भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 449, कुल 590 में से

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पृष्ठ 449

ज्ञानकी उत्पत्तिमें कर्मोंके उपयोगका विचार ] भाषानुवादसहित ४१९

विषयभोगे प्रावण्यं सम्पादयता प्रतिबन्धाद्विद्यासाधने श्रवणादौ प्रवृत्ति- पर्यन्ता रुचिर्न जायत इति प्रतिबन्धनिरासपूर्वं तत्सम्पादकयज्ञादिविधा- नोपपत्तेरिति ।

स्वर्गवत्काम्यमाने तं ज्ञाने विवरणानुगाः ।
जिज्ञासितव्यं श्रुतिभिर्ब्रह्मेत्यत्र श्रुतेरिव ॥३॥

विवरणानुसारी कहते हैं कि स्वर्गके समान अभिलषित ज्ञानमें ही कर्मोंका उपयोग है, जैसे कि 'श्रुतियोंसे ब्रह्म जानना चाहिए' इसमें श्रुतियोंका ब्रह्मज्ञानमें उपयोग है ॥३॥

भोगमें दक्षताका सम्पादन करानेवाले अनेक जन्मोंके सञ्चित पापोंके प्रभावसे प्रतिबन्ध होनेके कारण विद्याके साधन श्रवण आदिमें पुरुषकी प्रवृत्ति करानेवाली रुचिलक्षण इच्छा नहीं होती है, अतः प्रतिबन्धके निरासपूर्वक विविदिपाशब्दसे कहलानेवाली श्रवणादिमें प्रवृत्तिपर्यन्त रुचिकी उत्पत्तिके लिए यज्ञादिका अनुष्ठान करना चाहिए । [ सारांश यह है कि ज्ञानकी इच्छा दो प्रकारकी है—एक तो विद्यामें उत्कण्ठारूप और दूसरी रुचिरूप, पहली इच्छा, यज्ञ आदिके अनुष्ठानके पूर्वमें भी है, अतः उसीको लेकर ज्ञानकी कारण विविदिपामें कामना होती है, इससे विविदिपाके लिए यज्ञ आदिका अनुष्ठान होता है, दूसरी रुचिरूप इच्छा यज्ञ आदिके अनुष्ठानके वाद होती है, अतः उस रुच्यात्मक विविदिपामें यज्ञ आदिका विनियोग कर सकते हैं, इसलिए पूर्वपक्षीकी उक्त शङ्का उपपत्तिशून्य है * ] ।


'और उनका अनुष्ठान न करनेसे पाप होता है, इस प्रकार शास्त्रपरिशीलनसे ज्ञान है, ऐसे किसी पुरुषको भी कामोद्रेक होता है और पापविशेषसे निषिद्धाचरण करता है, वैसे मुमुक्षुको भी पापविशेषसे विषयमें प्रवृत्ति हो सकती है, यह भाव है ।

* इस भामतीकारके अनुसारी मतमें—‘अस्यार्थः—‘विविदिपन्ति यज्ञेन’ इति तृतीयाश्रुत्या यज्ञादीनामङ्गत्वेन ∙ ब्रह्मज्ञाने विनियोगात्••••••∙∙∙नित्यस्वाध्यायेन ब्राह्मणा विविदिपन्ति, न तु-विन्दन्ति, वस्तुतः प्रधानस्यापि वेदनस्य प्रकृत्यर्थतया शब्दतो गुणत्वाद्, इच्छायाश्च प्रत्ययार्थतया प्राधान्यात्, प्रधानेन च कार्यसम्प्रत्ययात्’ यह साक्षात् वाचस्पतिकी उक्ति—प्रमाणभूत है, तात्पर्य यह है कि ‘विविदिपन्ति यज्ञेन’ इसमें ‘यज्ञेन’ इस तृतीयाविभक्त्यन्तश्रुतिसे ब्रह्मज्ञानमें यज्ञ आदिका अङ्गत्वरूपसे विनियोग होता है••••••••नित्य स्वाध्यायसे ब्राह्मण ब्रह्मज्ञानकी इच्छा करते हैं, न कि जानते हैं, यद्यपि वस्तुतः वेदन ( ज्ञान ) प्रधान है, तथापि शब्दमर्यादासे वह अप्रधान है, और इच्छा प्रत्ययार्थ होनेके कारण प्रधान है, और प्रधानमें अन्यका सम्बन्ध होता है, [ द्रष्टव्य—पृ० ५१ और ६१ कल्पतरुसहित भामती निर्णयसागर प्रेसमें मुद्रित ] ।

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