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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ
४१८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

विनियोगो युक्त इति चेद्, न; अन्नद्वेषेण कार्श्यं प्राप्तस्य तत्परिहारायाऽन्नविषयोत्कण्ठ्यलक्षणायामिच्छायां सत्यामप्युत्कटाजीर्णादिप्रयुक्तधातुवैषम्यदोषात् तत्र प्रवृत्तिपर्यन्ता रुचिर्न जायते इति तद्रोचकौषधविधिवद् निरतिशयानन्दरूपं ब्रह्म तत्प्राप्तौ विद्यासाधनमित्यर्थे प्राचीनबहुजन्मानुष्ठितानभिसंहितफलकनित्यनैमित्तिककर्मोपसञ्जातचित्तप्रसादमहिम्ना सम्पन्नविश्वासस्य पुरुषस्य ब्रह्मावाप्तौ विद्यायां च तदोन्मुख्यलक्षणायामिच्छायां सत्यामप्यनादिभवसञ्चितानेकदुरितदोषेणाऽऽस्तिककामुकस्य हेयकर्मणीव


यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे अन्नमें द्वेषसे अर्थात् किसी दोषवशसे अन्न न खानेसे जिसको शरीरमें कृशता प्राप्त है, उसे अपने शरीरके दौर्बल्यका परिहार करनेके लिए अन्नमें उत्कण्ठारूप इच्छा, तो अवश्य होती है, परन्तु बड़े उत्कट अजीर्णरूप दोषसे उत्पन्न धातुवैषम्यसे अन्न-खानेमें प्रवृत्ति करानेवाली रुचि नहीं होती है, इसलिए अन्नमें रुचिके सम्पादक औषधका उपचार किया जाना आवश्यक होता है, वैसे ही 'ब्रह्म निरतिशय आनन्दरूप है और उसकी प्राप्तिका साधन विद्या है' इस विषयमें पहलेके अनेक जन्मोंमें फलकी इच्छाके बिना अनुष्ठित अनेक नित्य, नैमित्तिक कर्मोंसे उत्पन्न हुई चित्तकी प्रसन्नतासे जिस पुरुषको—विश्वास हुआ है, उस पुरुषको ब्रह्मकी प्राप्तिमें और विद्यामें उत्सुकतारूप इच्छा तो अवश्य होती है, परन्तु जैसे आस्तिक † कामी पुरुषकी निन्दित कर्ममें प्रवृत्ति होती है, वैसे ही विषय-


साधनत्वके ज्ञानसे इच्छा होगी, उसके बाद वेदनेच्छामें वेदनसाधनत्वज्ञानसे इच्छा होगी, इस इच्छाके अनन्तर यज्ञ आदिका अनुष्ठान होगा, इस परिस्थितिमें वेदनेच्छारूप विविदिषाके उद्देश्यसे यज्ञादिमें प्रवृत्त पुरुषको विविदिषाके फलभूत ब्रह्मज्ञानमें इच्छा है, या नहीं है ? प्रथम पक्षमें यज्ञ आदिका अनुष्ठान व्यर्थ होगा, द्वितीय पक्षमें यज्ञ आदिका अनुष्ठान ही नहीं प्रसक्त होगा, क्योंकि विविदिषाके फलमें (वेदनमें) कामनाके न रहनेसे विविदिषामें भी इच्छा नहीं है, अतः विविदिषामें यज्ञादिका विनियोग नहीं हो सकता है, यह पूर्वपक्षका भाव है।

† जिस पुरुषने पूर्वके अनेक जन्मोंमें अनेक कर्मोंका अनुष्ठान किया है, उन्हीं कर्मोंसे जब उसकी चित्तशुद्धि हुई है, और ब्रह्मविद्यामें जिसका विश्वास भी हुआ है, तो कैसे वह विषयभोगमें प्रवृत्त होगा ? इस शङ्काके परिहारमें यह 'आस्तिककामुकस्य' दृष्टान्त है, सारांश यह है कि जिसको कि वेदविहित कर्मोंके करनेसे अवश्य कल्याण होता है,

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ज्ञानकी उत्पत्तिमें कर्मोंके उपयोगका विचार ] भाषानुवादसहित ४१९

विषयभोगे प्रावण्यं सम्पादयता प्रतिबन्धाद्विद्यासाधने श्रवणादौ प्रवृत्ति- पर्यन्ता रुचिर्न जायत इति प्रतिबन्धनिरासपूर्वं तत्सम्पादकयज्ञादिविधा- नोपपत्तेरिति ।

स्वर्गवत्काम्यमाने तं ज्ञाने विवरणानुगाः ।
जिज्ञासितव्यं श्रुतिभिर्ब्रह्मेत्यत्र श्रुतेरिव ॥३॥

विवरणानुसारी कहते हैं कि स्वर्गके समान अभिलषित ज्ञानमें ही कर्मोंका उपयोग है, जैसे कि 'श्रुतियोंसे ब्रह्म जानना चाहिए' इसमें श्रुतियोंका ब्रह्मज्ञानमें उपयोग है ॥३॥

भोगमें दक्षताका सम्पादन करानेवाले अनेक जन्मोंके सञ्चित पापोंके प्रभावसे प्रतिबन्ध होनेके कारण विद्याके साधन श्रवण आदिमें पुरुषकी प्रवृत्ति करानेवाली रुचिलक्षण इच्छा नहीं होती है, अतः प्रतिबन्धके निरासपूर्वक विविदिपाशब्दसे कहलानेवाली श्रवणादिमें प्रवृत्तिपर्यन्त रुचिकी उत्पत्तिके लिए यज्ञादिका अनुष्ठान करना चाहिए । [ सारांश यह है कि ज्ञानकी इच्छा दो प्रकारकी है—एक तो विद्यामें उत्कण्ठारूप और दूसरी रुचिरूप, पहली इच्छा, यज्ञ आदिके अनुष्ठानके पूर्वमें भी है, अतः उसीको लेकर ज्ञानकी कारण विविदिपामें कामना होती है, इससे विविदिपाके लिए यज्ञ आदिका अनुष्ठान होता है, दूसरी रुचिरूप इच्छा यज्ञ आदिके अनुष्ठानके वाद होती है, अतः उस रुच्यात्मक विविदिपामें यज्ञ आदिका विनियोग कर सकते हैं, इसलिए पूर्वपक्षीकी उक्त शङ्का उपपत्तिशून्य है * ] ।


'और उनका अनुष्ठान न करनेसे पाप होता है, इस प्रकार शास्त्रपरिशीलनसे ज्ञान है, ऐसे किसी पुरुषको भी कामोद्रेक होता है और पापविशेषसे निषिद्धाचरण करता है, वैसे मुमुक्षुको भी पापविशेषसे विषयमें प्रवृत्ति हो सकती है, यह भाव है ।

* इस भामतीकारके अनुसारी मतमें—‘अस्यार्थः—‘विविदिपन्ति यज्ञेन’ इति तृतीयाश्रुत्या यज्ञादीनामङ्गत्वेन ∙ ब्रह्मज्ञाने विनियोगात्••••••∙∙∙नित्यस्वाध्यायेन ब्राह्मणा विविदिपन्ति, न तु-विन्दन्ति, वस्तुतः प्रधानस्यापि वेदनस्य प्रकृत्यर्थतया शब्दतो गुणत्वाद्, इच्छायाश्च प्रत्ययार्थतया प्राधान्यात्, प्रधानेन च कार्यसम्प्रत्ययात्’ यह साक्षात् वाचस्पतिकी उक्ति—प्रमाणभूत है, तात्पर्य यह है कि ‘विविदिपन्ति यज्ञेन’ इसमें ‘यज्ञेन’ इस तृतीयाविभक्त्यन्तश्रुतिसे ब्रह्मज्ञानमें यज्ञ आदिका अङ्गत्वरूपसे विनियोग होता है••••••••नित्य स्वाध्यायसे ब्राह्मण ब्रह्मज्ञानकी इच्छा करते हैं, न कि जानते हैं, यद्यपि वस्तुतः वेदन ( ज्ञान ) प्रधान है, तथापि शब्दमर्यादासे वह अप्रधान है, और इच्छा प्रत्ययार्थ होनेके कारण प्रधान है, और प्रधानमें अन्यका सम्बन्ध होता है, [ द्रष्टव्य—पृ० ५१ और ६१ कल्पतरुसहित भामती निर्णयसागर प्रेसमें मुद्रित ] ।

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४२०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

विवरणानुसारिणस्त्वाहुः—‘प्रकृतिप्रत्ययार्थयोः प्रत्ययार्थस्य प्राधान्यम्’ इति सामान्यन्यायाद् ‘इच्छाविषयतया शब्दबोध्ये एव शब्दसाधनतान्वयः’ इति स्वर्गकामादिवाक्ये क्लृप्तविशेषन्यायस्य बलवत्त्वात् । ‘अश्वेन जिगमिषति’ ‘असिना जिघांसति’ इत्यादिलौकिकप्रयोगे अश्वादिरूपसाधनस्य, ‘तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यं’ ‘मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’ इत्यादिवैदिकप्रयोगे तव्यार्थभूतविधेश्च सन्प्रत्ययाभिहितेच्छाविषये एव गमनादा-

