मूलसे बतलाते हैं । द्वितीय पक्षका 'न च' इत्यादि ग्रन्थसे आशङ्कापूर्वक परिहार स्वयं ग्रन्थकार करेंगे ।
† जीव परमात्माका अंश है, लोकमें जीवरूप मेरा ( ईश्वरका ) ही अंश हैं, और जीव परमात्माका अंश है, क्योंकि नानाव्यपदेश है, क्रमशः श्रुति, स्मृति और सूत्रका यह अर्थ है । इसलिए अननुसन्धानका प्रयोजक शुद्धभेद अर्थात् अंशांशिभावसे रहित भेद माना जाय, तो प्रकृतमें जीव और ईश्वरका अंशांशिभावसे असहकृत भेद न होनेसे अननुसन्धान नहीं होगा, किन्तु परस्परके भोगोंका अन्योन्यको अनुसन्धान होगा, यह भाव है ।
* प्रकृतमें शङ्का करनेवालेका भाव यह है कि अननुसन्धानमें शुद्धभेद प्रयोजक है; इसमें शुद्धत्व केवल अंशांशिभावासहकृतत्व नहीं है, किन्तु मुख्यांशांशिभावासहकृतत्व है,
जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित • ४०१
'चन्द्रबिम्बस्य गुरुबिम्बः शतांशः' इतिवत् 'सदृशत्वे सति ततो न्यूनत्वमात्रम्' औपचारिकोंशत्वमिति चेत्, किं तदतिरेकेण मुख्यांशत्वं जीवांशानां जीवं प्रति, यदत्राननुसन्धानप्रयोजकशरीरे निवेश्यते ? न तावत् पटं प्रति तन्तूनामिवारम्भकत्वम् । जीवस्याऽनादित्वात् । नाऽपि महाकाशं प्रति घटाकाशादीनामिव प्रदेशत्वम्, टङ्कोच्छिन्नपाषाणशकलादीनामिव खण्डत्वं वा, अणुत्वेन निष्प्रदेशत्वादच्छेद्यत्वाच्च । भिन्ना-
प्रति जीव मुख्य अंश नहीं है, किन्तु 'चन्द्रबिम्बका गुरुबिम्ब शतांश है' यहांपर जैसे गुरुबिम्बमें चन्द्रबिम्बका औपचारिक अंशत्व प्रतीत होता है, वैसे ही प्रकृतमें जीव ईश्वरके सदृश तथा उससे न्यून है, अतः जीवमें औपचारिक अंशत्व भासित होता है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इसमें यह प्रश्न होता है कि जीवके प्रति जीवांशोंमें मुख्यांशत्व, जो कि औपचारिक अंशत्वसे भिन्न है †, क्या है, जिसका कि अननुसन्धानके प्रयोजकीभूत शरीरमें ( नियमस्वरूपमें ) विशेषणरूपसे निवेश करते हो ? यदि कहो कि जैसे पटके प्रति तन्तु आरम्भक हैं, अत एव वे पटके मुख्य अंश कहे जाते हैं, वैसे ही प्रकृतमें आरम्भकत्वरूप मुख्य अंशत्व है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि जीव अनादि है, [ अर्थात् जीवांशोंमें जीवके प्रति मुख्य अंशत्व है, ऐसा पूर्वमें जो तुमने कहा है, यह नहीं हो सकता है, क्योंकि जीव अनादि है, इसलिए वे जीवांश जीवके आरम्भक नहीं हो सकते हैं, अतः उनमें आरम्भकत्वरूप मुख्य अंशत्व नहीं हो सकता है, यह भाव है । ] यदि कहो कि महाकाशके प्रति घटाकाश आदिमें जैसे प्रदेशत्वरूप अंशत्व है, वैसे ही प्रकृतमें प्रदेशत्वरूप अथवा टङ्कसे तोड़े हुए पत्थरके टुकड़ोंके समान खण्डत्वरूप मुख्यांशत्व है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीव अणु है, अतः उसका प्रदेश नहीं है और इसीसे उसका टुकड़ा भी नहीं
