सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 427, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपाधिभेद होनेपर भी सुखाद्यनुसंधानका सांकर्यापादन] भाषानुवादसहित ३९७
नन्वात्मनां विभुत्वेऽपि तेषां प्रदेशविशेषा एव बन्धभाज इति आत्मान्तराणां चैत्रशरीरे तत्प्रदेशविशेषाभावात् सुखदुःखादिव्यवस्था भविष्यतीति, न; यस्मिन् प्रदेशे चैत्रः सुखाद्यनुभूय तस्मात् प्रदेशादपक्रान्तस्तस्मिन्नेव मैत्रे समागते तस्यापि तत्र सुखदुःखादिदर्शनेन शरीरान्तरे आत्मन्तरप्रदेशविशेषस्याऽप्यन्तर्भावात् । तस्मादात्मभेदेऽपि व्यवस्था दुरुपपादेव । कथंचित्तदुपपादने च श्रुत्यनुरोधाल्लाघवाच्चैकात्म्यमङ्गीकृत्य तत्रैव तदुपपादनं कर्तुं युक्तमिति ॥ १३ ॥
यदि शङ्का हो कि आत्माओंके स्वतः व्यापक होनेपर भी उनके प्रदेशविशेष ही सुख, दुःख आदि बन्धके आश्रय हैं, अतः चैत्रशरीरमें अन्य आत्माओंके प्रदेशविशेषोंकी अवस्थिति न रहनेके कारण सुख, दुःख आदिकी व्यवस्था होगी ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जिस * प्रदेशमें चैत्रने सुख, दुःख आदिका अनुभव किया हो, उस प्रदेशसे उसके हट जानेपर उसी प्रदेशमें आये हुए मैत्रके भी सुख, दुःख आदि देखे जाते हैं, अतः अन्य शरीरमें दूसरे आत्माके प्रदेश भी अन्तर्भूत हैं, इससे आत्माभेद पक्षमें भी व्यवस्थाका उपपादन अशक्य ही है, किसी प्रकारसे सुख, दुःख आदिके साङ्कर्य-परिहार किया जाय, तो भी श्रुतिके † अनुसार और लाघवसे एक आत्माका अङ्गीकार करके उसीमें सुखादिकी व्यवस्था करनी चाहिए ॥१३॥
* पूर्वपक्षसे यह नियम फलित होता है कि एक शरीरमें एक ही आत्माका प्रदेश है, अन्य आत्माका नहीं, परन्तु यह असङ्गत है, क्योंकि प्रदेशसे वही आत्माका प्रदेश लिया जायगा जो कि अदृष्टका आश्रय होगा, क्योंकि सुख, दुःख आदि अव्याप्यवृत्ति हैं, इस अवस्थामें जिस आसन आदि प्रदेशमें चैत्रका शरीर अवस्थित होकर चैत्रसुखका आश्रय होता है, उसी प्रदेशमें चैत्रशरीरके हट जानेपर मैत्रका शरीर बैठ जाय तो वह सुखाश्रय देखा जाता है । इस अवस्थामें पीछे आये हुए मैत्रशरीरमें चैत्र और मैत्रके आत्मप्रदेशोंका, जो कि अदृष्टके आश्रय हैं, प्रवेश होनेसे उसमें ( मैत्रशरीरमें ) चैत्र और मैत्र दोनोंके भोगका प्रसङ्ग होगा । यदि इसमें शङ्का हो कि पूर्वके शरीरके अपक्रान्त होनेपर उसके साथ साथ चैत्रशरीरमें रहनेवाले आत्माके प्रदेशका भी अपसरण होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रदेशवाले आत्माके स्थिर होनेके कारण, प्रदेशका चलना बन ही नहीं सकता । इसी प्रणालीके अनुसार इतर आत्माओंमें भी प्रदेशान्तर्भावप्रयुक्त साङ्कर्य तदवस्थ ही है, अतः आत्मभेदवादियोंका मत सर्वथा अश्रद्धेय तथा युक्ति और प्रमाणसे विधुर है, यह भाव है ।
† 'तत्त्वमसि' 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार आत्माका भेद भासता ही