विवरणानुसारी लोग कहते हैं कि † ‘प्रकृति०’ ( प्रकृति और प्रत्ययके अर्थोंमें प्रत्ययका ‡ अर्थ ही प्रधान होता है ) इस सामान्य नियमसे स्वर्गकामादि वाक्यमें क्लृप्त ‘इच्छाविषय होनेसे शब्दबोध्य अर्थमें ही शब्दसाधनताका अन्वय होता है’ यह न्याय बलवान् है । और ‘घोड़ेसे जानेकी इच्छा करता है, तलवारसे मारनेकी अभिलाषा करता है’ इत्यादि लौकिकप्रयोगमें अश्व आदिरूपसाधनका और ‘तदन्वेष्टव्यम् ०’ ( उसकी — परमात्माकी — खोज करनी चाहिए, उसकी जिज्ञासा करनी चाहिए, आत्माका मनन करना चाहिए, निदिध्यासन करना चाहिए ) इत्यादि वैदिकप्रयोगमें तव्यार्थभूत विधिका सन्प्रत्ययसे कही गई इच्छाके विषयभूत गमन आदिमें ही अन्वय


† भामत्यादि नवटीकोपेत शाङ्करभाष्यके पृ० ६८३ में इस मतकी पोषक विवरणकी पंक्तियाँ हैं—'नित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठानैः संस्कृतस्याऽऽत्मनो यदि श्रवणमननध्यानाभ्यासादीनि ज्ञानसाधनानि सम्पद्यन्ते, तदा संस्कारकर्माणि सहकारिविशेषादात्मज्ञानमवतारयन्ति—इत्यादि । इसी प्रकार और अनेक वाक्योंसे भी इसी अर्थका प्रतिपादन श्रुति और स्मृतिके विरोधपरिहारपूर्वक किया गया है ।

‡ ‘विविदिषन्ति यज्ञेन’ इसमें सनरूप प्रत्ययका अर्थ है—इच्छा और विद्धातुरूप प्रकृतिका अर्थ है—ज्ञान, इनमें प्रत्ययार्थ इच्छा ही प्रधान है, इसलिए शब्दतः प्रधानरूपसे प्रतीत होनेवाली इच्छामें ही यज्ञादिका विनियोग प्राप्त है, परन्तु इस नियमका औत्सर्गिक होनेसे बाध हो सकता है । अतः ‘स्वर्गकामो यजेत’ इस विधिवाक्यमें विधायकप्रत्ययसे इष्टसाधनत्वरूपसे अवगत यागके इष्ट विशेषकी आकाङ्क्षामें शब्दतः स्वर्गके प्रधान न होनेपर भी फलत्वरूपसे अन्वय किया गया है, इसलिए ‘इष्यमाणसमभिव्याहारे इष्यमाणस्यैव प्राधान्यम्’ न तु इच्छायाः’ ( इच्छा और इच्छाविषयके सामीप्य रहते इच्छाका विषय ही प्रधान होता है, इच्छा नहीं ) इस प्रकारका विशेषनियम, जो कि पूर्व सामान्यनियमका बाधक है, बलवान् है, यह भाव है ।

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ज्ञानकी उत्पत्तिमें कर्मोंके उपयोगका विचार] भाषानुवादसहित ४२१


वन्वयस्य व्युत्पन्नतयाच प्रकृत्यभिहितायां विद्यायां यज्ञादीनां विनियोगः । ननु तथा सति यावद्विद्योदयं कर्मानुष्ठानापत्त्या 'त्यजतैव हि तज्ज्ञेयम्' इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धं कर्मत्यागरूपस्य सन्न्यासस्य विद्यार्थत्वं पीड्येतेति चेद्, न ; प्राग् बीजावापात् कर्षणम्, तदनन्तरमकर्षणमिति कर्पणाकर्षणाभ्यां व्रीह्यादिनिष्पत्तिवद्—

'आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥'

इत्यादिवचनानुसारेण चेतः शुद्धौ विविदिषादिरूपप्रत्यक्प्रावण्यो-


व्युत्पन्न है, अतः प्रकृतिसे अभिहित ( कथित ) विद्यामें ही यज्ञ आदिका × विनियोग है ।

यदि शङ्का हो कि ऐसा होनेपर विद्याकी उत्पत्ति तक कर्मानुष्ठानकी प्रसक्ति होनेसे 'त्यजतैव०' ( सब कर्मोंका त्याग करके ही पुरुषको ) प्रत्यगात्मरूप ब्रह्मका साक्षात्कार करना चाहिए, त्याग किये बिना नहीं ) इत्यादि श्रुतिसे* सिद्ध कर्मत्यागरूप संन्यासमें विद्यार्थता बाधित होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे बीज बोनेके पूर्वमें हल जोतना पड़ता है, उसके बाद नहीं, इससे कर्षण और अकर्षणसे व्रीहिकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही—

'आरुरुक्षोर्मु०' ( योगकी सिद्धि होनेके पूर्वमें उसके प्रति कर्म कारण हैं और योगसिद्ध होनेके बाद उन कर्मोंका शम ( संन्यास ) कारण है, ऐसा कहा जाता है ) इस वचनके अनुसार अन्तःकरणकी शुद्धिमें विविदिषारूप प्रत्यक्प्रावण्य


× यदि इसमें कोई शङ्का करे कि उदाहृत वाक्योंमें अर्थात् 'अश्वेन जिगमिषति' इत्यादि वाक्योंमें अश्व आदिका इच्छामें अन्वय नहीं हो सकता है, इसलिए इच्छान्वयका परित्याग किया ? तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि तुल्ययुक्तिसे यह भी कह सकते हैं कि वेदनेच्छाके भी यज्ञान्वयमें अयोग्य होनेसे उसमें यज्ञादिका विनियोग नहीं हो सकता है और ब्रह्मवेदनका, जो कि ब्रह्मानन्दसाक्षात्काररूप है, फलरूपसे अन्वय हो सकता है, यह भाव है ।

* 'अथ परिव्राट्' इस प्रकारसे उपक्रम करके 'ब्रह्मभूयाय कल्पते' इत्यादि कही गई अन्य श्रुतिसे परिव्राट्शब्दसे कथित संन्यास ब्रह्मसाक्षात्कारका कारण बतलाया गया है, इसी प्रकार अन्य श्रुतियोंमें भी कहा गया है, यह अभिप्राय है ।

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४२२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ तृतीय परिच्छेद


दयपर्यन्तं कर्मानुष्ठानम्, ततः कर्मतत्सन्न्यासाभ्यां विद्यानिष्पत्त्यभ्युपगमात् । उक्तं हि नैष्कर्म्यसिद्धौ—

‘प्रत्यक्प्रवणतां बुद्धेः कर्माण्युत्पाद्य शुद्धितः । कृतार्थान्यस्तमायान्ति प्रावृडन्ते घना इव ॥’ इति

कर्मणां विद्यार्थत्वपक्षेऽपि विविदिषापर्यन्तमेव कर्मानुष्ठाने विविदिषार्थत्वपक्षात् को भेद इति चेद्, अयं भेदः—कर्मणां विद्यार्थत्वपक्षे द्वारभूतविविदिषासिद्ध्यनन्तरमुपरतावपि फलपर्यन्तानि विशिष्टगुरुलाभानिर्विघ्नश्रवणमननादिसाधनानि निवृत्तिप्रमुखानि सम्पाद्य विद्योत्पादकत्वनियमोऽस्ति । विविदिषार्थत्वपक्षे तु श्रवणादिप्रवृत्तिजननसमर्थोत्कटेच्छासम्पादनमात्रेण कृतार्थतेति नावश्यं विद्योत्पादकत्वनियमः । ‘यस्यैतेचत्वारिंशत्


( योग ) के उदयतक कर्मोंका अनुष्ठान और उसके बाद संन्यास है, इस रीतिसे कर्म और कर्मके त्यागसे विद्याकी उत्पत्ति होती है, ऐसा माना है।

नैष्कर्म्यसिद्धिमें भी कहा है— ‘प्रत्यक्प्रवणताम्०’ (चित्तशुद्धिद्वारा बुद्धिमें विविदिषा, वैराग्य आदि प्रत्यक्प्रावण्यकी प्राप्ति करनेके बाद कर्मोंका प्रयोजन प्राप्त हो जानेसे वे कर्म वर्षाकालके बाद मेघके समान अस्त हो जाते हैं ।) यदि शङ्का हो कि कर्मोंके विद्यार्थत्वपक्षमें भी विविदिषातक ही उनका अनुष्ठान होनेसे कर्मोंके विविदिषार्थत्वपक्षसे क्या भेद हुआ ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भेद इस प्रकारसे है—कर्मोंके विविदिषार्थत्वपक्षमें द्वारभूत विविदिषाकी सिद्धिके बाद उनका त्याग होनेपर भी अदृष्टद्वारा फलकी उत्पत्तितक विशिष्ट गुरुकी प्राप्तिसे निवृत्तिप्रमुख ( निवृत्तिसहित ) श्रवण, मनन आदिका सम्पादन करके वे कर्म विद्याके उत्पादक होते हैं, ऐसा नियम है और विविदिषार्थत्वपक्षमें, तो अर्थात् जिस पक्षमें कर्मोंका प्रयोजन केवल ब्रह्मज्ञानकी इच्छा पैदा करना है, उस पक्षमें तो श्रवण आदिमें प्रवृत्ति करानेमें समर्थ, ऐसी उत्कट इच्छाके सम्पादनमात्रसे कृतार्थता है, इसलिए उनमें अवश्य विद्योत्पादकत्व * है,


* विविदिषार्थत्वपक्षमें यज्ञ आदिसे उत्पन्न अदृष्ट श्रवण आदिमें प्रवृत्ति तक रुचिका (विविदिषाका) उत्पादन करके नष्ट हो जाता है, क्योंकि अदृष्टका फलोत्पत्तिके बाद विनाश होता है, यह नियम है। और विविदिषाकी उत्पत्तिके अनन्तर श्रवण आदिके प्रति बाधक न

श्रुतिसे विनियुक्त कर्मविशेषोंका कथन] भाषानुवादसहित ४२३

संस्काराः' इति स्मृतिमूले कर्मणामात्मज्ञानयोग्यतापादकमलापकर्षणगुणा- धानलक्षणसंस्कारार्थत्वपक्षे इवेति वदन्ति ॥ १ ॥ तत्रोपयोगः कथितः कैश्चिदाश्रमकर्मणाम् ।