जीव और ईश्वरका अंशांशिभाव मुख्य नहीं है, किन्तु गौण है, इसलिए उनका शुद्ध भेद होनेसे परस्पर अनुसन्धानका साङ्कर्य नहीं है और जीव और उसके अंशोंमें मुख्यांशांशिभावत्वके होनेसे शुद्ध भेद उनका नहीं है, अतः अनुसन्धानकी उपपत्ति भी हो सकती है, यह भाव है ।
† अर्थात् आरम्भकावयवत्व, प्रदेशत्व, खण्डत्व अथवा भिन्नाभिन्नत्वरूप मुख्यांशत्व है ? यह प्रश्नका आशय है, इनमें प्रत्येक पक्षका मूलकारने ही क्रमशः खण्डन किया है ।
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४०२ . सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद
भिन्नद्रव्यत्वमंशत्वमभिमतमिति चेद्, न; तथा सति जीवेश्वरयोर्जीवानां च भोगसाङ्कर्यप्रसङ्गात् । स्वतो भिन्नानां तेषां चेतनत्वादिना अभेदस्यापि त्वयाऽङ्गीकारात्, समूहसमूहिनोर्भेदाभेदवादिनस्तव मते एकसमूहान्तर्गतजीवानां परस्परमप्यभेदसत्त्वाच्च स्वाभिन्नसमूहाभिन्नेन स्वस्याऽप्यभेदस्य दुर्वारत्वात् । यदि संयोगादीनां जातेश्चाऽनेकाश्रितत्वं स्यात्, तदा गुणगुण्यादेरभेदाद् घटाभिन्नसंयोगाभिन्नपटादेरपि घटाभेदः प्रसज्ये-
हो सकता है, जिससे कि प्रदेशत्व और खण्डत्वरूप जीवके अंशोंमें मुख्यांशत्व हो । यदि कहो कि भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वरूप अंशत्व प्रकृतमें अभिमत है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा होनेपर जीव और ईश्वरका और जीवोंका परस्पर भोगसाङ्कर्य प्रसक्त होगा, क्योंकि जीव और ईश्वर तथा अनेक जीव स्वरूपतः परस्पर भिन्न * हैं, तथापि वे चेतनत्व आदि धर्मोंसे अभिन्न हैं, ऐसा तुम मानते हो और दूसरी बात यह है कि तुम समूह और समूहीका भेदाभेद मानते हो, इसलिए तुम्हारे मतमें एक समूहमें विद्यमान सम्पूर्ण जीवोंका † परस्पर अभेद भी है, कारण कि अपनेसे अभिन्न समूहके साथ अभेद होनेसे अपना भी दूसरेके साथ अभेद है, इसका निवारण नहीं कर सकते हैं, क्योंकि गुण और गुणीका अभेद मानकर यदि संयोग, विभाग आदि अनेकाश्रित माने जाँय, तथा जाति और व्यक्तिका अभेद मान कर यदि जातिको अनेकाश्रित माना जाय, तो गुण और गुणीका अभेद होनेसे घटाभिन्न संयोगसे अभिन्न पटमें भी घटाभेद प्रसक्त होगा, ऐसा कहते हुए तुमने 'तदभिन्ना-
* अननुसन्धानमें प्रयोजकीभूत जो भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वासहकृत भेद है, वह जीव और ईश्वरमें भी है, अतः जीव और ईश्वरके भोगका साङ्कर्य प्रसक्त होगा, क्योंकि घट और पटका परस्पर घटत्वादि विशेष धर्मोंसे भेद होनेपर भी द्रव्यत्वरूप व्यापक धर्मसे जैसे अभेद है, वैसे ही जीवत्व और ईश्वरत्वरूप धर्मोंसे उनका परस्पर भेद होनेपर भी सत्त्व, द्रव्यत्व, चेतनत्व आदि धर्मोंसे उनका अभेद है, यह भाव है।
