सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 430, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४०० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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मैत्रगतसुखदुःखानुसन्धानस्यापि दुर्वारत्वात् । अविशेषो हि चैत्रजीवात्तदंशयोः मैत्रस्य च भेदः । कायव्यूहस्थले वियुज्याऽन्यत्र प्रसरणसमर्थानामंशानां जीवाद् भेदावश्यकंभावाद् अंशांशिनोस्त्वया भेदाभेदाभ्युपगमाच्च । न च शुद्धभेदोऽननुसन्धानप्रयोजक इति वाच्यम्, शुद्धत्वं हि भेदस्यांऽशांशिभावासहचरितत्वं वा अभेदाससहचरितत्वं वा स्यात् ? नाऽऽद्यः, 'अंशो ह्येष परमस्य' 'ममैवांशो जीवलोके' 'अंशो नानाव्यपदेशात्' इति श्रुतिस्मृतिसूत्रैर्जीवस्य ब्रह्मांशत्वप्रतिपादनेन ब्रह्मजीवयोर्भोगसाङ्कर्यप्रसङ्गात् ।
ननु जीवांशानां जीवं प्रतीव जीवस्य ब्रह्म प्रति नांशत्वम्, किन्तु
है, वैसे ही मैत्रमें रहनेवाले सुख, दुःखोंके अनुभवका भी कैसे परिहार कर सकते हैं, क्योंकि जैसे चैत्रके जीवसे उसके अंशोंका भेद है, वैसे ही चैत्रजीवसे मैत्रका भी भेद है । योगीके कायव्यूह स्थलमें अंशीसे विभक्त होकर अन्य स्थलमें प्रसक्त होनेवाले अंशोंका जीवसे भेद अवश्य होगा, और तुम अंश और अंशीका भेदाभेद स्वीकार करते हो । यदि शङ्का हो कि शुद्ध भेद ही अननुसन्धानका प्रयोजक है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शुद्धभेदका अर्थ क्या अंशांशिभावका असाहचर्य है, अथवा अभेदका असाहचर्य है ? इसमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि † 'अंशो ह्येष परमस्य' 'ममैवांशो जीवलोके' 'अंशो नानाव्यपदेशात्' इस प्रकारकी श्रुति, स्मृति और सूत्रोंसे जीवमें ब्रह्मांशत्वका प्रतिपादन होनेसे जीव और ब्रह्ममें भोगसाङ्कर्य प्रसक्त होगा ।
* यदि शङ्का हो कि जीवके प्रति जीवांश जैसे मुख्य अंश है, वैसे ब्रह्मके
करता है, इसी बातको 'चैत्रस्य' इत्यादि मूलसे बतलाते हैं । द्वितीय पक्षका 'न च' इत्यादि ग्रन्थसे आशङ्कापूर्वक परिहार स्वयं ग्रन्थकार करेंगे ।
† जीव परमात्माका अंश है, लोकमें जीवरूप मेरा ( ईश्वरका ) ही अंश हैं, और जीव परमात्माका अंश है, क्योंकि नानाव्यपदेश है, क्रमशः श्रुति, स्मृति और सूत्रका यह अर्थ है । इसलिए अननुसन्धानका प्रयोजक शुद्धभेद अर्थात् अंशांशिभावसे रहित भेद माना जाय, तो प्रकृतमें जीव और ईश्वरका अंशांशिभावसे असहकृत भेद न होनेसे अननुसन्धान नहीं होगा, किन्तु परस्परके भोगोंका अन्योन्यको अनुसन्धान होगा, यह भाव है ।
* प्रकृतमें शङ्का करनेवालेका भाव यह है कि अननुसन्धानमें शुद्धभेद प्रयोजक है; इसमें शुद्धत्व केवल अंशांशिभावासहकृतत्व नहीं है, किन्तु मुख्यांशांशिभावासहकृतत्व है,