सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 423, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवोपाधि-विचार ] भाषानुवादसहित ३९३
एकस्मिन् वृक्षे मूलाग्रभेदेनेव कालभेदेनेकस्मिन्नेकपरिमाणान्वयोपपत्तेः ।
नन्ववयवोपचयमन्तरेण न परिमाणभेदः । अवयवाश्च पश्चादापतन्तो न पूर्वसिद्धं शरीरं परियुज्यन्ते इति परिमाणभेदे शरीरभेद आवश्यक इति चेत्, न; प्रदीपारोपणसमसमयसौधोदरव्यापिप्रभामण्डलविकासत-त्पिधानसमसमयतत्संकोचाद्यनुरोधिनः परमाणुप्रक्रिययोरसम्भवादस्याऽनभ्युपगमात् । विवर्तवादे चैन्द्रजालिकदर्शितशरीरवद् विनैवाऽवयवोपचयं मायया शरीरस्य वृद्धद्युपपत्तेरित्याहुः ।
लिङ्गभेदं परेऽ —
कुछ लोग अन्तःकरणके भेदको असाङ्कर्यका प्रयोजक मानते हैं ।
इतरे त्वन्तःकरणाभेदतद्भेदाभ्यामनुसन्धानानुसन्धानव्यवस्थामाहुः ।
अयं च पक्षः प्रागुपपादितः ।
है, क्योंकि एक ही वृक्षमें मूल और अग्रके भेदसे जैसे भेदका अवभास होता है, वैसे ही एक ही शरीरमें कालभेदसे अनेक परिमाणोंका सम्बन्ध हो सकता है, यह भाव है ।
यदि शङ्का हो कि अवयवोंकी वृद्धिके विना परिमाणका भेद नहीं हो सकता है । और पीछेसे आनेवाले अवयव पूर्वसिद्ध शरीरके साथ सम्बद्ध नहीं हो सकते हैं, इससे परिमाणके भेदसे शरीरका † भेद आवश्यक है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रदीपके जलानेके समयमें ही महलके अन्दर व्याप्त होनेवाले प्रभामण्डलके विकासका और प्रदीपके आच्छादनकालमें ही उक्त प्रभामण्डलके संकोचका अनुसरण न करनेवालेकी परमाणुप्रक्रियाका सम्भव न होनेसे उक्त परिमाणभेदका अङ्गीकार ही नहीं है । विवर्तवादमें तो ऐन्द्रजालिकसे दिखलाये गये शरीरके समान अवयवकी वृद्धिके बिना ही मायासे शरीरकी वृद्धि हो सकती है ।
कुछ लोग कहते है कि अन्तःकरणके अभेद और उसके भेदसे ही अनुसन्धान और अननुसन्धानकी उपपत्ति हो सकती है । इस पक्षका पूर्वमें उपपादन किया जा चुका है ।
† तात्पर्य यह है कि पूर्वसिद्ध शरीर उत्तरकालभावी बड़े शरीरके प्रति उपादान नहीं हो सकता है, इसलिए पूर्व शरीरका नाश होनेके बाद पूर्व शरीरके अवयव और पीछे आनेवाले
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