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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ
४००सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

मैत्रगतसुखदुःखानुसन्धानस्यापि दुर्वारत्वात् । अविशेषो हि चैत्रजीवात्तदंशयोः मैत्रस्य च भेदः । कायव्यूहस्थले वियुज्याऽन्यत्र प्रसरणसमर्थानामंशानां जीवाद् भेदावश्यकंभावाद् अंशांशिनोस्त्वया भेदाभेदाभ्युपगमाच्च । न च शुद्धभेदोऽननुसन्धानप्रयोजक इति वाच्यम्, शुद्धत्वं हि भेदस्यांऽशांशिभावासहचरितत्वं वा अभेदाससहचरितत्वं वा स्यात् ? नाऽऽद्यः, 'अंशो ह्येष परमस्य' 'ममैवांशो जीवलोके' 'अंशो नानाव्यपदेशात्' इति श्रुतिस्मृतिसूत्रैर्जीवस्य ब्रह्मांशत्वप्रतिपादनेन ब्रह्मजीवयोर्भोगसाङ्कर्यप्रसङ्गात् ।

ननु जीवांशानां जीवं प्रतीव जीवस्य ब्रह्म प्रति नांशत्वम्, किन्तु


है, वैसे ही मैत्रमें रहनेवाले सुख, दुःखोंके अनुभवका भी कैसे परिहार कर सकते हैं, क्योंकि जैसे चैत्रके जीवसे उसके अंशोंका भेद है, वैसे ही चैत्रजीवसे मैत्रका भी भेद है । योगीके कायव्यूह स्थलमें अंशीसे विभक्त होकर अन्य स्थलमें प्रसक्त होनेवाले अंशोंका जीवसे भेद अवश्य होगा, और तुम अंश और अंशीका भेदाभेद स्वीकार करते हो । यदि शङ्का हो कि शुद्ध भेद ही अननुसन्धानका प्रयोजक है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शुद्धभेदका अर्थ क्या अंशांशिभावका असाहचर्य है, अथवा अभेदका असाहचर्य है ? इसमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि † 'अंशो ह्येष परमस्य' 'ममैवांशो जीवलोके' 'अंशो नानाव्यपदेशात्' इस प्रकारकी श्रुति, स्मृति और सूत्रोंसे जीवमें ब्रह्मांशत्वका प्रतिपादन होनेसे जीव और ब्रह्ममें भोगसाङ्कर्य प्रसक्त होगा ।

* यदि शङ्का हो कि जीवके प्रति जीवांश जैसे मुख्य अंश है, वैसे ब्रह्मके


करता है, इसी बातको 'चैत्रस्य' इत्यादि मूलसे बतलाते हैं । द्वितीय पक्षका 'न च' इत्यादि ग्रन्थसे आशङ्कापूर्वक परिहार स्वयं ग्रन्थकार करेंगे ।

† जीव परमात्माका अंश है, लोकमें जीवरूप मेरा ( ईश्वरका ) ही अंश हैं, और जीव परमात्माका अंश है, क्योंकि नानाव्यपदेश है, क्रमशः श्रुति, स्मृति और सूत्रका यह अर्थ है । इसलिए अननुसन्धानका प्रयोजक शुद्धभेद अर्थात् अंशांशिभावसे रहित भेद माना जाय, तो प्रकृतमें जीव और ईश्वरका अंशांशिभावसे असहकृत भेद न होनेसे अननुसन्धान नहीं होगा, किन्तु परस्परके भोगोंका अन्योन्यको अनुसन्धान होगा, यह भाव है ।

* प्रकृतमें शङ्का करनेवालेका भाव यह है कि अननुसन्धानमें शुद्धभेद प्रयोजक है; इसमें शुद्धत्व केवल अंशांशिभावासहकृतत्व नहीं है, किन्तु मुख्यांशांशिभावासहकृतत्व है,


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जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित • ४०१

'चन्द्रबिम्बस्य गुरुबिम्बः शतांशः' इतिवत् 'सदृशत्वे सति ततो न्यूनत्वमात्रम्' औपचारिकोंशत्वमिति चेत्, किं तदतिरेकेण मुख्यांशत्वं जीवांशानां जीवं प्रति, यदत्राननुसन्धानप्रयोजकशरीरे निवेश्यते ? न तावत् पटं प्रति तन्तूनामिवारम्भकत्वम् । जीवस्याऽनादित्वात् । नाऽपि महाकाशं प्रति घटाकाशादीनामिव प्रदेशत्वम्, टङ्कोच्छिन्नपाषाणशकलादीनामिव खण्डत्वं वा, अणुत्वेन निष्प्रदेशत्वादच्छेद्यत्वाच्च । भिन्ना-


प्रति जीव मुख्य अंश नहीं है, किन्तु 'चन्द्रबिम्बका गुरुबिम्ब शतांश है' यहांपर जैसे गुरुबिम्बमें चन्द्रबिम्बका औपचारिक अंशत्व प्रतीत होता है, वैसे ही प्रकृतमें जीव ईश्वरके सदृश तथा उससे न्यून है, अतः जीवमें औपचारिक अंशत्व भासित होता है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इसमें यह प्रश्न होता है कि जीवके प्रति जीवांशोंमें मुख्यांशत्व, जो कि औपचारिक अंशत्वसे भिन्न है †, क्या है, जिसका कि अननुसन्धानके प्रयोजकीभूत शरीरमें ( नियमस्वरूपमें ) विशेषणरूपसे निवेश करते हो ? यदि कहो कि जैसे पटके प्रति तन्तु आरम्भक हैं, अत एव वे पटके मुख्य अंश कहे जाते हैं, वैसे ही प्रकृतमें आरम्भकत्वरूप मुख्य अंशत्व है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि जीव अनादि है, [ अर्थात् जीवांशोंमें जीवके प्रति मुख्य अंशत्व है, ऐसा पूर्वमें जो तुमने कहा है, यह नहीं हो सकता है, क्योंकि जीव अनादि है, इसलिए वे जीवांश जीवके आरम्भक नहीं हो सकते हैं, अतः उनमें आरम्भकत्वरूप मुख्य अंशत्व नहीं हो सकता है, यह भाव है । ] यदि कहो कि महाकाशके प्रति घटाकाश आदिमें जैसे प्रदेशत्वरूप अंशत्व है, वैसे ही प्रकृतमें प्रदेशत्वरूप अथवा टङ्कसे तोड़े हुए पत्थरके टुकड़ोंके समान खण्डत्वरूप मुख्यांशत्व है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीव अणु है, अतः उसका प्रदेश नहीं है और इसीसे उसका टुकड़ा भी नहीं


जीव और ईश्वरका अंशांशिभाव मुख्य नहीं है, किन्तु गौण है, इसलिए उनका शुद्ध भेद होनेसे परस्पर अनुसन्धानका साङ्कर्य नहीं है और जीव और उसके अंशोंमें मुख्यांशांशिभावत्वके होनेसे शुद्ध भेद उनका नहीं है, अतः अनुसन्धानकी उपपत्ति भी हो सकती है, यह भाव है ।

† अर्थात् आरम्भकावयवत्व, प्रदेशत्व, खण्डत्व अथवा भिन्नाभिन्नत्वरूप मुख्यांशत्व है ? यह प्रश्नका आशय है, इनमें प्रत्येक पक्षका मूलकारने ही क्रमशः खण्डन किया है ।

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४०२ . सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद


भिन्नद्रव्यत्वमंशत्वमभिमतमिति चेद्, न; तथा सति जीवेश्वरयोर्जीवानां च भोगसाङ्कर्यप्रसङ्गात् । स्वतो भिन्नानां तेषां चेतनत्वादिना अभेदस्यापि त्वयाऽङ्गीकारात्, समूहसमूहिनोर्भेदाभेदवादिनस्तव मते एकसमूहान्तर्गतजीवानां परस्परमप्यभेदसत्त्वाच्च स्वाभिन्नसमूहाभिन्नेन स्वस्याऽप्यभेदस्य दुर्वारत्वात् । यदि संयोगादीनां जातेश्चाऽनेकाश्रितत्वं स्यात्, तदा गुणगुण्यादेरभेदाद् घटाभिन्नसंयोगाभिन्नपटादेरपि घटाभेदः प्रसज्ये-


हो सकता है, जिससे कि प्रदेशत्व और खण्डत्वरूप जीवके अंशोंमें मुख्यांशत्व हो । यदि कहो कि भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वरूप अंशत्व प्रकृतमें अभिमत है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा होनेपर जीव और ईश्वरका और जीवोंका परस्पर भोगसाङ्कर्य प्रसक्त होगा, क्योंकि जीव और ईश्वर तथा अनेक जीव स्वरूपतः परस्पर भिन्न * हैं, तथापि वे चेतनत्व आदि धर्मोंसे अभिन्न हैं, ऐसा तुम मानते हो और दूसरी बात यह है कि तुम समूह और समूहीका भेदाभेद मानते हो, इसलिए तुम्हारे मतमें एक समूहमें विद्यमान सम्पूर्ण जीवोंका † परस्पर अभेद भी है, कारण कि अपनेसे अभिन्न समूहके साथ अभेद होनेसे अपना भी दूसरेके साथ अभेद है, इसका निवारण नहीं कर सकते हैं, क्योंकि गुण और गुणीका अभेद मानकर यदि संयोग, विभाग आदि अनेकाश्रित माने जाँय, तथा जाति और व्यक्तिका अभेद मान कर यदि जातिको अनेकाश्रित माना जाय, तो गुण और गुणीका अभेद होनेसे घटाभिन्न संयोगसे अभिन्न पटमें भी घटाभेद प्रसक्त होगा, ऐसा कहते हुए तुमने 'तदभिन्ना-