कोई लोग कहते हैं कि आश्रम-कर्मोंका ब्रह्मविद्या आदिमें उपयोग है ।

ननु केषां कर्मणामुदाहृतश्रुत्या विनियोगो बोध्यते ? अत्र कैश्चिदुक्तम्- 'वेदानुवचनेन' इति ब्रह्मचारिधर्माणाम्, 'यज्ञेन दानेन' इति गृहस्थधर्मा- णाम्, 'तपसाऽनाशकेन' इति वानप्रस्थधर्माणां च उपलक्षणमित्याश्रमधर्मा-

ऐसा नियम नहीं है । जैसे कि 'यस्यैते०' ( जिस पुरुषके श्रौत, स्मार्त आदि चालीस संस्कार हैं ) इत्यादि स्मृतिसे प्रतिपादित कर्मोंके संस्कारार्थत्वपक्षमें, जो कि संस्कार आत्मज्ञानकी योग्यताके सम्पादक मलापकर्षणरूप और गुणके आधानरूप हैं, उक्त नियम नहीं है ॥ १ ॥

अब शङ्का होती है कि पूर्वोक्त श्रुतिसे किन कर्मोंका विनियोग ज्ञात होता है ? इस शङ्काके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि 'वेदानुवचनेन' * यह ब्रह्मचारीके धर्मोंका, 'यज्ञेन दानेन' यह गृहस्थ धर्मोंका और 'तपसाऽनाशकेन' यह वानप्रस्थधर्मोंका उपलक्षण है, इसलिए सभी आश्रमधर्म विद्यामें उपयुक्त


रहनेसे विविदिषासे ही श्रवणादि द्वारा ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है, श्रवण आदिके प्रतिबन्धक पापके रहनेपर यत्न करनेपर भी श्रवण आदि नहीं होते हैं, इसलिए दुरितसत्ताका निश्चय करके उसकी निवृत्तिका उपाय करता है, प्रायः निवर्तक उपायके न करनेसे श्रवण आदि नहीं हो सकते हैं, इसलिए ज्ञान भी नहीं होता है, जैसे औषधसे अन्नके भक्षणमें रुचिकी उत्पत्ति करके यदि अन्न प्राप्त हो, तो उसके भक्षणसे कृशता निकल जाती है, परन्तु यदि यत्न करनेपर भी अन्न नहीं मिला, तो कृशता ज्योंकी त्यों बनी रहती है, इसलिए उनमें अवश्य विद्योत्पादकता है, यह नियम नहीं है, यह भाव है । इसीमें दृष्टान्त है—जो लोग कर्मोंका संस्काररूप फल मानते हैं, उनके पक्षमें यदि कर्मोंसे संस्कृत पुरुषको श्रवणादिसाधन मिले, तो उसे तत्त्वज्ञान द्वारा ब्रह्मकी प्राप्ति होती है, यदि न मिले तो पुण्यलोककी प्राप्ति होती है, यह सिद्धान्त किया गया है, इसलिए कर्मोंके संस्कारार्थत्वपक्षमें कर्मोंमें विद्योत्पादकता अवश्य ही है, ऐसा नियम नहीं है, वैसे विविदिषार्थत्ववादियोंके मतमें भी है, यह भाव है ।

* शिष्य वेदका उच्चारण गुरुवचनके अनन्तर करता है, अतः वेदानुवचनशब्दसे वेदाध्ययनका ग्रहण किया जाता है, वह ब्रह्मचारीके धर्मोंमें प्रधान ही है, इसलिए वेदाध्ययनसे ब्रह्मचारीके सम्पूर्ण धर्मोंका ग्रहण किया जाता है । इसी प्रकार उत्तरोत्तर उपलक्षणमें बीज समझना चाहिए ।

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४२४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

णामेव विद्योपयोगः । अत एव 'विहितत्वाच्चाश्रमकर्मापि' ( उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ३२ ) इति शारीरकसूत्रे विद्यार्थकर्मस्वाश्रमकर्मपदप्रयोग इति ॥

'परैस्तु वैधुरादीनामपि कल्पतरूक्तितः ॥४॥

कोई लोग कल्पतरुकी उक्तिके अनुसार आश्रमरहित विधुर आदिकोंके कर्मोंका भी उपयोग कहते हैं ॥ ४ ॥

कल्पतरौ तु नाऽऽश्रमधर्माणांमेव विद्योपयोगः, 'अन्तरा चाऽपि तु तद्-दृष्टेः' (उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ३६) इत्यधिकरणे आश्रमरहितविधुराद्यनुष्ठितकर्मणामपि विद्योपयोगनिरूपणात् । न च विधुरादीनामनाश्रमिणां प्राग्जन्मानुष्ठितयज्ञाद्युत्पादितविविदिषाणां विद्यासाधनश्रवणादावधिकारनिरूपणमात्रपरं तदधिकरणम्, न तु तदनुष्ठितकर्मणां विद्योपयोगनिरूपणपरमिति शङ्क्यम् । 'विशेषानुग्रहश्च' इति (उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ३८)

हैं, इसीलिए 'विहितत्वाच्चाश्रमकर्माऽपि'* इस शारीरिकसूत्रमें विद्याके उपयोगी कर्मोंमें 'आश्रमकर्म' पदका प्रयोग किया गया है ।

कल्पतरुमें † तो कहा है कि आश्रमधर्मोंका ही विद्यामें उपयोग है, ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि 'अन्तरा चाऽपि' इस अधिकरणमें आश्रमरहित विधुर आदिसे अनुष्ठित कर्मोंका भी विद्यामें उपयोगनिरूपण किया गया है । यदि शङ्का हो कि पूर्वजन्ममें अनुष्ठित यज्ञ आदिसे जिन्होंने विविदिषाकी उत्पत्ति की है, ऐसे अनाश्रमी विधुरोंका विद्याके साधन श्रवण आदिमें अधिकार है, इसीका निरूपण उक्त अधिकरणमें किया गया है, न कि विधुरोंसे इसी जन्ममें अनुष्ठित कर्मोंका विद्यामें उपयोगका निरूपण किया गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'विशेषानुग्रहश्च'‡


* सूत्रका यह अर्थ है कि कर्मफलोंकी अभिलाषा न करनेवाले आश्रमीको भी आश्रम-कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिए, क्योंकि आश्रमीके प्रति उन कर्मोंका शास्त्रोंमें विधान है, अन्यथा प्रत्यवाय होगा, यह भाव है ।

† इस सूत्रका यह अर्थ है—आश्रमके बिना रहे हुए पुरुषोंका भी ब्रह्म-विद्यामें अधिकार है, क्योंकि रैक्वप्रभृति अनाश्रमी पुरुषोंको भी ब्रह्मविद्या हुई है, यह भाव है ।

‡ देवताराधन आदि विशेषधर्मोंसे चित्तशुद्धिद्वारा रैक्वप्रभृतिको आश्रमधर्मोंके समान विद्याका अनुग्रह देखा गया है, अतः अनाश्रमियोंका कर्म भी विद्याका साधन है, इसीलिए— 'जप्येनैव संसिद्धयेत् ब्राह्मणो नाऽत्र संशयः ।
कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान् मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥'
अर्थात् जपसे भी ब्राह्मण सिद्धि प्राप्त करता है, उसमें तनिक भी संशय नहीं है । वह अन्य कर्म करे या न करे, क्योंकि ब्राह्मण दयावान् कहलाता है, यह भाव है ।

श्रुतिसे विनियुक्त कर्मविशेषोंका कथन ] भाषानुवादसहित ४२५


तदधिकरणसूत्रतद्भाष्ययोस्तदनुष्ठितानां जपादिरूपवर्णमात्रधर्माणामपि विद्योपयोगस्य कण्ठत उक्तेः । 'विहितत्वाच्चाश्रमकर्मापि' इति सूत्रे आश्रमकर्मपदस्य वर्णधर्माणामप्युपलक्षणत्वादित्यभिप्रायेणोक्तम्—

तत्र क्लृप्तफलत्वेन नित्यानामेव कैश्चन ।

कोई लोग कहते हैं कि क्लृप्त फल होनेसे नित्य कर्म ही विद्याके उपयोगी हैं ।

आश्रमधर्मव्यतिरिक्तानामप्यस्ति विद्योपयोगः, किन्तु नित्यानामेव । तेषां हि फलं दुरितक्षयं विद्याऽपेक्षते, न काम्यानां फलं स्वर्गादि । तत्र यथा प्रकृतौ क्लृप्तोपकाराणामङ्गानामतिदेशे सति न प्राकृतोपकारा-

इस प्रकारके उसके अधिकरणके सूत्र और भाष्यमें जपादिरूप सम्पूर्ण धर्मोंका उपयोग साक्षात् कहा गया है । 'विहितत्वाच्चाश्रमकर्माऽपि' इस सूत्रमें 'आश्रमकर्मशब्द सभी वर्णधर्मोंका उपलक्षण है' अर्थात् आश्रमकर्मसे भिन्न इतर वर्णधर्मोंका भी ग्रहण करना चाहिए, यह भाव है—इसी अभिप्रायसे कल्पतरुमें पंक्तियां भी हैं—

यद्यपि आश्रमधर्मसे *इतर धर्म भी विद्याके उपयोगी हैं, तथापि वे नित्यधर्म ही हैं, क्योंकि उनका दुरितक्षयरूप जो फल है, उसीकी अपेक्षा विद्या करती है, काम्यकर्मोंसे होनेवाले स्वर्ग आदि फलकी अपेक्षा नहीं करती है, इस परिस्थितिमें अर्थात् विद्यामें उपयोगी उपकारकी हेतुताके काम्यकर्मोंमें न होनेसे जैसे प्रकृतियागमें † प्रसिद्ध उपकारी अङ्गोंका विकृतिमें अतिदेश होनेपर प्रकृतिमें किये हुए उनके उपकारसे