† तात्पर्य यह है कि समूह और समूही का स्वरूपतः भेद और व्यापक धर्मोंसे अभेद तुम मानते हो, इस अवस्था में उत्सवमें एकत्र मिलित मनुष्योंका परस्पर भेदाभेद होनेके कारण भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वासहकृत शुद्धभेदके न रहनेसे उस उत्सवमें संमिलित यावत् व्यक्तियोंके भोगका साङ्कर्य प्रसक्त होगा, क्योंकि एक समूही देवदत्तसे अभिन्न समूहका यज्ञदत्तके साथ अभेद होनेसे देवदत्तका यज्ञदत्तके साथ अभेद निरस्त नहीं हो सकता है,.. अर्थात् समूहको लेकर देवदत्तका यज्ञदत्तके साथ अवश्य अभेद है, इसलिए भोगसाङ्कर्यका प्रसङ्ग है ही।
जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहितं ४०३
तेत्यादि वदता त्वया तदभिन्नाभिन्नस्य तदभेदनियमभ्युपगमात् ।
न च जीवान्तरसाधारणचेतनत्वादिधर्मैकरूप्यैकसमूहान्तर्गतत्वादि-प्रयुक्ताभेदविलक्षणमभेदान्तरमंशांशिनोरस्ति भेदेऽप्यनुसन्धानप्रयोजकम्, यद्वानतिप्रसङ्गाय विवक्षेत । तथा सति तस्यैव विशिष्य निर्वक्तव्यत्वा-
भिन्नस्य ‡ तदभिन्नत्वम्' यह नियम माना है।
* और अंश और अंशीका भेद रहनेपर भी अनुसन्धानका प्रयोजक—अन्य जीवोंमें रहनेवाले चेतनत्व आदि धर्मोंसे होनेवाले तथा एक समूहान्तर्गतत्वरूपसे होनेवाले अभेदसे विलक्षण—अन्य—अभेद भी उनका नहीं है, जिसकी कि अतिप्रसङ्गके वारणके लिए विवक्षा की जाय, क्योंकि अंश और अंशीका विलक्षण भेद माननेपर उसका भी विशेषरूपसे निर्वचन करना पड़ेगा। यदि कहो कि अंश और अंशीके अभेदमें धर्मोंसे होनेवाली एकरूपता आदि अभेदप्रयोजक नहीं हैं, यही विशेष है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीव और उसके अंशोंमें चेतनत्वादि धर्मोंसे एकरूपता और एक शरीरावच्छेदमें एवम् कार्य-समूहके मेलनमें उनका समूह † होनेसे जीव और उसके अंशोंके अभेदमें
‡ 'तदभिन्नाभिन्नस्य तदभिन्नत्वनियमः' इस नियमको नैयायिक लोगोंने माना है, अपनेसे अभिन्न पदार्थसे जो अभिन्न पदार्थ है, वह आपसे भी अभिन्न होता है, यह उक्त नियमका अर्थ है, जैसे गुण और गुणीका जो अभेद मानते हैं, उनके मतमें उक्त नियमके आधारपर नैयायिकोंने दोष दिया कि घटसे अभिन्न संयोग है और उससे अभिन्न पट है, अतः घट और पटका भी अभेद प्रसक्त हो सकता है, यह भाव है।