* अननुसन्धानमें प्रयोजकीभूत जो भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वासहकृत भेद है, वह जीव और ईश्वरमें भी है, अतः जीव और ईश्वरके भोगका साङ्कर्य प्रसक्त होगा, क्योंकि घट और पटका परस्पर घटत्वादि विशेष धर्मोंसे भेद होनेपर भी द्रव्यत्वरूप व्यापक धर्मसे जैसे अभेद है, वैसे ही जीवत्व और ईश्वरत्वरूप धर्मोंसे उनका परस्पर भेद होनेपर भी सत्त्व, द्रव्यत्व, चेतनत्व आदि धर्मोंसे उनका अभेद है, यह भाव है।

† तात्पर्य यह है कि समूह और समूही का स्वरूपतः भेद और व्यापक धर्मोंसे अभेद तुम मानते हो, इस अवस्था में उत्सवमें एकत्र मिलित मनुष्योंका परस्पर भेदाभेद होनेके कारण भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वासहकृत शुद्धभेदके न रहनेसे उस उत्सवमें संमिलित यावत् व्यक्तियोंके भोगका साङ्कर्य प्रसक्त होगा, क्योंकि एक समूही देवदत्तसे अभिन्न समूहका यज्ञदत्तके साथ अभेद होनेसे देवदत्तका यज्ञदत्तके साथ अभेद निरस्त नहीं हो सकता है,.. अर्थात् समूहको लेकर देवदत्तका यज्ञदत्तके साथ अवश्य अभेद है, इसलिए भोगसाङ्कर्यका प्रसङ्ग है ही।

जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहितं ४०३


तेत्यादि वदता त्वया तदभिन्नाभिन्नस्य तदभेदनियमभ्युपगमात् ।

न च जीवान्तरसाधारणचेतनत्वादिधर्मैकरूप्यैकसमूहान्तर्गतत्वादि-प्रयुक्ताभेदविलक्षणमभेदान्तरमंशांशिनोरस्ति भेदेऽप्यनुसन्धानप्रयोजकम्, यद्वानतिप्रसङ्गाय विवक्षेत । तथा सति तस्यैव विशिष्य निर्वक्तव्यत्वा-


भिन्नस्य ‡ तदभिन्नत्वम्' यह नियम माना है।

* और अंश और अंशीका भेद रहनेपर भी अनुसन्धानका प्रयोजक—अन्य जीवोंमें रहनेवाले चेतनत्व आदि धर्मोंसे होनेवाले तथा एक समूहान्तर्गतत्वरूपसे होनेवाले अभेदसे विलक्षण—अन्य—अभेद भी उनका नहीं है, जिसकी कि अतिप्रसङ्गके वारणके लिए विवक्षा की जाय, क्योंकि अंश और अंशीका विलक्षण भेद माननेपर उसका भी विशेषरूपसे निर्वचन करना पड़ेगा। यदि कहो कि अंश और अंशीके अभेदमें धर्मोंसे होनेवाली एकरूपता आदि अभेदप्रयोजक नहीं हैं, यही विशेष है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीव और उसके अंशोंमें चेतनत्वादि धर्मोंसे एकरूपता और एक शरीरावच्छेदमें एवम् कार्य-समूहके मेलनमें उनका समूह † होनेसे जीव और उसके अंशोंके अभेदमें


‡ 'तदभिन्नाभिन्नस्य तदभिन्नत्वनियमः' इस नियमको नैयायिक लोगोंने माना है, अपनेसे अभिन्न पदार्थसे जो अभिन्न पदार्थ है, वह आपसे भी अभिन्न होता है, यह उक्त नियमका अर्थ है, जैसे गुण और गुणीका जो अभेद मानते हैं, उनके मतमें उक्त नियमके आधारपर नैयायिकोंने दोष दिया कि घटसे अभिन्न संयोग है और उससे अभिन्न पट है, अतः घट और पटका भी अभेद प्रसक्त हो सकता है, यह भाव है।

* प्रकृतमें शङ्काका यह कारण है कि जीव और ईश्वर तथा जीवांशोंका एवं समूहाभिन्न जीवोंका जो चेतनत्वादि धर्मप्रयुक्त अभेद है, उससे विलक्षण ही जीव और उसके अंशोंका अभेद है, इसलिए जीव और उसके अंशोंका भेद होनेपर भी परस्पर अनुसन्धान होता है, जीव और ईश्वरका चेतनत्वादि धर्मोंसे अभेद होनेपर भी उक्त विलक्षण अभेदके न रहनेसे परस्पर अनुसन्धानकी प्रवृत्ति नहीं है, अतः भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वासङ्कीर्ण भेद शुद्धभेद है, और वह अनुसन्धानका प्रयोजक है, इसमें जो अभेद प्रविष्ट है, वह जीव और उसके अंशोंका अनुसन्धानप्रयोजक विलक्षण अभेद है, इसलिए उक्त भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वासङ्कीर्ण भेदरूप शुद्धभेदमें दोष नहीं है, यह भाव है।

† जैसे जीव और उसके अंशोंकी चेतनत्वादिसे एकरूपता है, वैसे जीव और उसके अवयवोंका एक शरीरमें अनुप्रवेश कालमें उस शरीरावच्छेदेन समूह भी है, वैसे योगीके जीवके अवयवोंका कायव्यूहसे कहलानेवाले अनेक शरीरोंमें प्रवेश होनेसे कदाचित् उन शरीरी जीवोंका मेल न


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४०४. । सिद्धान्तलेशसंग्रहे । [ द्वितीय परिच्छेद

पत्तेः । धर्मैकरूप्याद्यप्रयुक्तत्वमंशांशिनोरभेदे विशेष इति चेत्, न ; जीवत्तदंशयोश्चेतनत्वादिधर्मैकरूप्यसत्त्वेन एकशरीरावच्छेदे कायव्यूहमेलने च समूहत्वेन च तयोरभेदे धर्मैकरूप्यादिप्रयुक्तत्वस्यापि सद्भावात् । धर्मैकरूप्यादिप्रयुक्ताभेदान्तरसत्त्वेऽपि जीवत्तदंशयोरंशांशिभावप्रयोजकाभेदो न तत्प्रयुक्त इति चेद् , न ; तयोरभेदद्वयाभावात् तन्मतेऽधिकरणैक्ये सति भेदस्याऽभेदस्य वा प्रतियोगिभेदेन तदाकारभेदेन वा अनेकत्वानभ्युपगमात् । तस्मादाद्यपक्षे सुस्थोऽतिप्रसङ्गः ।

एतेनैव द्वितीयपक्षोऽपि निरस्तः । अभेदासहचरितभेदस्याऽननुसन्धानप्रयोजकत्वे उक्तरीत्या तन्मते जीवब्रह्मणोर्जीवानां चाऽभेदस्यापि सत्त्वेनातिप्रसङ्गस्य दुर्वारत्वात् ।

ननु 'अभेदप्रत्यक्षमनुसन्धाने प्रयोजकम्' इति तदभावेऽननुसन्धानम् ।


धर्मैक्यरूप आदि प्रयोजक हैं । यदि शङ्का हो कि जीव और उसके अंशोंमें धर्मैक्यरूप्यसे होनेवाला कोई दूसरा अभेद भले ही रहे, परन्तु जीव और उसके अंशोंमें रहनेवाला अंशांशिभावप्रयोजक अभेद धर्मैकरूप्य आदिसे नहीं होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अंश और अंशीमें दो अभेद रह ही नहीं सकते हैं, तुम्हारे मतमें भी अधिकरणकी एकता होनेपर भेद और अभेद प्रतियोगीके भेदसे या प्रतियोगीके आकारके भेद अनेक नहीं माने जाते हैं । इससे प्रथम पक्षमें (भेदके अंशांशिभावासहचरितत्वरूप शुद्धत्व पक्षमें) अतिप्रसङ्ग विद्यमान ही है ।

इसीसे द्वितीय पक्ष भी निरस्त हुआ ही समझना चाहिए, क्योंकि अभेदसे असहकृत भेद अननुसन्धानका प्रयोजक माना जाय, तो उक्त रीतिसे चेतनत्वादि धर्मैक्यरूप्य आदि पङ्क्तिसे कही गई रीतिसे) तुम्हारे मतमें भी जीव और ब्रह्म और जीवोंका भी परस्पर अभेद होनेके कारण अतिप्रसङ्ग दुर्वार ही है ।

यदि शङ्का हो कि 'अभेदप्रत्यक्ष अनुसन्धानमें प्रयोजक है' इसलिए अभेदप्रत्यक्षके न होनेपर अननुसन्धान होगा। अंशीका अपना अभेद और


होनेपर योगी जीवके अंशियोंके साथ समूह भी है, इसलिए धर्मैकरूप्यप्रयुक्त अभेद होनेसे तदप्रयुक्तत्वका असम्भव है, यह भाव है ।

जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहिते ४०५


स्वस्य स्वाभेदः स्वांशाभेदश्च प्रत्यक्ष इति तद्द्रष्टुर्दुःखाद्यनुसन्धानम्, जीवान्तरेणाऽभेदसत्त्वेऽपि तस्याऽप्रत्यक्षत्वान्न तद्दुःखाद्यनुसन्धानम्। जातिस्मरस्य प्राग्भवीयात्मनाऽपि अभेदस्य प्रत्यक्षसत्त्वात् तद्वृत्तान्तानुसन्धानम्, अन्येषां तदभावाद् नेत्यादि सर्वं सङ्गच्छते इति चेत्, तर्ह्येकात्म्यवादेऽपि सर्वात्मतावरकाज्ञानावरणाच्चैत्रस्य न मैत्रात्माद्यभेदप्रत्यक्षमिति तत एव सर्वव्यवस्थोपपत्तेर्व्यर्थः श्रुतिविरुद्ध आत्मभेदाभ्युपगमः ।

न चेत्थमपि प्रपञ्चतत्त्ववादिनस्तव व्यवस्थानिर्वाहः, सर्वज्ञस्येश्वरस्य वस्तुसज्जीवान्तराभेदप्रत्यक्षावश्यंभावेन जीवेषु दुःखवत्सु 'अहं दुःखी'त्यनु-


अपने अंशोंका अभेद प्रत्यक्ष है, इसलिए अभेददर्शीको दुःख आदिका अनुसन्धान होता है और जीवान्तरके साथ अभेद होनेपर भी उसका प्रत्यक्ष नहीं है, अतः उसे अन्यका दुःख अनुभूत नहीं होता है, पूर्वकी जातिका स्मरण करनेवाले वामदेव प्रभृतिको प्राग्भवीय आत्माके साथ अभेदका प्रत्यक्ष है, इसलिए उनको पूर्ववृत्तान्तका अनुसन्धान होता है, दूसरोंको उसका प्रत्यक्ष न होनेसे अनुसन्धान नहीं होता है, इत्यादि सभी व्यवस्थाकी उपपत्ति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस अवस्थामें एकात्मवादमें भी सर्वात्मताके आवारक अज्ञानका आवरण होनेसे चैत्रको मैत्रात्माके साथ अभेदका प्रत्यक्ष नहीं है, इसलिए उसीसे * सब व्यवस्थाकी यदि उपपत्ति हो सकती है, तो श्रुतिविरुद्ध आत्माके भेदकी कल्पना व्यर्थ ही है।

और † इस प्रकारकी कल्पनासे अर्थात् अभेदप्रत्यक्ष अनुसन्धानमें प्रयोजक है, इस कल्पनासे भी प्रपञ्चको तात्त्विक माननेवाले तुम्हारे मतमें व्यवस्थाका निर्वाह नहीं हो सकता है, क्योंकि ‡ सर्वज्ञ ईश्वरको वस्तुसत् अन्य जीवोंके अभेदका प्रत्यक्ष अवश्य होनेसे जीवोंके दुःखसे 'मैं दुःखी हूँ' इस प्रकार


* अर्थात् चैत्र, मैत्र आदि सभीको परस्परमें अभेदप्रत्यक्ष नहीं होनेसे ही व्यवस्थितिरूपसे सुख आदिके अनुसन्धानकी उपपत्ति हो सकती है, इसीसे, यह अर्थ है।

† अभेदप्रत्यक्षको अनुसन्धानका प्रयोजक मानकर अन्य मतमें आत्मभेदकल्पनामें गौरव और श्रुतिका विरोध कहा गया, अब इस ग्रन्थसे—आत्माके अभेदप्रत्यक्षको अनुसन्धान-प्रयोजक मान भी नहीं सकते हैं, यह कहते हैं।

‡ यदि ईश्वर अन्य जीवसे अन्य जीवका पारमार्थिक अभेदको जानता नहीं है, यह मान लिया जाय, तो ईश्वर सर्वज्ञ नहीं हो सकेगा, यह भाव है।

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४०६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

भवापत्तेः । अस्मन्मते त्वीश्वरः स्वाभिन्ने जीवे संसारं प्रतिबिम्बमुखे मालिन्यमिव पश्यन्नपि मिथ्यात्वनिश्चयान्न शोचतीति नैष प्रसङ्गः ।

स्यादेतत्—मा भूदंशभेदः करशिरश्चरणादीनां कायव्यूहस्य चाऽधिष्ठानम्, आत्मदीपस्यानपायिनी ज्ञानप्रभाऽस्ति व्यापिनीति सैव सर्वाधिष्ठानं

ईश्वरको भी दुःखित्वका अनुभव प्रसक्त होगा । हम वेदान्तियोंके मतमें तो ब्रह्माभिन्न जीवमें—प्रतिबिम्बभूत मुखमें दर्पणकी मलिनता देखनेपर भी उसे जैसे मिथ्या मानते हैं, वैसे ही—संसारको देखता हुआ भी ईश्वर उसे मिथ्या मानता है, अतः उसके विषयमें कुछ नहीं सोचता है, अतः उक्त दोष नहीं * है।

अब इस प्रकार जीवाणुवादियोंकी शङ्का है कि जीवके अंशविशेष—हाथ, सिर, पैर आदिका और कायव्यूहका—अधिष्ठान ( प्रेरक ) भले ही न हो, परन्तु आत्मारूप दीपककी अविनाशिनी ज्ञानात्मक व्यापक प्रभा है, *


* कुछ लोगोंने कहा है कि जीवोंके सांश होनेसे हाथ, सिर, पैर आदिमें जीवांशोंके अनुगत होनेपर सुख, दुःख आदिका यौगपद्य हो सकता है, और कायव्यूहमें योगीके जीवावयवोंके जानेपर योगियोंको भी युगपत् सुख, दुःख आदिके भोगका वैचित्र्य हो सकता है, अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, जीवके प्रति उसके अंशोंमें मुख्य अंशत्व नहीं है, इसका निराकरण हो चुका है, और जीवाणुवादमें जीवसदृश होकर जीवसे न्यूनपरिमाणत्वरूप औपचारिक अंशत्वका भी बाध है, क्योंकि जीवका अणुपरिमाण होनेसे उससे न्यूनपरिमाण ही नहीं हो सकता है, और सदृशत्व होकर न्यूनपरिमाणत्वरूप जो औपचारिक अंशत्व है, वह तो चन्द्रबिम्ब और गुरुबिम्बके समान जीवांशोंके अत्यन्त भेदका प्रयोजक है, अतः जीवको अपने अंशगत दुःखादिके प्रति अनुसन्धातृत्व भी नहीं हो सकता है, वैसे ही योगके जीवांश कायव्यूहके अधिष्ठाता हैं, तथापि उनसे अत्यन्त भिन्न योगीका जीव कायव्यूहका अधिष्ठाता नहीं हो सकता है, इसी प्रकार शरीराधिष्ठाता जीव और अवयवोंके अधिष्ठाता अंश अत्यन्त भिन्न-भिन्न हैं । अतः एक ही शरीरमें अनेक भोक्ताओंकी प्रसक्ति होगी, और जीवको सांश माननेमें कोई प्रमाण भी नहीं है, 'द्रोणं बृहस्पतेर्भागम्' इत्यादि वाक्य—उक्त प्रकारसे अंशपरक न होनेसे बृहस्पति आदि अपने योग-प्रभावसे पृथ्वीका भार हरण करना आदि देवताओंके कार्यके लिए अन्य शरीरका परिग्रहण करते हैं—यही बोध कराता है । इससे यह भी खण्डित हुआ समझना चाहिए कि राम, कृष्ण आदि विष्णुके अंश हैं ।

* जीव स्वयं अणु भले ही हो, परन्तु उसकी नित्य और व्यापक ज्ञानात्मक प्रभा है, इससे उसके एकदेशमें रहनेपर भी अपनेमें रहनेवाले ज्ञानके प्रभावसे हाथ आदि शरीरके सम्पूर्ण अवयवोंमें और कायव्यूहमें वह अधिष्ठित होता है, अतः निरंश जीवके अधिष्ठातृत्व आदिकी अनुपपत्ति नहीं है, यह शङ्काका तात्पर्य है ।

जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार ] भाषानुवादसहित ४०७


भविष्यतीति चेद्, न; ज्ञानवद् आत्मधर्मस्य सुखदुःखभोगस्य ज्ञान- माश्रित्य उत्पत्त्यसम्भवेन करचरणाद्यवयवभेदेनाऽवयविनः, कायव्यूहवतः कायभेदेन च भोगवैचित्र्याभावप्रसङ्गात् । 'सुखदुःखभोगादि ज्ञानधर्म एव, नात्मधर्मः' इत्यभ्युपगमे तद्वैचित्र्येण आत्मगुणस्य ज्ञानस्य भेद- सिद्धावप्यात्मनो भेदासिद्ध्या भोगवैचित्र्यादिनाऽऽत्माभेदप्रतिक्षेपायोगात् । 'भोगाद्याश्रयस्याऽऽत्मनोऽणुत्वेन प्रतिशरीरं विच्छिन्नतया तद्व्यापित्ववाद् इव .