* इन पंक्तियोंको कल्पतरुमें, जिसके प्रणेता अमलानन्दस्वामी हैं, देखिए पृ० ६२ भामतीकल्पतरुसहित शाङ्करभाष्य । इससे यही सिद्ध होता है कि 'विविदिषन्ति' इत्यादि विविदिषाश्रुतिसे जिन यज्ञ आदि धर्मोंका विद्यामें उपयोग कहा गया है, वे नित्य ही धर्म लेने चाहिएँ, काम्य नहीं, क्योंकि काम्योंका यदि ग्रहण किया जायगा, तो काम्य कर्मोंके स्वाभाविक फलका परित्याग करके उनका नित्यसाधारण पापक्षयरूप फल मानना होगा, कारण कि विद्या पापक्षयकी अपेक्षा रखती है, स्वर्ग आदिकी नहीं, इससे केवल गौरव होगा, यह भाव है ।

† प्रकृतियाग उसे कहते हैं, जो अतिदिश्यमान अङ्गका प्रतियोगी हो । प्रतियोगी उसे कहना चाहिए कि जिस यागके अङ्ग अतिदिष्ट होते हों, और विकृतियागका अर्थ है अतिदिश्यमान अङ्गोंका अनुयोगी, जिसमें अङ्ग अतिदिष्ट हों, वह अनुयोगी है । प्रकृतियागमें श्रुत पदार्थकी विकृतिमें कल्पना करना अतिदेश कहलाता है। दर्शपूर्णमास प्रकृतियाग है, क्योंकि इसके पदार्थोंका विकृतिभूत सौर्य पशुयाग आदिमें अतिदेश होता है, और सौर्य पशुयाग आदि विकृतियाग हैं, क्योंकि वे अतिदिश्यमान दर्शपूर्णमासयागके पदार्थोंके अनुयोगी हैं, यह भाव है ।

५४

४२६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

तिरिक्तोपकारकल्पनम्, एवं ज्ञाने विनियुक्तानां यज्ञादीनां क्लृप्तनित्यफलपापक्षयातिरेकेण न नित्यकाम्यसाधारणविद्योपयोग्यपकारकल्पनमिति ।

काम्यानामपि संक्षेपशारीरककृतां नये ॥ ५ ॥
न चोपकारसंक्लप्तिद्वारं वाक्यं प्रतीक्षते ।
प्राप्तैर्वचनवैयर्थ्यं द्वारभेदेऽविशिष्टता ॥ ६ ॥

संक्षेपशारीरककारके मतमें काम्यकर्म भी विद्याके उपयोगी हैं, वाक्य उपकारसंक्लप्तिरूप द्वारकी अर्थात् अन्यत्र जिस उपकार की प्राप्ति हुई हो, उसकी अपेक्षा नहीं करता है, क्योंकि उसकी प्राप्ति होनेसे वाक्य ही व्यर्थ होगा, यदि द्वारभेद मानेंगे, तो समानता ही प्रसक्त होगी ॥ ५ ॥ ६ ॥

संक्षेपशारीरके तु नित्यानां काम्यानां च कर्मणां विनियोग उक्तः, यज्ञादिशब्दाविशेषात् । प्रकृतौ क्लृप्तोपकाराणां पदार्थानां क्लृप्तप्राकृतो-

भिन्न उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, वैसे ही ज्ञानमें विनियुक्त [ नित्य ] यज्ञोंका नित्यकर्मोंके फलरूपसे प्रसिद्ध पापविनाशसे अतिरिक्त नित्य और काम्यकर्मोंके साधारण विद्यामें उपयुक्त उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, कारण कि वैसी कल्पना करनेमें गौरव है।

* संक्षेपशारीरकमें तो नित्य और काम्य 'दोनों कर्मोंका विद्यामें विनियोग कहा है, क्योंकि 'तमेतम्' इत्यादि श्रुतिमें सामान्यरूपसे यज्ञ आदि शब्दोंका कथन किया गया है। † प्रकृतियागमें जिनका उपकार प्रसिद्ध है, ऐसे पदार्थोंका—क्लृप्त प्रकृतियागीयके उपकारके अतिदेशसे ही विकृतियागमें अतिदेशसे—


* संक्षेपशारीरककारका यह भाव है कि 'विविदिषन्ति यज्ञेन' इसमें यज्ञशब्द जैसे 'नित्य यज्ञोंमें रूढ है, वैसे ही काम्ययज्ञोंमें भी रूढ है, इसलिए नित्य कर्मोंके समान काम्य-कर्मोंका भी विद्यामें उपयोग प्रतीत होता है, अतः नित्यकाम्य साधारण किसी उपकारविशेषकी कल्पनामें कोई विरोध नहीं है।

† नित्यकाम्यसाधारण विद्यामें उपयुक्त उपकारकी यदि कल्पना की जाय, तो पूर्वमीमांसाके न्यायके साथ विरोध होगा, ऐसा समझ कर कल्पतरुमें विकृतिमें अतिदिष्ट अङ्गोंका दृष्टान्त दिया गया है, उसका परिहार इस ग्रन्थसे करते हैं। तात्पर्य यह है कि प्रकृतियागमें जिन पदार्थोंका उपकार क्लृप्त है, उनका पहले अतिदेश होता है, अनन्तर उन पदार्थोंके उपकारका विकृतिमें अतिदेश होता है, पहले प्राकृतिके पदार्थोंके अतिदेशसे विकृतिमें विनियोग करनेके बाद इनके उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, इसलिए प्रकृतिविकृतिस्थलमें क्लृप्त उपकारका

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श्रुतिसे विनियुक्त कर्मविशेषोंका कथन ] भाषानुवादसहित ४२७


पकारातिदेशमुखेनैव विकृतिष्वतिदेशेन सम्बन्धः, न तु पदार्थानामपि- देशानन्तरमुपकारकल्पनेति न तत्र प्राकृतोपकारातिरिक्तोपकारकल्पना- प्रसक्तिः । इह तु प्रत्यक्षश्रुत्या प्रथममेव विनियुक्तानां यज्ञादीनामुप- दिष्टनामङ्गानामिव पश्चात् कल्पनीय उपकारः प्रथमावगतविनियोग- निर्वाहायाक्लृप्तोऽपि सामान्यशब्दोपात्तसकलनित्यकाम्यसाधारणः कथं न कल्प्यः । अध्वरेषु अध्वरमीमांसकैरपि हि ‘उपकारमुखेन पदार्थान्वये एव क्लृप्तोपकारनियमः, पदार्थान्वयानन्तरम् उपकारकल्पने त्वकॢप्तोऽपि विनियुक्तपदार्थानुगुण एव उपकारः कल्पनीयः’ इति सम्प्रतिपद्यैव बाध-


सम्बन्ध होता है, पदार्थोंके अतिदेशके बाद उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, इसलिए विकृतिस्थलमें प्रकृतिस्थपदार्थोंके उपकारसे पृथक् उपकारकी कल्पना प्रसक्त नहीं है, प्रकृतस्थलमें⁺ तो साक्षात् ‘यज्ञेन’ इस श्रुतिसे पहले ही विनियुक्त यज्ञ आदिके—जैसे* उपदिष्ट अङ्गोंका प्रथम अवगत विनियोगके निर्वाहके लिए अक्लृप्त दृष्टादृष्टरूप उपकारकी कल्पना की जाती है, वैसे ही प्रथम अवगत विनियोगका निर्वाह करनेके लिए अक्लृप्त होनेपर भी सामान्य यज्ञशब्दसे नित्यकाम्य साधारण पश्चात् कल्पनीय—उपकारकी कल्पना क्यों न की जाय ? अर्थात् अवश्य की जाय, यह भाव है । प्रथम उपकारके अतिदेशके अनन्तर जहाँ पदार्थोंका अन्वय किया जाता है, वहींपर क्लृप्त अर्थात् प्रथमतः ज्ञात उपकारकी कल्पना होती है, अन्य की नहीं, यह नियम है और जहाँपर पदार्थोंके अन्वयके पीछे उपकारकी कल्पना की जाती है, वहींपर अक्लृप्त होनेपर भी विनियुक्त पदार्थोंके अनुकूल ही उपकारकी कल्पना की


⁺ परित्याग करके अन्य उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, इसलिए दृष्टान्त विषम है अर्थात् प्रकृतस्थलमें तो पहले यज्ञ आदिका विनियोग करनेके बाद उपकारकी कल्पना की जाती है और अतिदेशस्थलमें प्रकृतिमें उपकारकी कल्पना करनेके बाद प्रकृतियज्ञके पदार्थोंका विकृतिमें विनियोग होता है ।
* दर्शपूर्णमासके प्रकरणमें अथवा अन्य स्थलमें जो पदार्थ उपदिष्ट हैं अर्थात् साक्षात् श्रुतिसे बोधित हैं उनका श्रुति, लिङ्ग आदि प्रमाणोंसे पहले ही दर्श, पूर्णमास आदिमें विनियोग हो जाता है, अनन्तर इस विनियोगके निर्वाहके लिए दृष्ट और अदृष्टरूप किसी फलरूप द्वारकी कल्पना-की जाती है, इसी प्रकार ‘विविदिषन्ति यज्ञेन’ इत्यादि श्रुतिसे प्रथमतः ही यज्ञ आदिका विविदिषामें विनियोग हो जाता है, इसलिए इस विनियोगको सफल करनेके लिए अक्लृप्त उपकारकी यदि कल्पना की जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, यह भाव है ।