* प्रकृतमें शङ्काका यह कारण है कि जीव और ईश्वर तथा जीवांशोंका एवं समूहाभिन्न जीवोंका जो चेतनत्वादि धर्मप्रयुक्त अभेद है, उससे विलक्षण ही जीव और उसके अंशोंका अभेद है, इसलिए जीव और उसके अंशोंका भेद होनेपर भी परस्पर अनुसन्धान होता है, जीव और ईश्वरका चेतनत्वादि धर्मोंसे अभेद होनेपर भी उक्त विलक्षण अभेदके न रहनेसे परस्पर अनुसन्धानकी प्रवृत्ति नहीं है, अतः भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वासङ्कीर्ण भेद शुद्धभेद है, और वह अनुसन्धानका प्रयोजक है, इसमें जो अभेद प्रविष्ट है, वह जीव और उसके अंशोंका अनुसन्धानप्रयोजक विलक्षण अभेद है, इसलिए उक्त भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वासङ्कीर्ण भेदरूप शुद्धभेदमें दोष नहीं है, यह भाव है।
† जैसे जीव और उसके अंशोंकी चेतनत्वादिसे एकरूपता है, वैसे जीव और उसके अवयवोंका एक शरीरमें अनुप्रवेश कालमें उस शरीरावच्छेदेन समूह भी है, वैसे योगीके जीवके अवयवोंका कायव्यूहसे कहलानेवाले अनेक शरीरोंमें प्रवेश होनेसे कदाचित् उन शरीरी जीवोंका मेल न
४०४. । सिद्धान्तलेशसंग्रहे । [ द्वितीय परिच्छेद
पत्तेः । धर्मैकरूप्याद्यप्रयुक्तत्वमंशांशिनोरभेदे विशेष इति चेत्, न ; जीवत्तदंशयोश्चेतनत्वादिधर्मैकरूप्यसत्त्वेन एकशरीरावच्छेदे कायव्यूहमेलने च समूहत्वेन च तयोरभेदे धर्मैकरूप्यादिप्रयुक्तत्वस्यापि सद्भावात् । धर्मैकरूप्यादिप्रयुक्ताभेदान्तरसत्त्वेऽपि जीवत्तदंशयोरंशांशिभावप्रयोजकाभेदो न तत्प्रयुक्त इति चेद् , न ; तयोरभेदद्वयाभावात् तन्मतेऽधिकरणैक्ये सति भेदस्याऽभेदस्य वा प्रतियोगिभेदेन तदाकारभेदेन वा अनेकत्वानभ्युपगमात् । तस्मादाद्यपक्षे सुस्थोऽतिप्रसङ्गः ।
एतेनैव द्वितीयपक्षोऽपि निरस्तः । अभेदासहचरितभेदस्याऽननुसन्धानप्रयोजकत्वे उक्तरीत्या तन्मते जीवब्रह्मणोर्जीवानां चाऽभेदस्यापि सत्त्वेनातिप्रसङ्गस्य दुर्वारत्वात् ।
ननु 'अभेदप्रत्यक्षमनुसन्धाने प्रयोजकम्' इति तदभावेऽननुसन्धानम् ।
धर्मैक्यरूप आदि प्रयोजक हैं । यदि शङ्का हो कि जीव और उसके अंशोंमें धर्मैक्यरूप्यसे होनेवाला कोई दूसरा अभेद भले ही रहे, परन्तु जीव और उसके अंशोंमें रहनेवाला अंशांशिभावप्रयोजक अभेद धर्मैकरूप्य आदिसे नहीं होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अंश और अंशीमें दो अभेद रह ही नहीं सकते हैं, तुम्हारे मतमें भी अधिकरणकी एकता होनेपर भेद और अभेद प्रतियोगीके भेदसे या प्रतियोगीके आकारके भेद अनेक नहीं माने जाते हैं । इससे प्रथम पक्षमें (भेदके अंशांशिभावासहचरितत्वरूप शुद्धत्व पक्षमें) अतिप्रसङ्ग विद्यमान ही है ।
इसीसे द्वितीय पक्ष भी निरस्त हुआ ही समझना चाहिए, क्योंकि अभेदसे असहकृत भेद अननुसन्धानका प्रयोजक माना जाय, तो उक्त रीतिसे चेतनत्वादि धर्मैक्यरूप्य आदि पङ्क्तिसे कही गई रीतिसे) तुम्हारे मतमें भी जीव और ब्रह्म और जीवोंका भी परस्पर अभेद होनेके कारण अतिप्रसङ्ग दुर्वार ही है ।
यदि शङ्का हो कि 'अभेदप्रत्यक्ष अनुसन्धानमें प्रयोजक है' इसलिए अभेदप्रत्यक्षके न होनेपर अननुसन्धान होगा। अंशीका अपना अभेद और