अतः वही प्रभा हाथ आदिकी प्रेरक होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि † ज्ञानके समान आत्मामें रहनेवाले सुख-दुःखात्मक भोगकी ज्ञानको आश्रय करके—ज्ञानमें—उत्पत्ति नहीं हो सकती है, अतः हाथ, पैर आदि अवयवोंके भेदसे अवयवी जीवको और अनेक शरीरवाले योगीको, शरीरोंके भेदसे, विचित्र भोग. नहीं हो सकते हैं। सुख-दुःखात्मक भोग आदि ज्ञानके ही धर्म हैं, आत्माके धर्म नहीं हैं, ऐसा यदि मानो, तो उक्त भोगके वैचित्र्यसे आत्माके गुणभूत ज्ञानका भेद सिद्ध होनेपर भी आत्माका भेद सिद्ध नहीं हो सकता है, इससे भोगके वैचित्र्यसे आत्माके अभेदका अपाकरण नहीं कर सकते हैं। और 'भोग आदिका आश्रय आत्मा अणु होनेसे प्रत्येक शरीरमें विच्छिन्न-भिन्न है, अतः जीवके व्यापकवादके समान और जीव और ईशके


† समाधानकर्ताका भाव यह है—पूर्वपक्षीके मतसे ज्ञान ही व्यापक ठहरा, यदि व्यापक ज्ञानमें सुखादिकी उत्पत्ति मानी जाय, तो शरीरके प्रत्येक अवयवमें और कायव्यूहमें युगपत् सुखादिका अनुभव हो सकता है, परन्तु पूर्वपक्षी सुखादिको ज्ञानधर्म नहीं मानता, किन्तु अणु आत्माका ही धर्म मानता है, इसलिए ज्ञानके व्यापक' होनेपर भी हाथ आदि अवयवोंमें और कायव्यूहमें युगपत् भोगके वैचित्र्यकी उपपत्ति नहीं हो सकती है।
और योगियोंके भोगका वैचित्र्य हे इसमें स्मृति प्रमाण भी है—

आत्मनां च सहस्राणि बहूनि भरतर्षभ।
योगी कुर्यात् बलं प्राप्य तैश्च सर्वां महीं चरेत् ॥
प्राप्नुयात् विषयान् कैश्चित् कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत्।
सङ्क्षिपेच्च पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव ॥

अर्थात् योगी योगके प्रभावसे अनेक शरीरोंको धारणकर सम्पूर्ण पृथ्वीमें जा सकता है, कुछ शरीरोंसे वह अनेक भोग करता है और कई एक शरीरोंसे उग्र तप भी करता है, और उन शरीरोंको पुनः अपनेमें लीन भी कर लेता है जैसे सूर्य अपनी किरणोंको समेट लेता है, यह उपर्युक्त श्लोकोंका भाव है !

४०८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

तदभेदवाद इव च न सर्वधर्मसङ्करापत्तिः' इति मतहानेश्च । तस्माज्जीवस्याऽणुत्वोपगमेन व्यवस्थोपपादनं न युक्तमिति ।

नाऽपि तेन तस्येश्वराद् भेदसाधनं युक्तम्, उत्क्रान्त्यादिश्रवणात्, साक्षादणुत्वश्रवणाच्च 'अणुर्जीवः' इति वदतः तव मते 'तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' 'अन्तः प्रविष्टश्शास्ता जनानाम्' 'गुहां प्रविष्टौ परमे परार्ध्ये' इत्यादिश्रुतिषु प्रवेशादिश्रवणात्, 'स एषोऽणिमा एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद्वा' इति श्रुतौ साक्षादणुत्वश्रवणाच्च परोऽप्यणुरेव सिध्येदिति कुतः परजीवयोर्विभुत्वाणुत्वाभ्यां भेदसिद्धिः ।

अभेदवादके समान सब धर्मोंका साङ्कर्य प्रसक्त नहीं है' इस प्रकारके अपने मतकी हानि भी प्रसक्त होगी, इससे जीवको अणु माननेपर भी व्यवस्थाका उपपादन नहीं हो सकता है ।

और जीवको अणु मानकर उसका ईश्वरसे भेद भी पूर्वपक्षी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उत्क्रान्ति आदिके और साक्षात् अणुत्वके श्रवणसे 'जीवको अणु माननेवाले पूर्वपक्षीके मतमें 'तत्सृष्ट्वा०' ( जगत्‌को बना करके परमात्माने जगत्‌में ही प्रवेश किया ) 'अन्तः०' ( शरीरके भीतर प्रविष्ट हुआ, परमात्मा जनोंका नियन्ता है ) 'गुहां०' ( परार्ध्य * हृदयाकाशमें जो बुद्धिरूप गुहा है, उसमें जीव और ईश्वर प्रविष्ट हैं ) इत्यादि श्रुतियोंसे जगत् आदिमें ईश्वरके प्रवेश प्रभृति सुने जाते हैं और 'स एषोऽणिमा०' ( यह परमात्मा अणु है, मेरे हृदयमें यही आत्मा है, जो व्रीहि और यवसे छोटा है, इस श्रुतिमें साक्षात् अणुत्वका कथन है, इससे ईश्वर भी अणु ही सिद्ध होगा, इसलिए पूर्वपक्षीके मतमें भी अणुत्व और विभुत्वसे जीव और ईश्वरका भेद कैसे सिद्ध होगा ? †


* परार्ध्य शब्दका अर्थ है—परस्य अर्धम्—स्थानम् अर्हतीति परार्ध्यम् अर्थात् ईश्वरके स्थानके लिए जो योग्य है, ऐसा हृदयाकाश ।

† पूर्वपक्षी श्रुतियोंके आधारपर जीवमें अणुत्वकी और ईश्वरमें व्यापकत्वकी सिद्धि करता है, और इन्हीं अणुत्व और विभुत्वरूप विरुद्ध धर्मोंसे जीव और ईश्वरके भेदका भी साधन करता है, परन्तु ईश्वरमें उक्त श्रुतियोंसे अणुत्वकी सिद्धि ही हुई, इसलिए पूर्वपक्षीके मतसे दोनोंमें रहनेवाले एक अणुत्वसे उन दोनोंका भेद कैसे सिद्ध हो सकता है ?, अर्थात् कभी नहीं होगा । अतः पूर्वपक्षी अपने अभीष्ट जीवेश्वरके भेदकी भी सिद्धि जीवको अणु मानकर नहीं कर सकता है, यह भाव है ।

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जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार ] भाषानुवादसहित ४०९


ननु 'आकाशवत् सर्वगतश्च नित्यः' 'ज्यायान् दिवो ज्यायानन्तरिक्षाद्' इत्यादिश्रवणात्, सर्वप्रपञ्चोपादानत्वाच्च परस्य सर्वगतत्वसिद्धेः तदणुत्वश्रुतयः उपासनार्थाः, दुर्ग्रहत्वाभिप्राया वा उन्नेयाः । प्रवेशश्रुतयश्च शरीराद्युपाधिना निर्वाह्याः । न च जीवोत्क्रान्त्यादिश्रुतयोऽपि बुद्ध्या उपाधिना निर्वोढुं शक्या इति शङ्क्यम् , 'तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति'


यदि ‡ शङ्का हो कि 'आकाशवत्०' ( ईश्वर आकाशके समान सर्वगत और नित्य है ) 'ज्यायान् दिवो०' ( ईश्वर द्युलोक और अन्तरिक्षसे बड़ा है ) इत्यादि श्रुतिसे और सब प्रपञ्चके प्रति ईश्वरकी उपादानता श्रुत होनेसे परमात्मा व्यापक ही सिद्ध होता है । इससे ईश्वरमें अणुत्वकी प्रतिपादक श्रुतियाँ उपासनाके लिए अथवा ईश्वरमें दुर्ग्रहत्वके प्रतिपादनके लिए हैं । एवं प्रवेशश्रुतियोंका शरीर आदि उपाधिसे निर्वाह करना चाहिए । यदि शङ्का हो कि * जीवमें उत्क्रमण आदिकी प्रतिपादक श्रुतियोंका भी बुद्धिरूप उपाधिसे निर्वाह कर सकते हैं, तो फिर उक्त युक्तिसे जीवका अणुत्व सिद्ध नहीं होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'तमुत्क्रामन्तम्०' ( जीवके उत्क्रान्त होनेपर प्राण उत्क्रमण करता है ) इत्यादि श्रुतिसे प्राणात्मक


‡ पूर्वपक्षी अपने मतकी स्थिरताके लिए कहता है कि अनेक श्रुतियां ईश्वरमें विभुत्वका प्रतिपादन करती हैं, अतः विभुत्व-प्रतिपादक श्रुतियोंके आधारपर अणुत्वबोधक श्रुतियाँ उपासनार्थ हैं अथवा ईश्वर साधारण प्रयत्नसे ज्ञात नहीं हो सकता है, अपि तु उसको जाननेके लिए अत्यन्त कठिन प्रयत्न करना चाहिए यह सूचन करती हैं । और जीवको अणु माननेमें अनेक प्रत्यक्ष श्रुतियाँ है, अतः जीव अणु और ईश्वर व्यापक ही सिद्ध होता है ।