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४२८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

लक्षणारम्भसिद्धयर्थमुपकारमुखेन विकृतिषु प्राकृतान्वयो दशमाद्ये समर्थितः । किञ्च ‘क्लृप्तोपकारालभान्नित्यानामेवाऽयं विनियोगः’ इत्यभ्युपगमे नित्येभ्यो दुरितक्षयस्य तस्माच्च ज्ञानोत्पत्तेरन्यतः सिद्धौ व्यर्थोऽयं


जाती है, इस प्रकार कर्मोंके विषयमें अङ्गीकार करके ही पूर्वमीमांसकों ने बाधाध्यायके आरम्भके लिए उपकारका अतिदेश करनेके बाद विकृतिमें प्रकृतिस्थ पदार्थोंका सम्बन्ध * दशम अध्यायके प्रथम पादमें बतलाया है। किञ्च, क्लृप्त उपकारकी काम्योंमें प्राप्ति न होनेसे नित्य कर्मोंका ही यह विद्यामें विनियोग है, ऐसा माननेपर नित्य कर्मोंसे पापका विनाश और विविदिषावाक्यसे भिन्न वाक्यसे ज्ञानोत्पत्ति यदि सिद्ध है, तो यह विनियोग ही


* प्रकृतिभागके अङ्गभूत पदार्थोंकी, अतिदेशसे विकृतियागमें, प्राप्ति दिखलाई गई है। तात्पर्य यह है कि पूर्वमीमांसाके दशम अध्यायमें विकृतिमें अतिदिष्ट अङ्गोंका प्रकृतिमें क्लृप्त उपकारका सम्भव न होनेपर बाधका निरूपण किया गया है। उस बाधनिरूपणकी, यदि विकृतिमें अतिदेशसे पदार्थप्राप्तिके बाद उपकारकी कल्पना की जाय, तो सिद्धि नहीं होगी, क्योंकि जैसे प्रकृतिमें श्रुति आदिसे विनियुक्त पदार्थोंका दृष्ट फल न रहनेपर अदृष्ट उपकारकी कल्पना की जाती है, वैसे ही अतिदेशसे विकृतियागमें विनियुक्त पदार्थोंका दृष्ट उपकारके न रहनेपर अदृष्ट उपकारकी भी कल्पना हो सकनेसे उसकी सिद्धिके लिए सभी अङ्गोंका अनुष्ठान अवश्यम्भावी होनेके कारण कुछ अङ्गोंका अनुष्ठान या उसके अंशातिदेशप्रामाण्यरूप बाधका असम्भव है, इसलिए बाधनिरूपणकी सिद्धिके लिए प्रकृतिमें क्लृप्त उपकारके अतिदेशसे ही विकृतिमें प्रकृतिस्थ पदार्थोंका अन्वय है, इस प्रकार दशम अध्यायके प्रथम अधिकरणमें निश्चित किया गया है; इसलिए जहांपर पदार्थोंके विनियोगके अनन्तर उपकारकी कल्पना की गई हो, वहाँपर उन पदार्थोंकी अपनी सामर्थ्यके अनुसार प्रथमतः ज्ञात विनियोगके निर्वाहके लिए अक्लृप्त उपकारकी कल्पना मीमांसक सम्मत है, ऐसा प्रतीत होता है। यदि विनियोगके बाद जहाँ उपकारकी कल्पना की गई हो, उस स्थलमें भी क्लृप्त उपकारका सम्भव न होनेपर विनियुक्त पदार्थका परित्याग ही इष्ट हो, अक्लृप्त उपकारकी कल्पना इष्ट न हो, ऐसा माना जाय, तो ‘उपकारमुखेन’ इत्यादि निरूपण करनेवाला अधिकरण ही व्यर्थ होगा, क्योंकि श्रपण, अवघात आदि पदार्थोंका अतिदेशसे विनियोग होनेपर भी विकृतियागस्थ कृष्णल आदिमें श्रपण आदिके विक्लेत्ति;- तुषविमोक आदि लोकसिद्ध दृष्टोपकारका अभाव होनेसे और अक्लृप्त उपकारकी कल्पनाका स्वीकार न होनेसे श्रपणादिका अननुष्ठानलक्षण बाध, जिसका कि दशम-अध्यायमें निरूपण किया गया है, हो सकता है, फिर उसके लिए ‘उपकारमुखेन’ इत्यादि-निरूपण करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इससे विविदिषावाक्यसे सामान्यतः नित्यकाम्यसाधारण विनियोगके प्रथम अवगत होनेपर उसकी उपपत्तिका लिए अक्लृप्त उपकारकी कल्पना युक्त ही है, यह भाव है।


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श्रुतिसे विनियुक्त कर्मविशेषोंका कथन] भाषानुवादसहित ४२९

विनियोगः; अन्यतस्तदसिद्धौ ज्ञानापेक्षितोपकारजनकत्वं तेष्वक्लृप्तमित्य- विशेषाद् नित्यकाम्यसाधारणो विनियोगो दुर्वारः । ननु नित्यानां दुरितक्षयमात्रहेतुत्वस्यान्यतः सिद्धावपि विशिष्य ज्ञानोत्पत्तिप्रतिबन्धक- दुरितनिर्वर्हकत्वं न सिद्धम्, किन्तु अस्मिन् विनियोगे सति ज्ञानो- द्देशेन नित्यान्यनुतिष्ठतोऽवश्यं ज्ञानं भवति; इतरथा शुद्धिमात्रम्, न नियता ज्ञानोत्पत्तिरिति सार्थकोऽयं विनियोग इति चेत्, तर्हि नित्याना-


व्यर्थ है, यदि दूसरेसे सिद्ध नहीं है, तो ज्ञानके लिए अपेक्षित उपकार जनकता नित्यमें क्लृप्त ही नहीं है, इसलिए ? नित्य और काम्य कर्मोंके साधारण विनियोगका निवारण कर ही नहीं सकते हैं। यदि शङ्का हो कि * नित्य कर्मोंमें केवल दुरितक्षयकी हेतुताकी अन्यसे सिद्धि होनेपर भी ज्ञानकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक पापक्षयहेतुता अन्य प्रमाणसे विशेषरूपतया सिद्ध नहीं है; किन्तु इस विनियोगसे ही यह सिद्ध होता है कि ज्ञानके उद्देश्यसे यदि पुरुष नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करे, तो अवश्य ज्ञान उत्पन्न होता है; इस विनियोगके † न रहते केवल शुद्धिमात्र ही होती है, नियमसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होती, इसलिए यह विनियोग सार्थक है ? तो यह भी युक्त


* शङ्काका तात्पर्य यह है कि दुरित दो प्रकारके हैं—एक तो ज्ञानकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक और दूसरा ज्ञानकी उत्पत्तिमें उदासीन होकर नरकादि देनेवाला। इस अवस्थामें यदि नित्य- कर्मोंका ज्ञानमें विनियोग न किया जाय, तो नित्यकर्मोंसे ज्ञानप्रतिबन्धक दुरितका क्षय होता है, इसमें प्रमाण नहीं है, 'धर्मेण पापमपनुदति' (धर्मसे पाप हट जाता है) 'यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्' (यज्ञ, दान और तप मनीषियोंको पावन करनेवाले हैं) इस प्रकारके श्रुति-स्मृति-वचन भी नित्य कर्मोंमें सामान्यपापक्षयकी हेतुताका प्रतिपादन करते हैं। इससे नित्य कर्मोंमें नियमतः ज्ञानप्रतिबन्धकदुरितक्षयहेतुता दूसरेसे प्राप्त ही नहीं है, इसलिए उसकी प्राप्ति करानेके लिए यह विनियोग है, अर्थात् यह बात अन्यतः सिद्धिपक्षका अवलम्बन करके विनियोगकी सार्थकता बतलाती है, यह भाव है।

† तात्पर्य यह है कि यज्ञ आदिका ज्ञानमें विनियोग न होनेपर नित्य आदिके अनुष्ठानसे दुरितविनाशरूप शुद्धि ही प्राप्त होती है, परन्तु ज्ञानकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक दुरित क्षयरूप शुद्धि प्राप्त नहीं होती, क्योंकि ज्ञानके उद्देश्यसे नित्यकर्मोंका अनुष्ठान नहीं है, इस अवस्थामें अनेक जन्मोंसे जिसने नित्यकर्मोंका अनुष्ठान किया है, उसको भी नियमतः ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होगी, क्योंकि कदाचित् दैवयोगसे ज्ञानप्रतिबन्धक दुरितसमूहका सम्पूर्ण क्षय होनेपर भी ज्ञान कदाचित् होता है, इस प्रकार अनियत ज्ञानोत्पत्ति होगी।

४३०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

मपि अक्लृप्तमेव ज्ञानोत्पत्तिप्रतिबन्धकदुरितनिर्वहणत्वम्, ज्ञानसाधनविशिष्टगुरुलाभश्रवणमननादिसम्पादकापूर्वं च द्वारं कल्पनीयमित्यक्लृप्तोपकारकल्पनाऽविशेषाच्च सामान्यश्रुत्यापादितो नित्यकाम्यसाधारणो विनियोगो भञ्जनीय इति ॥ २ ॥

ब्राह्मणग्रहणं चाऽत्र त्रैवर्णिकानिदर्शनम् ।
वार्त्तिकोक्तेस्तथोद्देश्यगतत्वेनाऽविवक्षणात् ॥ ७ ॥

'विविदिषन्ति ब्राह्मणाः' इस श्रुतिमें ब्राह्मणग्रहण त्रैवर्णिकका उपलक्षण है, क्योंकि इस अर्थका पोषक वार्त्तिककारका वचन है और ब्राह्मणपदकी उद्देश्यविशेषणतया भी विवक्षा नहीं है ॥ ७ ॥


