भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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उपाधिभेद होनेपर भी सुखाद्यनुसन्धानका साङ्कर्यापादन] भाषानुवादसहित ३९५


सू० ५३) इतिसूत्रतद्गतभाष्यरीतिमनुसृत्य एकस्मिन्नात्मन्युपाधिभेदेन व्यवस्थानुपगमे कणभुगादिरीत्याऽऽत्मभेदवादेऽपि व्यवस्थाऽनुपपत्तितौल्यमाहुः ।

तथाहि—चैत्रचरणलग्नकण्टकेन चैत्रस्य वेदनोत्पादनसमये अन्येषामप्यात्मनां कुतो वेदना न जायते । सर्वात्मना सर्वगतत्वेन चैत्रशरीरान्तर्भावाविशेषात् । न च 'यस्य शरीरे कण्टकवेधादि, तस्यैव वेदना, नाऽन्येषाम्' इति व्यवस्था । 'सर्वात्मसन्निधावुत्पद्यमानं शरीरं कस्यचिदेव, नाऽन्येषाम्' इति नियन्तुमशक्यत्वात् ।

न च 'यददृष्टोत्पादितं यच्छरीरम्, तत्तदीयम्' इति नियमः । अदृष्ट-


और इनके भाष्यकी प्रणालीका अनुसरण करके एक आत्मामें उपाधिकी भिन्नतासे व्यवस्थाका अङ्गीकार न करनेपर कणाद आदिकी रीतिसे आत्माके भेदवादमें भी सुख आदिकी व्यवस्था नहीं हो सकती है ।

* जैसे कि चैत्रके पैरमें चुभे हुए कण्टकसे जब चैत्रको दुःख उत्पन्न होता है, उस कालमें दूसरे जीवोंको भी दुःख क्यों नहीं होता है ? क्योंकि सभी आत्माओंके व्यापक होनेसे चैत्रके शरीरमें भी उनका अन्तर्भाव समान ही है । यदि शङ्का हो कि 'जिसके शरीरमें कांटा चुभा हो, उसीके शरीरमें वेदना होती है' ऐसा नियम है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रत्येक आत्माके सामीप्यमें उत्पन्न हुआ शरीर 'किसी व्यक्तिविशेषका होता है, दूसरोंका नहीं होता' इस प्रकार नियम नहीं कर सकते हैं ।

यदि शङ्का हो कि 'जिस अदृष्टसे जिसका शरीर उत्पन्न हुआ है, वह उसीका है' ऐसा नियम है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस प्रकार अदृष्टका भी नियम नहीं कर सकते हैं, कारण कि जब उसी प्रकारके अदृष्टके


प्रदेशसे अभिसन्धि ( संकल्प ) आदिकी व्यवस्था हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि आत्मामें विभुत्व होनेसे सभीमें सबका सम्बन्ध होनेके कारण 'यह इसका शरीर है' यह नियम नहीं हो सकता है, अतः उक्त दोष समान है, यह भाव है ।

* इस ग्रन्थसे 'अदृष्टानियमात्' इत्यादि सूत्रोंका, जो कि पूर्वमें मूलमें ही उपन्यस्त हैं, उनका स्पष्टीकरण करते हैं, इससे यह निश्चित होगा कि उपाधिभेदके बिना आत्माओंको नाना मान कर भी भोगादिके साङ्कर्यका परिहार नहीं कर सकते हैं ।

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