* सिद्धान्तीकी बीचमें यह शङ्का है—जैसे ईश्वरमें विभुत्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियाँ औपचारिक नहीं हैं, और अणुत्वप्रतिपादक श्रुतियाँ मुख्य हैं, ऐसा तुल्ययुक्त्या क्यों न माना जाय ? इसपर 'तमुत्क्रामन्तम्' इत्यादिसे पूर्वपक्षी उत्तर देता है । इसमें फिर शङ्काकी जाय कि यद्यपि श्रुतिमें प्राणके उत्क्रमणके पूर्वमें जीवकी उत्क्रान्ति सुनी जाती है, तथापि केवल जीवकी उत्क्रान्ति नहीं होती है, परन्तु बुद्धिविशिष्ट जीवकी उत्क्रान्ति सुनी जाती है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि बुद्धि और प्राण अभिन्न-एक ही हैं, श्रुतिने कहा भी है—'यो वै प्राणः सा प्रज्ञा' ( जो प्राण है, वही बुद्धि है ) । अतः अनेक श्रुतियोंसे साक्षात् जीवकी उत्क्रान्ति, आदिका ज्ञान होता है, इससे जीवको अणु मानना ही युक्त है, विभु मानना युक्त नहीं है । इससे जीव और ईशका भेद सिद्ध हो सकता है, यह पूर्वपक्षीका भाव है ।

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४१०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

इति प्राणारूढ्यबुद्ध्युत्क्रान्तेः प्रागेव जीवोत्क्रान्तिवचनात् । तथा ‘विद्वा- न्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्’ इति नामरूपविमोक्षानन्तर- मपि गतिश्रवणाच्च । ‘तद्यथाऽनस्सुसमाहितमुत्सर्जन् यायादेवमेवायं शारीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जन् याति’ इति स्वाभाविक- गत्याश्रयशकटदृष्टान्तोक्तेश्चेति चेद्, नैतत्सारम्; ‘स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः ।’

‘घटसंवृतमाकाशं नीयमाने घटे यथा ।
घटो नीयेत नाकाशं तद्वज्जीवो नभोपमः ॥’

इत्यादिश्रुतिषु जीवस्यापि विभुत्वश्रवणात् । त्वन्मते प्रकृतेरेव जगदु- पादानत्वेन ब्रह्मणो जगदुपादानत्वाभावाज्जीवस्य कायव्यूहगतविचित्रसुख-

बुद्धिकी उत्क्रान्तिसे पूर्व ही जीवकी उत्क्रान्ति ज्ञात होती है, इसी प्रकार ‘विद्वान्नाम०’ (आत्मतत्त्वज्ञानी नाम और रूपसे * विमुक्त होकर दिव्य पर पुरुषके प्रति जाता है) इत्यादि श्रुतिसे नाम और रूपसे मोक्ष होनेके बाद भी जीवकी गति सुनी जाती है। और ‘तद्यथा०’ (जैसे अनेक सामानोंसे भरपूर बैलगाड़ी शब्द करती हुई जाती है, वैसे ही शरीरमें रहनेवाला यह जीव ईश्वरकी प्रेरणासे प्रेरित होकर जाता है) इस प्रकारकी श्रुतिसे जीवमें गाड़ीके दृष्टान्तसे स्वाभाविक गति कही भी गई है ? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ‘स वा एष०’ (वह विज्ञानमय जीव बड़ा व्यापक है) ‘घटसंवृतमाकाशं’ (घटसे सम्बद्ध आकाश जैसे घटके ले जानेपर जाता है, परन्तु स्वतः नहीं जाता है, वैसे ही जीव भी उपाधिके गमनसे जाता है, स्वतः नहीं जाता है, अर्थात् आकाशके समान है) इत्यादि श्रुतियोंसे जीवमें भी विभुत्वका श्रवण है। तुम्हारे मतमें † माया ही जगत्की उपादान होनेसे ब्रह्म जगत्का उपादान नहीं है और जीवको अणु माननेपर भी जैसे शरीर-


* नाम और रूपसे अर्थात् अज्ञानसे होनेवाले सम्पूर्ण संसारसे मुक्त होकर परमात्माके प्रति जाता है, यह भाव है।
† सिद्धान्ती उक्त पूर्वपक्षीके मतका खण्डन करता है, भाव यह है कि जैसे परमात्माके प्रकरणमें प्रतिपादित परमेश्वरका विभुत्व औपचारिक नहीं हो सकता है, वैसे ही जीवप्रकरणमें सुना गया जीवका विभुत्व भी औपचारिक नहीं हो सकता है, अतः जीवप्रकरणमें पठित अनेक वाक्य ‘स वा’ इत्यादिसे बतलाये हैं।

जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ४११


दुःखोपादानत्ववदणुत्वेऽपि जगदुपादानत्वसम्भवाच्च, ततस्तस्य सर्वगतत्वासिद्धेः । तत्प्रवेशश्रुतीनां शरीरोपाधिकत्वकल्पने जीवोत्क्रान्त्यादिश्रुतीनामपि बुद्ध्युपाधिकत्वोपगमसम्भवात् । 'पञ्चवृत्तिर्मनोवद्व्यपदिश्यते' (उ० मी० अ० २ पा० ४ सू० १२) इति सूत्रभाष्ये बुद्धिप्राणयोः कार्यभेदाद्भेदस्य प्रतिपादितत्वेन बुद्ध्युपाधिके जीवे प्रथममुत्क्रामति प्राणस्यानूत्क्रमणोपपत्तेः । नामरूपविमोक्षानन्तरं ब्रह्मप्राप्तिश्रवणस्य प्राप्तरि


समुदायमें विचित्र सुख, दुःख आदिके प्रति उसे उपादान मानते हो, वैसे ही वह जगत्का उपादान भी हो सकता है, अतः ईश्वरमें व्यापकत्वकी उपपत्ति नहीं हो सकती है* । ब्रह्मकी प्रवेशबोधक श्रुतियोंकी शरीररूप उपाधिसे जैसे उपपत्ति करते हो, वैसे ही जीवकी उत्क्रान्ति आदि बोधक श्रुतियोंकी भी बुद्धि आदि उपाधियोंसे उपपत्ति कर सकते हैं । † 'पञ्चवृत्तिर्मनोवद्व्यपदिश्यते' इस सूत्रके भाष्यमें कार्यके पार्थक्यसे प्राण और बुद्धिमें परस्पर भेदका प्रतिपादन किया गया है, अतः बुद्धिरूप उपाधिसे उपहित जीव प्रथम उत्क्रमण करता है, फिर प्राणका उत्क्रमण उपपन्न हो सकता है । नाम और रूपसे विमुक्त होनेके बाद ब्रह्मकी प्राप्तिकी जो श्रुति है, यह प्राप्त करनेवाले जीवमें


* इस ग्रन्थसे सिद्धान्तीने कहा कि पूर्वपक्षी ईश्वरमें विभुत्वका भी साधन नहीं कर सकता है, इससे सुतरां उसके मतमें जीव और ईश्वरभेद भी असिद्ध ही है, क्योंकि ईश्वरमें व्यापकत्व तभी हो सकता है, जब कि ईश्वर जगत् का उपादान हो परन्तु पूर्वपक्षीने ईश्वरको जगत्का उपादान नहीं माना है, किन्तु प्रकृतिको माना है, अतः ईश्वरमें व्यापकत्व सिद्ध नहीं हो सकता है, और जीवमें अणुत्वकी भी सिद्धि नहीं हो सकती है, क्योंकि सुखदुःखके प्रति जैसे जीवको उपादान तुमने माना है, वैसे ही युक्तिसे यह संसारका भी उपादान हो सकता है, इससे उपादान होनेके कारण जीवमें भी व्यापकत्वकी सिद्धि हो सकती है ।

† पञ्चवृत्तिर्मनोवद् व्यपदिश्यते इसका यह अर्थ है—मनके समान अर्थात् जैसे मनकी श्रोत्र, चक्षु आदिके भेदसे शब्द आदि विषयक पांच प्रकारकी वृत्तियाँ होती हैं, वैसे ही प्राणकी प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान रूपसे पाँच प्रकारकी वृत्तियाँ होती हैं, अतः प्राण मनके समान श्रुतिमें कहा गया है । इसमें दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिककी उपपत्तिके लिए अवश्य प्राण और मनका भेद मानना चाहिए, 'यो वै प्राणः सा प्रज्ञा' इत्यादिसे प्राण और प्रज्ञाका जो अभेद कहा गया है, वह प्रज्ञा और प्राणरूप उपाधिसे उपहित प्रत्यगात्माके एक होनेसे उपहित आत्माकी मुख्यतासे कहा गया है, यह समझना चाहिए ।


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४१२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

जीव इव प्राप्तव्ये ब्रह्मण्यपि विभुत्वविरोधित्वात् । प्राकृतनामरूपविमोक्षा- नन्तरमपि अप्राकृतलोकविग्रहाद्युपधानेन ब्रह्मणः प्राप्तव्यत्ववादिमते प्राप्तुर्जीवस्याऽप्यप्राकृतदेहेन्द्रियादिसत्त्वेन तदुपधानेन ब्रह्मप्राप्तिश्रवणा- विरोधात् स्वाभाविकगत्याश्रयशकटदृष्टान्तश्रवणमात्राद् जीवस्य स्वाभा- विकप्रवेशाश्रयजीवसमभिव्याहारेण ब्रह्मणोऽपि स्वाभाविकप्रवेशसिद्धिसम्भ- वाद् । ब्रह्मजीवोभयान्वयिन एकस्य प्रविष्टपदस्य एकरूपप्रवेशपरत्वस्य

