भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 429, कुल 590 में से

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पृष्ठ 429

जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३९९


ज्ञानसुखादीनां प्रदीपप्रभान्यायेन आश्रयातिरिक्तप्रदेशविशेषव्यापिगुणतया न सर्वाङ्गीणसुखानुपलब्धिः । 'द्रोणं बृहस्पतेर्भागम्' इत्यादिस्मृत्यनुरोधेन जीवानामांशसत्त्वात् । करशिरश्चरणाद्यनुगतेषु सुखदुःखादियौगपद्यं कायव्यूहगतेषु योगिनां भोगवैचित्र्यं चेति न काचिदनुपपत्तिः । एवं च जीवाना-मणुत्वेनाऽसङ्करात् सुख दुःखादिव्यवस्था विभोरीश्वराद् भेदश्चेति ।

अत्रोक्तमद्वैतदीपिकायाम्—एवमपि कथं व्यवस्थासिद्धिः । चैत्रस्य 'पादे वेदना, शिरसि सुखम्' इति स्वांशभेदगतसुखदुःखानुसन्धानवद्


सुख, दुःख आदि आश्रयसे अतिरिक्त प्रदेशविशेषमें व्यापी गुण हैं, अतः सर्वाङ्गीण सुख, दुःखोंकी अनुपलब्धि भी नहीं है । और 'द्रोणं बृहस्प०' (द्रोणाचार्य देवाचार्य बृहस्पतिका अंश है) इस स्मृतिके आधारपर जीव सांश भी सिद्ध होते हैं, अतः हाथ, सिर, पैर आदिमें जीवांशोंके अनुगत होनेसे ही सुख, दुःख आदिका यौगपद्य और अनेक शरीरोंके समूहोंमें जीवांशोंके जानेसे योगी लोगोंके भोगका वैचित्र्य होता है, इसलिए जीवाणुवादमें कोई अनुपपत्ति नहीं है । इस प्रकार जीवोंके अणु होनेपर भी एक शरीरमें सभी जीवोंका प्रवेश न होनेके कारण सुख, दुःख आदिकी व्यवस्था और विभु ईश्वरसे भेद भी हो सकता है, [जीवको विभु माननेसे दोनोंके लक्षणमें भेद न होनेके कारण ईश्वरसे जीवका भेद सिद्ध नहीं होगा । जीवको अणु माननेसे तो उन दोनोंमें अत्यन्त वैलक्षण्य होनेके कारण भेद स्पष्टरूपसे सिद्ध होता है, यह भाव है ] ।

इस प्रकारकी अर्वाचीनोंकी कल्पनाका अद्वैतदीपिका नामके ग्रन्थमें परिहार किया गया है कि * जीवमें अणुत्व और सांशत्वके माननेपर भी व्यवस्था किस प्रकार हो सकती हैं ? क्योंकि चैत्रके 'पैरमें वेदना है, सिरमें सुख है' इस प्रकार जीवके भिन्न अंशोंमें रहनेवाले सुख, दुःखोंका जैसे अनुभव होता


* अपने अंशमें रहनेवाले सुख आदिका जीव अनुभव करता है और अन्यजीवगत सुखादिका अनुभव नहीं करता, इस प्रकार स्वीकार करते हुए पूर्वपक्षीको कहना होगा कि भेद अननुसन्धानका प्रयोजक है और अभेद अनुसन्धानका प्रयोजक है, इसमें यह विकल्प हो सकता है—जो अननुसन्धानका प्रयोजक भेद है, वह भेदमात्र हैं अथवा शुद्ध भेद है ? प्रथम पक्षमें अपने अंशावृत्ति सुख आदिका भी चैत्र अनुभव नहीं कर सकेगा, क्योंकि अननुसन्धानमें हेतु वहाँ भेद है, यदि भेदके विद्यमान होनेपर भी वह सुखादिका अनुसन्धान करता है, यह स्वीकार करोगे तो यह भी मानना पड़ेगा कि चैत्रगत सुखादिका अनुसन्धान मैत्र भी

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