सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 453, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रुतिसे विनियुक्त कर्मविशेषोंका कथन] भाषानुवादसहित ४२३
संस्काराः' इति स्मृतिमूले कर्मणामात्मज्ञानयोग्यतापादकमलापकर्षणगुणा- धानलक्षणसंस्कारार्थत्वपक्षे इवेति वदन्ति ॥ १ ॥ तत्रोपयोगः कथितः कैश्चिदाश्रमकर्मणाम् ।
कोई लोग कहते हैं कि आश्रम-कर्मोंका ब्रह्मविद्या आदिमें उपयोग है ।
ननु केषां कर्मणामुदाहृतश्रुत्या विनियोगो बोध्यते ? अत्र कैश्चिदुक्तम्- 'वेदानुवचनेन' इति ब्रह्मचारिधर्माणाम्, 'यज्ञेन दानेन' इति गृहस्थधर्मा- णाम्, 'तपसाऽनाशकेन' इति वानप्रस्थधर्माणां च उपलक्षणमित्याश्रमधर्मा-
ऐसा नियम नहीं है । जैसे कि 'यस्यैते०' ( जिस पुरुषके श्रौत, स्मार्त आदि चालीस संस्कार हैं ) इत्यादि स्मृतिसे प्रतिपादित कर्मोंके संस्कारार्थत्वपक्षमें, जो कि संस्कार आत्मज्ञानकी योग्यताके सम्पादक मलापकर्षणरूप और गुणके आधानरूप हैं, उक्त नियम नहीं है ॥ १ ॥
अब शङ्का होती है कि पूर्वोक्त श्रुतिसे किन कर्मोंका विनियोग ज्ञात होता है ? इस शङ्काके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि 'वेदानुवचनेन' * यह ब्रह्मचारीके धर्मोंका, 'यज्ञेन दानेन' यह गृहस्थ धर्मोंका और 'तपसाऽनाशकेन' यह वानप्रस्थधर्मोंका उपलक्षण है, इसलिए सभी आश्रमधर्म विद्यामें उपयुक्त
रहनेसे विविदिषासे ही श्रवणादि द्वारा ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है, श्रवण आदिके प्रतिबन्धक पापके रहनेपर यत्न करनेपर भी श्रवण आदि नहीं होते हैं, इसलिए दुरितसत्ताका निश्चय करके उसकी निवृत्तिका उपाय करता है, प्रायः निवर्तक उपायके न करनेसे श्रवण आदि नहीं हो सकते हैं, इसलिए ज्ञान भी नहीं होता है, जैसे औषधसे अन्नके भक्षणमें रुचिकी उत्पत्ति करके यदि अन्न प्राप्त हो, तो उसके भक्षणसे कृशता निकल जाती है, परन्तु यदि यत्न करनेपर भी अन्न नहीं मिला, तो कृशता ज्योंकी त्यों बनी रहती है, इसलिए उनमें अवश्य विद्योत्पादकता है, यह नियम नहीं है, यह भाव है । इसीमें दृष्टान्त है—जो लोग कर्मोंका संस्काररूप फल मानते हैं, उनके पक्षमें यदि कर्मोंसे संस्कृत पुरुषको श्रवणादिसाधन मिले, तो उसे तत्त्वज्ञान द्वारा ब्रह्मकी प्राप्ति होती है, यदि न मिले तो पुण्यलोककी प्राप्ति होती है, यह सिद्धान्त किया गया है, इसलिए कर्मोंके संस्कारार्थत्वपक्षमें कर्मोंमें विद्योत्पादकता अवश्य ही है, ऐसा नियम नहीं है, वैसे विविदिषार्थत्ववादियोंके मतमें भी है, यह भाव है ।
* शिष्य वेदका उच्चारण गुरुवचनके अनन्तर करता है, अतः वेदानुवचनशब्दसे वेदाध्ययनका ग्रहण किया जाता है, वह ब्रह्मचारीके धर्मोंमें प्रधान ही है, इसलिए वेदाध्ययनसे ब्रह्मचारीके सम्पूर्ण धर्मोंका ग्रहण किया जाता है । इसी प्रकार उत्तरोत्तर उपलक्षणमें बीज समझना चाहिए ।