जैसे विभुत्वकी विरोधी है, वैसे ही प्राप्तव्य ब्रह्ममें भी विभुत्वकी विरोधी हो सकती है । और दूसरी बात यह भी है कि * प्राकृत नाम और रूपसे विमोक्ष होनेके अनन्तर भी अप्राकृत लोक-विग्रह आदि उपाधिसे ब्रह्ममें प्राप्तव्यता है, इस प्रकार कहनेवाले तुम्हारे मतमें ब्रह्मप्राप्ति करनेवाले जीवको भी अप्राकृत शरीर, इन्द्रिय आदि हैं, अतः उन उपाधियोंके आधारपर ब्रह्म- प्राप्तिका विरोध भी नहीं है, इससे स्वाभाविक गमनक्रियाके आश्रय शकटके दृष्टान्तमात्रसे जीवमें स्वाभाविक गति आदिकी सिद्धि होनेपर 'गुहां प्रविष्टौ' इससे स्वाभाविक प्रवेश करनेवाले जीवके सान्निध्यसे ब्रह्ममें भी स्वाभाविक प्रवेशकी भी सिद्धि हो सकती है † । क्योंकि ब्रह्म और जीव दोनोंमें सम्बन्ध रखनेवाले एक प्रविष्टपदकी एकरूपप्रवेशबोधकता ही कहनी चाहिए * ।


* अर्वाचीनोंके मतमें व्यापकत्वरूपसे ब्रह्म मुक्तोंका प्राप्य नहीं है, किन्तु लोकविशेष आदि उपहितत्वरूपसे ब्रह्म मुक्तोंका प्राप्य है, अतः उपहितत्वरूपसे ब्रह्ममें रहनेवाली प्राप्तव्यता ब्रह्मकी स्वरूपतः व्यापकत्वविरोधी नहीं है, ऐसी आशङ्का करके जीवमें भी तुल्ययुक्त्या यह प्रकार हो सकता है, ऐसा 'प्राकृत' इत्यादि ग्रन्थसे कहते हैं । तात्पर्य यह है कि 'विद्वान् नाम रूपाद्विमुक्तः' इस श्रुतिमें 'प्राकृतनामरूपसे विमुक्त' इस अर्थकी कल्पना करके अर्वाचीन ज्ञानी जीवके अप्राकृत नाम-रूपका स्वीकार करते हैं, इसलिए स्वतः विभु जीव, जो कि अप्राकृत नाम-रूप उपाधिसे परिच्छिन्न है, ब्रह्मके प्रति गन्ता (गमनकर्त्ता) हो सकता है, अतः जीवविषयक विभुत्व-श्रुतियोंका बाध न करना उचित नहीं है, यह भाव है ।

† तात्पर्य यह है—एक वार कहा गया पद अनेकार्थक नहीं होता है, यह नियम है, इससे 'गुहां प्रविष्टौ' इसमें एक प्रविष्टशब्दकी जीवमें स्वाभाविकार्थकता और ब्रह्ममें औपाधिकार्थकता माननी अयुक्त है, अतः ब्रह्ममें पूर्वपक्षीको स्वाभाविक गति प्राप्त होगी, यदि ईश्वरमें विभुत्वप्रतिपादक श्रुतिके अनुरोधसे प्रविष्टश्रुतिका सामान्यप्रवेश अर्थ मानते हो, तो जीवमें भी विभुत्वप्रतिपादक श्रुतिके आधारपर शकटदृष्टान्तमें गमनादिका साम्यमात्र प्रदर्शित है, स्वाभाविकगत्याश्रयत्व प्रतिपादित नहीं है, ऐसा मान सकते हैं; यह भाव है ।

जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार ] भाषानुवादसहित ४१३

वक्तव्यत्वात् । तस्मात् परमते ब्रह्मजीवयोर्विभुत्वाणुत्वव्यवस्थित्यसिद्धेर्न ततो भेदसिद्धिं प्रत्याशा । अस्मन्मते ब्रह्मात्मैक्यपरमहावाक्यानुरोधेनाऽवान्तरवाक्यानां नेयत्वात् स्वरूपेण जीवस्य विभुत्वम्, औपाधिकरूपेण परिच्छेद इत्यादिप्रकारेण जीवब्रह्मभेदग्राहकश्नुतीनामुपपादनं भाष्यादिषु व्यक्तम् ।

इससे पर-जीवाणुवादीके मतमें जीव और ब्रह्ममें अणुत्व और विभुत्वकी व्यवस्था नहीं हो सकती है, अतः उससे भेदसिद्धिकी आशा नहीं करनी चाहिए। हमारे मतमें ब्रह्म और जीवके ऐक्यबोधक 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यके अनुरोधसे अवान्तर * वाक्योंका अर्थ करना चाहिए, अतः जीव स्वरूपतः † व्यापक है और औपाधिकरूपसे परिच्छिन्न है, इत्यादिरूपसे जीव और ब्रह्मके भेदका बोध करानेवाली श्रुतियोंकी उपपत्ति भाष्य आदिमें स्पष्ट है।


* जैसे अर्वाचीनोंके पक्षमें—जीव और ईश्वर दोनोंमें विभुत्व और अणुत्व प्रतिपादक श्रुतियोंके समान होनेसे और उन दोनों श्रुतियोंकी अन्यथासिद्धिके समान होनेके कारण उनमें अणुत्व और विभुत्व समान रूपसे ही सिद्ध होंगे, एक अणु और दूसरा विभु, इस प्रकार व्यवस्था सिद्ध नहीं होगी—यह दोष दिया गया है। वैसे ही दोष सिद्धान्तमें भी आ सकते हैं, क्योंकि जीवके परिच्छिन्नत्व और विभुत्वका प्रतिपादक श्रुतिलिङ्ग समान ही है, अतः जीवमें विभुत्व स्वाभाविक है और परिच्छिन्नत्व औपाधिक है, इस प्रकार व्यवस्था नहीं हो सकती है, इसपर सिद्धान्ती 'अस्मन्मते' इत्यादिसे कहते हैं कि नहीं—हमारे मतमें अव्यवस्था नहीं हो सकती है, क्योंकि महावाक्यके अनुसार ही अवान्तर वाक्योंका अर्थ होता है, प्रकृतमें महावाक्य 'तत्त्वमसि' आदि वाक्य हैं, क्योंकि मुक्तिका साधनीभूत जो ब्रह्मात्मैक्यज्ञान है, उसके प्रति तत्त्वमस्यादि वाक्य जनक हैं, और अवान्तर वाक्य 'स एषोऽणिमा' इत्यादि हैं, क्योंकि वे महावाक्यार्थज्ञानके कारणीभूत तत् और त्वम् पदार्थके ज्ञानके प्रति साधन हैं, और जितने पदार्थप्रतिपादकवाक्य होते हैं, वे सब के सब महावाक्यके अङ्ग होते हैं, अतः सिद्धान्तमें अव्यवस्था नहीं है, यह भाव है।

† यदि स्वरूपतः जीव व्यापक न हो, तो महावाक्यसे प्रतिपाद्य ब्रह्मके साथ भेद अनुपपन्न होगा, अतः जीवको स्वरूपतः व्यापक ही मानना चाहिए।

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४१४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

तस्मात् प्रपञ्चमिथ्यात्वात् पराभेदाच्च देहिनः ।
मानान्तराविरोधेन सिद्धोऽद्वैते समन्वयः ॥६८॥

इससे प्रपञ्चके मिथ्या होनेसे, परमात्माके साथ जीवका अभेद होनेसे और अन्य किसी प्रमाणके साथ विरोध न होनेसे अद्वैत ब्रह्ममें वेदान्तोंका समन्वय सिद्ध ही है ॥६८॥

इति श्रीमद्गङ्गाधरसरस्वतीविरचितायां वेदान्तसिद्धान्तसूक्तिमञ्जर्यां
द्वितीयः परिच्छेदः समाप्तः ।

तस्मादचेतनस्य प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वात् चेतनप्रपञ्चस्य ब्रह्माभेदाच्च न वेदान्तानामद्वितीये ब्रह्मणि विद्यैकप्राप्ये समन्वयस्य कश्चिद्विरोध इति ॥

इति सिद्धान्तलेशसंग्रहे द्वितीयः परिच्छेदः समाप्तः ।


इससे अचेतन प्रपञ्चके मिथ्या होनेसे और चेतनप्रपञ्चका ब्रह्मके साथ अभेद होनेसे केवल विद्यासे प्राप्य अद्वितीय ब्रह्ममें वेदान्तोंका तात्पर्य है, इसमें कोई विरोध नहीं है ।

इति पं० मूलशङ्करव्यासविरचित सिद्धान्तलेशसंग्रहके भाषानुवादमें
द्वितीय परिच्छेद समाप्त

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ज्ञानोत्पत्तिमें कर्मोंके उपयोगका विचार] भाषानुवादसहित ४१५


ॐ नमः परमात्मने

तृतीयः परिच्छेदः

ज्ञानेनैव कथं मुक्तिः कर्मभिश्चापि तत्स्मृतेः ।
नाविद्यकत्वाद् बन्धस्य नान्यः पन्था इति श्रुतेः ॥ १ ॥

यदि शङ्का हो कि ज्ञान ही से मुक्ति कैसे होगी ? क्योंकि कर्मसे भी मुक्ति होती है, ऐसी स्मृति है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि समग्रप्रपञ्च अविद्यासे होता है, और 'नान्यः पन्था' इत्यादि श्रुति है ॥ १ ॥