नहीं है, क्योंकि * नित्य कर्मोंमें ज्ञानोपकारकत्वनियमके असिद्ध होनेपर नित्यकर्मोंमें भी ज्ञानकी उत्पत्तिमें अक्लृप्त ही प्रतिबन्धक दुरितके विनाशकारणतारूप और † ज्ञानके प्रति साधनभूत श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुका लाभ, श्रवण, मनन आदिको प्राप्त करानेवाले अदृष्टरूप द्वारकी कल्पना करनी होगी, इसलिए अक्लृप्त कल्पनाके सामान्य होनेसे 'यज्ञेन' इस सामान्यश्रुतिसे प्राप्त नित्य और काम्यकर्मोंके साधारण विनियोगको नहीं हटाना चाहिए ॥२॥


* 'ज्ञानमें अपेक्षित उपकार नित्योंमें क्लृप्त है' यह मत प्रमाणशून्य है, ऐसा मानकर काम्योंके समान नित्यमें भी अक्लृप्त उपकारकी कल्पना समान है, इस अभिप्रायसे दूषित करते हैं, यह भाव है ।

† यदि प्रकृतमें शङ्का हो कि नित्यकर्मोंके विनियोग पक्षमें ही विधिका लाघव है, क्योंकि पक्षमें उनकी ज्ञानप्रतिबन्धकपापविनाशकी जनकता अन्य वचनसे प्राप्त होनेके कारण केवल नियम विधिसे लभ्य है, और काम्यकर्मोंकी ज्ञानप्रतिबन्धकदुरितविनाशकारणता किसीसे प्राप्त नहीं है, अतः ज्ञानमें काम्य कर्मोंके विनियोग पक्षमें विधिका गौरव अपरिहार्य है, तो यह शङ्का युक्त नहीं है,—क्योंकि इस परिस्थितिमें भी यज्ञ आदि श्रुतियोंके सङ्कोचरूप बाधके परिहारके लिए काम्य कर्मोंका भी विनियोग अवश्य है, इसीमें तात्पर्य है । यद्यपि नित्यकर्मोंसे ज्ञान-प्रतिबन्धक दुरित-विनाशरूप विशेषशुद्धिका लाभ होनेपर भी उतने मात्रसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होती है। क्योंकि प्रमाणप्रमेयासम्भावना आदि प्रत्यक्ष प्रतिबन्धक हैं, तथापि उन प्रतिबन्धकोंके निरासके लिए नित्योंमें उक्त गुरु तथा उनसे श्रवण आदिके सम्पादक अक्लृप्त अदृष्टकारणताकी विविदिषावाक्यके बलसे कल्पना करनी चाहिए, यह भाव है ।

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विद्यार्थ कर्मोंमें त्रैवर्णिकोंका अधिकार ] भाषानुवादसहित ४३१

नन्वेवमपि कथम्— ‘कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।’ इत्यादिस्मरणनिर्वाहः ? न च तस्य विद्यार्थकर्मानुष्ठानपरत्वम्, विविदिषावाक्ये ब्राह्मणग्रहणेन ब्राह्मणानामेव विद्यार्थकर्मण्यधिकारप्रतीतेः । अतो जनकाद्यनुष्ठितकर्मणां साक्षादेव मुक्त्युपयोगो वक्तव्यः, मैवम्; विविदिषावाक्ये ब्राह्मणग्रहणस्य त्रैवर्णिकोपलक्षणत्वात् ।

अब शङ्का होती है कि यद्यपि ‘तत्प्राप्तिहेतुर्विज्ञानं कर्म चोक्तं महामुने’ इत्यादि ज्ञान और कर्मके समुच्चयका प्रतिपादन करनेवाली स्मृतिका विविदिषावाक्यके साथ विरोध न हो, इसलिए ‘ज्ञान साक्षात् मुक्तिका साधन है और कर्म विद्याकी प्राप्ति द्वारा मुक्तिमें साधन है, इस प्रकार क्रमसमुच्चयसे निरूपण किया गया, तो भी

‘कर्मणैव’ ( जनक प्रभृति महानुभावोंने कर्मोंके द्वारा ही मुक्ति प्राप्त की ) इत्यादि स्मृतिकी उपपत्ति कैसे हो सकती है, [ क्योंकि इसमें ‘कर्मणैव’ ( कर्मसे ही ) इस अवधारणसे मुक्तिके प्रति कर्मातिरिक्त साधनताका खण्डन किया गया है, इसलिए साक्षात् मुक्तिके प्रति ही कर्मोंका उपयोग प्रतीत होता है ] । यदि शङ्का हो कि ‘कर्मणैव’ इत्यादि स्मृतिका तात्पर्य विद्याके लिए कर्मोंके अनुष्ठानमें ही है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ‘ब्राह्मणाः विविदिषन्ति’ इत्यादि विविदिषाश्रुतिमें ‘ब्राह्मण’ शब्दके कथनसे यही प्रतीत होता है—ब्राह्मणोंका ही विद्याके प्रयोजक कर्मोंमें अधिकार है । इसलिए * जनक आदि द्वारा अनुष्ठित कर्मोंका साक्षात् ही मुक्तिमें उपयोग है, ऐसा कहना चाहिए ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त विविदिषावाक्यमें ब्राह्मणका ग्रहण त्रैवर्णिकोंका † उपलक्षण है ।


* अर्थात् ‘विविदिषन्ति’ इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात विद्यासाधन कर्मोंमें त्रैवर्णिक अधिकृत नहीं है, इसलिए, यह अर्थ है।

† जब विविदिषावाक्यमें ब्राह्मणग्रहण उपलक्षण है, तब विद्याके प्रयोजक कर्मोंमें जनक आदिका भी अधिकार है, अतः ‘कर्मणैव’ इत्यादि स्मृतिका वचन विद्याप्रयोजक कर्मके अनुष्ठानमें ही पर्यवसित है, इसलिए उक्त वचनसे ‘तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’ ( आत्मसाक्षात्कारसे ही मृत्युका—संसारका—अतिक्रमण कर सकते हैं, उससे अन्य संसारके अतिक्रमणके लिए मार्ग नहीं है ) इस श्रुतिसे विरुद्ध साक्षात् कर्मोंमें मुक्तिसाधनता बोधित नहीं होती है, यह भाव है।

४३२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद


यथाऽऽहुरत्रभवन्तो वार्तिककाराः—

‘ब्राह्मणग्रहणं चाऽत्र द्विजानामुपलक्षणम् ।
अविशिष्टाधिकारित्वात् सर्वेषामात्मबोधने ॥’ इति ।

नहि ‘विद्याकामो यज्ञादीननुतिष्ठेद्’ इति विपरिणमिते विद्याकामाधिकारविधौ ब्राह्मणपदस्याऽधिकारिविशेषसमर्पकत्वं युज्यते; उद्देश्ये विशेषणायोगात् ।


इस विषयमें पूजनीय वार्त्तिककार कहते हैं—
‘ब्राह्मणग्रहणं चाऽत्र०’ ( विविदिषावाक्यमें ब्राह्मण-ग्रहण द्विजोंका अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यका उपलक्षण है, क्योंकि आत्मज्ञानके साधनभूत कर्मोंमें ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यका अधिकार सामान्यरूपसे सुना गया है ※) ।

और ‘विद्याकामो यज्ञादीननुतिष्ठेत्’ ( विद्याका अभिलाषी यज्ञ आदिका अनुष्ठान करे ) इस प्रकार † विपरिणत विद्याकामकी अधिकार ‡ विधिमें ब्राह्मण पद अधिकारीका समर्थक ( बोधक ) है, ऐसा नहीं कह सकते हैं, कारण कि विद्याकामरूप उद्देश्यमें विशेषणका सम्बन्ध नहीं हो सकता है ।


※ इस वार्त्तिकको सुरेश्वराचार्य विरचित वार्त्तिकके १८८९ पृष्ठमें चतुर्थ अध्याय चतुर्थ ब्राह्मणमें देखना चाहिए ।

† क्योंकि विद्याप्रयोजक कर्मोंका ही अधिकार प्रकृत है, यह भाव है, यदि इस विषयमें किसीको शङ्का हो कि विविदिषावाक्यमें ब्राह्मणशब्दमें त्रैवर्णिकोपलक्षणत्वके सिद्ध होनेपर तीनों वर्णोंका सामान्यरूपसे विद्याप्रयोजक कर्मोंमें अधिकार सिद्ध होगा और तीनों वर्णोंका सामान्यतः कर्मोंमें अधिकार सिद्ध होनेपर उसके अनुरोधसे ब्राह्मणग्रहणको उपलक्षण मान सकते हैं, इसलिए अन्योऽन्याश्रय होगा, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ब्राह्मणपदमें सामान्यतः द्विजोपलक्षणताका अनाश्रय करके ही सभी द्विजोंका विद्यार्थकर्मोंमें अधिकार वार्त्तिक वचनमें कहा गया है ।

‡ तात्पर्य यह है कि किसीको यदि शङ्का हो—विविदिषावाक्यमें ब्राह्मण शब्दके ग्रहणसे ब्राह्मणका ही विद्यार्थ कर्मोंमें अधिकार प्रतीयमान होता है, तो फिर वर्णत्रयसाधारण अधिकारकी सिद्धि कैसे होती है ? तो इसपर कहना चाहिए कि क्या ब्राह्मणशब्द यज्ञ आदि विधिके उद्देश्यमें विशेषणके समर्पकरूपसे ब्राह्मणमात्रकी अधिकारिताका बोधक है, अथवा विधेयभूत कर्त्ताके समर्पकरूपसे अथवा इन दोनोंके समर्थक न होते हुए भी अन्य गति न होनेसे अपनी केवल सन्निधिमात्रसे ब्राह्मणमात्रके अधिकारका बोधक है ? इस प्रकार तीन विकल्पोंमें प्रथम