होनेपर योगी जीवके अंशियोंके साथ समूह भी है, इसलिए धर्मैकरूप्यप्रयुक्त अभेद होनेसे तदप्रयुक्तत्वका असम्भव है, यह भाव है ।
जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहिते ४०५
स्वस्य स्वाभेदः स्वांशाभेदश्च प्रत्यक्ष इति तद्द्रष्टुर्दुःखाद्यनुसन्धानम्, जीवान्तरेणाऽभेदसत्त्वेऽपि तस्याऽप्रत्यक्षत्वान्न तद्दुःखाद्यनुसन्धानम्। जातिस्मरस्य प्राग्भवीयात्मनाऽपि अभेदस्य प्रत्यक्षसत्त्वात् तद्वृत्तान्तानुसन्धानम्, अन्येषां तदभावाद् नेत्यादि सर्वं सङ्गच्छते इति चेत्, तर्ह्येकात्म्यवादेऽपि सर्वात्मतावरकाज्ञानावरणाच्चैत्रस्य न मैत्रात्माद्यभेदप्रत्यक्षमिति तत एव सर्वव्यवस्थोपपत्तेर्व्यर्थः श्रुतिविरुद्ध आत्मभेदाभ्युपगमः ।
न चेत्थमपि प्रपञ्चतत्त्ववादिनस्तव व्यवस्थानिर्वाहः, सर्वज्ञस्येश्वरस्य वस्तुसज्जीवान्तराभेदप्रत्यक्षावश्यंभावेन जीवेषु दुःखवत्सु 'अहं दुःखी'त्यनु-
अपने अंशोंका अभेद प्रत्यक्ष है, इसलिए अभेददर्शीको दुःख आदिका अनुसन्धान होता है और जीवान्तरके साथ अभेद होनेपर भी उसका प्रत्यक्ष नहीं है, अतः उसे अन्यका दुःख अनुभूत नहीं होता है, पूर्वकी जातिका स्मरण करनेवाले वामदेव प्रभृतिको प्राग्भवीय आत्माके साथ अभेदका प्रत्यक्ष है, इसलिए उनको पूर्ववृत्तान्तका अनुसन्धान होता है, दूसरोंको उसका प्रत्यक्ष न होनेसे अनुसन्धान नहीं होता है, इत्यादि सभी व्यवस्थाकी उपपत्ति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस अवस्थामें एकात्मवादमें भी सर्वात्मताके आवारक अज्ञानका आवरण होनेसे चैत्रको मैत्रात्माके साथ अभेदका प्रत्यक्ष नहीं है, इसलिए उसीसे * सब व्यवस्थाकी यदि उपपत्ति हो सकती है, तो श्रुतिविरुद्ध आत्माके भेदकी कल्पना व्यर्थ ही है।
और † इस प्रकारकी कल्पनासे अर्थात् अभेदप्रत्यक्ष अनुसन्धानमें प्रयोजक है, इस कल्पनासे भी प्रपञ्चको तात्त्विक माननेवाले तुम्हारे मतमें व्यवस्थाका निर्वाह नहीं हो सकता है, क्योंकि ‡ सर्वज्ञ ईश्वरको वस्तुसत् अन्य जीवोंके अभेदका प्रत्यक्ष अवश्य होनेसे जीवोंके दुःखसे 'मैं दुःखी हूँ' इस प्रकार
* अर्थात् चैत्र, मैत्र आदि सभीको परस्परमें अभेदप्रत्यक्ष नहीं होनेसे ही व्यवस्थितिरूपसे सुख आदिके अनुसन्धानकी उपपत्ति हो सकती है, इसीसे, यह अर्थ है।
† अभेदप्रत्यक्षको अनुसन्धानका प्रयोजक मानकर अन्य मतमें आत्मभेदकल्पनामें गौरव और श्रुतिका विरोध कहा गया, अब इस ग्रन्थसे—आत्माके अभेदप्रत्यक्षको अनुसन्धान-प्रयोजक मान भी नहीं सकते हैं, यह कहते हैं।
‡ यदि ईश्वर अन्य जीवसे अन्य जीवका पारमार्थिक अभेदको जानता नहीं है, यह मान लिया जाय, तो ईश्वर सर्वज्ञ नहीं हो सकेगा, यह भाव है।
