भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 424
३९४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

विद्याभेदमन्ये प्रवक्षते ।
कोई लोग अज्ञानके भेदको उक्त असाङ्कर्यका प्रयोजक कहते हैं।
केचित्तु 'अज्ञानानि जीवभेदोपाधिभूतानि नाना' इति स्वीकृत्य तद्भेदा-
भेदाभ्याम् अनुसन्धानाननुसन्धानव्यवस्थामाहुः ॥ १२ ॥
अदृष्टानियमादिभ्यः कारणादेर्व्यवस्थास्थितिः ॥ ६६ ॥
अदृष्टानियम आदिके कारण आदिकी व्यवस्था होती है ॥ ६६ ॥

अत्र केचिद् ( उ० मी० अ० २ पा० ३ सू० ४३ ) 'अंशो नाना-
व्यपदेशाद्' इत्यधिकरणे 'अदृष्टानियमात्' ( उ० मी० अ० २ पा० ३
सू० ५१ ) 'अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम्' ( उ० मी० अ० २ पा० ३
सू० ५२ ) 'प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावाद्' ( उ० मी० अ० २ पा० ३

कुछ लोग जीवके उपाधिभूत अज्ञान अनेक हैं, इस प्रकार अङ्गीकार
करके अज्ञानके अभेद और भेदसे अनुसन्धान और अननुसन्धानकी व्यवस्थाका
उपपादन करते हैं ॥ १२ ॥

इस विषयमें कुछ लोग कहते हैं * 'अंशो नानाव्यपदेशात्' 'अदृष्टानिय-
मात्' † 'अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम्' ‡ 'प्रदेशादिचेन्नान्तर्भावात्' इन सूत्रोंकी


उपचित अवयव दोनों मिलकर अन्य शरीरका द्वयणुकादिक्रमसे आरम्भ करते हैं, अतः शरीरोंके परिमाणके भेदसे शरीरोंका भी भेद अवश्य मानना चाहिए, यह पूर्वपक्षका भाव है।

* जीव ब्रह्मका अंश है, क्योंकि 'य आत्मनि' श्रुतिमें जीव और ब्रह्मका नानात्व व्यपदिष्ट है। इस विषयमें यदि शङ्का हो कि ब्रह्म तो अंशवान् नहीं है ऐसी परिस्थितिमें जीव ब्रह्मका अंश कैसे होगा ? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे घटादिसे अवच्छिन्न आकाश महाकाशका अंश होता है, वैसे ही प्रकृतमें भी हो सकता है अर्थात् अवच्छिन्न चैतन्य अनवच्छिन्न चैतन्यका अंश है, ऐसा माना जा सकता है, वस्तुतः नहीं है, यह सूत्रका एक हिस्सा है, परन्तु सूत्रका पूर्णस्वरूप—'अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके' इतना है, इसका विस्तार अच्युत-ग्रन्थमालामुद्रित भाषानुवादसहित शाङ्करभाष्यके पृ० १५०८ में देखना चाहिए ।

'अदृष्टानियमात्' साङ्ख्यमतमें प्रधानमें रहनेवाला अदृष्ट और न्यायमतमें अदृष्टका हेतु आत्ममनःसंयोग हरएक आत्माके प्रति साधारण है, अतः 'यह इसका अदृष्ट है' इस प्रकार व्यवस्था न होनेके कारण भोगादिका साङ्कर्य उनके मतमें भी समान है, यह इस सूत्रका अर्थ है।

† साधारण मनके संयोग आदिसे होनेवाले सङ्कल्प आदि भी अदृष्ट नियमके सम्पादक नहीं हैं, अतः भोगका साङ्कर्य ज्योंका त्यों है ।

‡ प्रदेशभेदादिति चेन्नान्तर्भावात्—आत्माओंके विभु होनेपर भी शरीरावच्छिन्न आत्म-

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