ननु कथं विद्ययैव ब्रह्मप्राप्तिः । यावता कर्मणामपि तत्प्राप्तिहेतुत्वं स्मर्यते—
'तत्प्राप्तिहेतुर्विज्ञानं कर्म चोक्तं महामुने !' इति ।
सत्यम्, 'नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' इति श्रुतेः, नित्यसिद्ध-


ॐ अब शङ्का होती है कि विद्यासे ही ब्रह्मकी प्राप्ति होती है, ऐसा कैसे कहते हो जब कि कर्म भी ब्रह्मप्राप्तिके प्रति साधनरूपसे स्मृतिमें कहे गये हैं—
'तत्प्राप्तिहेतुर्विज्ञानम्०' ( हे महामुने ! ब्रह्मप्राप्तिके प्रति साधन कर्म और विज्ञान दोनों ही कहे गये हैं ) ।
ठीक है, ‡ तथापि शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'नान्यः पन्था०' ( मुक्तिके लिए ज्ञानको छोड़कर अन्य मार्ग ही नहीं है ) ऐसी श्रुति है†, और सर्वदा


ॐ पूर्व परिच्छेदके अन्तमें ब्रह्मप्राप्तिरूप मोक्ष केवल विद्यासे होता है, ऐसा कहा गया है, इस विषयमें समुच्चयवादी शङ्का करता है कि केवल विद्यासे ही मुक्ति होती है, यह नहीं हो सकता, क्योंकि कर्म भी साधनरूपसे स्मृति आदिमें बतलाए गये हैं, यह भाव है ।
† अर्थात् 'तेनैति ब्रह्मवित् पुण्यकृत्' ( ब्रह्मज्ञान और पुण्य दोनोंके समुच्चयमें ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मको प्राप्त करता है ) इस श्रुतिमें कहा गया है, यह भाव है ।
‡ अर्थात् पूर्वपक्षीका समुच्चयवाद युक्त नहीं है, क्योंकि युक्तिसे उपबृंहित 'नान्यः पन्थाः' इत्यादि श्रुतिसे समुच्चयका बाध होता है, श्रुतिको अर्थ यह है, केवल ब्रह्मज्ञानसे अन्य—ज्ञानकर्म-समुच्चयरूप अथवा केवल कर्मरूप मार्ग मोक्षके लिए है ही नहीं । और मोक्ष तो आत्माका सर्वदा है ही, परन्तु उसमें अप्राप्तमात्र भ्रम है, इस भ्रमकी निवृत्ति ही मोक्ष है, अतः अज्ञान निवृत्ति केवल ज्ञानसे ही हो सकती है, कर्मसे नहीं हो सकती, यह लोकमें दृष्टचर है, जैसे कण्ठमें मालाके रहते हुए भी भ्रमसे वह अप्राप्तसी प्रतीत होती है, और भ्रमके निवृत्त होनेपर मनुष्य उसे

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४१६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

ब्रह्मावाप्तौ कण्ठगतविस्मृतकनकमालाऽवाप्तितुल्यायां विद्यातिरिक्तस्य साधनत्वासम्भवाच्च । ब्रह्मावाप्तौ परम्परया कर्मापेक्षामात्रपरा तादृशी स्मृतिः, क्व तर्हि कर्मणामुपयोगः ?

कर्मणामुपयोगस्तु भामतीकृन्मते स्थितः ।
तमेतमिति वाक्येन मुख्ये विविदिषोद्भवे ॥ २ ॥

भामतीकारके मतमें कर्मोंका उपयोग 'तमेतम्' इत्यादि वाक्यसे मुख्य विविदिषामें है ॥ २ ॥

अत्र भामतीमतानुवर्तिन आहुः—'तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन' इति श्रुतेर्विद्यासम्पादनद्वारा ब्रह्मावाप्त्युपायभूतायां विविदिषायामुपयोगः । ननु इष्यमाणविद्याया-


सिद्ध ( प्राप्त ) ब्रह्मकी प्राप्तिमें, जो कि गलेमें होते हुए भी विस्मृत सुवर्ण-मालाकी प्राप्तिके समान है, विद्यासे ( ज्ञानसे ) भिन्न कोई साधन हो ही नहीं सकता । अतः उक्त श्रुति ब्रह्मकी प्राप्तिमें केवल परम्परासे कर्मोंकी अपेक्षा ही बतलाती है, तो कर्मोंका उपयोग कहाँ है ?

इस विषयमें भामतीकारके अनुयायी कहते हैं कि 'तमेतं वेदा०' ( ब्रह्माभिन्न जीवको स्वाध्याय, यज्ञ, दान और अनाशक * तपसे ब्राह्मण लोग जाननेकी इच्छा करते हैं ) इस श्रुतिसे विद्याकी प्राप्ति द्वारा ब्रह्मप्राप्तिकी हेतुभूत विविदिषामें † कर्मोंका उपयोग है । यदि शङ्का हो कि ‡ इष्यमाण विद्यामें ही कर्मोंका उप-


प्राप्त हुई समझता है, वैसे ही मोक्षके प्राप्त होनेपर भ्रमकी निवृत्तिसे अप्राप्त वस्तु प्राप्त हुई, ऐसा समझता है, अतः समुच्चयवाद असङ्गत ही है, यह भाव है ।

* अर्थात् ऐसा तप करना चाहिए जिससे कि शरीरका विनाश न हो, इसलिए हित, मित, तथा पवित्र अशन करके ही तप करना चाहिए, अनशन आदि शरीरनाशक तप नहीं करना चाहिए, यह भाव है ।

† ब्रह्मज्ञानकी इच्छा, जो कि रुचिरूप है उसमें, यह अर्थ है ।

‡ शङ्काका बीज यह है कि विद्या ही साक्षात् मुक्तिके प्रति कारण है, इसलिए उसके प्रति ही यज्ञ आदिको कारण क्यों न माना जाय, जैसे अन्यत्र स्वर्गादिके प्रति, जो इष्यमाण-इच्छाके विषय हैं, यज्ञ आदिका विनियोग किया जाता है, प्रकृतमें इच्छाकी विषय विद्या है, इसलिए उसीमें यज्ञादिका अन्वय होना अभीष्ट है, यह भाव है ।

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ज्ञानकी उत्पत्तिमें कर्मोंके उपयोगका विचार ] भाषानुवादसहित ४१७


मेवोपयोगः किं न स्यात् ? न स्याद् ; प्रत्ययार्थस्य प्राधान्यात् । 'विद्यासंयोगात् प्रत्यासन्नानि विद्यासाधनानि शमदमादीनि, विविदिषासंयोगात्तु बाह्यतराणि यज्ञादीनि' इति सर्वापेक्षाधिकरणभाष्याच्च ( उ० मी० अ० ३ पा० ४ अधि० ६ सू० २७ ) । ननु विविदिषार्थं यज्ञाद्यनुष्ठातुर्वेदनगोचरेच्छावत्त्वे विविदिषायाः सिद्धत्वेन तदभावे वेदनोपायविविदिषायां कामनाऽसम्भवेन च विविदिषार्थं यज्ञाद्यनुष्ठानायोगाद् न यज्ञादीनां विविदिषायां


योग क्यों नहीं होता, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रकृत्यर्थ और प्रत्ययार्थमें प्रत्ययार्थ ही × प्रधान होता है। और 'विद्याके साक्षात् साधन होनेसे शम, दम आदि विद्याके अन्तरङ्ग कारण विद्याकी उत्पत्ति तक अनुष्ठेय हैं। तथा ब्रह्मज्ञानेच्छाके साधन होनेके कारण बहिरङ्ग यज्ञ आदि साधन विविदिषाकी उत्पत्ति तक ही अनुष्ठेय हैं, इस प्रकारका सर्वापेक्षाधिकरण-भाष्य † भी है। यदि शङ्का हो कि विविदिषाके लिए यज्ञ आदिका अनुष्ठान करनेवाले पुरुषको ज्ञानविषयक यदि पूर्वसे इच्छा विद्यमान है, तो विविदिषा सिद्ध ही है, यदि ज्ञानविषयिणी इच्छा उसे नहीं है, तो ज्ञानकी कारण विविदिषामें भी इच्छा नहीं हो सकती, अतः उभय था विविदिषाके लिए यज्ञादिका अनुष्ठान हो ही नहीं सकता है*, इसलिए विविदिषामें यज्ञ आदिका विनियोग युक्ति-युक्त नहीं है, तो


× तात्पर्य यह है कि 'स्वर्गकामो ज्योतिष्टोमेन यजेत' इत्यादि स्थलमें याग आदिमें विधिप्रत्ययसे इष्ट-साधनता बोधित होती है, वह इष्ट क्या है? इस प्रकारकी विशेष जिज्ञासा होनेपर पुरुषके विशेषणरूपसे श्रुत कामना और स्वर्ग दोनोंमें से किसी एककी भी शब्दतः प्रधानता प्रतीत न होनेसे आर्थिक प्रधानताका आश्रयण किया जाता है, और अर्थतः प्रधान है—स्वर्ग, इसलिए फलरूपसे उसीका अन्वय किया गया है—याग स्वर्गका साधन है। प्रकृतमें ज्ञानेच्छाका ही फलरूपसे अन्वय होता है, क्योंकि शब्दसे वही प्रधान प्रतीत होती है, इसलिए फलप्रत्यासत्ति आदि अकिञ्चित्कर हैं। प्रकृतमें भगवान् भाष्यकारकी भी सम्मति है।