| ४०६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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भवापत्तेः । अस्मन्मते त्वीश्वरः स्वाभिन्ने जीवे संसारं प्रतिबिम्बमुखे मालिन्यमिव पश्यन्नपि मिथ्यात्वनिश्चयान्न शोचतीति नैष प्रसङ्गः ।
स्यादेतत्—मा भूदंशभेदः करशिरश्चरणादीनां कायव्यूहस्य चाऽधिष्ठानम्, आत्मदीपस्यानपायिनी ज्ञानप्रभाऽस्ति व्यापिनीति सैव सर्वाधिष्ठानं
ईश्वरको भी दुःखित्वका अनुभव प्रसक्त होगा । हम वेदान्तियोंके मतमें तो ब्रह्माभिन्न जीवमें—प्रतिबिम्बभूत मुखमें दर्पणकी मलिनता देखनेपर भी उसे जैसे मिथ्या मानते हैं, वैसे ही—संसारको देखता हुआ भी ईश्वर उसे मिथ्या मानता है, अतः उसके विषयमें कुछ नहीं सोचता है, अतः उक्त दोष नहीं * है।
अब इस प्रकार जीवाणुवादियोंकी शङ्का है कि जीवके अंशविशेष—हाथ, सिर, पैर आदिका और कायव्यूहका—अधिष्ठान ( प्रेरक ) भले ही न हो, परन्तु आत्मारूप दीपककी अविनाशिनी ज्ञानात्मक व्यापक प्रभा है, *
* कुछ लोगोंने कहा है कि जीवोंके सांश होनेसे हाथ, सिर, पैर आदिमें जीवांशोंके अनुगत होनेपर सुख, दुःख आदिका यौगपद्य हो सकता है, और कायव्यूहमें योगीके जीवावयवोंके जानेपर योगियोंको भी युगपत् सुख, दुःख आदिके भोगका वैचित्र्य हो सकता है, अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, जीवके प्रति उसके अंशोंमें मुख्य अंशत्व नहीं है, इसका निराकरण हो चुका है, और जीवाणुवादमें जीवसदृश होकर जीवसे न्यूनपरिमाणत्वरूप औपचारिक अंशत्वका भी बाध है, क्योंकि जीवका अणुपरिमाण होनेसे उससे न्यूनपरिमाण ही नहीं हो सकता है, और सदृशत्व होकर न्यूनपरिमाणत्वरूप जो औपचारिक अंशत्व है, वह तो चन्द्रबिम्ब और गुरुबिम्बके समान जीवांशोंके अत्यन्त भेदका प्रयोजक है, अतः जीवको अपने अंशगत दुःखादिके प्रति अनुसन्धातृत्व भी नहीं हो सकता है, वैसे ही योगके जीवांश कायव्यूहके अधिष्ठाता हैं, तथापि उनसे अत्यन्त भिन्न योगीका जीव कायव्यूहका अधिष्ठाता नहीं हो सकता है, इसी प्रकार शरीराधिष्ठाता जीव और अवयवोंके अधिष्ठाता अंश अत्यन्त भिन्न-भिन्न हैं । अतः एक ही शरीरमें अनेक भोक्ताओंकी प्रसक्ति होगी, और जीवको सांश माननेमें कोई प्रमाण भी नहीं है, 'द्रोणं बृहस्पतेर्भागम्' इत्यादि वाक्य—उक्त प्रकारसे अंशपरक न होनेसे बृहस्पति आदि अपने योग-प्रभावसे पृथ्वीका भार हरण करना आदि देवताओंके कार्यके लिए अन्य शरीरका परिग्रहण करते हैं—यही बोध कराता है । इससे यह भी खण्डित हुआ समझना चाहिए कि राम, कृष्ण आदि विष्णुके अंश हैं ।
* जीव स्वयं अणु भले ही हो, परन्तु उसकी नित्य और व्यापक ज्ञानात्मक प्रभा है, इससे उसके एकदेशमें रहनेपर भी अपनेमें रहनेवाले ज्ञानके प्रभावसे हाथ आदि शरीरके सम्पूर्ण अवयवोंमें और कायव्यूहमें वह अधिष्ठित होता है, अतः निरंश जीवके अधिष्ठातृत्व आदिकी अनुपपत्ति नहीं है, यह शङ्काका तात्पर्य है ।
जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार ] भाषानुवादसहित ४०७
भविष्यतीति चेद्, न; ज्ञानवद् आत्मधर्मस्य सुखदुःखभोगस्य ज्ञान- माश्रित्य उत्पत्त्यसम्भवेन करचरणाद्यवयवभेदेनाऽवयविनः, कायव्यूहवतः कायभेदेन च भोगवैचित्र्याभावप्रसङ्गात् । 'सुखदुःखभोगादि ज्ञानधर्म एव, नात्मधर्मः' इत्यभ्युपगमे तद्वैचित्र्येण आत्मगुणस्य ज्ञानस्य भेद- सिद्धावप्यात्मनो भेदासिद्ध्या भोगवैचित्र्यादिनाऽऽत्माभेदप्रतिक्षेपायोगात् । 'भोगाद्याश्रयस्याऽऽत्मनोऽणुत्वेन प्रतिशरीरं विच्छिन्नतया तद्व्यापित्ववाद् इव .
अतः वही प्रभा हाथ आदिकी प्रेरक होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि † ज्ञानके समान आत्मामें रहनेवाले सुख-दुःखात्मक भोगकी ज्ञानको आश्रय करके—ज्ञानमें—उत्पत्ति नहीं हो सकती है, अतः हाथ, पैर आदि अवयवोंके भेदसे अवयवी जीवको और अनेक शरीरवाले योगीको, शरीरोंके भेदसे, विचित्र भोग. नहीं हो सकते हैं। सुख-दुःखात्मक भोग आदि ज्ञानके ही धर्म हैं, आत्माके धर्म नहीं हैं, ऐसा यदि मानो, तो उक्त भोगके वैचित्र्यसे आत्माके गुणभूत ज्ञानका भेद सिद्ध होनेपर भी आत्माका भेद सिद्ध नहीं हो सकता है, इससे भोगके वैचित्र्यसे आत्माके अभेदका अपाकरण नहीं कर सकते हैं। और 'भोग आदिका आश्रय आत्मा अणु होनेसे प्रत्येक शरीरमें विच्छिन्न-भिन्न है, अतः जीवके व्यापकवादके समान और जीव और ईशके
† समाधानकर्ताका भाव यह है—पूर्वपक्षीके मतसे ज्ञान ही व्यापक ठहरा, यदि व्यापक ज्ञानमें सुखादिकी उत्पत्ति मानी जाय, तो शरीरके प्रत्येक अवयवमें और कायव्यूहमें युगपत् सुखादिका अनुभव हो सकता है, परन्तु पूर्वपक्षी सुखादिको ज्ञानधर्म नहीं मानता, किन्तु अणु आत्माका ही धर्म मानता है, इसलिए ज्ञानके व्यापक' होनेपर भी हाथ आदि अवयवोंमें और कायव्यूहमें युगपत् भोगके वैचित्र्यकी उपपत्ति नहीं हो सकती है।
और योगियोंके भोगका वैचित्र्य हे इसमें स्मृति प्रमाण भी है—
आत्मनां च सहस्राणि बहूनि भरतर्षभ।
योगी कुर्यात् बलं प्राप्य तैश्च सर्वां महीं चरेत् ॥
प्राप्नुयात् विषयान् कैश्चित् कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत्।
सङ्क्षिपेच्च पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव ॥
अर्थात् योगी योगके प्रभावसे अनेक शरीरोंको धारणकर सम्पूर्ण पृथ्वीमें जा सकता है, कुछ शरीरोंसे वह अनेक भोग करता है और कई एक शरीरोंसे उग्र तप भी करता है, और उन शरीरोंको पुनः अपनेमें लीन भी कर लेता है जैसे सूर्य अपनी किरणोंको समेट लेता है, यह उपर्युक्त श्लोकोंका भाव है !