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विद्यार्थ कर्मोंमें त्रैवर्णिकोंका अधिकार ] भाषानुवादसहित ४३३


नापि 'राजा स्वाराज्यकामो राजसूयेन यजेत' इति स्वाराज्यकामा- धिकारे राजसूयविधौ 'स्वाराज्यकामो राजकर्तृकेण राजसूयेन यजेत' इति कर्तृतया यागविशेषणत्वेन विधेयस्य राज्ञो राजकर्तृकराजसूयस्याऽराज्ञा सम्पादयितुमशक्यत्वाद् अर्थादधिकारिकोटिनिवेशवद्, इह यज्ञादिकर्तृतया विधेयस्य ब्राह्मणस्याऽर्थादधिकारिकोटिनिवेश इति युज्यते । 'सर्वथाऽपि त एवोभयलिङ्गाद्' इति सूत्रे (उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ३४)

यदि शङ्का हो कि जैसे 'राजा स्वाराज्यकामो०' (स्वाराज्यको चाहनेवाला राजा राजसूयनामक यज्ञ करे) स्वाराज्य चाहनेवालेकी अधिकार- बोधिका* इस राजसूयविधिमें 'स्वाराज्यके अभिलाषी राजा द्वारा किये जानेवाले राजसूय यज्ञसे अपना अभीष्ट सम्पादन करे' इस प्रकार कर्तृत्वरूपसे यागके विशेषण विधेयभूत राजाका—केवल राजासे किये जानेवाले राजसूयका राजासे इतर अनुष्ठान नहीं कर सकता है, इससे अर्थतः—अधिकारी कोटिमें विशेषणरूपसे निवेश होता है, वैसे ही प्रकृतमें 'विद्याका अभिलाषी पुरुष ब्राह्मणकर्तृक याग आदिका अनुष्ठान करे, इस प्रकार विधेयभूत ब्राह्मणका अर्थतः अधिकारी कोटिमें निवेश होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'सर्वथाऽपि त एवोभयलिङ्गात्'† इस ब्रह्मसूत्रमें इस प्रकारकी व्यवस्था


विकल्पका इस ग्रन्थसे परिहार करते हैं। विद्यामें यज्ञ आदिका विनियोगबोधक विधिमें विद्याभिलाषीका अधिकार सिद्ध ही है, इसलिए ब्राह्मण्यविशिष्ट विद्याकामका अधिकार विवक्षित है, ऐसा स्वीकार कर ब्राह्मणपदमें विशेष अधिकारिसमर्पकताका अङ्गीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि विधेयभूत यज्ञ आदिकी उद्देश्यत्ता केवल विद्याभिलाषीमें ही प्रतीत होती है, अतः ब्राह्मण्यरूप विशेषणकी आकाङ्क्षा नहीं है, इसलिए अनाकाङ्क्षितका विद्याकामके प्रति विशेषण रूपसे अन्वय नहीं हो सकता है। यदि विशिष्टको उद्देश्य मानें, तो गौरव होगा, विद्याकाम और ब्राह्मण्य प्रत्येकको उद्देश्य मानें, तो वाक्यभेद प्रसक्त होगा अर्थात् विद्याका अभिलाषी यज्ञ आदि करे' और 'ब्राह्मण यज्ञ आदि करे' इस प्रकार वाक्यभेद होगा, यह भाव है।

* उक्त तीन विकल्पोंमें से द्वितीय विकल्पका इस ग्रन्थसे शङ्कापूर्वक परिहार करते हैं, तात्पर्य यह है कि स्वाराज्यकाम वाक्यमें स्वाराज्याभिलाषीके प्रति राजपदका पूर्वोक्त रीतिसे विशेषणत्वरूपसे सम्बन्ध नहीं हो सकता है, इसलिए कर्तृविधायकताका अङ्गीकार करके यदि स्वाराज्यकामी राजा हो, तो राजसूय यज्ञ करे, ऐसा प्रतिपादन किया गया है। इससे अर्थात् जैसे राजाका अधिकारी कोटिमें प्रवेश हुआ है वैसे ही ब्राह्मण्यका अधिकारीकी कुक्षिमें प्रवेश क्यों नहीं, यह शङ्काका भाव है।

† 'सर्वथापि त एवोभयलिङ्गात्' इस सूत्रका अर्थ यों है—सर्वथा अपि—यज्ञ आदिके

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४३४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद


'अन्यत्र विहितानामेव यज्ञादीनां विविदिषावाक्ये फलविशेषसम्बन्धविधिः, नापूर्वयज्ञादिविधिः' इति व्यवस्थापितत्वेन प्राप्तयज्ञाद्यनुवादेन एकस्मिन् वाक्ये 'कर्तृरूपगुणविधिः, फलसम्बन्धविधिश्च' इत्युभयविधानाद्वाक्यभेदापत्तेः ।

नापि राजसूयवाक्ये राज्ञः कर्तृतया विधेयत्वाभावपक्षे राजपदसमभिव्याहारमात्राद्विशिष्टकर्तृत्वलाभद्वद् इह वाक्यभेदाय कर्तृतया ब्राह्मणविधानेऽपि ब्राह्मणपदसमभिव्याहारमात्रेण ब्राह्मणकर्तृत्वलाभात् तदधि-


की गई है कि 'कर्मकाण्डमें विहित यज्ञ आदिको उद्देश्य करके ही विविदिषावाक्यमें फलविशेषके सम्बन्धकी विधि है, अपूर्व यज्ञ आदिकी विधि नहीं है, और यदि पूर्वसे प्राप्त यज्ञ आदिका अनुवाद कर एक वाक्यमें कर्तृरूप गुण और फलसम्बन्ध इन दोनोंकी विधि मानें, तो वाक्यभेदकी आपत्ति होगी* ।

† यदि शङ्का हो कि जैसे राजसूयवाक्यमें कर्तृरूपसे राजामें विधेयत्वके अभाव पक्षमें ‡ राजपद्के सान्निध्यमात्रसे विशिष्ट कर्तृताका लाभ होता है, वैसे ही प्रकृतमें वाक्यभेदके परिहारके लिए कर्तृरूपसे ब्राह्मणका विधान न होनेपर भी ब्राह्मणपदके समभिव्याहारमात्रसे (सान्निध्यमात्रसे) ब्राह्मणकी कर्तृताका


आश्रमकर्मत्वपक्षमें या उनके विद्यासहकारित्वपक्षमें एवं—'यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहुयात्' इत्यादि वाक्योंमें जो अग्निहोत्र आदि धर्म हैं, वे ही विहित हैं, क्योंकि 'उभयलिङ्गात्' अर्थात् श्रुति और स्मृति—दोनों प्रमाण हैं, श्रुतिसे 'विविदिषन्ति यज्ञेन' इत्यादि श्रुति लेनी चाहिए और स्मृतिसे 'अनाश्रितः कर्मफलम्' (कर्मफलकी अभिलाषा न करके जो यज्ञ आदिका अनुष्ठान करता है, उसे विद्या-प्राप्ति होती है) इत्यादिका ग्रहण करना चाहिए ।

* राजसूयवाक्यमें कर्त्रादिगुणविशिष्ट अपूर्व कर्मकी ही विधि मानी गई है, अतः वाक्यभेद प्रसक्त नहीं है, अतः उसमें राजशब्दकी कर्तृरूप गुणविधायकता युक्त है, यह भाव है ।

† पूर्वोक्त तीन विकल्पोंमें से तृतीय विकल्पका इस ग्रन्थसे परिहार करते हैं। कर्तृत्वरूपसे राजामें विधेयताके न होनेपर भी राजाका ही राजसूय यज्ञमें अधिकार सिद्ध होता है, क्योंकि राजशब्दकी सन्निधिसे स्वाराज्यकामशब्द क्षत्रियपरक है, ऐसा स्वभावतः ज्ञात हो सकता है, अन्यथा राजपद व्यर्थ होगा, इस अभिप्रायसे जिनके मतमें राजाकी कर्तृत्वरूपसे विधि नहीं मानी जाती है, उनके मतमें, यह अर्थ है ।

‡ क्योंकि विद्याके हेतु यज्ञ आदिमें जैसे शूद्रका निषेध है, वैसे क्षत्रिय और वैश्यका निषेध नहीं है, अतः ब्राह्मणके समान उनका भी अधिकार है, यह भाव है ।


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विद्यार्थ कर्मोंमें शूद्रका अनधिकार] भाषानुवादसहित ४३५


कारपर्यवसानमित्युपपद्यते । अन्यत्र त्रैवर्णिकाधिकारिकत्वेन क्लृप्तानामिहापि त्रैवर्णिकाधिकारात्मविद्यार्थत्वेन विधीयमानानां यज्ञादीनां त्रैवर्णिकाधिकारित्वस्य युक्ततया विधिसंसर्गहीनब्राह्मणपदसमभिव्याहारमात्रादधिकारसंकोचासम्भवेन ब्राह्मणपदस्य यथाप्राप्तविद्याधिकारिमात्रोपलक्षणत्वौचित्यात् ॥ ३ ॥

वैदिकत्वात्तु विद्यायाः शूद्रस्यानधिकारिता ।

विद्याके वैदिक होनेसे—वेदगम्य होनेसे—उसमें शूद्रका अधिकार नहीं है ।

ननु विद्याधिकारिमात्रोपलक्षणत्वे शूद्रस्यापि विद्यायामर्थित्वादि-


लाभ होता है अतः ब्राह्मणका† ही अधिकार फलतः सिद्ध.होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जिन यज्ञोंमें तीनों वर्णोंका अधिकार कर्मकाण्डमें निश्चित किया गया है, वे ही यज्ञ प्रकृत विविदिषा वाक्यमें आत्मज्ञानके, जिनमें कि तीनों वर्ण अधिकृत हैं, उत्पादन के लिए—विधीयमान हैं, अतः उनमें तीनों वर्णोंका अधिकार युक्तियुक्त होनेसे विधिसंसर्गसे* हीन ब्राह्मणपदकी सन्निधिसे अधिकारका सङ्कोच नहीं हो सकता है, अतः 'ब्राह्मणा विविदिषन्ति' इस श्रुतिमें ब्राह्मणशब्द यथाप्राप्त सामान्य विद्याधिकारीका उपलक्षण है, यही मानना उचित है ॥ ३ ॥

† अब शङ्का होती है कि यदि विविदिषावाक्यमें ब्राह्मणशब्दको विद्याधिकारीमात्रका उपलक्षण माना जाय, तो शूद्र भी विद्यामें अभिलाषा आदि कर सकता है, अतः वह भी विद्याके उपयुक्त कर्मोंमें अधिकृत होगा ?