† विविदिषामें ही कर्मोंका विनियोग है, इसमें भाष्य भी प्रमाण है, 'सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्', इस सूत्रसे यह सर्वापेक्षाधिकरण आरब्ध है, देखिए—पृ० २२२२ अच्युतग्रन्थमालामुद्रित शाङ्करभाष्य।

* प्रकारान्तरसे विविदिषाविनियोगका आक्षेप करते हैं, भाव यह है कि यदि ज्ञानेच्छा यज्ञ आदिका फल है, तो ज्ञानेच्छाविषयक ज्ञानसे यज्ञ आदिका अनुष्ठान करना चाहिए और ज्ञानेच्छाके स्वतः फलत्व न होनेसे ज्ञान द्वारा ही उसमें मुक्तिफलकत्व होगा, इससे यह क्रम प्राप्त होगा कि पहले मुक्तिमें स्वतः पुरुषार्थत्वके ज्ञानसे इच्छा होगी, उसके बाद ब्रह्मज्ञानमें मुक्ति-

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४१८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

विनियोगो युक्त इति चेद्, न; अन्नद्वेषेण कार्श्यं प्राप्तस्य तत्परिहारायाऽन्नविषयोत्कण्ठ्यलक्षणायामिच्छायां सत्यामप्युत्कटाजीर्णादिप्रयुक्तधातुवैषम्यदोषात् तत्र प्रवृत्तिपर्यन्ता रुचिर्न जायते इति तद्रोचकौषधविधिवद् निरतिशयानन्दरूपं ब्रह्म तत्प्राप्तौ विद्यासाधनमित्यर्थे प्राचीनबहुजन्मानुष्ठितानभिसंहितफलकनित्यनैमित्तिककर्मोपसञ्जातचित्तप्रसादमहिम्ना सम्पन्नविश्वासस्य पुरुषस्य ब्रह्मावाप्तौ विद्यायां च तदोन्मुख्यलक्षणायामिच्छायां सत्यामप्यनादिभवसञ्चितानेकदुरितदोषेणाऽऽस्तिककामुकस्य हेयकर्मणीव


यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे अन्नमें द्वेषसे अर्थात् किसी दोषवशसे अन्न न खानेसे जिसको शरीरमें कृशता प्राप्त है, उसे अपने शरीरके दौर्बल्यका परिहार करनेके लिए अन्नमें उत्कण्ठारूप इच्छा, तो अवश्य होती है, परन्तु बड़े उत्कट अजीर्णरूप दोषसे उत्पन्न धातुवैषम्यसे अन्न-खानेमें प्रवृत्ति करानेवाली रुचि नहीं होती है, इसलिए अन्नमें रुचिके सम्पादक औषधका उपचार किया जाना आवश्यक होता है, वैसे ही 'ब्रह्म निरतिशय आनन्दरूप है और उसकी प्राप्तिका साधन विद्या है' इस विषयमें पहलेके अनेक जन्मोंमें फलकी इच्छाके बिना अनुष्ठित अनेक नित्य, नैमित्तिक कर्मोंसे उत्पन्न हुई चित्तकी प्रसन्नतासे जिस पुरुषको—विश्वास हुआ है, उस पुरुषको ब्रह्मकी प्राप्तिमें और विद्यामें उत्सुकतारूप इच्छा तो अवश्य होती है, परन्तु जैसे आस्तिक † कामी पुरुषकी निन्दित कर्ममें प्रवृत्ति होती है, वैसे ही विषय-


साधनत्वके ज्ञानसे इच्छा होगी, उसके बाद वेदनेच्छामें वेदनसाधनत्वज्ञानसे इच्छा होगी, इस इच्छाके अनन्तर यज्ञ आदिका अनुष्ठान होगा, इस परिस्थितिमें वेदनेच्छारूप विविदिषाके उद्देश्यसे यज्ञादिमें प्रवृत्त पुरुषको विविदिषाके फलभूत ब्रह्मज्ञानमें इच्छा है, या नहीं है ? प्रथम पक्षमें यज्ञ आदिका अनुष्ठान व्यर्थ होगा, द्वितीय पक्षमें यज्ञ आदिका अनुष्ठान ही नहीं प्रसक्त होगा, क्योंकि विविदिषाके फलमें (वेदनमें) कामनाके न रहनेसे विविदिषामें भी इच्छा नहीं है, अतः विविदिषामें यज्ञादिका विनियोग नहीं हो सकता है, यह पूर्वपक्षका भाव है।

† जिस पुरुषने पूर्वके अनेक जन्मोंमें अनेक कर्मोंका अनुष्ठान किया है, उन्हीं कर्मोंसे जब उसकी चित्तशुद्धि हुई है, और ब्रह्मविद्यामें जिसका विश्वास भी हुआ है, तो कैसे वह विषयभोगमें प्रवृत्त होगा ? इस शङ्काके परिहारमें यह 'आस्तिककामुकस्य' दृष्टान्त है, सारांश यह है कि जिसको कि वेदविहित कर्मोंके करनेसे अवश्य कल्याण होता है,

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ज्ञानकी उत्पत्तिमें कर्मोंके उपयोगका विचार ] भाषानुवादसहित ४१९

विषयभोगे प्रावण्यं सम्पादयता प्रतिबन्धाद्विद्यासाधने श्रवणादौ प्रवृत्ति- पर्यन्ता रुचिर्न जायत इति प्रतिबन्धनिरासपूर्वं तत्सम्पादकयज्ञादिविधा- नोपपत्तेरिति ।

स्वर्गवत्काम्यमाने तं ज्ञाने विवरणानुगाः ।
जिज्ञासितव्यं श्रुतिभिर्ब्रह्मेत्यत्र श्रुतेरिव ॥३॥

विवरणानुसारी कहते हैं कि स्वर्गके समान अभिलषित ज्ञानमें ही कर्मोंका उपयोग है, जैसे कि 'श्रुतियोंसे ब्रह्म जानना चाहिए' इसमें श्रुतियोंका ब्रह्मज्ञानमें उपयोग है ॥३॥

भोगमें दक्षताका सम्पादन करानेवाले अनेक जन्मोंके सञ्चित पापोंके प्रभावसे प्रतिबन्ध होनेके कारण विद्याके साधन श्रवण आदिमें पुरुषकी प्रवृत्ति करानेवाली रुचिलक्षण इच्छा नहीं होती है, अतः प्रतिबन्धके निरासपूर्वक विविदिपाशब्दसे कहलानेवाली श्रवणादिमें प्रवृत्तिपर्यन्त रुचिकी उत्पत्तिके लिए यज्ञादिका अनुष्ठान करना चाहिए । [ सारांश यह है कि ज्ञानकी इच्छा दो प्रकारकी है—एक तो विद्यामें उत्कण्ठारूप और दूसरी रुचिरूप, पहली इच्छा, यज्ञ आदिके अनुष्ठानके पूर्वमें भी है, अतः उसीको लेकर ज्ञानकी कारण विविदिपामें कामना होती है, इससे विविदिपाके लिए यज्ञ आदिका अनुष्ठान होता है, दूसरी रुचिरूप इच्छा यज्ञ आदिके अनुष्ठानके वाद होती है, अतः उस रुच्यात्मक विविदिपामें यज्ञ आदिका विनियोग कर सकते हैं, इसलिए पूर्वपक्षीकी उक्त शङ्का उपपत्तिशून्य है * ] ।


'और उनका अनुष्ठान न करनेसे पाप होता है, इस प्रकार शास्त्रपरिशीलनसे ज्ञान है, ऐसे किसी पुरुषको भी कामोद्रेक होता है और पापविशेषसे निषिद्धाचरण करता है, वैसे मुमुक्षुको भी पापविशेषसे विषयमें प्रवृत्ति हो सकती है, यह भाव है ।

* इस भामतीकारके अनुसारी मतमें—‘अस्यार्थः—‘विविदिपन्ति यज्ञेन’ इति तृतीयाश्रुत्या यज्ञादीनामङ्गत्वेन ∙ ब्रह्मज्ञाने विनियोगात्••••••∙∙∙नित्यस्वाध्यायेन ब्राह्मणा विविदिपन्ति, न तु-विन्दन्ति, वस्तुतः प्रधानस्यापि वेदनस्य प्रकृत्यर्थतया शब्दतो गुणत्वाद्, इच्छायाश्च प्रत्ययार्थतया प्राधान्यात्, प्रधानेन च कार्यसम्प्रत्ययात्’ यह साक्षात् वाचस्पतिकी उक्ति—प्रमाणभूत है, तात्पर्य यह है कि ‘विविदिपन्ति यज्ञेन’ इसमें ‘यज्ञेन’ इस तृतीयाविभक्त्यन्तश्रुतिसे ब्रह्मज्ञानमें यज्ञ आदिका अङ्गत्वरूपसे विनियोग होता है••••••••नित्य स्वाध्यायसे ब्राह्मण ब्रह्मज्ञानकी इच्छा करते हैं, न कि जानते हैं, यद्यपि वस्तुतः वेदन ( ज्ञान ) प्रधान है, तथापि शब्दमर्यादासे वह अप्रधान है, और इच्छा प्रत्ययार्थ होनेके कारण प्रधान है, और प्रधानमें अन्यका सम्बन्ध होता है, [ द्रष्टव्य—पृ० ५१ और ६१ कल्पतरुसहित भामती निर्णयसागर प्रेसमें मुद्रित ] ।

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