सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 448, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४१८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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विनियोगो युक्त इति चेद्, न; अन्नद्वेषेण कार्श्यं प्राप्तस्य तत्परिहारायाऽन्नविषयोत्कण्ठ्यलक्षणायामिच्छायां सत्यामप्युत्कटाजीर्णादिप्रयुक्तधातुवैषम्यदोषात् तत्र प्रवृत्तिपर्यन्ता रुचिर्न जायते इति तद्रोचकौषधविधिवद् निरतिशयानन्दरूपं ब्रह्म तत्प्राप्तौ विद्यासाधनमित्यर्थे प्राचीनबहुजन्मानुष्ठितानभिसंहितफलकनित्यनैमित्तिककर्मोपसञ्जातचित्तप्रसादमहिम्ना सम्पन्नविश्वासस्य पुरुषस्य ब्रह्मावाप्तौ विद्यायां च तदोन्मुख्यलक्षणायामिच्छायां सत्यामप्यनादिभवसञ्चितानेकदुरितदोषेणाऽऽस्तिककामुकस्य हेयकर्मणीव
यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे अन्नमें द्वेषसे अर्थात् किसी दोषवशसे अन्न न खानेसे जिसको शरीरमें कृशता प्राप्त है, उसे अपने शरीरके दौर्बल्यका परिहार करनेके लिए अन्नमें उत्कण्ठारूप इच्छा, तो अवश्य होती है, परन्तु बड़े उत्कट अजीर्णरूप दोषसे उत्पन्न धातुवैषम्यसे अन्न-खानेमें प्रवृत्ति करानेवाली रुचि नहीं होती है, इसलिए अन्नमें रुचिके सम्पादक औषधका उपचार किया जाना आवश्यक होता है, वैसे ही 'ब्रह्म निरतिशय आनन्दरूप है और उसकी प्राप्तिका साधन विद्या है' इस विषयमें पहलेके अनेक जन्मोंमें फलकी इच्छाके बिना अनुष्ठित अनेक नित्य, नैमित्तिक कर्मोंसे उत्पन्न हुई चित्तकी प्रसन्नतासे जिस पुरुषको—विश्वास हुआ है, उस पुरुषको ब्रह्मकी प्राप्तिमें और विद्यामें उत्सुकतारूप इच्छा तो अवश्य होती है, परन्तु जैसे आस्तिक † कामी पुरुषकी निन्दित कर्ममें प्रवृत्ति होती है, वैसे ही विषय-
साधनत्वके ज्ञानसे इच्छा होगी, उसके बाद वेदनेच्छामें वेदनसाधनत्वज्ञानसे इच्छा होगी, इस इच्छाके अनन्तर यज्ञ आदिका अनुष्ठान होगा, इस परिस्थितिमें वेदनेच्छारूप विविदिषाके उद्देश्यसे यज्ञादिमें प्रवृत्त पुरुषको विविदिषाके फलभूत ब्रह्मज्ञानमें इच्छा है, या नहीं है ? प्रथम पक्षमें यज्ञ आदिका अनुष्ठान व्यर्थ होगा, द्वितीय पक्षमें यज्ञ आदिका अनुष्ठान ही नहीं प्रसक्त होगा, क्योंकि विविदिषाके फलमें (वेदनमें) कामनाके न रहनेसे विविदिषामें भी इच्छा नहीं है, अतः विविदिषामें यज्ञादिका विनियोग नहीं हो सकता है, यह पूर्वपक्षका भाव है।
† जिस पुरुषने पूर्वके अनेक जन्मोंमें अनेक कर्मोंका अनुष्ठान किया है, उन्हीं कर्मोंसे जब उसकी चित्तशुद्धि हुई है, और ब्रह्मविद्यामें जिसका विश्वास भी हुआ है, तो कैसे वह विषयभोगमें प्रवृत्त होगा ? इस शङ्काके परिहारमें यह 'आस्तिककामुकस्य' दृष्टान्त है, सारांश यह है कि जिसको कि वेदविहित कर्मोंके करनेसे अवश्य कल्याण होता है,