| ४०८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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तदभेदवाद इव च न सर्वधर्मसङ्करापत्तिः' इति मतहानेश्च । तस्माज्जीवस्याऽणुत्वोपगमेन व्यवस्थोपपादनं न युक्तमिति ।
नाऽपि तेन तस्येश्वराद् भेदसाधनं युक्तम्, उत्क्रान्त्यादिश्रवणात्, साक्षादणुत्वश्रवणाच्च 'अणुर्जीवः' इति वदतः तव मते 'तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' 'अन्तः प्रविष्टश्शास्ता जनानाम्' 'गुहां प्रविष्टौ परमे परार्ध्ये' इत्यादिश्रुतिषु प्रवेशादिश्रवणात्, 'स एषोऽणिमा एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद्वा' इति श्रुतौ साक्षादणुत्वश्रवणाच्च परोऽप्यणुरेव सिध्येदिति कुतः परजीवयोर्विभुत्वाणुत्वाभ्यां भेदसिद्धिः ।
अभेदवादके समान सब धर्मोंका साङ्कर्य प्रसक्त नहीं है' इस प्रकारके अपने मतकी हानि भी प्रसक्त होगी, इससे जीवको अणु माननेपर भी व्यवस्थाका उपपादन नहीं हो सकता है ।
और जीवको अणु मानकर उसका ईश्वरसे भेद भी पूर्वपक्षी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उत्क्रान्ति आदिके और साक्षात् अणुत्वके श्रवणसे 'जीवको अणु माननेवाले पूर्वपक्षीके मतमें 'तत्सृष्ट्वा०' ( जगत्को बना करके परमात्माने जगत्में ही प्रवेश किया ) 'अन्तः०' ( शरीरके भीतर प्रविष्ट हुआ, परमात्मा जनोंका नियन्ता है ) 'गुहां०' ( परार्ध्य * हृदयाकाशमें जो बुद्धिरूप गुहा है, उसमें जीव और ईश्वर प्रविष्ट हैं ) इत्यादि श्रुतियोंसे जगत् आदिमें ईश्वरके प्रवेश प्रभृति सुने जाते हैं और 'स एषोऽणिमा०' ( यह परमात्मा अणु है, मेरे हृदयमें यही आत्मा है, जो व्रीहि और यवसे छोटा है, इस श्रुतिमें साक्षात् अणुत्वका कथन है, इससे ईश्वर भी अणु ही सिद्ध होगा, इसलिए पूर्वपक्षीके मतमें भी अणुत्व और विभुत्वसे जीव और ईश्वरका भेद कैसे सिद्ध होगा ? †
* परार्ध्य शब्दका अर्थ है—परस्य अर्धम्—स्थानम् अर्हतीति परार्ध्यम् अर्थात् ईश्वरके स्थानके लिए जो योग्य है, ऐसा हृदयाकाश ।
† पूर्वपक्षी श्रुतियोंके आधारपर जीवमें अणुत्वकी और ईश्वरमें व्यापकत्वकी सिद्धि करता है, और इन्हीं अणुत्व और विभुत्वरूप विरुद्ध धर्मोंसे जीव और ईश्वरके भेदका भी साधन करता है, परन्तु ईश्वरमें उक्त श्रुतियोंसे अणुत्वकी सिद्धि ही हुई, इसलिए पूर्वपक्षीके मतसे दोनोंमें रहनेवाले एक अणुत्वसे उन दोनोंका भेद कैसे सिद्ध हो सकता है ?, अर्थात् कभी नहीं होगा । अतः पूर्वपक्षी अपने अभीष्ट जीवेश्वरके भेदकी भी सिद्धि जीवको अणु मानकर नहीं कर सकता है, यह भाव है ।