* विधिसंसर्गहीन अर्थात् उद्देश्यके समर्पण द्वारा अथवा विधेयके समर्पण द्वारा विधि-वाक्यार्थके अन्वयबोधमें ब्राह्मणशब्द अनुपयोगी है, राजसूय यज्ञका अन्यत्र विधान न होनेसे वर्णत्रयाधिकारता उसमें क्लृप्त नहीं है, अतः विधिसंसर्गहीन राजपदके समभिव्याहारसे राजसूयवाक्यमें राजकर्तृताका नियम है। यदि शङ्का हो कि उक्त प्रकारसे विद्यार्थ कर्मोंमें क्षत्रिय और वैश्यके समान ब्राह्मणका भी अधिकार सिद्ध ही है, तो ब्राह्मण ग्रहण व्यर्थ है, तो युक्त नहीं है, क्योंकि विद्यार्थ कर्मोंमें ब्राह्मणका मुख्य अधिकार है, ऐसा सूचित करनेके लिए ब्राह्मणका ग्रहण है, यह भाव है ।

† शङ्काका तात्पर्य यह है कि विद्या तो विधेय नहीं है, अतः उसमें अधिकार विद्यार्थित्वरूप ही होगा, और यह अर्थित्वरूप अधिकार शूद्रको भी हो सकता है, इसलिए क्षत्रिय आदिके समान शूद्रका भी विद्यार्थ कर्मोंमें अधिकार निवृत्त नहीं कर सकते हैं ।

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४३६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

सम्भवनेन तस्यापि विद्यार्थकर्माधिकारप्रसङ्ग इति चेद्, न; ‘अध्ययन-गृहीतस्वाध्यायजन्यतदर्थज्ञानवत एव वैदिकेष्वधिकारः’ इत्यपशूद्राधिकरणे (उ० मी० अ० १ पा० ३ सू० ३४) अध्ययनवेदवाक्यश्रवणादिविधुरस्य शूद्रस्य विद्याधिकारनिषेधात् । ‘न शूद्राय मतिं दद्याद्’ इति स्मृतेरपाततोऽपि तस्य विद्यामहिम्नावगत्युपायासम्भवेन तदर्थित्वानुपपत्तेश्च तस्य विद्यायामनधिकारादिति केचित् ।

केचित् पौराणिके ज्ञाने तस्याप्याहुरधिक्रियाम् ॥ ८ ॥

कोई लोग पौराणिक ज्ञानमें शूद्रका भी अधिकार मानते हैं ॥ ८ ॥

अन्ये त्वाहुः—शूद्रस्याप्यस्त्येव विद्यार्थकर्माधिकारः, तस्य वेदानु-

तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि विधिवत् अध्ययनसे [ वेदसे ] उत्पन्न होनेवाले ज्ञानसे युक्त पुरुषको ही वैदिक कर्मोंमें अधिकार है, अन्यका नहीं, इस प्रकार अध्ययनसे प्राप्त वेदवाक्योंके श्रवणसे रहित शूद्रका अपशूद्राधिकरणमें † ॰ विद्यामें अधिकारनिषेध किया गया है और ‘न शूद्राय मतिं दद्यात्’ (शूद्रको शास्त्रार्थ ज्ञान नहीं देना चाहिए) इस प्रकार की स्मृतिसे साधारणरूपसे भी विद्याकी महिमासे अर्थात् विद्यारूप ब्रह्मप्राप्तिके साधनसे ज्ञानसाधनका असम्भव होनेसे शूद्रमें विद्यार्थिता ही नहीं हो सकती है, अतः शूद्रका विद्यामें अधिकार है ही नहीं, ऐसा कुछ लोग कहते हैं ।

※अन्य कुछ लोग कहते हैं कि शूद्रका भी विद्याके उपयोगी कर्मोंमें अधिकार है । यद्यपि शूद्रका वेदाध्ययन और अग्निहोत्र आदिमें अधिकार नहीं


  • • 'शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात् सूच्यते हि' इस सूत्रसे आरब्ध अधिकरण अपशूद्राधिकरण कहलाता है, इसमें निर्णय किया गया है कि शूद्रका श्रुतिप्रतिपादित सगुण विद्यामें और निर्गुण ब्रह्मविद्याके साधन यज्ञ आदिमें अधिकार नहीं है, क्योंकि उसने वेदाध्ययन नहीं किया है। और वेदार्थानुष्ठानमें अध्ययनविधिसे सम्पादित वेदजन्य ज्ञान अपेक्षित है, अतः सगुण और निर्गुण ब्रह्मविद्यामें शूद्रका अधिकार है ही नहीं, इसीलिए तस्माच्छूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः (तै—सं) 'शूद्रो विद्यायामनवक्लृप्तः' ये उक्तार्थमें प्रमाणभूत भी हैं।
  • † 'शूद्रका भी विद्यार्थ कर्मोंमें अधिकार प्रसक्त होगा' इसे इष्टापत्ति मानकर उक्त आक्षेपका समाधान करते हैं।

विद्यार्थ कर्मामें शूद्रका अनधिकार ] भाषानुवादसहित ४३७


वचनाग्निहोत्राद्यसम्भवेऽपि कण्ठोक्तसर्ववर्णाधिकारश्रीपञ्चाक्षरमन्त्रराजविद्या-दिजपपापक्षयहेतुतपोदानपाकयज्ञादिसम्भवाद्; 'वेदानुवचनेन यज्ञेन दानेन' इत्यादिपृथक्कारकविभक्तिश्रुतेः विधुरादीनां विद्यार्थजपदानादिमात्रानुष्ठाना-नुमतेश्च वेदानुवचनादिसमुच्चयानपेक्षणात् । न च शूद्रस्य विद्याया-मर्थित्वासम्भवः ।


है, तथापि † जिनमें सब वर्णोंके अधिकारका प्रतिपादन किया गया है, ऐसे श्रीपञ्चाक्षररूप मन्त्राधिराज विद्या आदिका जप, पापक्षयके हेतुभूत-तप, दान, पाकयज्ञ आदिमें अधिकार है और 'वेदानुवचनेन' ( वेदाध्ययनसे ), 'यज्ञेन' ( यज्ञसे ) 'दानेन' ( दानसे ) इत्यादि अलग अलग कारकविभक्तिका श्रवण होनेसे विधुर आदिको विद्यार्थ जप, दान आदिके अनुष्ठानकी अनुमति होनेसे वेदानुवचन आदिके ‡ समुच्चयकी अपेक्षा नहीं है। और शूद्रकी विद्यामें अर्थिता ( अधिकारिता ) नहीं है, ऐसा भी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि


† किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः किं तीर्थैः किं तपोऽध्वरैः ।
यस्यो नमः शिवायेति मन्त्रो हृदयगोचरः ॥
मन्त्राधिराजराजो यस्तार्यवेदान्तशेखरः ।
सर्वज्ञाननिधानश्च सोऽयं शैवषडक्षरः ॥
प्रणवेन विना मन्त्रः सोऽयं पञ्चाक्षरः स्मृतः ।
स्त्रीभिशूद्रैश्च सङ्कीर्णैर्ध्यायते मुक्तिकांक्षिभिः ॥ ( ब्रह्मोत्तर खण्ड )

अर्थात् इन प्रमाणोंसे यह प्रतीत होता है कि जिसके हृदयमें ॐ नमः शिवाय यह मन्त्र है, उसको अनेक मन्त्रोंसे, अनेक तीर्थोंसे एवं अनेक प्रकारके तप और यज्ञोंसे कुछ भी प्रयोजन नहीं है। यह सब मन्त्रोंका अधिराज है, सब वेदान्तोंका मूर्धन्य है, सब ज्ञानोंका खजाना है। और यह 'ॐ नमः शिवाय' मन्त्र यदि प्रणव ( ॐ कार ) से रहित हो, तो इसे पञ्चाक्षर कहते हैं, इसी पञ्चाक्षर मन्त्रको मुक्तिके अभिलाषी स्त्री, शूद्र आदि तथा सङ्कीर्ण जातिके लोग मुक्तिके लिए भजते हैं ।

‡ 'वेदानुवचनेन विविदिषन्ति' 'यज्ञेन विविदिषन्ति' इत्यादि रूपसे प्रत्येकमें साधनताकी प्रतीति होनेसे समुच्चयकी अपेक्षा नहीं है, यदि समुच्चयकी विवक्षा होती, तो 'वेदानुवचनयज्ञदान-तपोभिर्विविदिषन्ति' ऐसा वाक्य होता और पृथक् कारकविभक्तिके श्रवणमें भी वेदानुवचनेन च, यज्ञेन च, इत्यादि चकारघटित वाक्य होता, अतः समुच्चयकी विवक्षा नहीं है, यह भाव है ।

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