भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 426
३९६सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ द्वितीय परिच्छेदे

स्याऽपि नियमासिद्धेः। यदा हि तददृष्टोत्पादनाय केनचिदात्मना संयुज्यते मनः, संयुज्यत एव तदाऽन्यैरपि। कथं कारणसाधारण्ये क्वचिदेव तददृष्टमुत्पद्येत। ननु मनस्संयोगमात्रसाधारण्येऽपि 'अहमिदं फलं प्राप्नुवान्' इति अभिसन्धिरदृष्टोत्पादककर्मानुकूलकृतिरित्येवमादि व्यवस्थितमिति तत एवाऽदृष्टनियमो भविष्यतीति चेत्, न; अभिसन्ध्यादीनामपि साधारणमनस्संयोगादिनिष्पाद्यतया व्यवस्थित्यसिद्धेः। ननु स्वकीयमनस्संयोगोऽभिसन्ध्यादिकारणमिति मनस्संयोग एवाऽसाधारणो भविष्यतीति, न; 'नित्यं सर्वात्मसंयुक्तं मनः कस्यचिदेव स्वम्' इति नियन्तुमशक्यत्वात्। न चाऽदृष्टविशेषादात्मविशेषाणां मनसस्स्वस्वामिभावसिद्धिः। तस्याऽप्यदृष्टस्य पूर्ववद् व्यवस्थित्यसिद्धेः।


उत्पादनके लिए किसी आत्माके साथ मनका सम्बन्ध होता, तब दूसरे आत्माओंके साथ भी मनका सम्बन्ध है ही, [ क्योंकि आत्मा व्यापक है ]। इसलिए आत्ममनःसंयोगरूप असमवायिकारण और समवायिकारणरूप आत्माके साधारण होनेसे किसी स्थलविशेषमें वह उत्पन्न होता है, यह कैसे होगा। यदि शङ्का हो कि केवल आत्ममनःसंयोगके साधारण होनेपर भी 'मैं इस फलको प्राप्त करूँ' इस प्रकार अभिसन्धि (फलकी इच्छा) और अदृष्टके उत्पादक कर्मोंके अनुकूल कृति आदि नियमित हैं, अतः उन्हींसे ही उक्त अदृष्टका नियम होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अभिसन्धि ( फलेच्छा ) प्रभृति भी सर्वसाधारण आत्ममनःसंयोगसे ही निष्पादित होते हैं, अतः अभिसन्धि आदि भी नियमत नहीं हो सकते हैं। यदि शङ्का हो कि स्वकीय मनःसंयोग ही अभिसन्धि आदिका कारण है, इसलिए मनःसंयोग ही असाधारण कारण है, सामान्य कारण नहीं है, अतः अदृष्टनियम हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, नित्य और सभी आत्माओंके साथ सम्बद्ध मन किसी व्यक्तिविशेषका होकर स्वकीय होता है, ऐसा भी नियम नहीं हो सकता है। यदि शङ्का हो कि अदृष्टविशेषसे ही तत्-तत् आत्मा तत्-तत् मनोंके स्वामी हैं ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस अदृष्टकी पूर्वके समान व्यवस्था नहीं हो सकती है।