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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 590 में से

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पृष्ठ 428
३५८सिद्धान्तलेशसंग्रह[द्वितीय परिच्छेद

एवमण्वात्मवादेऽपि भोगश्चेशे प्रसज्यते । तथाऽन्ये बहवो दोषा विद्वद्भिः संप्रदर्शिताः ॥ ६७ ॥

इसी प्रकार आत्माके अणुत्ववादमें भी ईश्वरमें भोगकी प्रसक्ति होगी, इसी प्रकार विद्वानोंने दूसरे अनेक दोष अणुवादमें कहे हैं ॥ ६७ ॥

सन्तु तर्ह्यणव एवात्मानः, यदि विभुत्वे व्यवस्था न सुवचा । मैवम्, आत्मनामणुत्वे कदाचित् सर्वाङ्गीणसुखोदयस्य करशिरश्चरणाधिष्ठानस्य चाऽनुपपत्तेः ।

यदत्राऽर्वाचीनकल्पनम्—उत्क्रान्तिगत्यागतिश्रवणान्यथानुपपत्त्या 'अणुर्ह्येष आत्मा यं वा एते सिनीतः पुण्यं च पापं च' 'वालाग्रशतभागस्य' इत्यादिश्रुतिषु साक्षादणुत्वश्रवणेन च अणव एव जीवाः । तेषामणुत्वेऽपि


यदि जीवोंको विभु माननेपर व्यवस्था नहीं होती है, तो अणुपरिमाण ही मानो इस प्रकारकी यदि शङ्का हो, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि आत्माको अणु माननेपर किसी समय जो सम्पूर्ण शरीरमें सुखानुभव होता है, उसकी और कभी एक ही समयमें हाथ, मस्तक और चरणकी जो प्रेरणा होती है, उसकी अनुपपत्ति होगी ।

इस विषयमें कुछ अर्वाचीनोंने कल्पना की है कि आत्माकी उत्क्रान्ति *, गति और आगति आदिकी अनुपपत्ति न हो, इसलिए और 'अणुर्ह्येष०' (जिस आत्माको पुण्य और पाप बाँधते हैं, वह आत्मा अणु है) 'वालाग्र०' (केशके अग्रभागका सौवां भाग जीव है) इत्यादि श्रुतियोंमें तो साक्षात् जीवके अणुत्वका प्रतिपादन है, इसलिए जीव अणुपरिमाणवाले ही हैं। उनके अणुपरिमाण होनेपर भी दीपप्रभाके † दृष्टान्तसे


नहीं है, किन्तु आत्माका ऐक्य ही बुद्धिपथमें उतरता है, और अनेक आत्माओंके अङ्गीकारकी अपेक्षा एक आत्मा माननेमें कितना लाघव और विरोधाभाव है, यह वेदान्तरसिक जानते ही हैं, यह तात्पर्य है ।

* 'समुत्क्रान्तम्' इत्यादि श्रुति आत्माका उत्क्रमण आदि दिखलाती है ।

† जैसे दीपकी प्रभा अपने आश्रय दीपको छोड़कर अन्य गृहोदरादि प्रदेशमें व्याप्त होती है, वैसे ही ज्ञान, सुख आदि अपने आश्रय अणु आत्माको छोड़कर शरीर आदिमें व्याप्त हो सकते हैं, यह भाव है ।

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